Thursday, August 22, 2019

वर्तमान परिवेश में अनुवाद



भारत एक बहुभाषी विभिन्न संस्कृतियों का देश है। सभी भाषाओं में आपस में आदान-प्रदान प्राचीनकाल से ही हो रहा है। इन भाषाओं-संस्कृतियों के मध्य ‘अनुवाद‘ संवाद-सेतु के रूप में अपनी अपरिहार्य भूमिका निभा रहा है। भूमण्डलीकरण के इस युग में आज पूरा विश्व एक नजर आता है। इस हेतु अनुवाद की महती भूमिका है। आज विश्व के देश एक-दूसरे से सम्पर्क कर अपना ज्ञान-विज्ञान, तकनीक-प्रोद्यौगिकी, साहित्य-विचार सांझा कर रहे हैं। जिसमें अनुवाद की भूमिका असंदिग्ध है। ज्ञान-विज्ञान का कोई क्षेत्र शेष नहीं है, जो किसी न किसी रूप में अनुवाद से संबंधित न हो। बल्कि यह कहना ज्यादा उचित होगा कि अनुवाद ही एक ऐसा माध्यम है, जो आज सम्पूर्ण विश्व को एकसाथ जोड़ने का कार्य कर रहा है। साहित्य हो या गैरसाहित्यिक अनुवाद का मुख्य कार्य ही है कि विश्व में बिखरे सम्पूर्ण ज्ञान को एकत्रित कर उससे सभी लाभान्वित हो सके। साहित्यिक, वैज्ञानिक या तकनीकी संसार की कोई भी भाषा अनुवाद से अछूती नहीं है। विश्व साहित्य की अनुवाद प्रक्रिया प्राचीन काल से ही अनवरत् चली आ रहा है।
वैश्विक परिदृश्य पर अनुवाद का मूलरूप तो वही है, परन्तु आधुनिक रूप में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन अवश्य हुए हैं। डॉ. कृष्ण कुमार गोस्वामी के शब्दों में ‘‘वास्तव में शताब्दियों के सांस्कृतिक समन्वय की प्रक्रिया के चलते देष में सांस्कृतिक एकीकरण में दृढ़ता आई। देष के विभिन्न भाषाओं, आचार-विचारों और मत-मतांतरों के होने के बावजूद हमारी अखंडता और एकता पर कोई आंच नहीं आई। विविध भाषा-परिवारों की भाषाओं को बोलने वालों में परस्पर सद्भाव बनाए रखने में अनुवाद का बहुत बड़ा योगदान रहा है। आज भी अनुवाद एक सामाजिक आवष्यकता है।‘‘1
    मानव सभ्यता के विकास के साथ ही मनुष्य ने भौगोलिक सीमाओं का पार करना शुरू किया, जिससे अन्य समुदायों से युद्ध, मित्रता, व्यापार, धर्म-प्रचार आदि के संबंध में एक-दूसरे से मिलने के फलस्वरूप संप्रेषण का व्यापार बढ़ता गया, जिसका आधार अनुवाद है। प्राचीन समय में संस्कृत और यूनानी ही क्रमषः पूर्व व पष्चिमी की प्राचीनतम क्लासिक भाषाएँ थीं, जिनके पास प्रचुर मात्रा में ज्ञान का भंडार था। अन्य समकालीन भाषाएँ उनके समक्ष बोलियों के रूप में विद्यमान थीं। चूंकि उनके पास इन क्लासिक भाषाओं को देने के लिए कुछ विषेष नहीं था, अतः अन्य भाषाओं से इन भाषाओं मंे अनुवाद का कोई क्रम स्पष्टतः नहीं दिखायी देता। उपरोक्त दो क्लासिक भाषाओं के आधार पर विश्व अनुवाद परंपरा को दो भागों पूर्व अर्थात् भारत में अनुवाद तथा पष्चिम में अनुवाद में विभाजित किया जा सकता है। तथापि विश्व के प्राचीनतम अनुवाद की बात करे तो, इसका वर्णन प्रो. कृष्णकुमार गोस्वामी जी अपनी पुस्तक में करते हैं, ‘‘विष्व का प्राचीनतम अनुवाद रोज़ेटा प्रस्तर पर मिला है, जो लगभग 200 ई.पू. का है और उसमें मिó की दो प्राचीन लिपियों ‘हीरोग्लाइफिक‘ तथा ‘देमांतिक‘ में इतिहास तथा संस्कृति का वृत्तांत है और उसका अनुवाद प्राचीन मिóी भाषा में भी है।‘‘2
    अनुवाद परम्परा के सन्दर्भ में प्राचीन भारतीय साहित्य में अनुदित साहित्य प्रायः उपलब्ध नहीं है। जिसका प्रमुख कारण तत्कालीन साहित्य और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में भारत विष्व का सर्वाधिक विकसित देष था। प्राचीन भारतीय साहित्य में लौकिक संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभं्रष आदि भाषाओं के साहित्य को किसी अन्य भाषा में प्रस्तुत/अनुवाद करने का कोई प्रचलन ही नहीं था। सम्भवतः इसकी जरुरत भी नहीं पड़ी होगी। लेकिन काव्यषास्त्र और नाट्यषास्त्र गं्रथों में गाहा सत्सई, वड्डकहा, कर्पूर मंजरी आदि प्राकृत गं्रथों में संकलित अनेक स्थानों का संस्कृत अनुवाद अवष्य किया गया। इसके साथ तत्कालीन नाटकों में पुरुष पात्रों का संवाद संस्कृत में होता होगा। चूंकि स्त्रियां तथा अन्य निम्न वर्ग के पात्रों की बोली प्राकृत थी, तो ऐसे पात्रों के प्राकृत संवादों का संस्कृत पाठ भी साथ-साथ दिया जाता था, जिसे ‘छाया‘ कहा गया। यह एक प्रकार का अंतरभाषिक अनुवाद ही था।
    प्रामाणिक रूप से प्राकृत भाषा के अनेक गं्रथों के संस्कृत में छायावाद हुए हैं, जिनमें प्रमुख गुणाढ्य की पैशाची प्राकृत में रचित ‘बडडकहा (बृहत्कथा) के तीन रूपांतर मौजूद हैं- पहला बुध स्वामी कृत ‘बृहत्कथा-श्लोक-संग्रह‘, दूसरा क्षेमेंद्र कृत ‘बृहत्कथा मंूजरी‘ व तीसरा सोमदेव का ‘कथा सरित्सार‘। इनके बाद भारतीय पाली साहित्य में अनुदित गं्रथ नगण्य है। इसी प्रकार प्राकृत अपभ्रंशों में भी अनुदित गं्रथ न के बराबर ही है। अनुवाद की क्रमबद्ध परंपरा भारतीय साहित्य में वैसे तो नगण्य ही है, परन्तु भारतीय साहित्य का विश्व की अन्य भाषाओं में अनुवाद और रूपांतरण होते रहे हैं। सबसे पहले संस्कृत के प्राचीनतम अनुवाद चीनी भाषा में हुए हैं। बौद्ध-धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु एशिया के विभिन्न देशों के साथ ही चीन, जापान, लंका, बर्मा, बाली, बोर्नियों आदि देशों में बौद्ध साहित्य का उन देशों की भाषाओं में अनुवाद हुआ। इसके साथ रामायण और महाभारत की बहुत सी कथाएं एशियाई देशों में पहुंची। अनुवाद की दृष्टि से पंचतंत्र का प्रथम स्थान है। मूलभाषा संस्कृत से इसके अनुवाद अरबी, ग्रीक, इटालियन, स्लाव, हिब्रू, डैनिस, आइसलैंडिक, डच, फ्रांसीसी, अंग्रेजी, फारसी, लेटिन, जर्मन, स्पेनिष आदि अनेक भाषाओं में हुए हैं।3 पंचतंत्र को अरबी में ‘कलील-दमना‘ नाम से जाना जाता है।
    अनुवाद के विकास मेें मुगल काल का अपना महत्व है। सम्राट् अकबर ने प्राचीन ग्रंथों के फारसी-अरबी में अनुवाद कराने के लिए एक स्वतंत्र विभाग की स्थापना करायी, जिसमें रामायण, महाभारत व गीता जैसे महान हिन्दू धर्मग्रंथों के फारसी में अनुवाद कराये गये। इसी कड़ी में सन् 1656-1657 में मुगल सम्राट् शाहजहाँ के बड़े पुत्र शहज़ादा दारा शिकोह ने एक महायज्ञ के रूप में 52 उपनिषदों का अनुवाद फारसी में किया। महाभारत के महत्वपूर्ण भाग श्रीमद्भगवद् गीता का अनुवाद विश्व की लगभग सभी प्रमुख भाषओं मंे हो चुका है। इसी प्रकार संस्कृत-तमिल, तमिल-संस्कृत, अंग्रेजी-तमिल-अंग्रेजी, संस्कृत-अंग्रेजी, तेलुगु-संस्कृत, बंगला-संस्कृत, गुजराती-संस्कृत, मराठी व सिंधी अनुवाद भी विश्व साहित्य के परिप्रेक्ष्य में उल्लेखनीय है, जो स्वयं में विशेष अध्ययन की संभावना रखते है।
    वैदिक साहित्य के अनुवाद के पश्चात्, आधुनिक काल में हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं से अनुवाद का क्रम ईस्ट इंछिया कम्पनी के शासनकाल तथा अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार-प्रसार से प्रारम्भ होती है। गोस्वामी के अनुसार हिन्दी में अनुवाद की व्यवस्थित परंपरा सोलहवीं शताब्दी से मिलती हैं। अट्ठारहवीं शताब्दी तक प्राचीन साहित्य का अनुवाद होता रहा।.................वषिष्ट कृत संस्कृत वेदांत ग्रंथ ‘योग वषिष्ट‘ का अनुवाद रामप्रसाद निरंजनी की भाषायोग वषिष्ट (1741) को खड़ीबोली हिन्दी गद्य की प्राचीनतम पुस्तक माना जाता है।‘‘4 खड़ीबोली काव्य की प्रथम कृति श्रीधर पाठक की ‘एकांतवासी योगी‘ (1886) ऑलिवर गोल्डस्मिथ की ‘द हरमिट‘ का काव्यानुवाद ही है।
    अनुवाद के माध्यम से ईरान में कई शताब्दियों तक गुमनामी के अंधकार में खोये रहे एक फारसी कवि उमर खैय्यमी अचानक 19वीं शताब्दी में विश्व में प्रसिद्ध हो गया। उनकी रूबाइयों का अंग्रेजी में सबसे पहले अनुवाद 1859 में फिट्ज़्ाजेराल्ड ने किया। भारतीय नवजागरण के उदय के साथ ही खड़ी बोली हिन्दी का उद्भव और विकास हुआ। इस सन्दर्भ में अनुवाद की महत्ता और भी बढ़ जाती है। ‘‘यदि नवजागरण दो जातीय संस्कृतियों की टकराहट से उत्पन्न रचनात्मक ऊर्जा है, तो अनुवाद ही वह माध्यम है जो संस्कृतियों में संपर्क और टकराहट लाने में अपनी भूमिका निभाता है।‘‘5 इसमें कोई दो राय नहीं है कि नवजागरण की चेतना के पार्श्व में अनुवाद की अति महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। खड़ी बोली के विकास में अपनो अद्वितीय योगदान देने वाले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अनुवाद के माध्यम से खड़ी बोली को परिष्कृत करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। भारतेन्दु ने श्री हर्ष कृत ‘रत्नावती‘, कृष्ण मिश्र के ‘प्रबोध चन्द्रोदय‘ नाटक का ‘पाखण्ड विडम्बन‘ (1873), कंचन पंछित के ‘धनंजय विजय‘ (1873), महाकवि विशाखदत्त के ‘मुद्राराक्षस‘ (1875), जैसे संस्कृत गं्रथों के साथ ही शेक्सपीयर के ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस‘ का भी ‘दुर्लभ बन्धु‘ नाम से खड़ी बोली में अनुवाद किया। हिन्दी भाषा-साहित्य न केवल संस्कृत से समृद्ध हुआ, अपितु अंग्रेजी साहित्य के अनुवाद से भी हुआ। अंग्रेजी साहित्य के संपर्क में आने पर भारतीय साहित्यकारों ने अंग्रेजी नाटकों के अनुवाद भी आरंभ करत दिये गये। वास्तव में हिन्दी साहित्य को उपन्यास की जिस नयी विधा का परिचय हुआ, वह डेनियल डेफो के अंग्रेजी उपन्यास ‘द लाइफ एंड स्टेंªज एंड सरप्राइजिंग एडवेंचर्स ऑफ रोबिन्सन क्रूसो‘ (1719) के हिन्दी अनुवाद 1860 से हुआ। इस उपन्यास का अनुवाद काशी के पंडित बद्रीलाल ने बंगला से किया था। इसके बाद यह सिलसिला आज तक भी चल रहा है। कई महत्वपूर्ण कृतियां अनुवाद के माध्यम से ही विश्व पटल पर अपना स्थान बना पायी हैं। भारतीय भाषाओं में जो परस्पर अनुवाद हुए हैं, उनमें सर्वाधिक अनुवाद हिन्दी और अंगला के मध्य ही हुए हैं। क्योंकि हमारे देश में मुद्रण एवं पत्रकारिता के आरंभिक काल से ही बंगला व हिन्दी के बीच अनुवाद प्रक्रिया प्रारम्भ हो चुकी थी। परन्तु बंगला व हिन्दी अनुवाद के विषय में यह पहलू भी महत्वपूर्ण है कि जहां बंगला से हिन्दी में अनुवाद करने की प्रवृति अधिक रही है, वहीं हिन्दी से बंगला में अनुवाद की स्थिति संतोषजनक नहीं रही है। अपवाद के रूप में कुछ उल्लेखनीय अनुवाद अवश्य हुए हैं। तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस‘ का अनुवाद विजयकाली भट्टाचार्य ने और प्रेमचंद कृत ‘गोदान‘ और ‘निर्मला‘ का अनुवाद चित्रा देव ने किया।
    द्विवेदी युग और उसके बाद अर्थात् देश के स्वाधीनता आन्दोलन ने सारी भारतीय भाषाओं और हिन्दी को आपस में जोड़ दिया, उसके फलस्वरूप अन्य भाषाओं से हिन्दी में तथा हिन्दी से अन्य भाषाओं में अनुवाद का कार्य शीघ्रता से होने लगा।
तेलुगु, मलयालम, कन्नड, तमिल, पंजाबी, कश्मीरी आदि भारतीय भाषाओं और साहित्य में परस्पर अनुवाद व विदेशी भाषाओं से हिन्दी अनुवाद की एक सशक्त और सुदीर्घ परम्परा विद्यमान है। किसी ने स्वेच्छा से और स्वांतः सुखाय से, तो किसी ने व्यावसायिक दृष्टि से अनुवाद किया। भारतीय अनूदित साहित्य को सीमित कर पाना असंभव है। भारत में अनुवाद प्रक्रिया उतनी ही पुरानी है, जितनी मूल लेखन की। अतः अनुवाद का इतिहास-लेखन बड़ा कठिन तथा चुनौती भरा काम है। वास्तव में अनुवाद की इतिहास की संस्कृत के वैदिक-औपनिवेशिक युग में प्रारंभ हो जाता है। ये अनुवाद भारतीयों तथा विदेशियों द्वारा पूरे मन से किय गये हैं। उल्लेखनीय है कि प्रत्येक रचना के अनेक अनुवाद कई अनुवादकों द्वारा किये गये हैं। परन्तु दुःखद है कि भारतीय स्वतंत्रता से पहले हिन्दी भाषी में साहित्यकारों ने संस्कृत, अंग्रेजी, बंगला, मराठी आदि भारतीय भाषाओं के साहित्यों का अनुवाद किया गया, लेकिन स्वतंत्रता के बाद हिन्दी भाषी साहित्यकारों  और अनुवादकों ने भारतीय भाषाओं से नाममात्र के अनुवाद किया, जबकि हिन्दीतर साहित्यकारों-अनुवादकों ने अपनी भाषाओं के साहित्य का अनुवाद स्वयं किया है। वास्तव में लक्ष्य भाषा अनुवादक की मातृभाषा/प्रथम भाषा हो तो उसे अनुवाद करने में अधिक सुविधा होती है और अनुवाद में सहजता और स्वाभाविकता आने की अधिक संभावना रहती है। इस ओर ध्यान देने की अत्यंत आवश्यकता है। इसकी चर्चा आगे करेंगे।
अनुवाद के संक्षिप्त इतिहास को जान लेने के बाद जरूरत है कि क्यों न इसके वर्तमान पक्ष पर नजर डाली जाए। साथ ही अनुवाद के वर्तमान भारतीय भाषाओं के सन्दर्भ में विभिन्न भारतीय साहित्यकारों के विचारों पर प्रकाश डालें।
निश्चित ही यह युग अनुवाद का युग है। इस युग में अनुवाद तथा अनुवादकों की महत्ता व प्रासंगिकता बढ़ रही है। डॉ. सुरेश सिंघल का मानना है कि ‘‘आज अनुवाद मौलिक विधा एवं अनुषासन के समतुल्य ही नहीं उससे भी आगे निकल रहा है। अनुवादकों तथा अनुवाद से जुड़े साधकों की साधना अब रंग ला रही है। प्रकाषन् संस्थाएं, अकादमियां, विष्वविद्यालय, शोध-संस्थान, भाषा एवं साहित्य सेवी जगत् सभी जगह अनुवाद एक अनिवार्यता बनकर प्रवेष कर चुका है।‘‘6 इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज अनुवाद उपेक्षित, दोयम दर्जे का कार्य का न रहकर मौलिक सृजन के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका है। अनुवादकों ने राष्ट्र के समक्ष यह सिद्ध कर दिया है कि राष्ट्र का बहुमुखी विकास अनुवाद के बिना असम्भव था और है।
उल्लेखनीय है कि एक समय था जब अनुवाद को एक निकृष्ट कार्य समझा जाता था। अनुवाद को स्वीकृति अथवा मान्यता प्राप्त करने के लिए बड़ा लंबा संघर्ष करना पड़ा। आरम्भ में लगभग सभी अनुवादकों की तीव्र आलोचना की जाती थी और यह माना जाता था कि अनुवाद असंभव था। अनुवाद मात्र का उपहास उड़ाते हुए उस समय यह कहा गया कि अनुवाद से अभिप्राय है ‘‘किसी मरे हुए पक्षी की खाल में भूसा भर कर उसे सजावट के लिए टाँग देना या नई बोतल में पुरानी शराब डाल देना अथवा किसी सरस फल को उबालकर उसका सत्व निकाल लेना।‘‘7 अनुवाद को प्रत्येक साहित्य, प्रतिबंधित सामग्री मानता था और अवैध वस्तु के रूप में देखता था। अनूदित सामग्री तस्कर की हुई वस्तु समझी जाती थी। अतः उस समय अनुवाद को निस्सार और निरर्थक माना जाता था। एक इतालवी कहावत के अनुसार ‘अनुवादक वंचक होते हैं।‘ एफ गंुथर ने अनुवाद को अर्थ विज्ञान के साथ जोड़ा है। अनुवाद हेतु एक इतालवी कहावत और है कि ‘निष्ठायुक्त कुरूपता अच्छी है, निष्ठायुक्त संुदरता नहीं। यानि यदि अनुवाद संुदर होगा तो मूलनिष्ठ नहीं होगा और मूलनिष्ठ होगा तो सुंदर नहीं होगा। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि मूल पाठ में अंतर्निहित सौन्दर्य को हम दूसरी भाषा में उतना ही सौन्दर्ययुक्त बनाकर प्रस्तुत नहीं कर सकते। सौंदर्यविहीन अनुवाद साधारणतः टीकाएं मात्र बनकर रह जाते हैं। अनुवादक अपनी रचना से मूल की समानर्थी अभिव्यक्त्यिों की पुनर्रचना तो कर सकता है, परन्तु यथातथ्य प्रतिरूप नहीं। इसी आधार पर ‘मे‘ जैसे विद्वानों ने तो यहां तक मान लिया कि‘‘अनुवाद जैसी कोई वस्तु होती ही नहीं।‘‘ इसी प्रकार अन्य पाश्चात्य साहित्यकारों-आलाचकों के साथ भारतीय साहित्यकारों के अनुवाद संबंधित विचार उसे हीन बनाते नजर आते हैं- उदाहरणार्थ-
सिडनी, ‘‘विचार अनूदित हो सकते हैं लेकिन शब्द और उनकी अर्थ-छायाएँ अनूदित नहीं हो सकती‘‘
जॉएटे, ‘‘अनुवाद में कुछ कमी अवष्य रह जाती है। प्रायः हर भाषा के शब्दों की अपनी ध्वनियां होती हैं, जिन्हें दूसरी भाषा में ला पाना संभव नहीं होता।‘‘
राबर्ट गेब्ज, ‘‘अनुवाद असत्य या विनम्र असत्य है। वह सत्य हो नहीं सकता ऐसी स्थिति में अनुवादक वंचक हो जाएगा।‘‘
रवीन्द्रनाथ टैगोर, ‘‘अनुवाद पूर्ण संतोष देने वाला नहीं होता।‘‘
मामा वरेरकर, ‘‘लेखक होना आसान है, अनुवादक होना अत्यंत कठिन है।‘‘
खुशवंत सिंह, ‘‘हर एक कृति अनुवाद योग्य है, पर हर कृति का अनुवाद नहीं किया जा सकता।‘‘ (उक्त परिभाषाएं ‘अनुवाद सूक्त्यिां‘ नामक पुस्तक से ली गयी हैं, संपादक- कुसुम अग्रवाल व डॉ. गार्गी गुप्त, वर्ष 1984)
    उक्त इन सभी धारणाओं/विचारों के बावजूद भी अनुवाद होता रहा और उसका मूल्यांकन भी साथ-साथ किया जाता रहा। सुख और दुख की भांति मनुष्य ज्ञान को भी दूसरों के साथ बाँट लेना चाहता है। जो वह स्वयं जानता है उसे दूसरों तक पहुंँचाना चाहता है और जो दूसरे जानते हैं, उसे स्वयं जानना चाहता है। इस प्रक्रिया में भाषा की सीमाएं उसके आड़े आती हैं। इसलिए अनुवाद आज ज्ञान-विज्ञान के विकास और प्रसार का अनिवार्य साधन बन चुका है। सामान्यतः एक भाषा की किसी सामग्री के दूसरी भाषा में रूपांतर को ही अनुवाद कहते हैं। यहां ‘अनुवाद‘ शब्द या उसकी परिभाषाओं पर विस्तार से विचार करने के अपेक्षा उसकी वर्तमान प्रासंगिकता और भावी संभावना पर गहन दृष्टि डालना मुख्य उद्देश्य है।
आज के ‘विश्व-कुटुम्बकम‘ युग पुनीत भावना को साक्षात् करने का महान समय है। प्राचीन अथाह अभाव वाले युग को भूलकर हम नवीन सूचना-प्रौद्योगिकी के युग में प्रवेश कर चुके हैं। तो निश्चय ही निःसंदेह सूचनाओं-आंकड़ों से भरे इस दुनिया में एक ऐसे माध्यम की महती आवश्यकता है, जो सूचनाओं को एकरूपता से विश्व में प्रचारित-प्रसारित किया जाए। यह महान कार्य भाषाओं के परस्पर ‘अनुवाद‘ के अलावा कोई अन्य माध्यम नहीं कर सकता।आज हम सच में बहुत आगे निकल चुके हैं। विदेशी-बहुद्देशीय व्यापार तंत्र हमारे देश में प्रविष्ट हो चुका है। हमारा व्यापार भी विश्व के अनेक देशों में अपने पैर पसार चुका है। वित्तीय निवेश के साथ हमारे वैचारिक प्रवेश भी विश्व के हर कोने में हो चुका है।निःसंदेह ही हमारी राजभाषा हिन्दी का प्रचार-प्रसार भी अब वैश्विक स्तर पर हो रहा है। इन सभी कार्यांे के लिए आज सर्वाधिक कारगर माध्यम ‘अनुवाद‘ ही है। भारत के प्रसिद्ध अनुवाद विद् तथा भाषा के स्थापित विशेषज्ञ डॉ. पूरनचन्द टण्डन ने अनुवाद के महत्ता के विषय में यहां तक कह चुके हैं, ‘‘यदि विष्व की कोई एक भाषा तलाषी जाए तो वह ‘अनुवाद‘ ही है।........अनुवाद एक ‘तकनीक‘ भी है,‘कला‘ भी है, ‘विज्ञान‘ भी है और ‘षिल्प‘ भी है।‘‘8 अपने एक अन्य साक्षात्कार में उन्होंने कहा, ‘‘अनुवाद आज विष्व की भाषा बन गया है। पूरे विष्व को एक सेतु बनकर जोड़ रहा है। ऐसा सेतु जो बहु-दिषागामी है और निर्बाध आवागमन के रास्ते खोलता है। अनुवाद राजगारोन्मुख विधा तो है ही, सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर प्रतिष्ठित करने का शस्त्र भी है। आज भूमण्डलीकरण की अवधारणा को साकार करने वाला संलल्प कोई है तो वह है अनुवाद।‘‘9 प्रख्यात भाषाविद् डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार, ‘‘कुछ लोग अनुवाद को केवल षिल्प मानते हैं, तो कुछ लोग केवल कला। अनुवाद को विज्ञान प्रायः लोग बिल्कुल नहीं मानते। मेरे विचार में अनुवाद षिल्प भी है, कला भी और विज्ञान भी।‘‘10साहित्य की अनेक विधाओं की तरह ‘अनुवाद‘ भी एक विधा के रूप में पहचान बना चुका है। आज के प्रगतिशील युग में अनुवाद की महती आवश्यकता है। ‘‘अनुवाद के कारण आपसी सम्बन्धों में बढ़ोतरी हुई है। इसीलिए तो बीसवीं सदी को अनुवाद या पुनस्सृजन का युग कहा जाता है।‘‘11 बिल्कुल सही है क्योंकि आज अनुवाद की उपयोगिता मात्र भाषा और साहित्य तक ही सीमित नहीं है, वह हमारी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और राष्ट्रीय भावना और साहित्य की सर्जनात्मक चेतना की समरूपता के साथ-साथ, वर्तमान तकनीकी और वैज्ञानिक युग की पूति कर हमारे ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न आयामों को देश-विदेश मंें सयुंक्त करता है। इससे आगे की बात करें तो आधुनिक विज्ञान के विकास की नींव भी अनुवाद के माध्यम से डाली गयी है।
अनुवादों के कारण ही विश्वसाहित्य की अवधारणा अस्तित्व में आयी। साधारणतः व संक्षिप्त रूप से अनुवाद की उपयोगिता कई रूपों में हमारे समक्ष है। इस आधार पर डॉ. पूरनचंद टंडन का व्यक्तव्य बिल्कुल सटीक व समीचीन है, ‘‘किसी भी समाज-देष का विकास अनुवाद के बिना सम्भव नहीं है।‘‘12 अनुवाद क्यों? या इसकी महत्ता के विषय को प्रसिद्ध अनुवाद शास्त्री डॉ. रीतारानी पालीवाल अनुवाद-अनुवादक संबंधी प्रासंगिक बात लिखती हैं, ‘‘मानव के पास आयु, समय और साधन की एक सीमा रहती है। हर व्यक्ति संसार की प्रत्येक भाषा नहीं सीख सकता। ऐसी स्थिति में अनुवादक की वह माध्यम है, जिसके द्वारा हम सभी भाषाओं से सम्पर्क स्थापित कर सकते हैं।‘‘13 आज अनुवाद का क्षेत्र इतना विस्तारित हो चुका है कि कोई भी क्षेत्र अनुवाद से अछूता नहीं है। महान् अनुवाद शास्त्री जिन्होंने भारत में भारतीय अनुवाद परिषद का गठन किया और अनुवाद कार्य को पुनीत बनाने का अद्वितीय कार्य किया। अनुवाद की उपयोगिता के क्षेत्र में उनका मानना है, ‘‘अब अनुवाद लगभग एक स्वतंत्र शास्त्र बन गया है। उसके सिद्धान्त निर्धारित हो गये हैं। उसकी समस्याएं भी रेखांकित हो गई हैं। उसकी प्रक्रिया भी स्पष्ट है। इन सभी का अध्ययन शैक्षिक पाठ्यक्रम का एक रोचक अंग बन चुका है। इसलिए इसका निरन्तर विस्तार ही होगा। अनुवाद शास्त्र के इन प्रष्नों की गहरी छानबीन कर सकते हैं और इसके फलस्वरूप काफी सामग्री अध्येता सामने आ सकती है।‘‘14  ज्ञान-विज्ञान की जानकारी के लिए अनुवाद, व्यवहारोपयोगी रूप में अनुवाद, सांस्कृतिक विनिमय की दृष्टि से अनुवाद आवश्यक है, राजनीतिक आदान-प्रदान की जरूरत हेतु अनुवाद, विभिन्न भाषाओं का सम्पर्क स्थापित करने के लिए अनुवाद की आवश्यकता, विदेशी भाषा के अध्ययन हेतु अनुवाद, अर्जित-उपार्जित ज्ञान की निरंतरता स्थापित करने वाला माध्यम, मानव जाति के विकास में अनुवाद की महती भूमिका, भाषा की अभिव्यक्ति क्षमता का विस्तार, वर्तमान विभिन्न भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन में सहायक, अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान का अभिन्न अंग, आमजन के मेल-मिलाप का महत्वपूर्ण साधन, विश्व के महान् साहित्य/गं्रथों का परिचय, सरकारी कामकाज में अनुवाद या कार्यालयी द्विभाषिकता, वैज्ञानिक-प्रौद्योगिकी-विधि साहित्य में अनुवाद की उपयोगिता, विभिन्न देशों द्वारा किया जा रहा शोध कार्यों में अनुवाद, व्यापार-पर्यटन के क्षेत्र में आदान-प्रदान में अनुवाद का उपयोग, पत्रकारिता, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में अनुवाद की उपादेयता, वर्तमान समस्त विमर्शों के अध्ययन-अध्यापन में अनुवाद की उपयोगिता। डॉ. रामचन्द्र वर्मा के अनुसार, ‘‘आज विष्व बन्धुत्व की भावना बल पकड़ रही है। एक राष्ट्र को दूसरे राष्ट्र के निकट लाने और एक-दूसरे को समझने-समझाने के निरन्तर प्रयास हो रहे हैं। यहां भाषा ही सबसे बड़ी बाधा है। अनुवाद कार्य ही इस बाधा को दूर करने को एकमात्र साधन है।‘‘15
विज्ञान के विकास के साथ ही सूचना का महत्व भी बढ़ रहा है। विज्ञान के क्षेत्र में खोजों/अविष्कारों की जानकारियां वैज्ञानिक तुरंत पाना चाहते हैं। जिस भाषा में वह उपलब्ध है, उसे एकदम अपनी भाषा में पाने हेतु उन्हें अनुवादकों की जरूरत रहती है। विज्ञान व प्रौद्योगिकी के विकास के साथ आज दुनिया भर के लोगों का आपसी संपर्क काफी बढ रहा है। ज्ञान के क्षेत्र के अतिरिक्त व्यापार, उद्योग, पर्यटन आदि के क्षेत्र में विश्व सिमट गया है। भूमंडलीकरण के जमाने में जब मनुष्य एक दूसरे की आवश्यकताओं और उनकी पूर्ति में ज्यादा और निकट का साझीदार हुआ है तब अनुवाद की आवश्यकता और भी बढ़ गयी हे। आज बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रसाद है और इन कंपनियों के माल के बाजार दुनियाभर में विस्तारित हैं। इस बाजारों में माल की खपत हेतु अनुवाद का महत्व अपने ढंग से और बढ़ गया है। कम्पनियों के उत्पाद भाषा की सीमाओं को लांघते हुए अब जगह पहंुच रहे हैं।
चूंकि अनुवाद के परिप्रेक्ष्य में उसकी उपयोगिता से सन्दर्भित रोजगार के प्रत्येक क्षेत्र में पृथक-पृथक शोध किया जा सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि अनुवाद ही वह सशक्त माध्यम है, जिसके द्वारा भारत जैसे देश की एक सूत्रता को सही दिशा मिलती है। अनुवाद की सुविधा के अभाव में हम अपने विशाल बहुभाषी देश में ही अपरिचित जैसे रह जाते। अनुवाद ने सम्पूर्ण राष्ट्र को एकता में बांध रखा है तथा राष्ट्रीयता के सूत्रों को बिखरने से रोका हुआ है। रोजगार की दृष्टि से भी अनुवाद आज अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो रहा है। उदाहरण के लिए वरिष्ठ/कनिष्ठ अनुवादक, हिन्दी अधिकारी, अंग्रेजी-हिन्दी अध्यापक व प्राध्यापक, भाषा निदेशक, उपनिदेशक, राजभाषा अधिकारी, संवाददाता, समाचारवाचक, संपादक, बैंक अधिकारी आदि अनेक पदों पर अनुवादकों की नियुक्तियां हो रही हैं। केन्द्र-राज्य सरकार के कार्यालयों में, अस्पतालों में, बैंक, रेलवे, संसद, पर्यटन, विधानसभा, पत्र-पत्रिकाओं के कार्यालयों में, अकादमियों में, प्रकाशन संस्थानों में, रेडियो-दूरदर्शन, विज्ञापन एजेंसियों में, बीमा क्षेत्रों में, कोश विज्ञान में, भाषा संबंधी निदेशालयों व संस्थानों में, प्रदर्शनियों में, संग्रहालयों में, पुस्तकालयों में, खेलों में, अर्थजगत में, विज्ञान-तकनीकी-प्रौद्योगिकी से संबद्ध कार्यालयों में, विभिन्न विषयों, साहित्य आदि अनेक क्षेत्रों में अनुवाद की उपादेयता एवं प्रासंगिकता पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता। लाखों व्यक्ति इन अनेक क्षेत्रों में अनुवाद के जरिए धनार्जन कर रहे इस सन्दर्भ में अनुवाद शास्त्री डॉ. पूरनचंद के अनुसार, ‘‘सिनेमा भी आज अनुवाद का बहुत बड़ा मंच बन गया है। टेलीविजन के अनेक चैनल भी आज अनुवाद के माध्यम से ही अपने कार्यक्रम चला रहे हैं। ..............आज डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, जज, फैषन डिजाइनर, इंटीरियर डैकौरेटर, आर्किटैक्ट, मनोवैज्ञानिक, बिल्डल आदि भी अनुवाद के माध्यम से अपने व्यवसाय को व्यापक स्तर पर देष-विदेष में फैलाने-बढ़ाने का कार कर रहे हैं।‘‘16 निःसन्देह ही अनुवाद-कार्य जिज्ञासाओं का शांत करने वाली एक प्रकार की चमत्कारी विधा है। या यूं कहिए अतृप्त को तृप्ति तथा प्यासे को जल प्रदान करने वाली विधा है। अनुवाद शास्त्री डॉ. पूरनचंद के अनुसार, ‘‘ ‘न होने से कुछ होना बेहतर है‘ तथा कुछ से कुछ और‘ उपलब्ध कराते चलने का मूल मंत्र है अनुवाद। अनुवाद ‘षास्त्र‘ भी और इसी कारण अनुषासन की विधा भी है।‘‘17 भारतीय अनुवाद परिषद् की अधिष्ठात्री, महान अनुवाद शास्त्री व भाषाविद् डॉ. गार्गी गुप्त ने अनुवाद की उपोदयता, महत्व और प्रासंगिकता को अपने एक वाक्य में समेटते हुए कहा है कि ‘‘अनुवाद वस्तुतः एक ऐसा नीड़ है, जहाँ से विष्व-भर की यात्रा घर बैठे ही हो जाती है- ‘यत्र विष्वम् भवति एक नीडम्।‘‘18
भारतीय साहित्य के सन्दर्भ में अनुवाद की भावी संभावनाओं को कदापि नकारा नहीं जा सकता है। मशहूर लेखिका अमृता प्रीतम ने अपने साक्षात्कार में कहा भी है कि ‘‘ अनुवाद के लिए काफी संभावनाएं हैं। किन्तु काम बहुत ही कम हुए हैं।‘‘19 इनके इस वाक्य से यह तो स्पष्ट है कि भारत में अनुवाद का क्षेत्र तो अति विस्तृत है, लेकिन काम अभी उस स्तर पर नहीं हुआ है, जो कि होना चाहिए था। उसका कारणों पर प्रकाश डालते हुए अपने साक्षात्कार में आगे वे कहती हैं, ‘‘हमारे यहाँ अनुवाद के लिए जमीन तो है किन्तु मौके नहीं। गैर-सरकारी प्रकाषक अनुवाद छापते कहाँ है? सरकारी योजनाअें की अपनी सीमाएं हैं। अनुवाद के के चयन में सरकार का अपना दृष्टिकोण है। अच्छे अनुवादक को सेवा का मौका अक्सर नहीं मिलता है।......अनुवाद भी ज्यादातर -काण्ट्रेट के तौर पर दिया जाता है। अनुवाद पर उसका बुरा असर पड़ता है। पैसे के चक्कर में पड़ने वाला आदमी समर्पित मन से अनुवाद नहीं करेगा। कुछ प्राध्यापक लोग छात्रों से अनुवाद कराकर अपने नाम छपवाते हैं। गरीब लेखकों से अनुवाद कराकर अपना नाम रखने वाले अनुवादक भी हमारे बीच में है। निष्ठा के साथ न करें तो अनुवाद का स्तर अपने आप ही गिर जाएगा।‘‘20  उनकी इन बातों में कितना कड़वा सच छिपा है। इस सच से सामना अक्सर अनुवाद से जुड़े व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से हो ही जाता है। आमतौर पर अनुवादक को लेखक से नीचे पायदान पर माना जाता है। इसके अन्य पहलू पर भी प्रकाश डालना समीचीन होगा कि अनुवादक की निष्ठा अनुवाद के प्रति कमतर होने का मुख्य कारण क्या है? इस सन्दर्भ में प्रसिद्ध अनुवादक सरला जगमोहन का कहना है कि ‘‘अनुवादक को उतने पैसे नहीं मिलते हैं, लेकिन केवल पैसे की ही बात नहीं है- दाम भी नहीं मिलता और नाम भी नहीं मिलता और दुःख तो इस बात का है कि उसे जितना चाहिए उतना यष भी नहीं मिलता है। बड़ी-बड़ी पत्रिकाओं और अखबारों में भी अनुवादकों का नाम पीछे रखा जाता है। खुद कहने में अफसोस होता है कि साहित्य अकादमी जैसे संस्था को हालांकि वह अनुवादक का नाम जरूर देती है, लेकिन गौण बनकर।‘‘21  जबकि होना यह चाहिए कि मूल लेखक के नाम के साथ ही अनुवादक का नाम भी होना चाहिए। पुस्तकों-पत्रिकाओं में भी ऐसे ही अनुवादक का दर्जा नीचा हो जाता है। यह पैसे मिलने से भी ज्यादा दुर्भाग्य की बात है। इस बात की पुष्टि श्रीपाद रघुनाथ जोशी के व्यक्तव्य के होती है, ‘‘अधिकांष अनुवादकों ने उसके लिए मेहनत नहीं की और यह समझा गया कि दो भाषाओं का मामूली ज्ञान हो तो कोई भी अनुवाद कर सकता है।..... इसीलिए हमारे यहां अनुवादों का स्तर बहुत अच्छा नहीं है।‘‘22
अनुवाद की प्रासंगिकता और विलक्षणताओं के प्रकाश में विश्व की सभी भाषाओं में अनुवाद की कई शैलियां और प्रविधियां अपनायी गयी हे। यदि अनुवादक सावधानीपूर्वक शब्द और अर्थ की आत्मा का स्पर्श करते हुए स्त्रोत भाषा की प्रकृति के अनुरूप लक्ष्य भाषा में अनुवाद उपस्थित करता है, तो यही आदर्श अनुवाद होगा। ‘‘श्रेष्ठ अनुवादक को ऐसा कुषल चिकित्सक कहा गया है, जो बोतल में रखी दवा को अपनी सिरिंज के द्वारा रोगी के शरीर तक यथावत् पहुंचा देता है।‘‘23  अनुवादक ही स्त्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा की मूल कड़ी होता है, इसलिए अनुवाद के क्षेत्र में अनुवादक की भूमिका ही सबसे महत्वपूर्ण होती है। अनुवादक का चाहिए कि उसका उक्त दोनों भाषाआंे पर प्रभुत्व हो। जब तक प्रभुत्व नहीं होता तब तक अनुवाद नहीं करना चाहिए। ज्यादा से ज्यादा शब्दकोशों को प्रयोग करने की आदत डालनी चाहिए। प्रमुख अनुवाद के क्षेत्र में जाना पहचाना नाम है श्रीपाद रघुनाथ जोशी, उनके अनुसार अनुवादक की योग्यता, ‘‘अनुवादक के पास अनुवाद के लिए वैसी ही प्रतिभा होनी चाहिए, जैसी मौलिक लेखक के पास होती है। दोनों भाषाओं पर आपको ऐसा अधिकार होना चाहिए जैसे दोनों मातृभाषाएँ हों।.........मौलिक लेखन की अपेक्षा अनुवाद में अधिक परिश्रम, अधिक बुद्धि और अधिक प्रतिभा की जरूरत होती है।‘‘24 अनुवादकों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए और उनकों उत्साहित करने के उद्देश्य से वह आगे कहते हैं, ‘‘अनुवादकों से मैं यह कहूँा कि भाई, पहले तो अपने लिए समझो कि मैं अनुवादक हूँ और साहित्यिक समाज का महत्वपूर्ण अंग हूँ। मैं कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हूँ या दूसरे दर्जे का लेखक नहीं हँ। समझो कि मैं वेसा ही लेखक हूँ, जैसाकि कोई दूसरा लेखक होता है। मैं भी उतना ही महत्वपूर्ण हॅँू। यह अस्मिता उसमें पहले आनी चाहिए। मैं अपनी ‘टर्म्स डिक्टेट‘ कर सकता हूँ, यह स्वाभिमान उसमें आना चाहिए।‘‘25 अनुवाद कार्य कम होने का एक अन्य मुख्य कारण अनुवाद की आवश्यकतानुसार शब्दकोशों का न मिलना या अधूरा शब्दकोश मिलना है। कोश हमारी एक मुख्य समस्या है। अभी भी हमारे यहां पारिभाषिक शब्दों भारी कमी है। यह कमी वैज्ञानिक, विधि, प्रौद्योगिकी, कार्यालयी अनुवाद के क्षेत्र में विशेषकर खलती है। वैसे हमारे यहाँ सभी भाषाओं में पारिभाषिक शब्दों का अभाव बड़ी आम बात है। वैसे इस क्षेत्र में कई प्रयास हुए हैं और हो रहे हैं। सरला जगमोहन इस विषय में कहती हैं, ‘‘केन्द्रीय हिन्दी निदेषालय के पारिभाषिक शब्दकोष के दो खण्ड हैं, लेकिन वे भी पर्याप्त नहीं। उनमें जिस तरह के जिस सावधानी और चौकसी से काम होना चाहिए था और जितने उत्साह से काम होना चाहिए था, वह नहीं हो पाया है।‘‘26  परन्तु इसमें एकदम सख्त होना भी लाज़मी नहीं होगा क्योंकि जिस भाषा में अनुवाद होगा, तो उसमें जो प्रचलित शब्द प्रयोग में आते जाएंगें, उनसे अलग या हटकर भी कुछ नये प्रयोग करने को अनुवादक को तैयार रहना चाहिए।
जैसा कि कुछ लोग मानते है कि अनुवाद छल है, कपट है, प्रवन्चना है, पाप है। कुछ लोग यह तक मानते है कि अनुवाद में मौलिकता नहीं होती। अनुवादक का प्रदेय उल्लेखनीय नहीं होता। कोई भी विधा या अनुशासन छोटा या बड़ा नहीं होता। अनुवाद और मौलिक लेखन भिन्न-भिन्न दो प्रक्रियाएं हैं, लेकिन एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी एक का दूसरे से ऊँचा या नीचा मानने की गलती जो आज तक हम करते आ रहे हैं, वह अब बन्द होनी चाहिए। डॉ. शरद चन्द्रा इस विषय में कहते हैं कि ‘‘अनुवाद कार्य को हीन कार्य शायद वे लोग मानते हैं, जिनको अनुवाद का कोई अनुभव नहीं होता। जो लोग इसे हीन मानते हैं, उन्हें शब्दकोष लेकन बैठा दीजिए, फिर देखिए वे क्या करते हैं। जो लोग स्वयं मौलिक लेखन करते हैं और अनुवाद कार्य भी करते है, वही जानते हैं कि अनुवाद मौलिक लेखन की तुलना में कितना दुष्कर कार्य है।‘‘27
अनुवाद के भविष्य के विषय में हिन्दी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. श्यामसिंह ‘शशि‘ का चिंतन कुछ प्रकार है ‘‘आज जब सारा विष्व अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव तथा सह-अस्तित्व की दिषा में आगे बढ़ रहा है, सैकड़ों भाषाओं में विचारों के आदान-प्रदान हो रहे हैं, तो अनुवाद का भविष्य भी उज्ज्वल दिखायी पड़ता है।...... आज आवष्यकता है अनुवाद के नये क्षेत्रों को खोजने तथा अच्छे अनुवादक तैयार करने की ताकि अनुवाद का पथ प्रषस्त हो, भविष्य और अधिक उज्ज्वल हो।‘‘28 अनुवाद आज विश्व की भाषा बन गया है। पूरे विश्व को एक सेतु बनकर जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। यह सेतु बहु-दिशागामी है और निर्बाध आवागमन के रास्ते खोलता है। अनुवाद रोजगारोन्मुख विद्या तो है ही, सामाजिक तथा सांस्कृतिक स्तर पर प्रतिष्ठित करने का शस्त्र भी है। आत्मविश्वास प्रदान करने का सूत्र भी अनुवाद ही है। आज भूमण्डलीकरण की अवधारणा को साकार करने वाला संकल्प यदि कोई है तो वह है अनुवाद।आज के युग में अनुवाद को जितना महत्व मिल रहा है, वह पहले कभी नहीं मिला, क्योंकि आज अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भाषा का परस्पर सम्पर्क पहले की अपेक्षा में बढ़ गया है। आज विभिन्न देशों की संस्कृतियों की विपुल संपदा हमारे सामने है और हम उनसे सांस्कृतिक आदान-प्रदान करने हेतु उत्सुक है। इसलिए अनुवाद को सेतु बनाना हमारी विवशता भी है और जरूरत दोनों ही है। यदि अनुवाद न किये गये होते तो आज वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, कबीर आदि विदेशों में तो क्या शायद अपने ही देश में भी न जाने जाते। अनुवाद न होता तो अरस्तु, प्लेटों, सुकरात, शैली, शेक्सपियर, मोपांसा, चेखव आदि महान् लेखकों की विचार-सम्पदा से सारा विश्व कैसे लाभान्वित होता। टैगोर, बंकिम और शरतचन्द्र केवल बंगाल तक ही सीमित रह जाते। अर्थात् साहित्य और साहित्यकारों का अस्तित्व का आधार बिन्दु यदि अनुवाद को कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए।
विभिन्न साहित्यिक विमर्शों की आधारशिला भी अनुवाद के माध्यम से ही मजबूत हुई है। दलित, स्त्री, आदिवासी, पसमांदा, अल्पसंख्यक चाहे कोई भी साहित्यिक विमर्श क्यों न हो विभिन्न भाषाओं से हुए परस्पर हुए अनुवाद के कारण ही आज साहित्य जगत में उक्त विमर्शों पर चर्चा करना संभव हो पाया है। अभी हाल ही 30 सितम्बर को अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस मनाया गया। दिनांक 30.09.2016 के दैनिक हिन्दुस्तान में संपादकीय पृष्ठ पर वरिष्ठ लेखिका मधु बी जोशी का सारगर्भित लेख ‘कुछ अनुवाद जिन्होंने पूरी दूनिया ही बदल दी‘ में उन्होंने तीन अनूदित धर्मग्रन्थों रामायण, बाइबिल व रामचरितमानस की अनुवाद के सन्दर्भ में संक्षिप्त पर अनोखी चर्चा की। उनके लेख से स्पष्ट होता है कि अनुवाद मात्र एक ऐसा माध्यम है, जो पूरे विश्व को बदलने की क्षमता रखता है।
वर्तमान युग अनुवाद का युग है। सोच व व्यवहार के प्रत्येक स्तर पर हम अनुवाद पर आश्रित हैं, अनुवाद के आग्रही है। जीवन का कोई क्षेत्र शायद ही ऐसा हो, जिसमें अनुवाद की उपादेयता प्रमाणित न की जा सके। अपरिहार्य तौर पर अनुवाद एक व्यापक और प्रासंगिक स्थिति है। इसलिए यह सर्वथा स्वाभाविक ही है कि नये संसाधनों के विकास और व्यापकतर मानवीय सम्पर्कों के संदर्भ में अनुवाद के महत्व, प्रासंगिकता और भविष्य का अनुशीलन किया जाये। विश्व में प्रयुक्त पांच हजार से अधिक भाषाओं और बोलियों के बीच वैचारिक, सर्जनात्मक और कार्यात्मक सामंजस्य स्थापित रखने के लिए अनुवाद ही सर्वाधिक लोकप्रिय एवं उपयोगी माध्यम बन गया है।
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---ःसन्दर्भ सूचीः---
भारत की समसांस्कृतिक भाषाएँ और अनुवाद, ले. प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी, अनुवाद त्रैमासिक, जनवरी-मार्च 2016, अंक 166, पृ0 26
अनुवाद विज्ञान की भूमिका, कृष्ण कुमार गोस्वामी, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2008, पृ0-473
वही, पृ0-434
वही, पृ0-443
वही, पृ0-446
प्राक्कथन, अनुवाद अनुभूति एवं अनुभव, प्रधान संपादक डॉ. सुरेश सिंघल, संजय प्रकाशन, नयी दिल्ली, वर्ष 2006
अनुवाद मूल्यांकन, प्रधान संपादक डॉ. नीता गुप्ता, भारतीय अनुवाद परिषद, वर्ष 2002, पृ0-20 
अनुवाद के विविध आयाम, डॉ. पूरनचन्द टण्डन, हरीष कुमार सेठी, तक्षशिला प्रकाशन नयी दिल्ली, वर्ष 2012, भूमिका से
अनुवाद अनुभूति एवं अनुभव, प्रधान संपादक डॉ. सुरेश सिंघल, संजय प्रकाशन, नयी दिल्ली, वर्ष 2006, पृ0 321
अनुवाद विज्ञान और संप्रेषण, प्रो. हरिमोहन, तक्षशिला प्रकाशन, वर्ष 2014 से उदृधत, पृ019
अनुवादः स्वरूप और समस्याएं, डॉ. गिरीश सोलंकी, पैराडाईज पब्लिशर्स, जयपुर, वर्ष 2012, पृ0 51
राजभाषा के विकास में अनुवाद की भूमिका, मुख्य संपादक डॉ. गार्गी गुप्ता, भारतीय अनुवाद परिषद, नयी दिल्ली, पृ0163
अनुवाद प्रक्रिया एवं परिदृश्य, रीतारानी पालीपाल, वाणी प्रकाशन नयी दिल्ली, वर्ष 2010, पृ0 105
पश्चिम में अनुवाद कला के मूल स्त्रोत, पृ0 107
अनुवाद कला, डॉ. रामचन्द्र वर्मा शास्त्री, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, वर्ष 2012, पृ0 10
राजभाषा के विकास में अनुवाद की भूमिका, मुख्य संपादक डॉ. गार्गी गुप्ता, भारतीय अनुवाद परिषद, नयी दिल्ली, पृ0168-169
अनुवाद का व्याकरण, मुख्य संपादक डॉ. गार्गी गुप्ता व भोलानाथ तिवारी, भारतीय अनुवाद परिषद, नयी दिल्ली, पृ023
वही, पृ0134
अनुवाद अनुभूति एवं अनुभव, प्रधान संपादक डॉ. सुरेश सिंघल, संजय प्रकाशन, नयी दिल्ली, वर्ष 2006, पृ0 6
वही, पृ0 6-7
वही, पृ0 59
अनुवाद अनुभूति एवं अनुभव, प्रधान संपादक डॉ. सुरेश सिंघल, संजय प्रकाशन, नयी दिल्ली, वर्ष 2006, पृ0 69
इ.ग.रा.मु.विवि के पाठ्यक्रम पी.जी.डी.टी.-01 से साभार
अनुवाद अनुभूति एवं अनुभव, प्रधान संपादक डॉ. सुरेश सिंघल, संजय प्रकाशन, नयी दिल्ली, वर्ष 2006, पृ0 78
वही, पृ0 81)
वही, पृ0 61)
वही, पृ0 210)
(अनुवाद का भविष्य, डॉ. श्यामसिंह ‘शशि‘, अनुवाद बोध, संपादक-डॉ. गार्गी गुप्ता व डॉ. पूरन चंद टंडन, भारतीय अनुवाद परिषद, नयी दिल्ली, वर्ष 2001, पृ0 147)

सहायक प्राध्यापक (हिन्दी साहित्य एवं भाषा विज्ञान)
"हिन्दी विभागाध्यक्ष"
शहीद बेलमती चौहान राजकीय महाविद्यालय पोखरी (क्वीली) टिहरी गढ़वाल उतरा

Tuesday, May 21, 2019

प्रकाशित लेख: स्वतंत्रता प्राप्ति में असहयोग आंदोलन की भूमिका



इस वर्ष हम अपनी आज़ादी की 71वीं वर्षगांठ मनाने जा रहे है. देश को स्वतंत्र कराने में कई आंदोलनों की भूमिका रही है, जिनमे से एक था ‘असहयोग आन्दोलन’.  1 अगस्त 2018 को इस आन्दोलन के 98 बरस पुरे हो चुके हैं. असहयोग आंदोलन की शुरुआत महात्मा गाँधी जी द्वारा 1 अगस्त, 1920 को की गयी। इस आन्दोलन की वजह बने 1918 में लागू रोलट एक्ट, 13 अप्रैल 1919 में हुआ जलियांवाला बाग हत्याकांड, और पंजाब में मार्शल लॉ, जिसके अंतर्गत एक खास सड़क से गुजरते हुए लोगों को घुटने के बल रेंगते हुए चलने के लिए कहा जाता था. अंग्रेज अधिकारी जिसको दोषी मानते थे, उन्हें कोड़े लगाना एक बात हो गयी थी. इस काम के लिए कुछ स्थानों को निर्धारित कर दिया गया था. यह सभी 289 लोगों को सजा देने से अलग की कार्यवाही थी. सजा पाने वालों में 51 को फांसी और 46 को उम्रकेद दी गयी थी. साथ ही 1913 से  1918 के मध्य सभी वस्तुओं का दाम दोगुना हो गया था, जिसके चलते देश में भुखमरी और गरीबी चरम पर पहुँच गयी और जिसके कारण महामारी में कई लोगों की जानें गयी. परन्तु इस क्षेत्र में भी ब्रिटिश हुकुमत ने कोई भी सकारात्मक कार्य नहीं किया. इन सब घटनाओं से गाँधी जी समझ गए थे कि ब्रिटिश हुकूमत भारतीयों के प्रति नरमी नहीं बरतेगी बल्कि उनका दमन ही करेगी. 
    अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों की विरोध में 1 अगस्त 1920 में ‘असहयोग आन्दोलन’ के कार्यक्रम पर विचार करने के लिए कोलकाता में एक विशेष अधिवेशन बुलाया. जिसकी अध्यक्षता लाला लाजपत राय ने की. इसी अधिवेशन में महात्मा गाँधी ने असहयोग का प्रस्ताव पेश किया था. शुरू में इस प्रस्ताव का विरोध एनी बेसेंट,  मदन मोहन मालवीय, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, विपिनचंद्र पाल, देशबंधु चितरंजन दास, मोहम्मद अली जिन्ना, शंकरन नायर तथा सर नारायण चन्द्रावरकर ने किया, किंतु अली बंधुओं तथा मोतीलाल नेहरू के समर्थन से यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया। यहीं से गांधी युग की शुरुआत भी मानी जाती है। 
    गाँधी जी ने अलीबंधुओं के साथ पुरे देश का भ्रमण किया एवं लोगों को असहयोग आन्दोलन में भाग लेने का आह्वान किया. अप्रैल में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के विजयवाड़ा अधिवेशन में तिलक कोष में एक करोड़ राशि एकत्रित करने का निर्णय लिया गया था. इसी अधिवेशन में 20 लाख चरखे लगाये जाने का भी फैसला लिया. साथ ही गाँधी जी ने भारतीयों से विनती की कि वह अंग्रेजों द्वारा दी गयी सभी उपाधियाँ एवं सरकारी पदों का त्याग करे दें और उन्होंने कहा कि अपने बच्चों को अंग्रेजी विद्यालय और विश्वविद्यालयों में पढने के लिए न भेजें. उन्होंने भारतीय जनता से अपील की अंग्रेजी संस्थाओं का त्याग करें और विदेशी वस्तुओं तथा न्यायालयों का बहिष्कार करें.
    आन्दोलन शुरू करने से पहले ही गांधी जी ने ‘कैसर-ए-हिन्द’ पुरस्कार को लौटा दिया, अन्य सैकड़ों लोगों ने भी गांधी जी के पदचिह्नों पर चलते हुए अपनी पदवियों एवं उपाधियों को त्याग दिया। ‘राय बहादुर’ की उपाधि से सम्मानित जमनालाल बजाज ने भी यह उपाधि वापस कर दी। गाँधी जी इन विचारों का बहुत ही गहरा प्रभाव भारतीय जनता पर पड़ा और असहयोग आन्दोलन का अच्छा परिणाम निकला. प्राप्त तथ्यों के अनुसार पहले ही महीने में 90 हज़ार विद्यार्थियों ने स्कूल-कॉलेज छोड़ दिए. भारी संख्या में विद्यार्थियों ने कलकत्ता, लाहौर में हड़तालें कीं. इसी समय देश में कई राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई जिनमें मुख्य- काशी विद्यापीठ, बिहार विद्यापीठ, गुजरात विद्यापीठ तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ, राष्ट्रीय कॉलेज लाहौर, जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली तथा  अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय.
    संस्थाओं के बहिष्कार में बंगाल के बाद पंजाब का स्थान था. बंगाल में चितरंजनदास और पंजाब में लाला लाजपत राय ने इस आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे. वकालत छोड़ने वाले चोटी के वकीलों में सी.आर. दास टी. प्रकाशन, एम.आर. जयकर, मोतीलाल नेहरू, किचलू, राजेन्द्र प्रसाद, राजगोपालाचारी, जवाहरलाल नेहरू, आसफ अली, विठ्ठलभाई पटेल, वल्लभ भाई पटेल आदि शामिल थे. 
    असहयोग आन्दोलन का सबसे महत्वपूर्ण अस्त्र साबित हुआ ‘विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार’. देश के हर क्षेत्र में इसका व्यापक असर हुआ. विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गयी, महिलाओं ने विदेशों में बनी साड़ियों एवं दुपट्टों को आग के हवाले कर दिया. लोग विदेशों में बने कपड़ों का त्याग कर खादी और स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग दैनिक जीवन में करने लगे. कांग्रेस और खिलाफत स्वयंसेवकों ने विदेशी कपड़ों की दूकानों पर पिकेटिंग की और हड़ताले संगठित की. इतिहासकार ए.आर. देसाई ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय राष्ट्रवाद की सामाजिक पृष्ठभूमि’ में जिक्र किया है “उनकी संख्या गैर क़ानूनी करार दी गयी फिर भी वे अपना काम करते रहे और बड़ी तादाद में गिरफ्तार होते रहे. सरकार ने आन्दोलन के सभी प्रमुख नेताओं को साल के खत्म होने से पहले गिरफ्तार कर उन्हें जेल भेज दिया.” इस आन्दोलन के चलते लगभग 30 हज़ार लोग गिरफ्तार हुए. विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का परिणाम यह हुआ कि 1920-21 में जहाँ एक अरब दो करोड़ रुपये दाम के विदेशी कपड़ों का आयात हुआ था, वहीँ  1921-22 में यह घटकर 57 करोड़ पर ठहर गया. विदेशी कपड़ों के बहिष्कार के परिणाम स्वरूप स्थानीय कपड़ा उद्योग को प्रोत्साहन मिला.
    असहयोग आन्दोलन बहुत प्रभावशाली तरीके से भारत के जनमानस तक पहुँच रहा था और बहुसंख्यक रूप से लोग इससे जुड़ रहे थे. यह आन्दोलन लगभग 2 वर्षों तक बहुत ही सफ़लतापूर्वक चलता रहा और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की क्रांति के बाद पहली बार असहयोग आंदोलन से अंग्रेजी राज की नींव हिल गयी। ब्रिटिश तंत्र द्वारा इस आन्दोलन को कुचलने के लिए कई प्रयास किये गए, परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली. बल्कि यह प्रतिदिन बढ़ता रहा. जब ब्रिटिश हर प्रकार से आन्दोलन को रोकने में विफल रहे, तब उन्होंने कांग्रेस के कुछ सक्रिय नेताओं के साथ-साथ गाँधी जी को भी गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया. चूँकि गाँधी जी उस समय भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के सर्वाधिक प्रमुख व्यक्ति थे. यह देखकर जनता ने विरोध शुरू कर दिया. यह विरोध हिंसात्मक होने लगा.       जिसके फलस्वरूप 5 फरवरी 1922 इस्वी को जनता ने गोरखपुर जिले के चौरा-चौरी नामक स्थान पर एक पुलिस चौकी में आग लगा दी गयी जिसमें 22 पुलिस वालों की जान गयी. इस हिंसक घटना से गाँधी जी बहुत आहात हुए और असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया. 12 फरवरी, 1922 को बारदोली में हुई कांग्रेस की बैठक में इस आन्दोलन को अपने फैसले के विषय में गाँधी जी ने ‘यंग इंडिया’ में लिखा था, ‘आन्दोलन को हिंसक होने से बचाने के लिए मैं हर एक अपमान, हर एक यातनापूर्ण बहिष्कार, यहाँ तक कि मौत भी सहने को तैयार हूँ.’ गाँधी जी द्वारा असहयोग आन्दोलन के स्थगन पर मोतीलाल नेहरू ने कहा कि, "यदि कन्याकुमारी के एक गाँव ने अहिंसा का पालन नहीं किया, तो इसकी सज़ा हिमालय के एक गाँव को क्यों मिलनी चाहिए।" अपनी प्रतिक्रिया में सुभाषचन्द्र बोस ने कहा, "ठीक इस समय, जबकि जनता का उत्साह चरमोत्कर्ष पर था, वापस लौटने का आदेश देना राष्ट्रीय दुर्भाग्य से कम नहीं"। आन्दोलन के स्थगित करने का प्रभाव गांधी जी की लोकप्रियता पर पड़ा। 13 मार्च 1922 को गांधी जी को गिरफ़्तार किया गया तथा न्यायाधीश ब्रूम फ़ील्ड ने गांधी जी को असंतोष भड़काने के अपराध में 6 वर्ष की कैद की सज़ा सुनाई। स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणों से उन्हें 5 फ़रवरी 1924 को रिहा कर दिया गया। इन आलोचनापरक वाक्यों से यह तो स्पष्ट हो ही चुका है कि असहयोग आन्दोलन देश को आजाद कराने में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था. इस वर्ष इस आन्दोलन के 98 वर्ष पूर्ण होने जा रहे हैं. इस प्रकार असहयोग आन्दोलन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलनों की संघर्षमय यात्रा में मील का पत्थर साबित हुआ.
अंत में असहयोग आन्दोलन के परिणाम की चर्चा करते हैं, जिसकों कुछ बिन्दुओं में समझाने का प्रयास किया है-
  1. असहयोग आन्दोलन से प्रभावित होकर लगभग 2 तिहाई मतदाताओं ने विधानमंडल के चुनाव का बहिष्कार किया और इन मतदाताओं ने अपने मत का प्रयोग नहीं किया.
  2. अध्यापकों और विद्यार्थियों ने स्कूल जाना छोड़ दिया.
  3. कई भारतीयों ने जो सरकारी सेवा में थे, अपने-अपने पदों से इस्तीफा दे दिया और असहयोग आन्दोलन का हिस्सा बने गए.
  4. भारतीय जनता में ब्रिटिश हुकूमत में खिलाफ बहुत क्रोध था और उन्होंने विदेशी कपड़ों के जगह-जगह होली जलायी.
  5. जिस समय असहयोग आन्दोलन हो रहा था, उस समय ब्रिटेन के राजकुमार ‘प्रिन्स ऑफ़ वेल्स’ का 17 नवम्बर 1921 आगमन हुआ और उनका स्वागत एवं प्रदर्शनों से किया गया.
  6. असहयोग आन्दोलन स्वतंत्रता प्राप्ति के संघर्ष का महत्वपूर्ण अंग बन गया और भविष्य में इस आन्दोलन में भारत की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.


सहायक प्राध्यापक (हिन्दी साहित्य एवं भाषा विज्ञान)
"हिन्दी विभागाध्यक्ष"
शहीद बेलमती चौहान राजकीय महाविद्यालय पोखरी (क्वीली) टिहरी गढ़वाल
उत्तराखंड

Tuesday, February 12, 2019

भारतीय सिनेमा में नारी - दशा व दिशा

 भारतीय सिनेमा के निर्माण को एक शताब्दी से अधिक का समय हो चला है। बावजूद इसके महिलाओं, औरतों, नारियों की स्थिति में आशानुकूल परिवर्तन नहीं हो पाया है। सिनेमा के पितामह दादा साहब फाल्के ने जब इस दिशा में पहला कदम बढ़ाया तो निसंदेह उन्होंने यह नहीं सोचा होगा कि आगे जाकर समाज को मनोरंजित करने वाला, जगाने वाला, विभिन्न रसों से परिपाक करने वाला माध्यम इन स्थितियों, परिस्थितियों का भी सामना करेगा। इतने दशक गुजर जाने के बाद भी सिनेमा के विभिन्न रूपों (भाषाओं) में महिला निर्देशकों, कैमरामैन, म्यूजिक डायरेक्टर की संख्याओं को उंगलियों पर गिना जा सकता है। सिनेमाई दुनिया में लैंगिक असमानताएँ शुरुआत से ही रही हैं। भारतीय सिनेमा के नाम पर कुछ ही महिलाओं के नाम हमारे ज़ेहन में उठते हैं। और वो हैं देविका रानी, माधवी मुखर्जी, नरगिस, मधुबाला, स्मिता पाटिल, दीप्ति नवल जयललिता से लेकर आलिया भट्ट, दीपिका पादुकोण तक यात्रा। इन सारी महिलाओं और सिनेमा में उनके चरित्रों तथा इनकी चार फुटिया अदायगी के आस-पास घूमता, भटकता आदर्श भारतीय समाज और उसके खाके में फिट तथा मर्द जात के खाके में अनफिट हो जाने वाले चरित्रों की रचना हमारे सिनेमा में लगातार देखने को मिलती रही है। सिनेमा के इस अध्ववसाय में टैक्निकली और व्यवहारिक काम अपवाद स्वरूप ही महिला फिल्मकारों के हिस्से आया पाया है। 
 साल 1943 में शुरू हुए भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के आंदोलन की वजह से जरुर सिनेमा में महिलाओं को लेकर इस विधा में प्रवेश करने के बारे में धारणा बदली। इसके पहले तक महिलाओं का फिल्मों में आना अच्छा नहीं माना जाता था। और आज 21वीं सदी में हर कोई इस ओर कदम बढ़ा रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण पैसा और रुतबा है। बावजूद इसके निर्देशन एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ आज भी पुरुष सत्ता काबिज है। कई फिल्म स्कूल खुल जाने के बाद भी और उनसे शिक्षित होने पर भी फिल्मकारों में लैंगिक असमानताएँ जन्म लेती रहती हैं। जबकि यह शश्वत सत्य है कि बिना महिलाओं के सिनेमा पूरा हो ही नहीं सकता। बड़े बजट वाली फिल्मों के हाल फिलहाल में फ्लॉप होने और छोटे बजट की किन्तु महिलाओं से सजी सुपरहिट फ़िल्में इसका एक उदाहरण है कि महिलाएँ इस क्षेत्र में कहीं आगे जाएंगी। 1970-1980 के बीच जब सेटेलाइट आए और टीवी का उद्भव हुआ तब उसकी वजह से देश में सिनेमा का विस्तार होना शुरू हुआ। इस विस्तार के फलस्वरूप कई नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहन और सिनेमा में स्पेस मिलना शुरू हुआ। दूरदर्शन के अलावा इस क्षेत्र के शिक्षण संस्थान खुलने से यह हौसला बढ़ा कि हर वर्ग के लोगों में अपेक्षाएँ जन्म लेने लगीं। इस वजह से पढ़े-लिखे घरों से भी सिनेमा के बहाने सिनेमा में युवा लड़के ही नहीं लड़कियों की दिलचस्पी बढ़नी शुरू हुई। उन्हें भी कैमरा पकड़ने और उसके सामने अपनी प्रतिभा दिखाने के मौके मिलने लगे। लघु फ़िल्में जन्म लेने लगी और उन लघु फिल्मों से प्रोत्साहित होती हुई लड़कियाँ नए-नए विषयों पर बनने वाली फिल्मों में काम करने लगी। शिक्षण संस्थान खुलने और टीवी के आ जाने के बाद इस नए पन ने 80 का दशक महिलाओं के हकों के लिए खड़ा कर दिया।
 इस दौर में सिनेमा में विभिन्न क्षेत्रों से आई महिलाओं ने निर्देशन की बागडोर भी बखूबी सम्भालने की कोशिश की जिसमें “मीरा दीवान की ससुराल’, मंजीरा दत्ता की बाबूलाल भुइया की कुर्बानी’, निलिता वाछानी की आइज़ ऑफ स्टोन’, दीपा धनराज की क्या हुआ इस शहर को’, मधुश्री दत्ता की आई लिव इन बेहरमपाड़ा’, वसुधा जोशी की वॉयसेज़ फ्रॉम बलियापालऔर सुहासिनी मुले की ऐन इंडियन स्टोरीऔर भोपाल: बियॉन्ड जेनोसाइडइस दशक की सर्वाधिक महत्वपूर्ण फिल्में हैं, जिन्हें महिला फिल्मकारों ने ख़ुद बनाया।”हालांकि यह आँकड़ा हिंदी फिल्म उद्योग में बनने वाली फिल्मों की तुलना में बहुत कम था किन्तु हौसलाअफजाई और प्रोत्साहन के लिए दखल काबिलेतारीफ था। भिन्न विषयवस्तु और भिन्न सिनेमाई ट्रीटमेंट के लिहाज से ये फ़िल्में इस कला के विस्तार में महत्वपूर्ण माध्यम साबित हुई।  80 के दशक में ‘सई परांजपे’ को छोड़ दिया जाए तो कोई मजबूत या यादगार नाम सिनेमा में सुनाई नहीं देता। परांजपे ने स्पर्श, कथा और ‘चश्म-ए-बद्दूर’ जैसी फिल्मों का निर्माण किया। 80 के दशक के ठीक बाद से 90 के दशक क्रांतिकारी बदलाव आए। किन्तु इन बदलावों ने महिलाओं को मात्र दिखावे की वस्तु बनाकर रख दिया।  इस दौर का प्रभाव आज भी भारतीय सिनेमा में देखने को मिल रहा है कि आज आइटम नंबर, सेक्स सीन, किसिंग के अलावा महिलाएँ लुप्त प्राय हो रही हैं। 2017-2018 के साल में जरुर आलिया भट्ट अभिनीत ‘राजी’ और नंदिता दास निर्देशित ‘मंटों’ ने महिलाओं के लिए फिर से उम्मीदें जगाई हैं। किन्तु साल भर में बनने वाली सौ-दो सौ फिल्मों के बीच आज भी अँगुलियों पर गिनने लायक फ़िल्में ही सामने आ पा रही हैं। ‘मैरिकॉम’ पर बनने वाली बायोपिक जरुर उम्मीद जगाती है कि लता मंगेशकर, जद्दनबाई, सरोजनी नायडू, मदर टेरेसा जैसी महिलाओं पर फ़िल्में भी बनाई जा सकती हैं। खाली पीली संजू जैसी फिल्में कमाई का जरिया जरुर हो सकती हैं किन्तु समाज को सही मार्गदर्शन देने में वे फ़िल्में कामयाब नहीं हो सकती। सई परांजपे, दीपा धनराज और नीलिता वाछानी, मंजीरा दत्ता, वसुधा जोशी और झरना झावेरी के द्वारा निर्मित फिल्मों की लागत कम होने से एक तो सिनेमा अन्य तकनीकी मुद्दों से मुक्त हुआ तो दूसरी ओर अभिव्यक्ति की संभावनाएँ बढ़ा गया।
 एक ओर नए फिल्मकारों का जन्म हुआ तो दूसरी ओर नए विषयों का भी सृजन हुआ। इसका सबसे बड़ा प्रभाव यह पड़ा कि रचनाशील, प्रगतिशील फिल्मकारों ने अनकही और हाशिये पर पड़ी कहानियों को कह पाए। जहाँ समथिंग लाइक अ वार फिल्म से ‘दीपा धनराज’ ने भारत सरकार की परिवार नियोजन योजना को चुनौती दी और स्त्री यौनिकता के सवाल को सिनेमा के दायरे में ला खड़ा किया। वहीं ‘निलिता वाछानी’ ने आइज़ ऑफ स्टोनके माध्यम से राजस्थान राज्य में फैली चुड़ैल की झूठी कहानियों के बहाने औरतों के दुख-दर्द को स्वर दिया। तीसरी महत्वपूर्ण फिल्मकार ‘मंजीरा दत्ता’ ने मज़दूर आंदोलन के हवाले से ‘बाबूलाल भुइयां’ के बलिदान को अपनी फ़िल्म बाबूलाल भुइयां की कुर्बानी के माध्यम से प्रदर्शित किया। इसी तरह ‘वसुधा जोशी’ ने वॉयसेज़ फ्रॉम बलियापालके माध्यम से उड़ीसा के तटीय इलाके बलियापाल के लोगों का अहिंसक आंदोलन जगजाहिर किया। तो वहीं ‘झरना झावेरी’ नर्मदा बचाओ आंदोलन से आम जनमानस का ज़रूरी हिस्सा बन जाती है। इस दौर में कई अन्य महिला फिल्मकारों रीना मोहन, सबा दीवान, श्रेरना दस्तूर ने लैंगिक मुद्दों से जुड़े सवालों को केंद्र में रखकर फिल्में बनाईं। इसमें ‘रीना मोहन’ की कमलाबाईके कारण हिंदुस्तान के लोग और सिनेमा प्रेमी पहली फिल्म अभिनेत्री ‘कमलाबाई गोखले’ की कहानी से रूबरू हुआ। तो ‘सबा दीवान’ द अदर सॉन्गके माध्यम से उत्तर भारत की तवायफ़ों की असलियत की लकीर अपनी कहानी से खींचती है। हाल ही में ‘निष्ठा जैन’ ने गुलाबी गैंग के माध्यम से स्त्री आंदोलन के नए आयाम और विस्तार ठीक से समझने का मौका दिया। 

Tuesday, October 23, 2018

हिजड़ा समुदाय के घुटते जीवन का यथार्थ : एक सामाजिक एवं साहित्यिक अध्ययन : निष्कर्ष : भाग 4



हिजड़ा समुदाय के घुटते जीवन का यथार्थ : एक सामाजिक एवं साहित्यिक अध्ययन की यात्रा का अंतिम लेख और निष्कर्ष स्वरूप कुछ बातें पढिए भाग 4 में –



अपवाद रूप से थर्ड जेंडरसमुदाय से कुछ नाम अवश्य जहन में आते हैं, जिन्होंने तृतीय लिंगी होने के बावजूद अपने जीवन में संघर्षरत रहे और भारत में ही वरन् विश्व में अपना विशेष स्थान प्राप्त किया- लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी‘ (एक टी.वी. कलाकर, भरतनाट्यम नर्तिका और सामाजिक कार्यकर्ता), ‘पद्मिनी प्रकाश‘ (भारत की पहली ट्रांसजेंडर न्यूज एंकर), ‘रोज वेंकटेश्वर‘ (पहली ट्रांसजेंडर टीवी होस्ट), ‘विद्या‘ (पहली पूर्णकालिक थियेटर कलाकार, सामाजिक कार्यकर्ता, ब्लागर, फिल्म निर्माता), ‘शबनम मौसी‘ (पहली किन्नर विधायक), दिवंगत आशा देवी‘ (उ0प्र0 के गोरखपुर से 2001 में चुनी गयी देश की पहली किन्नर महापौर), ‘मधु किन्नर‘ (छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में महापौर), ‘कल्कि सुब्रह्मण्यम‘ (सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक, कलाकार और अभिनेत्री), ‘मानवी बंदोपाध्याय‘ (देश की पहली किन्नर प्रिंसिपल, पश्चिम बंगाल से), ‘ए. रेवती‘ (सेक्सुअल माइनॉरिटी के लिए कार्य करने वाली संस्थ संगमासे जुड़कर थर्ड जेंडरों के लिए काम कर रही हैं), ‘पायल सिंह‘ (2010 में पायल फाउण्डेशनकी स्थापना की), ‘बिशेष हुइरेम‘ (मणिपुरी फिल्मों की जानी-मानी अभिनेत्री)। जब ये सभी अपनी पसंद का काम करते हुए अपनी शर्तों पर जी सकती हैं, तो क्यों न उनके साथ होने वाले भेदभाव को मिटाकर, उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रयास किये जाएं, जिसके फलस्वरूप थर्ड जेंडर/ट्रांसजेंडर प्रत्येक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाएंगे।

सामान्यतः हिजड़ाऔर किन्नरएक ही समझे जाते हैं, परन्तु इनमें शाब्दिक ही नहीं अपितु अर्थ भेद भी है। जिसको लेकर काफी विवाद भी है। किन्नरहिमाचल प्रदेश में बसने वाली एक जनजाति है, जो सामान्य स्त्री-पुरुष की भांति व्यवहार करते हैं, जबकि हिजड़ामतलब जो न पूर्ण स्त्री है न पुरुष। हिजड़ा सुनना हिजड़ों को ही पसंद नहीं है, इसलिए उनका भी मानना है कि उन्हें हिजड़ाकहकर न पुकारा जाए बल्कि किन्नरकहा जाए। अब साहित्यिक रूप से भले ही दोनों शब्दों में विवाद हो, परन्तु यदि किन्नरसुनना उनको अच्छा लगता है, तो इसमें कोई बुराई नहीं।



चंडीगढ़ से धनंजय चौहान जो अपने समुदाय की वस्तुस्थिति बताने और किन्नर समुदाय को सामान्य समाज मे बराबर का हक़ मिले इसके लिए संघर्षरत है। हाल ही में इनको मुख्य भूमिका में रखते हुए एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म 'एडमिटटेड' रिलीज़ हुई है जो देश विदेश में खूब सराही जा रही है। बलिया से सिमरन का नाम भी उल्लेखनीय है। सिमरन जी न केवल अपने समुदायों के हितों के संरक्षण हेतु समाज मे संघर्षरत है अपितु सामान्य समाज से आयें गरीब बच्चों को शिक्षित करने का महती कार्य भी कर रही हैं। जो अपने आप में अनुकरणीय भी है और सराहनीय भी। हमे गर्व करना चाहिए ऐसी हस्तियों पर जो अपनी अस्तित्व की लड़ाई के साथ हमारे उस समाज के हितों हेतु भी निस्वार्थ भाव से कार्य कर रही हैं, जो समाज उनके अस्तित्व को नकारता है।

तमिलनाडु के डॉ. श्रीदेवी (अण्णा आदर्श महिला महाविद्यालय, चेन्नई) ने करीब 120 किन्नरों से संबंधित अलग-अलग पहलुओं पर शोध किया जो उल्लेखनीय है-

उपर्युक्त तालिकाओं से हम किन्नरों की सामान्य समस्याओं से अवगत हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त हमस ब इनके प्रति सौहार्दपूर्ण तथा सहानुभुतिपूर्ण व्यवहार करें, हमारे समाज में इन्हें सादर स्थान दे।   

निष्कर्षतः हमें यह समझना होगा कि लैंगिकता का तात्पर्य स्त्री या पुरुष से नहीं है। हमें लोगों को लैंगिक धरातल पर अपने समान ही जीवन जीने की छूट देनी होगी। साथ ही हमें एक ऐसी भाषा को खोजना होगा, जिसमें हिजड़ा समाज के अस्तित्व एवं उसकी अस्मिता के लिए पूर्णरूपेण स्थान हो। एक ऐसी भाषा जो लैंगिक धरातल पर प्रचलित सामाजिक अतिवादिता के बरअक्श प्रतिरोध की संस्कृति का विकास कर सके, जिससे समाज सही दिशा में आगे बढ़ सके। यह वक्त की मांग है कि सामाजिक धरातल पर हिजड़ा समुदाय के साथ-साथ हम खुद भी इस बात की जागरूकता फैलाएं कि आलोच्य समाज भी मानवों के समाज का ही एक हिस्सा है, जिसे किसी भी अन्य मानव प्रजाति से संबन्धित समाज के व्यक्तियों के जैसे ही सम्मानूपर्वक जीवन जीने का अधिकार है। यही वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा हम उन्हें स्वास्थ्यगत, विधिगत, भावनागत, मनोगत इत्यादि स्तरों पर मात्र सुदृढ़ ही नहीं बनाएंगे बल्कि अपने समाज को भी सही अर्थों में मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण कर कहीं अधिक बेहतरीन एवं वासोपयोगी बनाएंगे।

‘‘उनकी गालियों और तालियों से भी उड़ते है, खून के छीटें,
और यह जो गाते बजाते उधम मचाते,
हर चौक चौराहे पर,
वे उठा देते हैं अपने कपड़े ऊपर,
दरअसल उनकी अभ्रदता नहीं,
उस ईष्वर से प्रतिशोध लेने का उनका एक तरीका है,
जिसने उन्हें बनाया है, या फिर नहीं बनाया है।‘‘ (कृष्ण मोहन झा)

इस लेख का प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय भाग पढ़ने के लिए लिंक देखें - 

भाग 2 के लिए यहाँ जाएँ - https://teesritaali.blogspot.com/2018/10/2.html

भाग 3 के लिए यह देखें - https://teesritaali.blogspot.com/2018/10/3.html

--सन्दर्भ सूची--

1.         थर्ड जेंडर-एक रहस्यलोक, ले. डॉ. भारती अग्रवाल, ‘किन्नर विमर्शः साहित्य के आइने मेंवाङ्मय बुक्स, अलीगढ़, वर्ष 2017, पृ0-60

2.         हिन्दी उपन्यासों के आइने में थर्ड जेंडर, ले. डॉ. विजेन्द्र प्रताप सिंह, अमन प्रकाशन, कानपुर, वर्ष 2017, पृ0-66

3.         वही पृ0-66

4.         भूमिका से, ‘थर्ड जेन्डरः हिन्दी कहानियांसं.-डॉ. एम. फिरोज खान‘, अनुसंधान प. एण्ड डि., कानपुर, वर्ष 2018, पृ0-05

5.         वही पृ0-05

6.         वही पृ0-06

7.         हिन्दी उपन्यासों के आइने में थर्ड जेंडर, ले. डॉ. विजेन्द्र प्रताप सिंह, अमन प्रकाशन, कानपुर, वर्ष 2017, पृ0-73 से उद्धत

8.         हम भी इंसान है, ले. महेन्द्र भीष्म, ‘भारतीय साहित्य एवं समाज में तृतीय लिंगी विमर्शसं.- डॉ. विजेन्द्र प्रताप सिंह, अमन प्रकाशन कानपुर, वर्ष 2016, पृ0-13

9.         अधूरी देह, ले. महेन्द्र भीष्म, ‘भारतीय साहित्य एवं समाज में तृतीय लिंगी विमर्शसं.- डॉ. विजेन्द्र प्रताप सिंह, अमन प्रकाशन कानपुर, वर्ष 2016, पृ0-09

10.       वही पृ0-09

11.       वही पृ0-17

12.       वही पृ0-17

13.       हिन्दी साहित्य का लगभग अछूता परिदृश्यः तृतीय लिंगी समाज, ले. अभिलाषा सिंह, ‘भारतीय साहित्य एवं समाज में तृतीय लिंगी विमर्शसं.- डॉ. विजेन्द्र प्रताप सिंह, अमन प्रकाशन कानपुर, वर्ष 2016, पृ0-93

14.       मनीषा महंत (थर्ड जेंडर) से डॉ. फिरोज और डॉ. शमीम की बातचीत, वाङ्मय त्रैमासिक पत्रिका, जुलाई-सितम्बर 2017, पृ0-245-246

15.       भूमिका से, ‘हम भी इंसान हैं‘, सं.-डॉ. फिरोज खान, वाङ्मय बुक्स, अलीगढ़, वर्ष 2018

16.       भारतीय वाङ्मय और हिजड़ा समुदाय, ले. डॉ. सुनील कुमार द्विवेदी भारतीय साहित्य एवं समाज में तृतीय लिंगी विमर्शसं.- डॉ. विजेन्द्र प्रताप सिंह, अमन प्रकाशन कानपुर, वर्ष 2016, पृ0-83

17.       सिनेमा और साहित्य में हिजड़ेःएक समीक्षा, ले. डॉ. चन्द्रेश्वर यादव, ‘भारतीय साहित्य एवं समाज में तृतीय लिंगी विमर्शसं.- डॉ. विजेन्द्र प्रताप सिंह, अमन प्रकाशन कानपुर, वर्ष 2016, पृ0-125

18.       मैं क्यो नहीं : अस्तित्व की नये सिरे से पहचान, ले.-आनन्दप्रकाश त्रिपाठी, वाङ्मय त्रैमासिक पत्रिका, जुलाई-सितम्बर 2017, पृ0-106

19.       थर्ड जेंडर-एक रहस्यलोक, ले. डॉ. कर्मानन्द आर्य, ‘किन्नर विमर्शः साहित्य के आइने में‘, सं.-डॉ. इकरार अहमद, वाङ्मय बुक्स, अलीगढ़, वर्ष 2017, पृ0-52




Thursday, October 18, 2018

हिजड़ा समुदाय के घुटते जीवन का यथार्थ : एक सामाजिक एवं साहित्यिक अध्ययन : भाग 3


भाग 3 में आगे पढिए कुछ पौराणिक सन्दर्भों और आधुनिक संदर्भों के साथ किन्नरों की जीवन यात्रा पर आधारित इस लेख को - 

पौराणिक धर्म ग्रंथों में हिजड़ों की उपस्थिति स्पष्ट देखी जा सकती है। वाङ्मय द्विरूपी होता है। इसका एक काव्य तथा दूसरा शास्त्र है। हिजडा समुदाय से संयुक्त काव्य तो यहां-वहां मिल ही जाता है, परन्तु उसके शास्त्र का बनना शेष है। दूसरी ओर, हमारे वाङ्मय में अर्द्धनारीश्वर की अवधारणा का स्पष्ट उल्लेख है। शिव-शक्ति का युगल रूप अर्द्धनारीश्वर की परिकल्पना को आकार देता है। उपर्युक्त परिकल्पना सृष्टि के निर्माण में नर-नारी के समन्वित प्रयास का प्रतीक है। यदि हिजड़ा समाज की बात की जाए तो वे स्वयं ही अर्द्धनारीश्वरता को साकार कते हैं। रामायण में हिजड़ों में जो समर्पण और त्याग राम के प्रति दिखाया उसी का प्रतिफल आज भी उन्हें कुछ धार्मिक कार्यां में शकुन रूप में स्वीकारा जाता है। राम वनवास जाने के समय लोग जब उन्हें मनाने के लिए एकत्रित हो उनके पीछे चल दिये तो उन्होंने पुत्र, धर्म और पिता के आदेश का पालन करने को पवित्र कार्य कहकर वापस अयोध्या जाने को कहा। समस्त जनता वापस हो गयी लेकिन वहां उपस्थित हिजड़ें राम बनवास के 14 वर्ष तक यथास्थान राम के आने का इंतजार करते रहे। 14 वर्ष बनवास पूर्ण करके राम जब वापस लौटे तो उन्हें उसी स्थिति में पाकर उनके त्याग-समर्पण और आस्था पर प्रसन्न होकर कुद शुभ कार्यां का सदा साक्षी बनने का आशीर्वाद दिया और बधाई की उत्पत्तिकी संख्या दी जो वर्तमान में भी कायम है। डॉ. सुनील कुमार द्विवेदी इस पौराणिक घटना का आलोचनात्मक पक्ष इस प्रकार रखते हैं, ‘‘कि राम के पितृशासित समाज के लिए हिजड़ा समाज नगण्य ही था। लोग उसको लक्षित ही नहीं करते थे। कहना न होगा कि इन मिथको के आविर्भाव काल में भी सामाजिक लैंगिक विभाजन बड़ा ही स्थूल-सा था।‘‘16

हिजड़ा समुदाय के भारतीय वाङ्मय के सन्दर्भ में एक अन्य पौराणिक घटना, जो महाभारत से संबन्धित है इस प्रकार है महाभारत के अति महत्वपूर्ण पात्र गंगा पुत्र भीष्म अकेले कुरुक्षेत्र के घमासान युद्ध की दशा-दिशा तय करने की माद्दा रखते थे। उनके धनुष की टंकार पाण्डवों पर भारी पड़ रही थी। जिसे रोकना किसी के लिए आसान नहीं था। भीष्म पितामह को युद्ध से अलग किये बगैर सत्य के साक्षी पाण्डव भी अपनी जीत सुनिश्चित नहीं मान रहे थे। चुंकि भीष्म बहुत ही आदर्शवादी और धर्मपरायण योद्धा थे। उन्हें न्याय-अन्यास का सर्वथा ज्ञान था और हस्तिनापुर की रक्षा मात्र उनके जीवन का लक्ष्य न्याय पथ पर चलकर युद्ध कर रहे पांडव के प्रति भीष्म की आस्था से दुर्यांधन भी काफी नाराज था और अशोभनीय टिप्पणी करने से नहीं चूकता था। भीष्म पितामह महिलाओं का हृदय से सम्मान करते थे। स्त्रियों तथा स्त्री जैसे दिखने वाले लोगों पर अस्त्र नहीं चलाते थे। इस बात का ज्ञान पांडवों को था। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर शिखंडी जो हिजड़ा था, को ढाल के रूप में प्रयुक्त करके अर्जुन ने भीष्म पितामह को सर सैय्या पर लेटने के लिए मजबूर कर दिया। इसके अतिरिक्त पांडवों के अज्ञातवास काल में राजा विराट के साम्राज्य में अर्जुन का बृहन्नला के रूप में स्त्रैण व्यवहार, वस्तुतः उसके द्वारा आलोच्य समाज का प्रतिनिधित्व करता दर्शाता है। उसे उर्वशी नामक एक अप्सरा के प्रणय निवेदन को ठुकराने के एवज में कुछ काल के लिए स्त्रैण पुरुष बन जाने का यह अभिशाप मिला था जो उस अप्सरा ने ही दिया था। वैसे यह अभिशाप हिजड़ो की दोयम दर्जे की नागरिकता को समझाने के लिए पर्याप्त है। साथ ही यह समाज की उनके प्रति व्यवहारिक असहिष्णुता का भी परिचायक है।

काव्य के अतिरिक्त कथा साहित्य में, फिर चाह वह कहानी हो या उपन्यास दोनों में कहीं-कहीं आलोच्य समाज का जिक्र आता है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने संभवतः सन् 1891 में गिन्नीअर्थात् गृहिणी जैसी कहानी लिखी थी। इस कहानी में किशोर लड़के आशू की कथा है, जिससे मात्र यह भूल हो गयी है कि वह अपनी सगी बहनों के साथ घर-घर खेलता रहा है, तो उस पर स्त्रैणता का आरोपण कर सारा समाज उस सलज्ज और संकोची लड़के को चिढ़ाता है। उसका गुरु शिवनाथ अपने प्रवृत्ति को देखकर व्यंग्य करने हेतु एक नाम दे देता है। यह नाम उस विद्यार्थी की किसी प्रवृत्ति को देखकर व्यंग्य करने हेतु दिया जाता है। शिवनाथ राष्ट्रीय आंदोलन हेतु युवा पीढ़ी तैयार करना चाहता है। उसके भीतर पुरुषोचित दंभ और अक्खड़ता है। वह स्वयं को नैतिक पहरेदारी का ठेकेदार समझता है। आशू को वह गिनी नाम दे देता है। ऐसे में सारे लड़के उस पर व्यंग्य करने लगते हैं और उसे गिन्नी कहकर पुकारने लगते हैं। वह स्वयं को अपने दोस्तों से दूर महसूस करता है तथा उनके साथ खेलने नहीं जाता है। वह स्वयं के लिए अपने दोस्तों में कोई स्थान नहीं ढूंढ पाता। यह प्रमाण है हमारे समाज की लैंगिक पहरेदारी। इस समाज अपनी लैंगिकता या यौनिकता को वैयक्तिक धरातल पर परिभाषित करने की स्वतंत्रा किसी को नहीं देता। ऐसे में हिजड़ा समुदाय की स्थिति सहज ही अनुमेय है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ही एक अन्य कहानी है व्यवधान। इसकी कथावस्तु भी समाज के लैंगिक अस्मिता के परिप्रेक्ष्य में नये सिरे से सोचने-विचारने के लिए बाध्य करती है।

साहित्य जगत में हिजड़ों के विषय में कुछ प्रसिद्ध पुस्तकों की रचना हुई। प्रसिद्ध साहित्यकार स्तम्भकार, लेखक-आलोचक खुशवंत सिंह ने अपने अंग्रेजी में प्रकाशित उपन्यास देहलीमें भागमती नाम हिजड़े को केन्द्र में रखकर वेश्यावृत्ति की समस्या को उकेरा है। तमिलनाडु के उपन्यासकार सु. समुथीराम का अरावनी समुदाय पर तमिल में पहला उपन्यास वादामल्ली1994 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद में ट्रांसजेण्डर कार्यकर्ता ए. रेवती पहले ट्रांसजेण्डर हुए जिन्होंने हिजड़ा समुदाय के विषय में लिखा। इनकी पुस्तक का नाम ^Life in Trans Activism^ ¼2011½ है जिसका आठ भाषाओं में रूपान्तरण हुआ और इसे एशिया में ट्रांसजेण्डर से संबन्धित प्राथमिक तथ्य के रूप में स्वीकार किया जाता है। इनकी अन्य पुस्तक ^The Truth About Me^ जिसमें एक अन्य ट्रांसजेण्डर वी. गीता के जीवन की सच्ची कहानी को उकेरा गया है। ए. रेवती की अन्य पुस्तक का नाम ^Our Lives Our Words Telling Aravani Lifestories^  है। इसके साथ ‘‘नान सारावानन द्वारा 2001 में लिखित अल्ला और विद्या रचित आई एम विद्याजो कि 2008 में प्रकाशित हुई हिजड़ों की प्रथम आत्मकथा है। इसके अलावा लेजली फोर्वस लिखित उपन्यास बाम्बे आइसकुछ हिजड़ा सेक्स वर्कस के मौत पर आधारित हिजड़ों पर है। जॉन इरविंग का उपन्यास ए सन ऑफ द सर्कसभी हिजड़ों पर केंद्रित है। क्रेग थॉम्पसन के ग्रॉफिक उपन्यास हबीबीअनगिनत कृतियों की रचना हुई जिनके अध्ययन से उनके जीवन अध्यायों को बेहतर ढंग से जाना जा सकता है।‘‘17


  • मुख्यतः यहां हिजड़ा समुदाय पर लिखी गयी कुछ कहानियों और उपन्यासों की परोक्ष चर्चा करना साहित्यिक रूप से अनिवार्य भी और प्रासंगिक है। हिन्दी साहित्य में हिजड़ा समुदाय पर सबसे पहला उपन्यास लिखने का श्रेय उपन्यास यमदीप नीरजा माधव लिखित है इसके पश्चात महेन्द्र भीष्म का उपन्यास किन्नर कथासन् 2010-11 में सामयिक प्रकाशन से प्रकाशित हुआ था। जिसमें हिजड़ों की कई समस्याओं को भखूबी दर्शाया गया है। साथ ही इस उपन्यास में उनके जीवन के विविध अनछुएं पहलुओं की ओर भी इशारा किया है।


 हाल के कुछ वर्षां में कतिपय उपन्यासकारों और कहानीकारों ने कुछ उपन्यास और कहानियां अवश्य लिखी हैं। इस विषय में उल्लेखनीय कार्य किया है पत्रिका वाङ्मयने, जिसमें हिजड़ा समुदाय पर आधारित विशेषांकों के माध्यम से हिन्दी भाषा में इनके जीवन पर आधारित कहानियों को संकलित कर महती कार्य किया। लेखिक आनन्द प्रकाश त्रिपाठी अपने एक आलोचनात्मक लेख में लिखते हैं, ‘‘एक नयी सामाजिक चेतना से प्रेरित होकर साहित्यकारों ने हिजड़ों के जीवन यथार्थ को नये सिरे से पहचाना और उनके जीवन में आये परिवर्तन को बड़ी संजीदगी से अपनी रचनाओं में उभारा है। बड़ी निर्भीकता और बेबाकी से कई रचनाकारों ने कविताएं और कथाकृतियां रची हैं।‘‘18 स्वतंत्रता पूर्व अपवाद रूप ही रचनाएँ हिजड़ो पर केन्द्रित थीं। जिनमें मौलिक रचनाएँ मुख्यतः शिवप्रसाद सिंह कृत बिन्दा महाराज‘, राही मासूम रजा कृत खलीक अहमद बुआ‘, एस.आर. हरनोट द्वारा रचित किन्नरकुसुम अंसल कृत ई मुरदन का गाँव‘, सलाम बिन रज्जाक कृत बीच के लोग‘, अंजना वर्मा कृत बीनी चदरियाआदि हैं। अनुदित कहानियों में प्रमुख करतार सिंह दुग्गल द्वारा रचित हमजिनस‘, नवतेज पुआधी कृत ऊँचा बुर्ज लाहौर का‘, मोहन भण्डारी कृम मटकनलाल खोजा‘, रामसरूप अणखी द्वारा रचित उसका बाप‘, वीना वर्मा कृत सती‘, हरजीत कौर कृत मलका‘, बलजीत सिंह रैना कृत पेड़ से टूटा पत्ता‘, एस. बलवंत कृत मृगतृष्णाआदि। कहानियों के शीर्षकों का सामान्य परिचय दिया है, वैसे तो हिजड़ा समुदाय से जुड़ी प्रत्येक कहानी या उपन्यास पृथक रूप से एक शोध की मांग करता है।

हिजड़ा समुदाय का सामाजिक-साहित्यिक विश्लेषण करते हुए मित्र युवा लेखक-कवि डॉ. कर्मानन्द आर्य का वक्तव्य दृष्टव्य है, ‘‘थर्ड जेंडर का सम्बन्ध कुछ लोग अवैध यौन शोषण से जोड़ते रहते हैं। ब्रह्मचर्य और सेक्स को निषेधात्म मानने वाले इस देष में सबसे ज्यादा अगर कोई चीज बिकती है तो वह है यौनिकता। यह यौनिकता अगर स्त्री के लिए हो तो पुरुष किसी भी हद तक जा सकता है। जैविक बनावट और संस्कृति के अंतरसंबंधों को समझ को अगर हम जेंडर पर लागू करें तो निष्कर्ष यही निकलता है कि महिलाओं के शरीर की बनावट भी सामाजिक बंधनों और सौन्दर्य के मानकों द्वारा निर्धारित की गयी है। शरीर का स्वरूप जितना प्रकृतिसे निर्धारित हुआ है उतना ही सस्कृतिसे भी। थर्ड जेंडर भी इसी सोच का शिकार है। इस प्रकार उसी अधीनता, जैविक असमानता से नहीं पैदा होती है बल्कि यह ऐसे सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों और संस्थाओं की देन है। पुरुष थर्ड जेंडर में स्त्री के उन्हीं गुणों को खोजने का भरसक प्रयास करता है।‘‘19

सहित्यिक दृष्टिकोण के हिजड़ा समुदाय पर कुछ अन्य महत्वपूर्ण कृतियां भी हमारे समक्ष हैं, जिन्हें पढ़कर उनकी अधूरी और यातनाओं युक्त जिंदगियों का करीब से जानने का अवसर मिलता है। जैसे हमारी कहानियां, हमारी बातेंए. रेवती द्वारा संकलित हिजड़ा समाजका मार्मिक दस्तावेज है। यह पुस्तक मूल रूप में तमिल में लिखी गयी थी और वहीं से इसे ए.मंगई द्वारा हिन्दी में अनुदित किया गया। यह 7 अध्यायों (बचनपन और शिक्षा, माता-पिता और समाज, काम, हिजड़ा माँएँ, सांस्कृतिक प्रथाएँ, निरवाणम एवं सक्रियता) का संकलन में जिसमें दिखाया गया है कि हमारे मध्य रहने वाले ये मानव जिस विषम त्रासद परिस्थितियों में मात्र जीवन जीने के लिए जूझ रहे हैं, उसी कल्पना ही रोंगटे खड़े करने वाली है। इसके अतिरिक्त हरीश बी, शर्मा का अप्रकाशित लघु नाट्य हरारतमानवीय संवेदनाओं को छूता हुआ नाटक है, जिसमें विशुद्ध थर्ड जेंडर की समस्याओं के प्रति संवेदना व्यक्त की गयी है। इसी प्रकार हिजड़ा समुदायपर डॉ. फखरे आलम खान विद्यासागरद्वारा लिखी एक मात्र एकांकी किन्नरभी एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। लक्ष्मीनाराण त्रिपाठी द्वारा लिखित आत्मकथा मैं हिजड़ा....मैं लक्ष्मीभी एक पठनीय दस्तावेज है। हिन्दी उपन्यास की यदि बात करें तो जैसा कि ऊपर लिखा गया कि नीरजा माधव द्वारा रचित हिन्दी का प्रथम उपन्यास ‘यमदीप' है। इसके इतर हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में भी उपन्यास लिखे गए- तीसरी ताली-2010‘ (प्रदीप सौरभ), ‘मैं भी औरत हूँ-2005 (डॉ. अनुसूइया त्यागी), ‘पोस्ट बॉक्स नं. 203 नाला सोपारा-2016‘ (चित्रा मुद्गल), ‘गुलाम मंडी-2013‘ (निर्मला भुराडिया), ‘मैं पायल-2016‘ (महेन्द्र भीष्म), ‘मैं क्यों नहीं‘ (मराठी  उपन्यास, पारू मदन नाइक), ‘वाडामल्लि‘ (तमिल उपन्यास, सु. समुद्रम) आदि। अन्य संपादित कृतियां हम भी इंसान हैं‘ (कहानी संग्रह, सं. डॉ. फीरोज़ खान), ‘थर्ड जेन्डरः हिन्दी कहानियां‘ (सं. डॉ. फीरोज़ खान), ‘थर्ड जेन्डरः अनुदित कहानियां‘ (सं. डॉ. फीरोज़ खान), ‘किन्नर विमर्शः साहित्य के आइने में‘ (आलोचना, सं. डॉ. इकरार अहमद), ‘हिन्दी उपन्यासों के आइने में थर्ड जेंडर‘ (सं. डॉ. विजेंन्द्र प्रताप सिंह), ‘थर्ड जेंडर के संघर्ष का यथार्थ‘ (सं. डॉ. शगुफ्ता नियाज़), ‘भारतीय साहित्य एवं समाज में तृतीय लिंगी विमर्श‘ (सं. डॉ. विजेन्द्र प्रताप सिंह व रवि कुमार), ‘सिनेमा की निगाह में थर्ड जेण्डर‘ (सं. डॉ. फीरोज़ खान) आदि। समय-समय पर हिजड़ा समुदायविषय पर अपने-अपने विशेषांक भी प्रकाशित किये हैं, उदाहणार्थ- त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका वाङ्मयजो कि डॉ. फीरोज़ खान के संपादाकत्व में निकलता है, ‘थर्ड जेंडरविषयक तीन अंकों का संपादन किया। कुमार गौरव मिश्रा का अगस्त 2016जनकृतिका थर्ड जेंडर विशेषांक भी उल्लेखनीय है। यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि सदियां से ही हिजड़ा समाज को अन्यकी नजर से देखा जाता रहा है, भारतीय समाज नयी सदी में अचानक इस समाज के प्रति संवेदनशी और जागरूक नहीं हुआ है। साहित्यकारों एवं संस्कृतियकर्मियों तथा सामाजिक संस्थाओं ने इनके प्रति लोगों की पारम्परिक सोच को बदलने का सार्थक प्रयास किया है।

अपवाद रूप से थर्ड जेंडरसमुदाय से कुछ नाम अवश्य जहन में आते हैं, जिन्होंने तृतीय लिंगी होने के बावजूद अपने जीवन में संघर्षरत रहे और भारत में ही वरन् विश्व में अपना विशेष स्थान प्राप्त किया- लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी‘ (एक टी.वी. कलाकर, भरतनाट्यम नर्तिका और सामाजिक कार्यकर्ता), ‘पद्मिनी प्रकाश‘ (भारत की पहली ट्रांसजेंडर न्यूज एंकर), ‘रोज वेंकटेश्वर‘ (पहली ट्रांसजेंडर टीवी होस्ट), ‘विद्या‘ (पहली पूर्णकालिक थियेटर कलाकार, सामाजिक कार्यकर्ता, ब्लागर, फिल्म निर्माता), ‘शबनम मौसी‘ (पहली किन्नर विधायक), दिवंगत आशा देवी‘ (उ0प्र0 के गोरखपुर से 2001 में चुनी गयी देश की पहली किन्नर महापौर), ‘मधु किन्नर‘ (छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में महापौर), ‘कल्कि सुब्रह्मण्यम‘ (सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक, कलाकार और अभिनेत्री), ‘मानवी बंदोपाध्याय‘ (देश की पहली किन्नर प्रिंसिपल, पश्चिम बंगाल से), ‘ए. रेवती‘ (सेक्सुअल माइनॉरिटी के लिए कार्य करने वाली संस्थ संगमासे जुड़कर थर्ड जेंडरों के लिए काम कर रही हैं), ‘पायल सिंह‘ (2010 में पायल फाउण्डेशनकी स्थापना की), ‘बिशेष हुइरेम‘ (मणिपुरी फिल्मों की जानी-मानी अभिनेत्री)। जब ये सभी अपनी पसंद का काम करते हुए अपनी शर्तों पर जी सकती हैं, तो क्यों न उनके साथ होने वाले भेदभाव को मिटाकर, उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रयास किये जाएं, जिसके फलस्वरूप थर्ड जेंडर/ट्रांसजेंडर प्रत्येक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाएंगे।