Friday, March 6, 2020

हिंदी उपन्यासों में देह व्यापार


निर्मला पुतूल स्त्री अस्तित्व पर एक सवाल करती हुई कहती हैं-

धरती के इस छोर से उस छोर तक
मुठ्ठी भर सवाल लिए मैं,
दौडती रही हूँ, सदियों से निरन्तर
अपनी जमीन, अपना घर अपने होने का अर्थ।।

बीसवीं सदी में प्रबुद्ध वर्ग के साथ-साथ स्त्रियों ने अपनी आन्तरिक शक्ति को पहचानना शुरू कर दिया था। अतः सामाजिक उत्थान और प्रगति के दृष्टिकोण से उन्हें बराबरी के अधिकार मिले। स्त्री शक्ति इस विकास को देखकर जहाँ यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमंते तत्र देवता की उक्ति चरितार्थ होनी चाहिए थी, वहाँ हुआ इसके घोर विपरीत। नारी स्त्री शोषण में प्रायः द्विगुणित वृद्धि होती गई। प्रभा खेतान के शब्दों में औरत के आर्थिक अवदान को नकारने की परम्परा रही है। पहले गृहस्थी में उसके श्रम को नकारा जाता है फिर मुख्यधारा में उसे स्थान दिया जाता है तब उस स्त्री को या तो अपवाद मानकर पुरुष वर्ग अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेता है या फिर उसे परे धकेल दिया जाता हैं।1

लेकिन घर, परिवार, समाज से परे पुरुष ने अपने सुख, तृप्ति, वासना के लिए एक ऐसे संसार की रचना की है जहाँ स्त्री सिर्फ उसके सुख का माध्यम है। उस सुख की भागीदार नहीं। यह है जिस्म के खरीद-फरोख्त का बाजार। देहवृत्ति के इस धंधे में औरत के शरीर का इस्तेमाल बडे ही अमानवीय तरीके से किया जाता है। आदिकाल से आज तक औरत की देह पुरुष की तुष्टि के लिए और अपनी जरूरतों के लिए, उनकी पूर्ति के दूसरे साधनों के अभाव में बिकाऊ रही है, लेकिन अब सुविधाओं और साधनों के लिए यह बिकाऊ हो रही है। बडा जटिल सवाल है आज 21वीं सदी में, और वहीं खडी है। फिर से बिकाऊ बनी।2

वैदिक कालीन समाज से प्रारम्भ करें तो ऋग्वैदिक काल में स्त्रियों को समाज में बडा महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। उन्हें पुरुषों के बराबर सामाजिक और धार्मिक अधिकार प्राप्त थे। घोषा, लोपामुद्रा और अपाला आदि विदुषियों ने ऋग्वेद के मंत्रों की रचना की थी। गार्गी ने याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ किया था। उत्तर वैदिककाल में स्त्रियों के सम्मान में थोडी कमी आ गई। इसी युग में नारी के इतने सम्मान के बावजूद वेश्याएँ भी समाज का हिस्सा थीं। गर्भवती गांधारी की सेवा में वेश्याएँ नियुक्त थीं। बहुसंख्यक वेश्याएँ सेवा-शुश्रषा, परिचर्या, संगीत, नृत्य आदि कलाओं में निपुण होती थीं और इन कार्यों के लिए उन्हें विशेष अवसरों पर नियोजित किया जाता था।
महाभारत में वेश्याओं का वर्गीकरण राज वेश्या, नगर वेश्या, गुप्त वेश्या, देव वेश्या व ब्रह्म वेश्या के रूप में किया गया है। अप्सरा, किन्नरी, हूर, परी, स्वर्ग की गणिकाएँ थी। स्वर्ग के निवासियों का मनोरंजन एवं यौन सुख प्रदान करना इनका कर्तव्य था। स्वर्ग के राजा इन्द्र को जब-जब धरती पर से किसी ऋषि, मुनि और तपस्वी के स्वर्ग में आने का डर हुआ उसने उनकी तपस्या भंग करने के लिए अप्सराओं को धरती पर भेजा। मेनका, उर्वशी, रँभा इसी श्रेणी की गणिकाएँ थीं।

पुरातत्त्ववेत्ताओं एवं इतिहासकारों को उत्तर-पाषाणकालीन सिंधु घाटी की सभ्यता में भी वेश्यावृत्ति के विकसित चिह्न प्राप्त हुए हैं। सिंधु घाटी सभ्यता, मिश्र एवं बेबीलोन, असीरिया, स्लाम आदि की सभ्यताओं की समकालीन थी। इन देशों में भी उस समय वेश्यावृत्ति का चलन था। हडप्पा और मोहनजोदडो से नर्तकी की कुछ सुन्दर मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। संभवतः उस समय भी मंदिरों में देवदासियाँ होती थीं। मंदिरों में ही नहीं राजाओं ने भी वेश्यावृत्ति को प्रश्रय दिया। विजेता राजा को हारे हुए राजा की ओर से अपनी बेटी और विभिन्न दास-दासियाँ देने की परम्परा थी। युद्ध में जीते गाँव, कस्बों व नगरों की नारियों का यौन-शोषण होना स्वाभाविक था। युद्ध की विभीषिका का खमियाजा स्त्री व बच्चों को ही ज्यादा भुगतना पडता है। संसार के हर कोने में आज भी युद्धों के बाद सैनिकों द्वारा अत्याचार की यही कहानी दोहराई जाती है।

बाईबिल में केडेशोथ वेश्याओं का वर्णन आता है। अर्मीनिया देश में पुराने समय में यह आम प्रथा थी कि लोग अपनी बेटियों को देवदासी बना देते थे। प्राचीन बेबिलोनिया में इन देवदासियों का बडा रुतबा था। प्राचीन ऐथेन्स में भी वेश्याओं को सम्मान की दष्टि से देखा जाता था।3
देवदासियों की प्रथा लगभग 1700 वर्ष पुरानी है- देवदासियों को मंदिर में सेवा के एवज में नियमित आय, वार्षिक आधार पर नगद या भूमि उपहार के रूप में दी जाती थी। प्रौढ होने पर वह मंदिर से सेवानिवृत्त हो सकती थी। न केवल भारत में, विश्व के हर कोने में वेश्यावृत्ति का एक धार्मिक स्वरूप किसी न किसी रूप में विद्यमान रहा है। राजस्थान में राजनट, मध्यप्रदेश के बडिया और राजस्थान, मध्यप्रदेश के बार्डर में बछडा समुदायों में सामाजिक स्वीकृति से स्त्रियों का शोषण पीढी-दर-पीढी चलता आ रहा है, जिसके लिए कहीं कोई अपराध-बोध नहीं।

गीता में देवदासी भाविन है। आन्ध्र प्रदेश में कुडिकर, बोगम या जोगिन, तमिलनाडु में थेवरडियर, महाराष्ट्र में जोगलीन मुराली और अर्धनी, कर्नाटक में जोगनी या बासवी, उडीसा में गणिका और असम में नटी है। हर क्षेत्र व प्रांत की भाषा के अनुसार देवता को समर्पित ये देवदासियाँ हैं। लेकिन उनकी आय को मंदिर के पुजारी इकट्ठा करते थे। महाराष्ट्र और गोवा में अधिकांश गरीब परिवारों की लडकियाँ ही देवदासी बनाई जाती हैं। चूँकि एक बार देवता से ब्याह दी जाने के बाद किसी साधारण पुरुष से ब्याह नहीं हो सकता इसलिए वे दूसरे शहरों या नगरों में जाकर यौन-कर्मी बन जाती हैं।
जगन्नाथ पुरी के मंदिर के अलावा वहाँ के छोटे-बडे सभी मंदिरों में देवदासियाँ विद्यमान थी, जिनका शोषण मंदिर के पुजारी, तीर्थयात्रियों व साधुओं के द्वारा होता रहता था। ग्राहक किन स्थानों पर अधिक होते हैं उनमें से एक स्थान ये धार्मिक स्थल हैं और इन धार्मिक स्थलों में भी जब वर्ष में मेले व बडे कार्यऋम होते हैं तब उनकी आमदनी बढ जाती है।

उडीसा और बंगाल में कसबी जाति भी है जो अपनी किशोरी लडकियों को किसी अमीर पुरुष के पास भेजते हैं। एक अच्छी खासी मोटी रकम लेकर पाँच दिन पहले से विभिन्न रीति-रिवाज रस्में निभाई जाती हैं।
आदमी हमेशा से नारी की स्वतंत्र सत्ता से डरता रहा है और उसे ही उसने बाकायदा अपने आक्रमण का केन्द्र बनाया है। अपनी अखंडता और संपूर्णता में नारी दुर्जेय और अजेय है। वह एक ऐसी शक्ति है जो स्वतंत्र और स्वछन्द है, इसीलिए आदमी ने उसे ही तोडा है। आदमी ने लगातार और हर तरह कोशिश की है कि उसे परतन्त्र और निष्क्रिय बनाया जा सके। सिमोन कहती है कि औरत पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। (सिमोन, 1949)
इसलिए वेश्याएँ भी आदिकाल से समाज का हिस्सा हैं। इतिहास के पन्नों पर आम्रपाली के साध्वी बनने, वसंतसेना के उपपत्नी बनने और कई तवायफों के गीत, गजल, ठुमरी की मल्लिका बनने की कहानियाँ दर्ज हैं। कुछ यौनकर्मी इस व्यवसाय में बनी रहना चाहती हैं, तो कुछ चाह कर भी निकल नहीं पाई और कुछ ब्याहकर घर परिवार वाली बनती रही हैं।
हिन्दी कथा साहित्य में स्त्री के वेश्या रूप को लेकर काफी लिखा गया है। कभी उसके बहाने किसी गृहिणी की विपत गाथा, तो कभी उसके नारकीय जीवन की त्रासदी को बयां करती कृतियाँ हर युग में इस समस्या को रेखांकित करती आ रही हैं। ईसापूर्व दूसरी सदी में लिखी गई संस्कृत की कहानी मृच्छकटिकम में वैशाली की नगरवधू इसी काम के लिए जानी जाती है। चतुरसेन शास्त्री की वैशाली की नगरवधू हो या अमृतलाल नागर की ये कोठेवालियाँ, या फिर मुंशी प्रेमचन्द का सेवासदन- सभी में इस समस्या का गंभीरतापूर्वक चिंतन कर समाज को प्रबुद्ध करने के प्रयास किए गए हैं। मुंशी प्रेमचन्द के सेवासदन की नायिका सुमन द्वारा दहेज की समस्या का गंभीरतापूर्वक चिन्तन कर समाज को प्रबुद्ध करने के प्रयास किए गए हैं। मुंशी प्रेमचन्द के सेवासदन की नायिका सुमन दहेज की समस्या के कारण इस धंधे में आने के लिए विवश हो जाती है। दहेज के अभाव में अनमेल विवाह, पति का शंकालु स्वभाव, धर्म-परायण लोगों का वेश्या को सम्मान देना आदि कई कारण मिलकर भले घर की स्त्रियों को पथभ्रष्ट करने की भूमिका तैयार करते हैं। अकेली स्त्री समाज से लड नहीं पाती है जबकि समाज उसे तोडने की कोशिश करता है।
निराला अपने पहले उपन्यास अप्सरा में एक अलग अवलोकन बिन्दु से वेश्या जीवन को देखते हैं। गंधर्व जाति और अप्सरा के रूपक का समावेश करते हुए लेखक ने रूपजीवा कनक की इस विवशता को उभारा है कि उसे प्रेम करने का अधिकार नहीं है। सर्वेश्वरी अपनी पुत्री कनक का पालन-पोषण इस प्रकार करती है कि उसके मन में पुरुष के प्रति प्रेम नहीं बल्कि उसकी स्वभावगत कमजोरियों का लाभ उठाने की भावना दृढ होती जाती है। इस वृत्ति द्वारा उसे अपार संपत्ति की प्राप्ति तो होती है, लेकिन प्रेम से प्राप्त होने वाले आत्मतोष का परिचय उसे नहीं मिल पाता। माता सर्वेश्वरी ने कनक को सिखलाया था, किसी को प्यार मत करना। हमारे लिए प्यार करना आत्मा की कमजोरी है। यह हमारा नहीं।4
आचार्य चतुरसेन का बहुचर्चित उपन्यास वयं रक्षामः स्त्री देह पर पुरुष की एकाधिकारवादी मनोवृत्ति पर सीधी चोट करता है। नायिका, नायक से सीधा सवाल पूछती है, तू दाता है या याचक-नायक उत्तर देता है, प्यार का याचक हूँ। इस पर नायिका जवाब देती है, तो याचक की तरह ही रह, दाता का दंभ मत भर। नायक अपनी भावनाओं को स्पष्ट तौर पर रखता हुआ कहता है, मैं तुमसे प्यार करता हूँ। नायिका तुरन्त पूछती है, प्यार क्या होता है। जवाब मिलता है-जो प्राणों को विलय करता है। इस पर नायिका पूरे दंभ के साथ कहती है, तो तू प्यार कर, अनुमति देती हूँ। किन्तु तू ही पहला पुरुष नहीं है। तुझसे पहले बहुत आ चुके हैं। तू अंतिम भी नहीं है और अनेक आएँगे।
सोनागाछी में देह व्यापार से जुडी औरतों में ऐसा ही गर्व देखा जाता है। वहाँ तक पहुँचने की और पारिवारिक और व्यक्तिगत मजबूरियों की दुखभरी दास्तान इनकी जिन्दगियों में भी है, पर शायद स्पष्ट तौर पर दिख रही पुरुषों की इनकी ओर आसक्ति इन्हें मानसिक मजबूती दिये हुए है। सोनागाछी का देह बाजार देहकर्मियों से पटा रहता है। ये न सिर्फ एच.आई.वी. एड्स के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करती हैं बल्कि सरकार से अपने लिए कामगार (वर्कर) के दर्जे की माँग भी कर रही हैं।5
जगदम्बा प्रसाद दीक्षित का प्रचलित उपन्यास मुर्दाघर संभवतः बडे फलक पर वेश्याजीवन को प्रतिबिंबित करने वाला पहला मौलिक उपन्यास है। इस उपन्यास की नायिका मैना को वेश्या व्यवसाय करते हुए पुलिस पकड कर ले जाती है और हवालात में बंद कर देती है। उसका पति उससे जाकर मिलता है और उसे घर की औरत बताकर छुडाकर ले जाने की बात करता है। तब मैना उसका विरोध करती हुई कहती है- तेरे बोलने से क्या होता। मैं रंडी हूँ : सब लोग कू मालूम। मैं खुद बोलती.... मैं रंडी हूँ। ... और तू .... मेरा मरद होके मेरे से अईसा काम करवाता .... मेरी कमाई खाता... मैं। स्पष्ट है कि मैना मजबूर करने वाले पुरुष पति के खिलाफ बोलने लगी है।
नारी अपनी देह मजबूरी में बेचती है। मोहनदास नैमिशराय का आज बाजार बंद है वेश्याओं के जीवन पर केन्द्रित एक यथार्थवादी उपन्यास है। इस उपन्यास की प्रमुख नायिका पार्वती है, किन्तु मुख्य नायिका के अलावा शबनम, हसीना, मुमताज, बीना, सलमा, पायल, चम्पा, चमेली, गुलाब, रुखसाना, शम्मी, हमीदा, जीनत, जरीना, हाजरा, कुसुम, फूल, सुमन, गुमरन आदि अनेक वेश्याएँ हैं, जिनमें से अधिकांश दलित वर्ग की या मुस्लिम हैं और धोखे से या मजबूरी में यह जीवन जी रही हैं। मोहनदास नैमिशराय की दृष्टि बहुत पैनी है। उन्होंने बहुत बारीकी से इस संसार का वर्णन किया है। वेश्याओं की सीलन भरी कोठरियाँ, सौन्दर्य प्रसाधन, अंग भंगिमा, ग्राहकों की हरकत, पुलिस की परेशानियाँ, ब्राह्मण देवता की कामलीला, लोगों की अंधश्रद्धा, अज्ञानता, वेश्याओं के उत्सव व उनकी मान्यताओं आदि का ऐसा जीवन्त चित्रण किया है मानो ये सारे चित्र चलचित्र की तरह आँखों के सामने घूम रहे हों- सावधान होकर जाओ, ऊपर रंडियाँ रहती हैं। जो जिस्म से जिस्म की भाषा की तब्दीली में विश्वास करती हैं। केवल एक मंजिल की सीढियाँ चढने में वे सभी हाँफने लगे थे। दिन का समय होने पर भी सीढियों के आस-पास अंधेरा था जैसे किसी तहखाने की सीढियों से जा रहे हों वे। सीढियों के स्टैप ऊँचे तथा खुरदरे थे। जिनका पत्थर कहीं-कहीं से उखड गया था। दीवारें बदरंग थीं। पुराना मकान होने के कारण स्टैप की संख्या काफी थी।6
समाज चाहे किसी भी देश या जाति का हो स्त्री सदैव पिछले पन्नों पर ही रही है। पिछले पन्ने की औरतें उपन्यास में शरदसिंह ने बेडिया समुदाय के इतिहास, संस्मरणों, लोक कथाओं एवं किंवदन्तियों के माध्यम से बेडनियों (बेडिया स्त्रियाँ) के जीवन के नंगे यथार्थ को उपन्यास में चित्रित किया है। वर्तमान समय में बेडिया समुदाय मध्य-प्रदेश के सागर जिले और उसके आस-पास और विशेषतः पथरिया बेडनी नाम के गाँव में बसा हुआ है जिसका नाम इसके समुदाय के नाम पर पडा है। बेडनियाँ समाज में परम्परानुमोदित नृत्य के माध्यम से अपने परिवार का भरण-पोषण करती हैं। छोटी उम्र में बेडनियाँ राई नाचना शुरू कर देती हैं और अपने परिवार की आर्थिक मदद करने लगती हैं। बेडनियों में विवाह संबंध तो प्रचलित हैं, लेकिन राई नृत्य करने वाली स्त्री विवाह नहीं करती, वह चाहे तो किसी भी पुरुष के साथ अपना शारीरिक संबंध रख सकती है अथवा पुरुष की रखैल रह सकती है। ऊपर से देखने पर बेडनियों का जीवन काफी उन्मुक्त और स्वतंत्र दिखता है, लेकिन सच्चाई का यह केवल एक पक्ष है।
दरअस्ल राई एक लोक-नृत्य कला है। लेकिन आधुनिक समय में भी बेडिया समुदाय की स्त्रियों को नृत्य करने और मजबूरी में देह-व्यापार जैसे अवैध कृत्य करने को बाध्य होना पडता है, जो अब उनके समाज में परम्परा से स्वीकृत हो चुका है। उपन्यास में उल्लिखित है कि इन स्त्रियों ने यह जीवन स्वेच्छा से नहीं चुना था। बेडिया समुदाय का इतिहास यह बतलाता है कि कभी इस समुदाय के पूर्वज पृथ्वीराज चौहान और उनके जमींदारों से संबंध रखते थे। युद्ध में हार के बाद जब इनके पुरुष मारे गये तब कुछ औरतों ने तो जौहर कर लिया, लेकिन कुछ औरतों ने किसी तरह जीवन जीने की हिम्मत दिखाई, समाज में उन स्त्रियों की जीवन जीने की महत्त्वाकांक्षा की कीमत उनकी अस्मत थी। अतः उन्होंने इसके बल पर धनवान पुरुषों को रिझाना आरम्भ कर दिया। धीरे-धीरे यही उनका पेशा बन गया।
बेडिया समाज की औरतों की समस्याएँ उनके दैहिक शोषण से जुडी हुई हैं। चूँकि अपने समाज में आय का प्रमुख स्रोत उनका नृत्य और देह ही है। अतः समस्याओं के मूल में भी वही मौजूद है। रजस्वला होने के बाद ही वह इस धंधे के लायक समझी जाती है और सिर ढकना की प्रथा के बाद उसे किसी ठाकुर अथवा रईस पुरुष की रखैल बनना पडता है। वह पुरुष उसका इस्तेमाल अपनी सम्पत्ति की तरह करता है। उसकी माँग पर प्राकृतिक अथवा अप्राकृतिक तरीके से यौन-इच्छाओं को उन्हें पूरा करना पडता है। उस पुरुष के पारिवारिक उत्सवों में जाकर नाचना और वहाँ उपस्थित रिश्तेदारों का मनोरंजन करना बेडनी के लिए अनिवार्य है और उसकी इच्छा-अनिच्छा का कोई प्रश्न नहीं उठता। उपन्यास की एक पात्र नचनारी ठाकुर के बच्चे को जन्म देती है। जन्म के एक महीने के बाद ही ठाकुर के घर से राई नृत्य के लिए बुलावा आ जाता है। अभी उसका शरीर कमजोर है, परन्तु ठाकुर की आज्ञा को वह टाल नहीं सकती और नृत्य करने जाती है। ठाकुर की क्रूरता उसके गर्भावस्था के दौरान भी देखने को मिलती है जब वह गर्भ के सातवें-आठवें महीने में भी उसके साथ यौन-संबंध बनाता है और एक बार जब नचनारी बिल्कुल ही इसके लिए राजी नहीं होती, तब वह अपना लिंग जबरन उसके मुँह में डाल उसे मुख-मैथुन के लिए बाध्य करता है। नचनारी मन ही मन बहुत ऋोधित होती है, लेकिन प्रत्यक्ष रूप से कुछ कह नहीं पाती क्योंकि वह जानती है कि ठाकुर अपनी इच्छा पूरी न होने पर उसे और उसके बच्चे को मौत के घाट उतारने से भी नहीं हिचकेगा।
अविवाहित मातृत्व इनकी एक अन्य प्रमुख समस्या है। इनके बच्चे अवैध कहलाते हैं। लेखिका यह सुनकर स्तब्ध रह जाती है कि बेडनियाँ स्कूल में बच्चे के पिता का नाम पूछे जाने पर रुपया, पैसा कुछ भी लिखवा देती हैं। यह सही भी है क्योंकि रुपये, पैसे के लिए ही वो माँ बनने पर मजबूर हैं। देह व्यापार की लगातार आवश्यकता ने बेडिया औरतों के जीवन में कभी स्थायित्व नहीं आने दिया। सभ्य समाज का कोई पुरुष उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करना पसंद नहीं करता और यदि वे अपने समाज के पुरुष से विवाह रचाती भी हैं तब भी धंधे पर उन्हें लौटना ही पडता है। उपन्यास में एक बेडनी धंधा नहीं करना चाहती है और सामूहिक विवाह आयोजन में उसका विवाह तथाकथित सभ्य घर के लडके से होता है। विवाह के कुछ समय पश्चात् ही घर की सभ्यता सामने आ जाती है, क्योंकि पति अपने ही दोस्तों के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर करने लगता है। वह उससे कहता है- तू क्या समझती है तुझे अपनी बीवी बनाए रखने को तुझसे शादी किया मैंने। अरे, चल हट। तुझे तो मैं इसलिए ब्याह कर लाया हूँ कि तुझसे धंधा करा सकूँ। उसका यह वाक्य उसकी तमाम सभ्यता के ढकोसले को सामने रख देता है जिसके लिए बीवी पहले बेडनी है और बाद में पत्नी या शायद वह भी नहीं, महज यौन-इच्छाओं की पूर्ति का साधन-मात्र।
देह के व्यापार का जन्म भूख और बेरोजगारी के गर्भ में से ही नहीं हुआ है, इसकी जिम्मेदार पुरुष लिप्सा की अनियंत्रित आकांक्षा भी है। मधु कांकरिया अपने उपन्यास सलाम आखिरी में भारतीय पुरुषों का स्त्री-पक्ष प्रस्तुत करती लिखती हैं, पुरुषों का आज भी वेश्याओं के पास जाने को किसी भी प्रकार की अनहोनी घटना न समझने वाला विजय बडे गर्व से अपने युवा मित्र के द्वारा अडतालीस स्त्रियों के साथ शारीरिक संफ की बात करता है और जब सुकीर्ति उसे पुरुष वेश्या कहलाना अधिक उपयुक्त समझती है, तब भी विजय के पुरुषों के पक्ष में अपने तर्क हैं- जहाँ तक मैं जानता हूँ, वेश्यावृत्ति हमारी संस्कृति के हर कालखंड में किसी न किसी रूप में जीवित रही है, चाहे वह महाभारत काल रहा हो, मौर्यकाल या वैदिक काल। बस यूं समझ लो कि जगन्नाथपुरी के रथ की तरह वेश्यावृत्ति के रथ को खींचने के लिए युग में पुरुष आते रहे।...
मधु कांकरिया आगे लिखती हैं- सैद्धांतिक तौर पर नारी पूजा की वस्तु रही है, पर व्यवहार में सदैव ही काम की वस्तु रही। कुछ आस्थावान नारी पात्रों को छोडकर यहाँ सारी मूर्तियाँ प्रायः नग्न ही रहीं। प्रसिद्ध यात्री मार्कोपोलो ने और बाद में एक अन्य यात्री हेमिल्टन ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि देवदासी यदि रूपवती होती, तो कोई-न-कोई धार्मिक सेठ उसे मंदिर से अपने भोग के लिए ले जाता, लेकिन वृद्ध देवदासियों को बिना सुरक्षा के ही मंदिरों से निकाल दिया जाता था। इन देवदासियों के प्रथम संभोग का अधिकार कई जगह उस व्यक्ति को भी मिलता था जो मंदिर को सर्वाधिक धनराशि दान देता था, और कई जगह यह सौभाग्य केवल ब्राह्मणों को मिलता था।
वेश्याओं के अवरुद्ध मानसिक विकास को देखकर सुकीर्ति को बोंसाई पद्धति की याद आती है। इन वेश्याओं में से करीब नब्बे प्रतिशत बारह-तेरह वर्ष की उम्र में ही इस माहौल में आकर बंद हो जाती हैं। किसी बाडे में बंद भेडों का- सा जीवन उनका। चकले की मालकिन एवं दलाल उन्हें किसी से मिलने-जुलने तक नहीं देते कि कहीं चिडिया उड न जाय। मुश्किल से इनकी भाषा में सत्तर-अस्सी शब्द होते हैं- अंगिया, खटिया, अंगना, जोवना, तकिया, बतिया, कंगन, चूमा, चिपटा, लिपटा जैसे सिर्फ देह की भाषा तक ही सीमित। अधिकांश का मस्तिष्क एक बच्चे के मस्तिष्क से अधिक विकसित अवस्था में नहीं रहता है।
लता शर्मा ने सही नाप के जूते उपन्यास में आधुनिक नारी के भूमंडलीय समाज में कमोडिटी के रूप में परिणत होकर खुद को बिकाऊ स्थिति में डालने की स्थितियों का चित्रण कर स्त्री के इन सबसे अलग रहने का मार्ग प्रशस्त किया है। उपन्यास प्रारम्भ में ही यह वाक्य- मुक्त अर्थव्यवस्था के सामने नाच रही है अर्द्धनग्न स्त्री देह कथाकार के उद्देश्य को स्पष्ट कर देता है कि वह इस मुक्त बाजार की उपभोक्ता संस्कृति में अभिभावकों की महत्त्वाकांक्षाओं के सामने लडकों को कितना-कितना लाचार कर देते हैं। माँ की महत्त्वाकांक्षा अपनी बेटी को विश्वसुन्दरी बनाने की है, इसलिए वह अपनी बेटी उर्मी को उर्वशी तक की यात्रा कराती है, सामान्य लडकी से विश्व-सुन्दरी। उसके शरीर की देख-भाल, रख-रखाव, वह जिस रूप में कर रही है, उसमें बेटी की खान-पान, रहन-सहन, पढने-ओढने में निज की कोई इच्छा नहीं है, जैसा माँ कराती है, वह करती चली जाती है। कुछ बनने के लिए ... उर्मी को बचपन और कैशोर्य का बहुत कुछ खोना पडता है और यौवन का बहुत कुछ खोती है वह माँ की महत्त्वाकांक्षा के लिए, अपने मालिश करने वाले को शरीर भी समर्पित करना पडता है तो माँ उसे बिजनेस हैजार्ड (व्यावसायिक जोखिम) कहकर अनदेखी में डाल देती है। वह भारत-सुन्दरी का ताज पाने में सफल हो जाती है, अब माँ उसका अगला पडाव विश्व-सुन्दरी का तय करती है। भारत सुन्दरी बनते ही तीन घटनाएँ एक साथ घटती हैं, माँ ने कफ परेड की खूबसूरत इमारत सागर रत्न में फ्लैट खरीदा, पापा सरकारी क्वार्टर में ही छूट गए, और उर्वशी का कौमार्य भंग हुआ।
माँ के लक्ष्य को पाने के लिए वह मशीनी जीवन जीने लगती है, भारत सुन्दरी बनते ही उर्वशी के चारों ओर विज्ञापनों की वर्षा होने लगी। उसके पास दो ही काम थे। माँ द्वारा बताई गई जगह पर हस्ताक्षर करना और निर्देशक द्वारा बताई गई वस्तु हाथ में लेकर विज्ञापित करना। समय बहुत कम था। एक बार विश्व सुन्दरी प्रतियोगिता की ट्रेनिंग शुरू हो गई, तो किसी काम के लिए वक्त नहीं बचेगा। आषाढ की धूप है, जितने बने, पापड बना लो। इन सबसे थक-ऊबकर उर्वशी पापा के पास घर लौट जाना चाहती है किन्तु माँ वहीं पाँच करोड रुपये का आलीशान फ्लैट ले जरा ढंग से रहना चाहती है अब। बेटी को चिन्ता है कि इसका लोन कैसे पटेगा, माँ जानती है कि यह सब बेटी के शरीर-विज्ञापन से ही आएगा। चार्ल्स रोजेरियो नामक युवक अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शरीर वैज्ञानिक प्रशिक्षक और मालिश करने वाला उसे पूर्ण नग्न कर आपाद मस्तक निहारता है, परीक्षक की तरह और ऐसे ही किसी सेशन में ऐसे ही संगीत की लहरों पर डूबते-उतरते अचानक एक बार चार्ल्स ऊपर चढ आया। दोनों हाथों से उर्वशी के पुष्ट उरोजों को भींच उसके अन्दर उतर गया। माँ बडी शांति और धैर्य से बेटी की पूरी बात सुन पानी में डेटॉल डालकर गुप्तांग धोने और अच्छी तरह नहाने की सलाह देकर उपराम हो जाती है, सहज भाव से इसे व्यवसायगत जोखिम-आक्यूपेशनल हैजार्ड, का नाम देकर और व्यक्तिविहीन हुई उर्वशी सदा की आज्ञाकारिणी की तरह इसे भूल गई। फिर वो विश्वसुन्दरी की यात्रा तक कई बार उन ब्यूटी कांटेस्ट सेशंस में प्रख्यात व्यक्तियों की जूरी के सदस्यों को उसने तरह-तरह से अपने को परोसा और इसी की कीमत पर विश्वसुन्दरी का ताज हासिल किया। माँ की महत्त्वाकांक्षा पूरी हुई। आगे क्या है। कोई और शिखर।.... या ढलान.... सिर्फ ढलान।7
फिल्म इंडस्ट्री में सफलता और प्रसिद्धि के अनेक शिखर छूते हुए अन्ततः वह ढलान से गर्त में, और गहरे गर्त में गिरती चली जाती है। और अन्त में मिला है उसे कारुणिक दारूण अन्त। इस प्रकार उपन्यास भूमंडलीय समय के भँवर में फँसी मॉड नारी की नियति का आख्यान रचता है।
निर्मल भुराडिया का उपन्यास गुलाम मंडी महिलाओं के साथ-साथ किन्नर समाज के शारीरिक शोषण और प्रताडना को प्रस्तुत करता है। आर्थिक असमर्थता, बेरोजगारी, शिक्षा का अभाव, तकनीकी अकुशलता, परंपरागत पेशे का अज्ञान, साथ ही समाज का अमानवीय व्यवहार किन्नरों को यौन कर्म की ओर धकेलता है। जानकी के माध्यम से लेखिका दलितों के यौन शोषण और मानव-तस्करी के सत्य पर से पर्दा उठाती हैं। आर्थिक बेरोजगारी के कारण यौन-कर्म के लिए मानव तस्करी का वैश्विक बाजार बढता जा रहा है। यौनकर्मियों के साथ बर्बरतापूर्ण व्यवहार के वर्णन के साथ मायावी दुनिया का अमानवीय सत्य प्रस्तुत करती हैं,- हाँ कुछ भी तो नहीं भूली थी जानकी। लम्बे-लगडे बलशाली मैक के द्वारा बार-बार किया गया बलात्कार। शरीर पर नील के निशान देने, नोचने-काटने वाले ग्राहक। नंगा नचवाने के लिए भूखा रखने वाली मारिया। ऐनल सेक्स करके असहनीय दर्द और चोट पहुँचाने वाला गंजा टॉम। कैसे भूल सकती है वो यह सब।8 जिसके बाद वह फिर सामान्य जीवन नहीं जी पाती। जानकी कहती है- मैं तो जल रही हूँ खुद के प्रति नफरत में। कितनों ने मेरी देह को रौंदा है।9
मधु कांकरिया प्रश्न करती हुई स्वयं ही उत्तर तलाशती हुई लिखती हैं- संसार की किस फैक्टरी में ढाली जाती हैं ये वेश्याएँ। ये ढाली जाती हैं या समाज की खुशहाली अथवा परिवार की किलेबंदी के बाई-प्रोडक्ट के रूप में खुद-ब-खुद अंकुरित हो जाती हैं। शहरी औद्योगीकीकरण और आधुनिकीकरण की आँधी ने मानवी को सिर्फ देह में परिवर्तित कर दिया है। वह रह गई है मात्र शरीर.. एक स्थूल शरीर.. कलाहीन, रूपहीन, रूप की हाट में बिकता एक रुग्ण शरीर।10
उमराव जान संभवतः वेश्या जीवन को उद्घाटित करने वाली पहली लिखित गाथा है। लेखक मिर्जा हादी का यह दावा है कि यह उमराव की सच्ची आत्मकथा है। कम उम्र की लडकियों की खरीद-फरोख्त से लेकर एक वेश्या के पूरे जीवन की दर्द भरी दास्ताँ का जिऋ इसमें किया गया है। उमराव कहती है - एक मेरी फूटी तकदीर थी कि बिकी, तो कहाँ रंडी के घर में।11 वह अपनी किस्मत पर अफसोस करती हुई जीवन यात्रा के पडाव याद करती है कि कैसे वह अमीरन से उमराव बनी। उम्र की ढलान पर जब वह उन कामों को छोड किसी के घर बैठने की सोचती तब वह समाज की सोच को लिखती है- लोग कहेंगे कि आखिर रंडी थी, कफन का चोगा किया जब कोई रंडी उम्र से उतर जाने के बाद किसी के घर बैठी रहती है, तो तजुरबेकार तमाशबीन कहते हैं कि मरते-मरते कफन ले मरी, इंतजाम कर लिया कि कफन के पैसे पास से न खर्चने पडें और फरेब में फँसा के दूसरे के सर बोझ डाल दिया।12 कितना खुदगर्ज होता है पुरुष समाज, जिसके साथ रात रंगीन करता है दिन के उजाले में बसता हुआ देख बर्दास्त नहीं कर सकता और गढने लगता है तमाम बातें।
ऐसा ही कुछ गीताश्री अपने उपन्यास हसीनाबाद में वेश्याओं के प्राणहीन जीवन की एक झांकी प्रस्तुत करती हैं- हसीनाओं से आबाद इस नगर की हसीनाएँ अपने बेहिसाब दर्द में बर्बाद थी। हसीनाएँ वहाँ पर कुछ समय के लिए ही हसीन रहती थीं, फिर खण्डहर और मलबों में बदल जाती थी। उस बस्ती में, उसकी धूल, मिट्टी और हवाओं में सिर्फ देह गंध ही भरी थी। जैसे सारी औरतें देह की गठरियाँ हो, जमीन पर लुढकती हुई गठरियाँ, प्राणहीन गठरियाँ, जिनमें उभरी हुई अरमानों की कब्रें साफ नजर आती थी।13
प्रत्येक व्यक्ति स्वाभिमान से जीने की कामना करता है। जहाँ तक एक स्त्री की प्रकृति की बात है तो वह मिटने के बजाए स्वाभिमान से मरना बेहतर समझती है। लेकिन सभ्य समाज कैसे लडकियों को अगवा कर इस बाजार तक पहुँचा देते हैं जहाँ उसे किसी भी बात का अधिकार नहीं- कुछ पल के लिए वह भूल गयी थी कि वह स्वप्न नगर की नहीं हसीनाबाद की नागरिक है, जहाँ उसकी नींद तक गिरवी है।14
फिर कानून पुरुषों को वेश्याओं, कॉलगर्ल या अनैतिक चरित्र की किसी भी महिला के साथ बलात्कार तक का कानूनी अधिकार देता है। संशोधन से पहले साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 155(4) में कहा गया था कि गवाह की विश्वसनीयता खत्म करने के लिए किसी व्यक्ति पर बलात्कार का आरोप हो तो उसे यह सिद्ध करना चाहिए कि अमुक महिला आमतौर पर अनैतिक चरित्र की महिला है। मतलब महिला को अनैतिक चरित्र की स्त्री प्रमाणित करने पर बलात्कार का अपराध माफ। या फिर पुरुषों को बलात्कार का कानूनी अधिकार है वेश्याओं या कॉलगर्ल के साथ?
देह व्यापार में उँगली भले ही वेश्या की ओर उठती है, किन्तु यह पितृसत्ता के तुष्टीकरण की नीति के तहत ही तो जीवित है। पुरुष वर्ग रस्सी से बँधी स्त्री का स्वाद भी पाना चाहता है और रस्सी तुडाई हुई स्त्री का भी। लेकिन दमन और यातना के इतिहास के साथ-साथ अस्तित्व की अभिव्यक्ति भी निरन्तर चलती रहती है। गरीब पुरुष जहाँ अपनी मजबूरी से भीख माँगने का आदी बन जाता है तो स्त्री को अपनी सांसें बरकरार रखने के लिए अपनी देह का बिस्तर बिछाना ही पडता है ..... वह कहती है- मजबूरी में वह अपनी देह तो दे सकती है, रूह पर काबू तो कभी इस जन्म में तुम नहीं पाओगे। बिना रूह की मुर्दा देह चाहिए तो ले लो।15
प्रश्न यह है कि कीडे-मकोडों की तरह जीते-जी नरक की जिन्दगी जीने के लिए अभिशप्त असंख्य लोगों का यह सिलसिला तथाकथित सभ्य कहलाने वाले मानव-समाज में क्या अनवरत इसी तरह चलता रहेगा? तिनका तिनके के पास और दस द्वारे का पिंजरा दोनों ही उपन्यासों में अनामिका वेश्यावृत्ति के पारम्परिक से लेकर आधुनिक तक विविध रूपों को उजागर करती हुई वेश्याओं के पुनर्वास की समस्या को भी उठाती है। अनामिका वेश्यावृत्ति में पहुँची इन स्त्रियों को अपराधबोध से ग्रस्त नहीं बनाती। तारा और ढेलाबाई ऐसी ही स्त्रियाँ हैं जो अपनी नियति के कारण किसी प्रकार ग्लानि में नहीं डूबती। लेखिका उन्हें स्वाभिमान और मर्यादा से युक्त ऐसी उच्च सामाजिक चेतना सम्पन्न स्त्रियों के रूप में चित्रित करती हैं जो वेश्या के रूप में स्त्री के वस्तुकरण का प्रतिकार करके उसका पुनः मानुषीकरण करती है। पूरा जीवन वेश्या के रूप में जीने वाली ढेलाबाई अपनी नातिन काननबाला से पूछती है कि औरत को देह मिली है तो क्या। वह इस देह को रूह का कैदखाना बनाए रखने के लिए तनिक भी सहमत नहीं। उसके अनुसार इस समस्या का सुधारात्मक समाधान यह है कि स्त्री को अपना संसार और बडा करना होगा।

संदर्भ :
(1) प्रभा खेतान, अन्या से अनन्या, पृ. 212
(2) कमल कुमार, पासवर्ड, पृ. 20
(3) नीना लाम्बा, व्यावसायिक यौनकर्मियों का सुधार एवं पुनर्वास, पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो,
गृह मंत्रालय, नई दिल्ली, पृ.19
(4) निराला, अप्सरा, पृ.15
(5) गीतश्री- औरत की बोली, पृ.148
(6) मोहनदास नैमिशराय- आज बाजार बंद है, पृ.24
(7) लता शर्मा, सही नाप के जूते, पृ.9
(8) गुलाम मंडी, पृ. 235
(9) गुलाम मंडी, पृ. 239
(10) आखिरी सलाम, पृ. 59
(11) मिर्जा हादी रुस्वा- उमराव जान ‘अदा’, पृ. 88
(12) मिर्जा हादी, रुस्वा- उमराव जान ‘अदा’, पृ. 92
(13) गीताश्री, हसीनाबाद, पृ. 21
(14) गीताश्री, हसीनाबाद, पृ. 23
(15) अनामिका, दस द्वारे का पिंजरा, पृ.192

सम्पर्क : सहायक आचार्य, हिन्दी विभाग,
राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय
बान्दरसिंदरी, किशनगढ,
अजमेर (राज.)
मो. 9413169433

Sunday, March 1, 2020

रिव्यू : किसानों के प्रति कृतज्ञ होने का संदेश देती 'सीरी'

पिछले 15 सालों में खेती से हुए नुकसान से लगभग 7300 किसान मजदूरों ने आत्महत्या कर ली। यह आँकड़ा कहने सुनने में छोटा लग सकता है किंतु सोचकर देखें कि जिन किसानों की बदौलत हम अनाज, फल, सब्जियां खाते हैं और जिंदा रहते हैं क्या कभी भी हम उनके प्रति कृतज्ञ हो पाए हैं। नहीं ना? आए दिन अखबारों और न्यूज चैनलों की मात्र ये सुर्खियांबनकर रह जाते हैं। कभी टिड्डी दल तो कभी सफेदा किसानों की फसलों को चौपट कर जाता है। 

एक बुजुर्ग एक लड़की को लेकर पानी की टँकी पर चढ़ा हुआ है और उसे मारने की धमकी भी देता है। इस बीच काफी सारी घटनाएं होती हैं। सीरी फ़िल्म की कहानी है ही ऐसे ही एक किसान की। किसान चंद नाम और उसका दोस्त कीटो आपस में खेती करते हैं। ढाई किले जमीन चंद की है और पाँच किले जमीन ठेके पर लेकर कीटो चंद का सीरी यानी साझेदार किसान मजदूर है। पिछली तीन फसलें बर्बाद हो चुकी हैं कीड़े लगने की वजह से और अबकी बार कीटो को अपनी बेटी की एन आर आई लड़के से शादी भी करवानी है। इस बीच वे अस्सी हजार रुपए कर्जा भी लेते हैं। लेकिन फसल में अच्छा बीज डालने के बावजूद फसल चौपट हो जाती है और कर्जे के चलते कीटो आत्महत्या कर लेता है। कुछ समय बाद खबर आती है कि सरकार किसानों को मुआवजा देगी। लेकिन यहाँ भी साढ़े सात किले जमीन की एवज में चंद के हिस्से मुआवजे के मात्र 2 हजार रुपए आते हैं। इस सबको देख वह लड़ाई लड़ने का फैसला करता है। कोर्ट केस होता है। एक पढ़ी लिखी लड़की के साथ मिलकर पानी की टँकी पर भी चढ़ जाता है। अब समझे वह पानी की टँकी पर क्यों चढ़ा? 

सबसे पहले तो धन्यवाद सुरेंद्र सर का जिन्होंने इस फ़िल्म का प्राइवेट लिंक भेज कर मुझे रिव्यू लिखने के लिए कहा। राष्ट्रीय फ़िल्म पुरुस्कार विजेता राजीव कुमार ने इस फ़िल्म का स्क्रीनप्ले काफी कसा हुआ रखा है। जिस बदौलत यह फ़िल्म दिल के काफी अंदर तक पैठ बनाती है और सोचने पर मजबूर करती है कि क्या महज किसानों की आए दिन हो रही दुर्दशा को हम यूँ ही देखते रहेंगे। 

एक बात और जो इस फ़िल्म में दिखाई गई है वह यह कि आजादी के बाद हमारे पास खाने को गेहूँ नहीं था और गेहूँ हमें अमेरिका से आयात करना पड़ता था। वह ऐसा गेहूँ होता था जिसे वे समुद्र में बहा दिया करते थे। उसके बाद उन्होंने हथियारों की खेती छोड़ ज़हरीले यूरिया और अन्य दवाईयां बनाकर अधिक फसल लेने का लालच दिखाया। जिसके कारण मौजूदा हालात यह है कि हमारे देश की मिट्टी का उपजाऊपन जाता रहा है। ना ही वैसा स्वाद अब फल, सब्जी और अनाज में रहा है और न ही वैसी पौष्टिकता। 

खैर सीरी फ़िल्म एक बेहद ही जरूरी मुद्दे को उठाती है और बेहद संवेदनशील तरीके से हर किरदार ने अपना श्रेठ प्रदर्शन किया है। फ़िल्म का गीत- संगीत फ़िल्म के स्तर को ऊँचा उठाता है। फ़िल्म की कास्टिंग, ड्रेस, लोकेशन, म्यूजिक सब एक मंझे हुए निर्देशन टीम में ही सम्भव हो सकता है। राष्ट्रीय फ़िल्म पुरुस्कार विजेता 'नाबर' फ़िल्म प्रोडक्शन के बैनर तले बनी इस फ़िल्म की बेहतरीन सिनेमेटोग्राफी के लिए रोबिन कालरा की जितनी तारीफ की जाए कम है। इसी तरह एडिटिंग के लिए दीपक गर्ग भी तालियों के हकदार है। फ़िल्म का म्यूजिक दिया है मनाश बोनहाकुर , कुणाल अग्रवाल ने। फ़िल्म का सबसे अहम और जरूरी हिस्सा उसका गीत होता है गीतकार संतराम उदासी, कर्म जीत भाटी, बलविंदर सिंह की कलम इस मामले में बेहद खूबसूरती से निखर कर सामने आई है। 

फ़िल्म चूंकि रिलीज नहीं हुई है ना ही इसका कोई ट्रेलर लॉन्च हुआ है लेकिन फिर भी अपनी और से इस फ़िल्म को साढ़े 4 स्टार

रिव्यू : जरूरी सवाल उठाती 'थप्पड़'

निर्देशक: अनुभव सिन्हा
अभिनीत: तापसी पन्नू, दीया मिर्ज़ा, माया सरराव, गीतिका विद्या, रत्ना पाठक शाह, तन्वी आज़मी, नैला ग्रेवाल, पावेल गुलाटी, कुमुद मिश्रा, मानव कौल, अंकुर राथे, सुशील दहिया

घर के  मुख्य द्वार से न्यूज पेपर और दूध की बोतलें लेने और अदरक और लेमनग्रास के साथ चाय के कप को पीते हुए, दिन की भीड़ से पहले बालकनी में शांति के चाय की चुस्कियाँ भरती हुई अमू यानी अमृता की कहानी किस कदर मोड़ लेगी यह फ़िल्म के मध्यांतर के लगभग पहले से ही तय हो जाता है। अमृता का जीवन एक सामान्य दैनिक जीवन है जो थप्पड़ के माध्यम से प्रतिच्छेदित किया गया है, 
अमृता की खुशहाल जिंदगी तब टूटती है जब उसका पति उसे पार्टी में थप्पड़ मारता है।

अमृता (तापसी पन्नू) के जीवन में प्रत्येक जंक्शन पर एक अलग अंतर्निहित अर्थ कैप्चर करने वाला एक रनिंग थ्रेड है।  घरेलू जीवन में निर्विवाद संतोष और अपने स्वयं के सपनों को शादी में लिए जाने की बेचैनी में रखती हुई अमृता एक पार्टी में एक पति द्वारा दिए गए अप्रत्याशित थप्पड़ के अपमान से एक पार्टी में सक्रिय भूमिका निभाने के बावजूद इस कदर आत्मसम्मान को ठेस पहुँचा बैठती है कि नोबत तलाक तक पहुँच जाती है।  इस फ़िल्म के बारे में  यह है कि वह बाहर की दुनिया के साथ-साथ शादी, रिश्तों, परिवार के परिणामों को कैसे नष्ट कर सकती है। 


थप्पड़ के ट्रेलर ने मुझे एक थकावट की भावना के साथ छोड़ दिया था। लेकिन फिल्म के टीज़र के मूल को प्रकट कर चुकी यह फ़िल्म दो घंटे से अधिक दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रख सकती है? इस बारे में कहना दिलचस्प नहीं।  

 
हालाँकि, लेखक अनुभव सिन्हा और मृण्मयी लगू वीकुल एक थप्पड़ को पुरुष पात्रता के बड़े अन्वेषण में बदल देते हैं।  वे एक निंदनीय लेकिन संक्षिप्त और किफायती कथा बुनते हैं, जो एक महिला के जीवन पर ध्यान केंद्रित करते हुए भी इसे हर महिला के बारे में कहानी में बदल देती है।   यह सभी आयु समूहों और सामाजिक विभाजनों में महिलाओं के एक सुंदर प्रारंभिक क्रम में अच्छी तरह से केंद्रित है, कारों और साइकिलों में रात को सवारी करते हुए, कुछ अपने पुरुषों के साथ, एक तरफ पितृसत्ता के उल्लंघन की अपनी कहानियों के साथ सभी पर एक नारंगी रंग की तरह है यह फ़िल्म

 यह फ़िल्म उन महिलाओं के बारे में है जो रोज़मर्रा की पितृसत्ता के दबाव के चलते चुपचाप रहने के लिए मजबूर  हैं ("बर्दाशत करना" जैसा कि फ़िल्म कहती है)  लोग कहते हैं।  मानव कौल, कुमुद मिश्रा, रत्ना पाठक शाह,तन्वी आज़मी से लेकर अमृता के भाई नैला ग्रेवाल और उसके विवादित वकील माया सराओ सभी का अभिनय श्रेष्ठ तथा फ़िल्म की कहानी उसकी बुनावट के अनुकूल है। गीत- संगीत भी जरूरत के अनुसार ही है। फ़िल्म में कोई मसाला नहीं बल्कि संवेदनशीलता है और यह संवेदनशीलता केवल महसूस की जा सकती है। इस तरह यह फ़िल्म एक महिला की कहानी हर महिला, हर पुरुष और रोजमर्रा के पुरुष पात्र बन जाती है।

अपनी रेटिंग - ढाई स्टार 
 

Friday, February 28, 2020

बुक रिव्यू : आत्मा की अधूरी प्यास है "पुरुष तन में फँसा मेरा नारी मन"

 प्रत्येक भगवान और देवी का हिंदू धर्म में गहरा महत्व है जो प्राचीन शास्त्रों में परिलक्षित होता है।  हाल के दिनों में, हिंदुओं के लिए, देवी लक्ष्मी सौभाग्य का प्रतीक है।  लक्ष्मी शब्द संस्कृत के शब्द लक्स्या से लिया गया है, और वह धन और सभी रूपों और भौतिक और समृद्धि की समृद्धि की देवी हैं।  लक्ष्मी ज्यादातर सभी हिंदू परिवारों की घरेलू देवी हैं और उनकी पूजा रोज की जाती है। लक्ष्मी को देवी दुर्गा की बेटी और विष्णु की पत्नी के रूप में जाना जाता है, जिनके साथ वह अपने प्रत्येक अवतार में अलग-अलग रूप धारण करती हैं।  किंतु ऐसी ही एक पुत्र रूप में लक्ष्मी यानी किन्नर की आत्मकथा है- पुरुष तन में फँसा मेरा नारी मन। यह आत्मकथा उस भारत की पहली ट्रांसजेंडर की आत्मकथा है जिसने कॉलेज में प्रिंसिपल का पद हासिल किया और वर्तमान में विद्यासागर विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। झिमली मुखर्जी पांडे उर्फ़ मानोबी बंधोपाध्याय का जीवन बहुत ही संघर्ष पूर्ण रहा है। बचपन से लेकर अपनी सफलता तक पहुंचने की यह बेबाक आत्म कहानी है। 

 "आप एक पुस्तक का चयन नहीं करते हैं, पुस्तक आपको चुनती है"।  क्या आप बता सकते हैं कि आप में से कितने लोग इस महिला को पहचानते हैं, इस महिला को कहीं देखा या सुना होगा। मुझे यकीन है कि हम में से बहुत कम ही हैं जो मानोबी को जानते और पहचानते हों। भारत की पहली "ट्रांसजेंडर" प्रिंसिपल की कहानी "मैं हिजड़ा मैं लक्ष्मी" लिखने वाली लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी जैसी नहीं बल्कि उससे भी दयनीय, सोचनीय और विचारणीय बन जाती है। 

 अब ट्रांसजेंडर को आमतौर पर हमारे समुदाय में "हिजड़ा" के रूप में जाना जाता है।  हम आम तौर पर उन पर बहुत ध्यान आकर्षित करते हैं चाहे वह ट्रेनों में हो, या ट्रैफिक सिग्नल पर हो या शादियों में हो या जब बच्चा पैदा होता हो।  ट्रांसजेंडरों का मज़ाक उड़ाते हुए लोगों और समाज को देखना और सुनना बहुत आम है क्योंकि उनके अनुसार, वे हमारे लिए गंदे प्राणी हैं और हमें लगता है कि उनके साथ दास या अछूत जैसा व्यवहार किया जाना चाहिए।  यह पुस्तक ज्ञान चक्षु खोलने वाली और एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति की बहुत स्पष्ट और खूबसूरती से लिखी गई कहानी है। अपनी पहचान को परिभाषित करने और उपलब्धि के नए मानक स्थापित करने के लिए एक ट्रांसजेंडर की यह असाधारण और साहसी यात्रा है।
 
बंगाली साहित्य का अध्ययन करने के लिए अपने गृहनगर नैहाटी के ऋषि बंकिम चंद्र कॉलेज से जादवपुर विश्वविद्यालय में जाने के बाद, मानबी का विश्वदृष्टि का विस्तार शंख घोष और पाबित्रा सरकार और उनके समान बौद्धिक रूप से उत्तेजक साथी छात्रों की संगति में हुआ।  रंगमंच, नृत्य और लेखन ने उसे शारीरिक और मानसिक अशांति की एक निरंतर स्थिति प्रदान की।  यह पुस्तक उनके निजी संबंधों और उनके परिवार की लंबे समय से चली आ रही पहचान को अस्वीकार करने का एक कच्चा चिठ्ठा है।  उसकी रोमांटिक व्यस्तताओं के कई परीक्षण और गहरे संबंध के लिए उसकी निरंतर लालसा पाठक को उसके उम्मीद भरे चरित्र में अद्भुत बनाती है। अपने जादवपुर के दिनों में, मनोबी एक अन्य ट्रांसजेंडर जगदीश (जूही), जो एक सार्वजनिक कलाकार था, से निकटता से परिचित हो गया। उनकी अंतरंग मित्रता के बावजूद, उनके जीवन और समझ में विपरीतता ने उस अंतर को उजागर किया, जो किसी व्यक्ति के जीवन में शिक्षा और समाजीकरण करता है।  जगदीश ने लापरवाह यौन जीवन शैली के कारण एड्स का शिकार हो गया। झारग्राम में व्याख्यान देने और पीएचडी कार्यक्रम में उसके बाद के नामांकन में उनके पहले कार्यकाल के बाद, उन्होंने अबोमनोब (जिसका अर्थ है सबहुमन) - भारत की पहली ट्रांसजेंडर पत्रिका शुरू की - जो समुदाय और समाज के बाकी हिस्सों के बीच संवाद के प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करती है।  पत्रिका ने स्वास्थ्य, स्वच्छता, रहने की स्थिति, भाषा, लिंग, साक्षात्कार, बधियाकरण, सम्मेलनों, कलंक और निश्चित रूप से, आगे बढ़ने जैसे विषयों पर छुआ।  इसने सार्वजनिक क्षेत्र में ट्रांसजेंडर लोगों के लिए जगह बनाई।  “तब तक, हिजड़े एक ऐसे समुदाय के थे, जो ट्रैफिक सिग्नल पर ताली बजाते और भीख मांगते थे या जब नए-नवजातों को अस्पताल से लाते थे, तब उन्हें पैसे मिलते थे।  यह तथ्य कि उनके कारण के लिए पूरी पत्रिका समर्पित हो सकती है, ताकि वे अपने अधिकारों के लिए लड़ सकें। 

यह किताब परिवार में पैदा हुए एक लड़के की कहानी है जिसे सोमनाथ के नाम से जाना जाता है।  उनके पिता विशेष रूप से खुश थे क्योंकि उनका जन्म 2 लड़कियों के बाद हुआ था। शुभचिंतकों ने उनके जन्म के समय, परिवार की बढ़ती समृद्धि और टिप्पणी करते हुए कहा कि, "यह एक लड़का है लक्ष्मी!" हालांकि, यह बहुत पहले नहीं था जब छोटे से इस लड़के को अपने शरीर में कुछ अपर्याप्त सा महसूस होना शुरू हो गया था और अपनी खुद की पहचान पर सवाल उठाना शुरू कर दिया था। क्यों कि उसे लगातार महसूस हुआ कि वह एक लड़की थी जबकि उसके पुरुष अंग थे?  वह एक तरह से लड़कों के प्रति आकर्षित थी।  इतना अधूरा महसूस करने से रोकने के लिए वह क्या कर सकती थी?  यह स्पष्ट रूप से भाग्य का एक क्रूर मजाक था जिसे परिवार ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। ईमानदारी और गहरी समझ के साथ, मानोबी एक पुरुष से एक महिला में उसके परिवर्तन की चलती कहानी बताती है;  इस तरह की उथल-पुथल के बावजूद वह अपने शिक्षाविदों का पीछा करना जारी रखा और एक गर्ल्स कॉलेज की पहली ट्रांसजेंडर प्रिंसिपल बन जाती है और ऐसा करने में, उसने न केवल अपनी पहचान को परिभाषित किया, बल्कि अपने पूरे समुदाय को भी प्रेरित किया। 

 यह कहना कि ट्रांसजेंडर्स के प्रति मेरा नजरिया गलत नहीं होगा। पुस्तक एक नई दुनिया के लिए एक प्रवेश द्वार है, अज्ञात, अनदेखी और बेरोज़गार। यह पुस्तक समाज और सामान्य रूप से तथाकथित पुरुषों के लिए एक आईना दिखाती है, जिन्होंने सामान्य रूप से "थर्ड जेंडर" का मजाक उड़ाने का मौका नहीं छोड़ा, लेकिन ये वही लोग हैं जो गोपनीयता में ट्रांसजेंडरों के साथ यौन गतिविधियों में लिप्त हैं मैं आपको एक ऐसे व्यक्ति के मानस में पढ़ने और गोता लगाने की अत्यधिक अनुशंसा करता हूं, जो एक पुरुष के शरीर में एक महिला है, आजाद होने और इस दुनिया में अपनी वास्तविक पहचान पाने के लिए संघर्ष कर रहा है। मनोबी - क्विंटेसिव महिला बनने की अपनी यात्रा शुरू कर चुका था, जैसा कि प्रकृति उसके लिए थी।  ईमानदारी और गहरी समझ के साथ, मानोबी एक पुरुष से एक महिला में उसके परिवर्तन की चलती कहानी बताती है
 
2015 में भारत में पहला ट्रांसजेंडर कॉलेज प्रिंसिपल बनने के बाद बंदोपाध्याय प्रमुखता से खबरों में आए और इस समय उनकी उपलब्धियों की प्रशंसा करने वाले राष्ट्रीय समाचार पत्रों से मीडिया कवरेज प्राप्त किया।  यद्यपि कॉलेज के उनके स्वागत के दृष्टिकोण के बारे में बहुत शोर किया गया था, लेकिन कई स्थानीय लोगों की प्रतिक्रियाओं ने उनकी केस स्टडी के रूप में उपयोग करने के लिए उत्सुकता से अलग सफलता के बारे में साक्षात्कार किया।  यह एक संकेत होना चाहिए। यह एक ऐसी समस्या है जिसने भारत में एक नई तात्कालिकता हासिल कर ली है।  दिसंबर में, शैक्षणिक मनोबी बन्धोपाध्याय ने सहकर्मियों और छात्रों द्वारा उनके प्रति दिखाई गई असम्मानजनकता के कारण कृष्णानगर वीमेंस कॉलेज के प्रिंसिपल के रूप में अपने पद से इस्तीफा देने की कोशिश की।  एक साक्षात्कार में, उन्होंने बताया कि संस्था के अधिकांश लोग उनके खिलाफ थे। “मैं छात्रों और शिक्षकों द्वारा नियमित आंदोलन और घेराव का सामना करने से थक गया था।  मैं नई उम्मीदें और सपने लेकर इस कॉलेज में आया था।  लेकिन मुझे हार को स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है।"

"ए गिफ्ट ऑफ देवी लक्ष्मी" का हिंदी अनुवाद " पुरुष तन में फँसा मेरा नारी मन" उनके जीवन पर केंद्रित है।  यह पश्चिम बंगाल के झाड़ग्राम में विवेकानंद सातवार्षिकी महाविद्यालय में बंगाली साहित्य के व्याख्याता के रूप में उनके कठोर अनुभवों को विस्तार से बताता है।  बन्धोपाध्याय के लिए जीवन कभी भी एक प्रकार का सेवक नहीं रहा, क्योंकि वह बड़ी होकर अपनी ट्रांसजेंडर पहचान के साथ आने के लिए संघर्ष कर रही थी, एक तरफ रूढ़िवादी और निर्णय लेने वाले परिवार के सदस्यों द्वारा भड़क गई और चचेरे भाई और पड़ोसियों ने उसका यौन शोषण किया। हालांकि, वर्षों से सामने आने वाले अन्याय के प्रति मनोबी का आक्रोश उचित है, लेखक (ओं) ने आत्म-दया में कमी और सभी पर और बारी-बारी से घिरे आरोपों में लॉन्च करने के बजाय अधिक चातुर्य और विचार के साथ भावनाओं को व्यक्त किया हो सकता है।  कई उदाहरणों में, वह अपने सहयोगियों और दोस्तों को भी नीचे रखती है। 

 लेकिन जब मानोबी ने जादवपुर विश्वविद्यालय में एक छात्र के रूप प्रवेश लिया तो उनके पास एक विशेष स्वतंत्रता थी, क्योंकि वे विशेषाधिकार प्राप्त और खुले विचारों वाले सामाजिक क्षेत्रों में घूमती थीं, शिक्षण में जाने के बाद चीजें काफी बदल गईं। कुछ छात्रों से समर्थन प्राप्त करने के बावजूद, उसने अपने सहयोगियों की एकमत राय के बारे में स्पष्ट समझ के साथ छोड़ दिया, जिसे वह अपनी पुस्तक में संक्षेप में प्रस्तुत करती है।  "वे स्वाभाविक रूप से मेरी उपस्थिति से स्तब्ध थे और मेरे खिलाफ खुलेआम युद्ध की घोषणा कर रहे थे, मेरे करियर को बर्बाद करने की धमकी दे रहे थे क्योंकि किसी भी हिजड़े को प्रोफेसर बनने का अधिकार नहीं था!  ... किसी हिजड़े के रूप में किसी को भी कॉलेज में पढ़ाने की अनुमति नहीं होनी चाहिए, एक ही स्टाफ रूम, शौचालय और सुविधाओं को साझा करना चाहिए। "

 हमारे शैक्षणिक संस्थानों की विविधता कैसे बढ़ेगी ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि अन्य ट्रांसजेंडर शिक्षाविदों को यौन उत्पीड़न से लेकर गैर-कानूनी मुकदमेबाजी, और अपमानजनक विट्रियॉल - सभी को उनके यौन अभिविन्यास के कारण मजबूर करने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए?  एक अन्य साक्षात्कार में वे कहती , “लोग कह सकते हैं कि वे हमें मुख्यधारा में स्वीकार करने के लिए तैयार हैं।  लेकिन गहराई से, वे ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हैं।  वे मुझे ट्रैफ़िक सिग्नल पर भीख मांगते हुए और एक प्रिंसिपल के रूप में नहीं देखकर अधिक सहज महसूस करते हैं।

 बन्धोपाध्याय की पुस्तक एक प्रमुख के रूप में उनकी नौकरी में बसने के बाद उत्थान के एक नोट पर समाप्त होती है।  लेकिन दिसंबर में पद से इस्तीफा देने के डेढ़ साल बाद उनके इस्तीफे ने मीडिया में लहरें पैदा कर दीं और किताब में एक अलग तरह की फिरकी पैदा कर दी, जिसमें से बहुत कुछ उनके इस्तीफे के लिए दबाव डालने वाले सहयोगियों के खिलाफ उनकी दृढ़ता पर केंद्रित है।  अंत में, कॉलेज ने उसे वापस आने का अनुरोध किया, और उसने 2 जनवरी को अपनी स्थिति फिर से शुरू की - जाहिर है छात्रों से बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया।


तेजस पूनिया
सम्पर्क 9166373652

Thursday, February 20, 2020

कालजयी पत्रिका


कुछ कालजयी रचना या पुस्तक ऐसी होती हैं, जिनकी प्रासंगिकता कभी समाप्त नहीं होती। ऐसे ही कुछ कालजयी पत्रकारिता भी अपने समय की तमाम बंधनों को तोड़कर भावी युगों के लिए प्रासंगिक बनी रहती है। 20वीं सदी के तीसरे-चौथे दशक में निकलने वाली 'चांद' पत्रिका में संकलित रचनाएं ऐसी ही कालजयी रचनाएं हैं। यदि कहूँ कि इन रचनाओं ने हिन्दी साहित्य के इतिहास के सृजन में महती भूमिका निभाने के साथ भाषा के रूप में भी परिवर्तन किया, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। समय समय पर 'चांद' के अनेक विशेषांक निकलते रहे, जिनमें तत्कालीन समय को परिभाषित करने का निरंतर प्रयास होता रहा। उस समय के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया और उनका विश्लेषण किया। 'चाँद' के प्रकाशन काल अनिश्चितताओं का समय था। एक तरफ हम अंग्रेजों की गुलामी से आज़ादी के लिए छटपटा रहे थे वही दूसरी ओर जातीय भेदभाव से मानवता शर्मसार हो रही थी (जो आज भी वैसे). उक्त दोनों की तत्कालीन समस्या पर 'चाँद' ने दो अंक निकाले 'फांसी अंक' व 'अछूत अंक'.
गांधी जी के प्रभाव में 'अछूत अंक' तथा क्रांतिकारियों के सम्मान में उसने 'फांसी अंक' संयोजित किया।
चाँद का यह 'अछूत अंक' मई 1927 में पहली बार निकला जिसका पाँचवा संस्करण 'राजकमल प्रकाशन' दिल्ली द्वारा किया गया। पहला अंक पंडित नन्दकिशोर तिवारी ने इस अंक का संपादन किया। इस अछूत अंक के मुख्य पृष्ठ पर एक ऐसी तस्वीर छपी है जिसमें उसके संपादक प्रेस के दलित कंपोजीटर के साथ एक थाल में भोजन कर रहे हैं। उस समय इसका कितना विरोध हुआ होगा, इसकी कल्पना सहज की जा सकती है। यह 'अछूत अंक' मिशन पत्रकारिता का अन्यतम उदाहरण है।

इस अंक की सामग्री का संकलन कुछ इस प्रकार किया गया है कि अछूत दलित समस्या का कोई भी पहलू न छूट पाये। यह अंक अनेक खंडों में बंटा है तथा इसमें प्रकाशित लेख व टिप्पणियां में दलित समस्या के उत्स की विस्तार से पहचान कर समाधान के रास्ते बताएं गये हैं।

प्रेमचंद की कालजयी रचना 'मन्दिर' तो सभी को याद है, यह कहानी इसी अंक में छपी थी। दलित साहित्य-चेतना के विस्तार के इस काल में चाँद का 'अछूत अंक' मील का पत्थर है। निसंदेह इसकी सामग्री दलित साहित्य व दृष्टि को सही दिशा में ले गयी है।

धन्यवाद

Wednesday, February 19, 2020

उच्च शिक्षा में बढ़ता जातीय भेदभाव और हमारा उत्तरदायित्व


इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज हमारी उच्च शिक्षा-व्यवस्था पर गंभीरता से पुर्विचार करने की ज़रूरत है. देश के लगभग अधिकांश महाविद्यालय-विश्वविद्यालयों की वर्तमान हालत को देखकर दुःख भी होता है और रोष भी. स्वयं भी उच्च शिक्षा से जुड़े होने के कारण यह दुःख-रोष और भी बढ़ जाता है. जिस प्रकार हमारे उच्च शिक्षण संस्थानों में दलित वर्ग से छात्रों के उत्पीड़न की खबरें आम हो गयी हैं, यह भावी भारत (डिजिटल इंडिया) के लिए कम से कम शिक्षा के क्षेत्र में कतई भी शुभ सन्देश लेकर नहीं लाने वाले हैं. केवल गिनती कि बात की जाए, तो भारत शिक्षा-तंत्र की उपलब्धियों किसी को आश्चर्य करने के लिए पर्याप्त हैं. संख्यात्मक दृष्टि से तो देश में स्कूल, कॉलेजों, यूनिवर्सिटिओं में बढ़ोतरी हुई है, परन्तु गुणवत्ता उस अनुपात में नगण्य ही है. इसका प्रमाण इस बात से मिल जाता है- देश में प्रत्येक वर्ष लाखों की संख्या में बच्चे ग्रेजुएट-पोस्ट ग्रेजुएट होते हैं, लेकिन जब बात रोजगार की आती है, तो अधिकांश संख्या पढ़े-लिखे बेरोजगारों की ही मिलेगी.  
स्पष्ट है कि हमारे देश में मात्र उच्च शिक्षा के नाम पर डिग्री बांटी जा रही है. मूल में स्थिति आज भी संतोषजनक नहीं है. उस पर बड़े खेद की बात है कि हमारे उच्च शिक्षण संस्थान जातिवाद के गढ़ बन रहे हैं. कही दलित छात्रों को उत्पीडित व अपमानित कर उन्हें आत्महत्या के लिए मजबूर किया जा रहा है तो कही दलित प्राध्यापक को झूठी शिकायतों को आधार बनाकर उनका निलंबन किया जा रहा है. यह सब इस बात को प्रमाणित करने हेतु पर्याप्त है कि आज भी दलितों के लिए उच्च शिक्षा कि राह में मनुवादी रोड़े भरपूर हैं. उच्च शिक्षा में ही क्यों दलित बच्चों को तो उनके प्राथमिक स्तर से अपमान का घूंट पीना पड़ता है. कहीं उनके लिए भोजनमाता भोजन बनाने के लिए मना कर देती है, तो कहीं उनकों अन्य बच्चों के साथ बैठकर भोजन नहीं कराया जाता आदि. जब भी कभी जातीय उत्पीड़न के कारण कोई दलित छात्र आत्महत्या करता है, तो लगता है जैसे जातिवाद की बाँहों में शिक्षा अपना दम तोड़ रही है. दलित छात्रों में उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिले से लेकर नियुक्ति तक की प्रक्रिया में घोर जातिवाद झलकता है. एक ओर जहाँ वर्तमान सरकार नयी शैक्षणिक नीति बनाने की कोशिश कर रही है, वहीँ उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिवादिता को बढ़ावा देने में सरकार के नुमाइंदों की भी भूमिका कम प्रतीत नहीं होती.  
    आखिर हमारी शिक्षा जा किधर रही है? यह एक यक्ष प्रश्न बनता जा रहा है. सरकार चाहे जिसकी रही हो, जातिवाद से पीड़ित छात्र हर शिक्षण संस्थान में मिल जायेगा. नयी शैक्षणिक नीति के विषय में यू.जी.सी. के पूर्व चेयरमैन व जे.एन.यू. के पूर्व प्रोफेसर सुखदेव थोराट मानते है कि “उच्च शिक्षा में दाखिले के दर को बढ़ाये जाने की कोशिश होनी चाहिए. इनमें महिलाओं, दलितों-आदिवासियों, मुसलमानों का प्रतिनिधित्व काफी कम है. इस विषमता को दूर करने के ज़रूरत है.” (इंडिया टुडे, 03.02.16) समाज विज्ञानी और शिक्षाविद् शिव विश्वनाथन दलित छात्रों की आत्महत्या को लेकर अति गंभीर बात कहते हैं- “यह मामला दिखता है कि वि.वि. छात्र-छात्राओं के ख्वाबों को  किस तरह खत्म कर रहे हैं. खासकर दलितों के. उनके शिक्षकों की चुप्पी सब कुछ बयां कर रही है.” (इंडिया टुडे, 03.02.16) प्रत्येक शिक्षण संस्थान में द्रोणाचार्य मौजूद है. ओ.पी. सोनिक कहते हैं, “द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा में एकलव्य का अंगूठा मांग लिया था, पर आज के द्रोणाचार्य तो एकलव्यों को जान देने पर मजबूर कर रहे हैं.” (राष्ट्रीय सहारा 08.11.2011)
    रोहित वेमुला जैसी न जाने कितनी ही प्रतिभाएं हमारे शिक्षण केन्द्रों में जातिवाद के कारण अपनी जान गवां चुके हैं. इसकी एक झलक देख ही आत्मा चीत्कार करने लगती है. यहाँ उनका संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करना उल्लेखनीय भी है और समीचीन भी –
1. अगस्त 2007- आइआइएस, बंगलुरु में शोध छात्र अजय एस.चंद्रा ने आत्महत्या की.
2. जनवरी 2007- आइआइटी मुंबई में बी.टेक. अंतिम वर्ष के दलित छात्र एम.श्रीकांत की आत्महत्या.
3. जनवरी 2007- आइआइटी दिल्ली में दलित छात्र अंजनी कुमार ने आत्महत्या की.
4. फरवरी 2008- हैदराबाद विश्वविद्यालय में पीएचडी छात्र सेंथिल कुमार ने फेलोशिप बंद होने के चलते आत्महत्या का कदम उठाया.
5. जनवरी 2009- आइआइटी कानपुर एम.टेक. अंतिम वर्ष की छात्रा जी.सुमन तथा इससे पूर्व यहाँ 2008 में प्रशांत कुरील ने आत्महत्या की.
6. मार्च 2010- एम्स, नयी दिल्ली के एमबीबीएस के अंतिम वर्ष के बाल मुकुंद भारती ने जातीय भेदभाव के चलते अपनी जान दे दी.
7. फरवरी 2011- आइआइटी रुड़की के दलित छात्र मनीष कुमार ने अपने उत्पीड़न से तंग आकर आत्महत्या की.
8. मार्च 2012- एम्स, नयी दिल्ली के आदिवासी छात्र अनिल कुमार मीणा ने फांसी लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली.
9. 2013- आइआइटी दिल्ली के दलित छात्र राजविंदर सिंह ने आत्महत्या की.
10. नवम्बर 2013- हैदराबाद विश्वविद्यालय में पीएचडी छात्र एम.वेंकटेश ने कथित तौर पर भेदभाव से तंग आकर आत्महत्या कर ली. 
11. सितम्बर 2014- आइआइटी मुंबई में दलित छात्र अनिकेत अम्भोरे की संधिग्ध हालात में मृत्यु (आत्महत्या)
12. जनवरी 2016- हैदराबाद विश्वविद्यालय में पीएचडी छात्र रोहित वेमुला की फेलोशिप बंद होने के चलते आत्महत्या का कदम उठाया. जिसने पुरे देश को एक बार फिर पुनः हिलाकर रख दिया है और कई सवाल हमारे सामने खड़े कर दिये हैं. (इंडिया टुडे से साभार)

    उच्च अध्ययन केन्द्रों में हो रहे जातिगत भेदभाव को क्या माना जाए. यही कि आज मनुवादी डरे हुए हैं कि अगर दलित पूर्ण रूप से शिक्षित हो गये तो उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन सकते हैं और इसमें कोई संदेह भी नहीं है. मनुवादियों का प्रयास है कि भारत में फिर कोई ‘अम्बेडकर’ का जन्म न हो जाए. सभी जानते हैं कि आजादी के बाद आरएसएस चाहता था कि ‘मनुस्मृति’ को आजाद भारत का नया संविधान घोषित किया जाए, परन्तु बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर ने नये ढंग से समतावादी संविधान की रचना कर उनके प्रयोसों पर पानी फेर दिया. इसे देश का दुर्भाग्य के कहना चाहिए कि स्वंतत्रता के 69 वर्ष बाद भी मनुस्मृति के वैचारिक अवशेष मौजूद हैं, जो मनुवादियों को जातीय उत्पीड़न के लिए प्रेरित करते हैं. 
    विडम्बना है कि एक ओर जहाँ दलितों-आदिवासियों, मुस्लिमों का उच्च शिक्षा में प्रतिनिधित्व काफी कम है और दूसरी ओर दलित-आदिवासी-मुस्लिम बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर, उच्च शिक्षा में ही अपना कैरियर बनाने के सपने संजोये हैं. डॉ. अम्बेडकर के सपने को साकार करने के लिए दलित छात्र अपने जी-जान से जुटे हैं. अफ़सोस उनकी राह आसान नहीं है. आज यह मिथ्या सा लगता है कि शिक्षा नये विचारों को जन्म देती है और विचारों में परिवर्तन लाती है; क्योंकि जातिवादी पूर्वाग्रहों के चलते दलित उत्पीड़कों में न तो समतावादी नये विचार पैदा हो पाए हैं, न ही जातिवादी विचार बदले हैं और न ही शिक्षा से उनके जीवन की विषमतावादी धारा ही बदल पायी है. 
    उच्च शिक्षा में दलित छात्रों  के नामांकन से लेकर नियुक्ति तक के वास्तविक आंकड़े किसी से छिपे नहीं हैं. उच्च शिक्षण संस्थानों में उच्च पदों पर दलितों-आदिवासियों व मुस्लिमों की भागीदारी न के ही बराबर है. छात्रों के नामांकन की वास्तविक स्थिति जानने डीयू के दयाल कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर और एकेडमिक फोरम फॉर सोशल जस्टिस के अध्यक्ष केदार कुमार मंडल ने सुचनाधिकार में प्राप्त सूचनाओं में पाया कि “2010-11 सत्र में डीयू में दाखिले के करीब 50000 अनुसूचित जाति, जनजाति और ओबीसी समुदाय की सींटे खाली रह गयी और इनकों बाद में सामान्य वर्ग के छात्रों से भर दिया गया.” (इंडिया टुडे फरवरी 2016)  बाद में उनके सुप्रीम कोर्ट में अपील के बाद फैसला आया कि इन आरक्षित सीटों के लिए न्यूनतम कट-ऑफ जारी किया जाए. केदार कुमार मंडल के अनुसार “यहाँ नियुक्तियों में भी विसंगतियां हैं और इसके लड़ाई मैं अदालत में लड़ रहा हूँ.” ऐसा ही एक अन्य उदाहरण है- जेएनयू में भेदभाव की स्थिति को वही के छात्र बाल गंगाधर बताते हैं- “जेएनयू में पीएचडी कर रहे वंचित समुदाय के डेढ़ दर्जन छात्र हर साल बीच में ही पढाई छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं.” (इंडिया टुडे फरवरी 2016, 17)
    छात्रों के नामांकन हेतु प्रतिशतवार आंकड़े क्या कहते हैं – 4% अनुसूचित जनजाति, 13.5% अनुसूचित जाति, 35% ओबीसी, 85% सामान्य (राष्ट्रीय सहारा 30.01.2016) 
नियुक्ति के विषय में आंकड़े-

संस्थान का नाम 
अनुसूचित जाति 
अनुसूचित जनजाति

राष्ट्रीय सहारा 15.09.2012
आरक्षित पद 
वर्तमान स्थिति 
आरक्षित पद 
वर्तमान स्थिति 
AMU
283
01
142
0
DU
255
44
128
14
JNU
109
24
55
09
BHU
362
115
181
30

    एक ओर मनुष्य की मुक्ति शिक्षा प्राप्त करने पर मानी गयी है, दूसरी ओर जिस प्रकार दलित-आदिवासियों को शिक्षा से दूर रखने का षडयंत्र किये जा रहे हैं, क्या दर्शाता है? यही कि आज भी अपने को विकसित करने के लिए दलित वर्ग जो प्रयास कर रहा है उसकी राह बाधित है. वास्तव में अध्ययन स्थलों पर पसरा यह भेदभाव आने वाले समय में देश के लिए घातक साबित होगा, जिससे किसी का भी भला होने वाला नहीं है. इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद जैसे देश का दलित युवा (गैर दलित भी आंशिक रूप से शामिल हैं) इकठ्ठा होकर सड़कों पर आ रहे हैं और देश में छोटे-बड़े शहरों में न्याय के लिए झंडा उठाये हैं. 
    यह तो स्पष्ट हो ही चूका है कि उच्च शैक्षणिक परिसरों में दलित छात्रों को उपेक्षा, उत्पीड़न, अपमान और भेदभाव के अंतर्धारा को रोहित वेमुला की आत्महत्या ने एक बार पुनः सतह पर ला दिया है. साथ ही यह भी बता दिया है कि हमारे इन संस्थानों में कुछ भी ठीक नहीं हैं, वहां सांस्थानिक भेदभाव आज भी मौजूद है. इन आत्महत्याओं की पड़ताल करते हुए राजनीतिक विश्लेषक कुमार नरेंद्र सिंह लिखते हैं- “उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव के अनुभव, बहिष्कार और अपमान के चलते अधिकतर दलित छात्र आत्महत्या कर लेते हैं. इनका कारण भारतीय सामाजिक संरचना है, जो ऊँच-नीच पर आधारित सामाजिक दूरी के सिद्धांत पर आधारित है. दलितों को केवल एक पहचान में तब्दील कर देती है. उच्च शिक्षा संस्थानों में जातीय समूहों का अलग-अलग रहने की प्रवृत्ति सर्वव्यापी है. ऐसा जातीय दुराग्रह और जातीय दंभ से चलते होता है. बहुधा यह बंटवारा लिंग, धर्म, वर्ग, जाति, राष्ट्रीयता, क्षेत्र और नस्ल के आधार पर स्पष्ट भेदभाव पैदा होता है. परिसर का माहौल दलितों-गैर दलितों के बीच विभेद बनाये रखता है” अकादमिशियन अनूप सिंह ने आत्महत्याओं के कुछ मामलों का विश्लेषण करने पर पाया कि “इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि जातिगत भेदभाव ही वह कारण है, जिसके चलते हाशिये पर पड़े समूहों के छात्र आत्महत्या करने को विविश हैं. इसमें बहुत बड़ी या मुख्य भूमिका संस्थान के उच्च जाति के शिक्षक व छात्र उत्तरदायी हैं.” शिक्षाविद् शिव विश्वनाथन दलित छात्रों की आत्महत्या को लेकर अति गंभीर बात कहते हैं- “यह मामला दिखता है कि वि.वि. छात्र-छात्राओं के ख्वाबों को  किस तरह खत्म कर रहे हैं. खासकर दलितों के. उनके शिक्षकों की चुप्पी सब कुछ बयां कर रही है.” (इंडिया टुडे, 03.02.16) उक्त दोनों विद्वानों के कथनों यह स्पष्ट है कि उच्च जाति के शिक्षक उच्च शिक्षा में हो रहे जातीय भेदभाव के काफीहद तक जिम्मेदार हैं. ऐसी क्रूर और दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ होने के बाद भी जिस प्रकार शिक्षक मौन साधे बैठे रहते हैं, सच में यह बहुत कष्टकारी स्थिति है. जिनके हाथों में देश के भविष्य को सुरक्षित महसूस करना चाहिए उन्हीं की छत्रछाया में उनके साथ दोगला व्यव्हार किया जा रहा है. यह अवस्था संतोषजनक तो कतई नहीं कही जा सकती. आज 21वीं सदी में भी हमारे यहाँ कक्षाओं में छात्रों से उनकी जाति पूछा जाना आम बात है.
शिक्षक युवाओं को भविष्य के लिए तैयार करता है. भारत के पूर्व राष्ट्रपति और बच्चों के चहेते डॉ. अब्दुल कलाम का मानना है कि “शिक्षकों का महान ध्येय युवा मस्तिष्कों को तेजस्वी बनाना है.” (अदम्य साहस, राजकमल प्रकाशन) सत्य ही है, शिक्षक पर समाज से हर बुराई दूर करने की खास जिम्मेदारी होती है (यदि वह समझे) परन्तु जब उसके सामने इतना सब अनैतिक हो और वह चुप रहता है या वह स्वयं भी छात्र शोषण का जिम्मेदार हो, तो हृदय को कष्ट बड़ा कष्ट पहुचता है. क्या हो गया है शिक्षकों को? क्या जाति ही एक व्यक्ति की पहचान है. एक विद्यार्थी मात्र विद्यार्थी होता है, उसकी कोई जाति नहीं होती. सिर्फ मोटी-मोटी तनख्वाह लेकर अपना स्टेट्स बढ़ाना ही सब है. समाज के प्रति नैतिक जिम्मेदारी से मुख मोड़ना कहाँ की समझदारी है. परन्तु वे बड़े-बड़े सेमिनारों और संगोष्ठियों में जोर-जोर से नैतिकता पर चिल्लाते हुए ज़रूर दिख जायेंगे और धरातल पर वही ढाक के तीन पात. कॉलेज हो या यूनिवर्सिटी शिक्षक के हाथ में बहुत कुछ होता है. लेकिन उनकी उदासीनता का परिणाम रोहित-सेंथिल जैसे होनहार छात्रों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ता है. आज भी हालत हमारे नियन्त्रण में हैं. आज भी शिक्षक अपने छात्रों के आदर्श होते हैं. यदि किसी भी संस्थान के शिक्षक एकजुट होकर सभी बच्चों के दिलों-दिमाग से जातीय वैमनस्य को दूर करने के सही अर्थों में प्रयास करें, तो किसी भी छात्र के मन में कभी भी किसी भी विषम परिस्थिति में आत्महत्या करने का विचार नहीं आएगा. ऐसा पूर्ण विश्वास के साथ कहा जा सकता है. देश के सभी शिक्षण संस्थानों को जातिगत, लिंग, वर्ण, वर्ग भेद के विरुद्ध समय रहते सचेत हो जाना चाहिए. नहीं तो उस भावी गंभीर स्थिति से सभी परिचित है. 
भविष्य में कोई भी दलित छात्र या किसी भी छात्र की आत्महत्या के पीछे संस्थान की भूमिका न हो, ऐसे प्रयास शीघ्र अति शीघ्र करने होंगे. राजनीतिक लोग केवल अपना उल्लू सीधा करते हैं. अत: उनके भरोसा छोड़कर शिक्षक जगत और युवा पीढ़ी को जातिगत भेदभाव दूर करने के लिए स्वयं ही आगे आना होगा. इस विषय पर यू.जी.सी. के पूर्व चेयरमैन डॉ. सुखदेव थोराट का महत्वपूर्ण सुझाव है, जिस पर सरकार से लेकर तमाम अध्ययन केन्द्रों से जुड़े विद्यार्थी, शिक्षक एवं अन्य सभी कर्मचारियों को मिलकर कार्य करना होगा. उन्होंने कहा कि “ज़रूरी है कि कॉलेजों/विश्वविद्यालयों में भेदभाव के खिलाफ अलग से प्रावधान किए जायें. इनमे दंड की व्यवस्था हो. लैंगिक भेदभाव और रैगिंग मामले की तरह जातिगत आधार पर होने वाले भेदभाव के लिए भी दिशानिर्देश जारी किए जायें.” (राष्ट्रीय सहारा 30.01.16)
ऐसा कहना उचित नहीं होगा कि उक्त दशा में कोई सुधार नहीं हुए हैं. निश्चय ही सुधार तो हुआ है, परन्तु जाति अभी भी ज्यों की त्यों बनी है. आप हर क्षेत्र में देख सकते हैं. दलित-वंचित समुदाय के छात्रों के अन्य छात्रों, अध्यापकों एवं अध्ययन केन्द्रों के प्रशासकों के साथ सामान्यत: यह देखने को मिल ही जाता है. अभिप्राय है कि हाशिये पर मौजूद छात्रों की समस्याओं का निराकरण करने हेतु हर ओर से कोशिशें करनी होगी. जातीय भेदभाव के विरुद्ध वैधानिक प्रावधान, नैतिक-सामाजिक शिक्षा के साथ शिक्षा के जरुरतमंदों की हर जरुरी मदद की जाए और सबसे अंतिम और महत्वपूर्ण बात हमारे सभी सरकारी/गैर सरकारी उच्च शैक्षणिक संस्थानों में निर्णय लेने वाली कमेटियों में दलितों/ओबीसी की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए तथा सभी इकाइयों में दलित छात्रों/शिक्षकों को प्रतिनिधित्व दिया जाए, जिससे उनका संस्थान के संचालन में भागीदारी हो. दलितों की इस भागीदारी से ही भविष्य में उच्च शैक्षणिक केन्द्रों में जातीय भेदभाव को काफहद तक खत्म किया जा सा सकता है.
इस लेख का अंत महान दार्शनिक संत ‘ओशो’ के वाक्य से करना उचित भी होगा और समीचीन भी –
“जो मित्र नहीं है, वो गुरु कैसे हो सकता है.”

धन्यवाद.....

Monday, February 17, 2020

हिंदी सिनेमा की बेजोड़ फ़िल्म


तीसरी कसम सन् 1966 में हिन्दी भाषा में प्रदर्शित चलचित्र है। हालाकि इसे तत्काल सफलता न मिलने के बावजूद हिन्दी के उत्कृष्ट फिल्मों में शुमार किया जाता है ।यह फिल्म हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक ' फणीश्वर नाथ रेणु ' की कहानी ' मारे गए ग़ुलफ़ाम ' पर आधारित है। जिसे निर्मित करने का भार प्रसिद्ध गीतकार 'शैलेन्द्र' जी ने लिया था ।

लेखक , पटकथा - नबेंदू घोष
अभिनेता - राज कपूर , वहीदा रहमान, इफ्तेख़ार , दुलारी , असित सेन आदि
संगीतकार - शंकर जयकिशन

'तीसरी कसम' एक गैर परंपरागत फिल्म है जो भारत की देहाती दूनिया एवं वहाँ के लोगो के सादगी का बोध कराती है ।अररिया में फिल्मांकित इस फिल्म में हिरामन ( राज कपूर ) एक सज्जन गाड़ीवान है । फिल्म के शुरूआती दृश्य में हीरामन बैल गाड़ी को हाँकते हुए मन में प्रसन्नता का भाव लिये जा रहा हैं । खुश होने का कारण है हीराबाई ( वहीदा रहमान) , जो सर्कस में नाचने का काम करती है ।हीरामन रास्ते में कई कहानियाँ , लोकगीत एवं संगीत सुनाता है ।  इसी बीच हीरामन को अपनी पूरानी बातें याद आती है , जब वह नेपाल की सीमा में तस्करी कर रहा था और उसे इस दौरान बैल को छोड़कर भागना पड़ा था ।इसके बाद उसने पहली कसम खायी थी कि कभी अपने बैलगाड़ी में चोर बाजारी का सामान नही लादेगा ।
उसके बाद उसने बाँस की लदनी से परेशान होकर दूसरी कसम खायी थी कि कभी अपने बैलगाड़ी में बाँस को नही लादेगा । अन्त में हीराबाई के चले जाने , और उनके मन में हीराबाई के प्रति उत्पन्न प्रेम के कारण बौलगाड़ी को झिड़की देते हुए " तीसरी कसम " खायी कि कभी भी नाचने वाली को अपने बैलगाड़ी में नही बैठाएगा । इसके साथ ही फिल्म " तीसरी कसम " खत्म हो जाती है ।



कुल जमा 43 बसंत देखने वाले गीतकार शैलेन्द्र के जीवन के अनेक क़िस्से रोमांचित करने वाले हैं। ऐसा ही एक क़िस्सा उस वक़्त का है जब फ़िल्म 'तीसरी क़सम' की शूटिंग मुंबई के आर.के. स्टूडिओ में चल रही थी। तीसरी क़सम हिन्दी के महान कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी 'मारे गये गुलफ़ाम' पर आधारित है। इस फ़िल्म के मुख्य कलाकारों में राज कपूर और वहीदा रहमान शामिल हैं। बासु भट्टाचार्य द्वारा निर्देशित तीसरी क़सम एक गैर-परंपरागत फ़िल्म है जो भारत की देहाती दुनिया और वहां के लोगों की सादगी को दिखाती है। इस फ़िल्म की पूरी शूटिंग बिहार के अररिया ज़िले में की गई थी। फ

फ़िल्म को आर.के. स्टूडियो में भी फ़िल्माया गया था। इस फ़िल्म में एक बैलगाड़ी का प्रयोग बहुत हुआ है। इसके लिए एक बैलगाड़ी, बैल और एक गाड़ीवान की व्यवस्था बिहार के फॉरविसगंज से की गई। गाड़ीवान को बैल और गाड़ी के साथ स्टूडियो में रहने की व्यवस्था कर दी गई। शैलन्द्र के बेटे दिनेश और बेटी अमला ने बताया कि तब वे सब 5-7 साल के रहे होंगे। वे स्कूल से आकर स्टूडिओ शूटिंग देखने पहुँच जाते थे। फ़िल्म के एक सीन में बैलगाड़ी में वहीदा रहमान बैठी हैं। गाना बज रहा है - "लाली-लाली डोलिया में लाली रे दुल्हनिया, पिया की प्यारी भोली भाली रे दुल्हनिया" गांव के बच्चे गाड़ी के पीछे भाग रहे हैं। इन बच्चों में शैलेन्द्र के तीन बच्चे भी हैं। 

स्टूडियो में शूटिंग के वक़्त जब सब तैयारियां हो जाती तो गाड़ीवान को बैलगाड़ी के साथ फटाफट फ़िल्म के सेट पर आ जाने की ख़बर भेजी जाती और शूटिंग शुरू होती। कामकाज ठीक चल रहा था लेकिन एक दिन जब सारी तैयारियां हो गईं, वहीदा रहमान और राजकपूर आ गए तो गाड़ीवान के पास सेट पर आ जाने की ख़बर गई। गाड़ीवान रोई सी सूरत बनाकर बोला, "साब, गाड़ी न ला सकत, बैल मर गयो।"

शूटिंग की तैयारी में जुटे शैलेन्द्र को जब गाड़ीवान की बात बताई गई तो वे दौड़े-दौड़े गाड़ीवान के पास गए। शैलेन्द्र समझ गए कि यह सब गाड़ीवान की शरारत है। उन्होंने गाड़ीवान से उलझने और झगड़ा करने में कोई फायदा न समझा। शैलेन्द्र गाड़ीवान से बोले, "नया बैल कितने में आएगा ?" पहले से तैयार गाड़ीवान ने एक रकम बताई जिसे शैलेन्द्र ने तत्काल निकाल कर दी। कुछ ही समय में गाड़ीवान सैट पर बैलगाड़ी ले आया। शैलेन्द्र को नए और पुराने बैल में कोई अंतर ही नज़र नहीं आया। वे गाड़ीवान को देखकर सिर्फ़ मुस्कराये। शैलेन्द्र ने गाड़ीवान को न कभी बेइज़्ज़त किया और न डांटा। गाड़ीवान की शरारत की बात उन्होंने अपनी पत्नी के अलावा किसी दूसरे को नहीं बताई।

'तीसरी क़सम' में जिस बैलगाड़ी को फ़िल्म में दिखाया गया है, वह बैलगाड़ी आज फॉरबिसगंज (बिहार) में उपन्यासकार फणीश्वर नाथ रेणू के भांजे के पास यादगार के रूप में सुरक्षित है। इस गाड़ी को फ़िल्म के महूर्त के वक़्त दिखया गया था। राज कपूर ने एक स्थान पर कहा है, "यह गाड़ी न होती तो बात न बनती।''




हिन्दी फिल्मों का यह वह दौर था जिसमें कथानक हलचल, घटनाक्रम, उफान-ढलाव, आरंभ एवं चरमोत्कर्ष के कथा तत्वों से सराबोर रहा करता था। लेकिन शैलेन्द्र(गीतकार-निर्माता) की फिल्म साहित्य कथा का सिनेमाई रूपांतरण थी, कथा में बातचीत, मनोभाव, मानवीय संबंधो के सहारे प्रवाह आया। समकालीन चलन की तुलना में पात्रों का चरित्र चित्रण सत्यता,सादगी, संवेदनशीलता से पूर्ण था। अपने समय में ‘तीसरी कसम’ की दुनिया तमाम फिल्मों से जुदा रही, कथानक में मल्टी स्टार कास्ट उपयोग में नहीं है।


कथानक,अभिनय ,निर्देशन के अतिरिक्त ‘तीसरी कसम’ का संगीत पक्ष भी काफी सुंदर था। शंकर-जयकिशन के संगीत से सजी इस फिल्म में ‘सजनवा बैरी हो गईल हमार, दुनिया बनाने वाले, सजन रे झूठ मत बोलो, पान खाए सैंय्या हमार, मारे गए गुलफाम, चलत मुसाफिर’ जैसे अच्छे गीत संग्रहित हैं।

शैलेन्द्र की ‘तीसरी कसम’ हिंदी सिनेमा में साहित्य का बेहतरीन रूपांतरण थी। तीसरी कसम फणीश्वरनाथ रेणु की रचना का सिनेमाई प्रतिबिम्ब बनके उभरी। महान कथाकार रेणु ने अनेक स्मरणीय कहानियां व उपन्यास लिखे। रेणु जी ने स्वयं को लेखक परिधि से आगे सामाजिक एक्टिविस्ट भी समझा।

आपकी ‘मैला आंचल’ व ‘परती परिकथा’ इसका जीवंत उदाहरण कही जानी चाहिए। टेलीविजन पर ‘मैला आंचल’ पर इसी नाम से धारावाहिक का निर्माण हुआ। वो टीवी के गोल्डन एज के दिन थे। आंखों के लिए विजुअल अनुभव बनाने में रेणु बेज़ोड़ थे।

गाने जो सदाबहार हैं वो हैं।

'सजनवा बैरी हो गए हमार!’
‘लाली लाली डोलिया में लाली रे दुलहिनिया!’
‘सजन रे झूठ मति बोलो, खुदा के पास जाना है!’ शामिल है।

लेकिन अभिनय और निर्देशन की नजर से यह फिल्म बेजोड़ थी। इसका अभिनय उच्चकोटि का रहा। इसीलिए 1967 में ‘राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार’ में इसे सर्वश्रेष्ठ हिंदी फीचर फिल्म का पुरस्कार दिया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि सब कुछ सादगी से दर्शाया गया। निसंदेह ‘तीसरी कसम’ अपने दोनों माध्यमों में ऊंचे दरजे का सृजन है। इससे साहित्य और सिनेमा दोनों में निकटता आई है। आजादी के बाद भारत के ग्रामीण समाज को समझने के लिए ‘तीसरी कसम’ मील का पत्थर साबित हुई।
पोस्ट गूगल साभार

Saturday, February 15, 2020

रिव्यू : उलझी उलझी लव आजकल


लव आज कल फिल्म कास्ट: कार्तिक आर्यन, सारा अली खान, रणदीप हुड्डा, अरुशी शर्मा
 लव आज कल फिल्म निर्देशक: इम्तियाज अली
 अपनी रेटिंग: 1.5 स्टार

 लव आजकल 2 फ़िल्म पिछले वाली लव आजकल जैसी ही हूबहू है। इसलिए अगर आपने लव आजकल देखी है तो इसे देखने या समझने की भूल मत कीजिएगा। अगर आपको यह लगता है कि कल्पना की कमी के बावजूद, यह  लव आज कल कुछ कमाल करेगी तो आप गलत सोच रहे हैं।   आज के  दिन की और उस समय की लव आजकल  में इम्तियाज़ अली के रोमांस का नवीनतम संस्करण यह फ़िल्म नहीं है।


 2010 में आई लव आजकल में सैफ अली खान और दीपिका पादुकोण थे, और अब की फ़िल्म में सैफ की बेटी है।  यह फ़िल्म भी  वही करती है, जो प्रेम-शव-डेटिंग-शैटिंग के समकालीन विचारों से जुड़ने का प्रयास करती है। प्रत्येक प्रेम कहानी जैसी ही यह फ़िल्म है। एक समान है लेकिन अलग है जो वह है प्रेमी से प्यार नहीं करना?  अली की सबसे अच्छी तरह से महसूस की गई फिल्म, जब वी मेट में और इसके बाद रॉकस्टार के बाद उनका निर्देशन उतार में ही आ रहा है। 

फिल्म का एक गाना 'ये दूरियाँ' को छोड़ कोई भी गाना बेहतर नहीं बन पाया है।