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Monday, October 19, 2020

रिव्यू : दिलो दिमाग पर छाई 'भूरी'



बहुत कम फ़िल्में हैं जो आपको पलक झपकने तक नहीं देतीं।  भूरी निश्चित रूप से उनमें से एक है।  यह वासना, प्रभुत्व और अंधविश्वास की खोज करती हुई फ़िल्म है।  ग्रामीण मानसिकता की पृष्ठभूमि पर निर्मित, भूरी एक महिला का संघर्ष है, जो सत्ता में रहने वालों और अंधविश्वासों पर टिके रहने वालों के बीच की कहानी कहती  है।

 प्लॉट 
 फ़िल्म एक लड़की, भूरी की कहानी है, जो अपने बिसवां दशा में है और यह बेहद आकर्षक है।  उसे अपने गाँव के लोगों द्वारा मनहूस (अशुभ) माना जाता है।  भूरी ने तीन बार शादी की, और उसके सभी पति मर गए।  ग्रामीणों का मानना ​​है कि वह किसी भी शादी में एक अभिशाप है, और इसकी वजह यह है कि तीनों पतियों की मृत्यु हो गई।  इस सब के कारण उसे गाली दी जाती है और प्रताड़ित किया जाता है।  उसकी शादी अब एक 54 वर्षीय ईंट भट्ठा मजदूर, धनवा से हुई है। ग्रामीणों का मानना ​​है कि उसकी वजह से धनवा की भी मौत हो जाएगी।  सत्ता में रहने वाले सभी लोग- राजनेता, पुलिस और पुरुष उसके साथ सोना चाहते हैं और ऐसा करने के लिए वे धनवा पर दबाव डालते हैं और उसे परेशान करते हैं। धनवा जब तक बीमार नहीं पड़ता तब तक वह भूरि को सभी शातिरों के चंगुल से बचाने की कोशिश करता है।  तब जब भूरी सभी के बीच खुद को नीलाम करती है और फिर उसके साथ कुछ अविश्वसनीय होने लगता है जो पूरे गांव को सदमे की स्थिति में छोड़ देता है।

 फिल्म एक स्टनर है और इसमें भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों की जमीनी हकीकत को दर्शाया गया है।  फिल्म कुछ दिलचस्प मोड़ हैं। जो आपकी आंतरिक आत्मा तक को हिला देती है।  फिल्म वास्तव में समाज का स्कैन करती है और हमारे समाज की सच्चाई को दर्शाती है।  फिल्म में केवल एक खलनायक है, और वह इसकी ईमानदारी है।  इस फ़िल्म के माध्यम से ग्रामीण स्तर पर हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति को आसानी से महसूस किया जा सकता है।

 स्टार परफॉरमेंस फिल्म में कोई बड़ी स्टार कास्ट नहीं है, लेकिन भारतीय सिनेमा के कई जाने माने चेहरे हैं।  पीपली लाइव फेम रघुवीर यादव, धनवा की भूमिका निभा रहे हैं, जिन्होंने शानदार ढंग से भूमिका निभाई है।  जबकि मार्श पौर ने वास्तव में अपने अभिनय और संवाद के साथ अपनी भूमिका साबित की है, क्योंकि उन्होंने भूरी को चित्रित किया था।  आदित्य पंचोली, कुनिका सदानंद, शक्ति कपूर, मोहन जोशी, मुकेश तिवारी, मनोज जोशी और सीताराम पांचाल ने भी महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई हैं और अपने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है।

 फ़िल्म में क्या है?

 1. नाटक और वास्तविकता का एक बहुत ही सही और सटीक चित्रण। साथ ही  फिल्म में ग्रामीण क्षेत्रों की विकट स्थितियों को बिना किसी दोष के साथ प्रदर्शित किया गया है और यह दिखाया गया है कि किस तरह पुरुषवाद और अंधविश्वासों ने तर्क और मानवता पर नियंत्रण किया है।

 2. कुछ गहन संवाद डिलीवरी जो कि खुरदरी, गंदा और आम तौर पर ग्रामीण होती है।

 3. दर्शकों को एक मजबूत और सीधा संदेश।

 4. कुछ व्यंग्यात्मक टैपिंग गाने।

 फ़िल्म में क्या नहीं है?

 1. फिल्म में ग्रामीण सेटअप, पंचायत, जातिवाद, आदि के कुछ महत्वपूर्ण हिस्से याद हैं। किंतु उन्हें खूबसूरती से नहीं फिल्माया जा सका।

 2. अंधविश्वास और पुरुषवाद पर अंकुश लगाने की समस्या का कोई हल नहीं है।

 3. कहानी में कुछ-कुछ गायब हैं। या कहें झोल हैं।

 4. फ़िल्म का चरमोत्कर्ष बेहतर हो सकता था।

  यह देखना दिलचस्प होगा कि वास्तविकता और नाटक के साथ फिल्माई गई यह कहानी जो कुछ मूर्त गीतों से सराबोर है। वह दर्शकों को कब तक याद रह पाती है।  एक आउट-ऑफ-द-बॉक्स फिल्म भूरी आपको ऐसी उत्कृष्ट कृतियों के लिए तरसा जरूर जाएगी।
  अपनी रेटिंग - 4 स्टार 
Review By Tejas Poonia