Friday, July 31, 2020

प्रेमचन्द साहित्य में सन्निहित दलित चेतना सम्पन्नता-असम्पन्नता सम्बद्ध विमर्ष : एक अध्ययन



वर्तमान हिन्दी साहित्य जगत की बात करें और प्रेमचन्द साहित्य का जिक्र ना हो, यह एक असम्भव बात है। उपन्यास सम्राट् प्रेमचन्द के बिना वर्तमान हिन्दी कथा साहित्य की कल्पना नहीं की जा सकती, विषेषकर जब से (कुछ वर्ष पूर्व) प्रेमचन्द के साहित्य के साथ दलित विमर्ष जुड़ गया है, तब से प्रेमचन्द-साहित्य और भी प्रांसगिक हो गया है। बल्कि, यह कहना अतिष्योक्ति न होगा कि वर्तमान साहित्य जगत् में जितने प्रांसगिक साहित्यकार प्रेमचन्द हैं, उतना अन्य कोई साहित्यकार नहीं हैं। कान्तिमोहन इस बात को पुष्ट करते हुए लिखते हैं कि ‘‘दलित विमर्ष के सन्दर्भ प्रेमचन्द और हिन्दी कथाकारों में से सिर्फ प्रेमचन्द ही आज भी न केवल प्रांसगिक बने हुए है, बल्कि चर्चा के केन्द्र में हैं।‘‘1 चूंकि इस बात में कोई दो राय नहीं है कि वर्तमान साहित्य जगत् में दलित साहित्य एक क्रांति का पर्याय बन चुका है और इस क्रांति का हिन्दी साहित्य में अभी प्रारम्भ मात्र है। यहाँ यह कहना भी उचित होगा कि ‘मार्क्सवाद-प्रगतिवाद‘ के पष्चात् समकालीन साहित्य में ‘दलितवाद या दलित विमर्ष‘ एक बड़ा विक्षोभ है, जिसने साहित्य एवं संस्कृति को एक परिवर्ततनकारी मोड़ दिया है। इतिहास साक्षी है कि जब-जब क्रांति होती है, परम्परा का नये सिरे से मूल्यांकन होता है, कुछ पुराने प्रतिमान की जगह नये मूल्यों का निर्माण होता है। प्रेमचन्द ऐसे ही सौभाग्यषाली लेखक हैं, जिनकी चर्चा मार्क्सवाद के समय में भी उतनी  नहीं हुयी, जितनी आज दलित उभार के जमाने में हो रही है। यह चर्चा कुछ वैसे ही है, जैसे जब  देष में कोई सामाजिक और राजनीतिक क्रांति की बात की जाती ह,ै तो डॉ. अम्बेडकर व गांधी के बिना पूर्ण नहीं हो सकती है, यह उनकी वर्तमान समय में भी प्रासंगिकता का प्रमाण है। डॉ. अम्बेडकर व गांधी के साथ ही प्रेमचन्द ने हमेषा अपने आपको तत्कालीन समाज और राजनीति से जोड़कर देखा। इस विषय में ठाकुर हरिनारायण कहते हैं कि ‘‘गांधी  ने धर्म को राजनीति से जोड़ा, डॉ. अम्बेडकर ने समाज को और प्रेमचन्द ने साहित्य को।2‘‘ अगर दलित चेतना/विमर्ष की बात की जाए, जो प्रेमचन्द विगत कुछ वर्षा से खासे विवादस्पद हुए हैं। दलित विमर्ष के सन्दर्भ में पिछले कई वर्षो में प्रेमचन्द पर जितना चर्चाएं हुई है, तर्क-वितर्क, आलोचना एवं प्रतिवाद हुए है, उतने किसी अन्य भारतीय लेखक के सम्बन्ध में नहीं हुए हैं। प्रेमचन्द हिन्दी साहित्यकारों में खासकर दलित लेखकों में शुरु से ही विवाद का कारण बने रहे हैं, बल्कि प्रेमचंद के जीवन काल के दौरान भी उनके साहित्य को सन्देहात्मक दृष्टि से देखा जा रहा था। वास्तव में हिन्दी साहित्य, विषेषकर दलित साहित्य में, यह आज भी यक्ष प्रष्न बना हुआ है कि प्रेमचन्द को दलित साहित्यकार की श्रेणी में रखा जाए या नहीं?

वर्तमान समय की यह माँग बन चुकी है कि प्रेमचन्द का पुनःपाठ अथवा दलित पाठ किया जाना चाहिए, क्योंकि जिस प्रकार प्रेमचन्द को दलित-विरोधी, सामन्तों का मुंषी (डॉ. धर्मवीर), विदेषी साहित्य का नकलची इत्यादि नामों से पुकारा जा रहा है, जो कि साहित्य की दृष्टि से न्यायसंगत प्रतीत नहीं होता है। इस प्रकार की चर्चाओं से साहित्य का हित भी हुआ है और अहित भी। प्रेमचन्द की इस प्रकार की आलोचनाओं से साहित्य का हित इस रूप में हुआ है कि दलित लेखकों ने प्रेमचन्द का पुनर्पाठ किया है, जिसके फलस्वरूप आलोचना में एक नयी दृष्टि के साथ-साथ दलित दृष्टि भी समृद्ध हुई है। साहित्य के अहित के विषय में हरिनारायण जी कहते हैं कि ‘‘सृजनात्मक लेखन बाधित हुआ है और कई ऊर्जावान लेखकों की बहुत सारी रचनात्मक ऊर्जा इस उठा-पटक की भेंट चढ़ गयी है।’‘3 प्रेमचन्द साहित्य सम्बंधी विरोध को दो रूपों में देखा जा सकता है। एक तो विरोध केवल विरोध के लिए किया जाए, तो अधिक समय तक नहीं चलता और व्यर्थ ही होता ह,ै किन्तु दूसरी तरफ सकरात्मक और रचनात्मक विरोध सार्थक उपलब्धियों से भरा होता है। दलित लेखकों द्वारा प्रेमचन्द के विरोध के मूल्यांकन को इसी दृष्टि से देखे जाने की जरूरत है। अब यहाँ प्रष्न यह भी उठता है कि ‘‘ क्या दलितों का प्रेमचन्द-विरोध केवल विरोध के लिए है या कि वह रचनात्मक के लिए है? क्या उनका विरोध निराधार या तर्कहीन है या उसके पीछे कोई ठोस आधार है?‘‘4 इस पर गम्भीरता से चर्चा करना अनिवार्य हो गया है। साथ ही प्रेमचन्द साहित्य को लेकर एक मुद्दा और भी कि प्रेमचन्द-साहित्य को किस श्रेणी में स्थान दिया जाए? जबकि इसके उत्तर में दलित और गैर-दलित साहित्यकारों दोनों का ही दृष्टिकोण अलग-अलग है। एक वर्ग जहाँं प्रेमचन्द-साहित्य को दलित साहित्य के अन्तर्गत रखता है और दूसरा इसका पूर्ण रूप से विरोध करता है। जयप्रकाष कर्दम जी (दलित लेखक) ने इस सन्दर्भ में प्रेमचन्द विरोध और समर्थन के दो उदाहरण दिये हैं, पहला सी.बी.एस.ई. पाठ्यक्रम से प्रेमचन्द के ‘निर्मला‘ उपन्यास की जगह मृदुला सिंह के ‘ज्यों मेहंदी को रंग‘ को लगाए जाने का तथा दूसरा ‘रंगभूमि‘ को जलाये जाने पर राष्ट्रव्यापी विरोध का मुद्दा। दोनों ही स्थितियों में प्रेमचन्द को राष्ट्रव्यापी समर्थन मिला।

उपन्यास ‘रंगभूमि‘ का दहन ‘हंस‘ के वर्तमान सम्पादक राजेन्द्र यादव के तथाकथित दलित विरोधी तेवर का परिणाम था। इस बात का प्रमाण देते हुए हरिनारायण ठाकुर लिखते है कि ‘‘वस्तुतः ‘रंगभूमि‘ का दहन ‘हंस‘ के संपादक राजेन्द्र यादव और ‘भारतीय दलित साहित्य अकादमी‘ के अध्यक्ष डॉ. सोहनपाल सुमनाक्षर के बीच द्वन्द्व का परिणाम था।‘‘5 हांलाकि उपरोक्त मुद्दा साहित्य की राजनीति से सम्बंध रखता है परन्तु फिर भी यहाँं इसका जिक्र किया जाना बेहद आवष्यक है। दलित लेखकों में जिसने प्रेमचन्द का खुलकर और पूर्ण रूप से विरोध किया वह हैं डॉ. धर्मवीर भारती। अब तक का प्रेमचन्द पर सबसे बड़ा प्रष्न इन्होंने ने ही उठाया है कि ‘‘दलितों का लिखा हुआ साहित्य प्रेमचन्द के साहित्य की काट हैय उस पर रोक है, उसका क्रमिक विकास नहीं। दलित साहित्य जिस जगह पर जन्म लेता है, द्विज साहित्य उस जगह पर मरने तक भी नहीं पहुँच सकता।‘‘6  पर यहाँं ध्यान देने वाली बात है कि धर्मवीर जी के प्रेमचन्द विरोध की कसौटी साहित्यषास्त्र न होकर समाजषास्त्र है। डॉ. धर्मवीर ने यहाँ ‘पितृसत्ता‘ और ‘मातृ सत्ता‘ के पष्चात् इस नयी सत्ता पर दृष्टि डाली ह,ै वह है ‘जारसत्ता‘। उन्होंने प्रेमचन्द का सम्पूर्ण मूल्यांकन इसी आधार पर किया है, जिसके फलस्वरूप इन्होंने प्रेमचन्द को ‘सामन्त का मुंषी‘ कहा है, लेकिन यह तथ्य भी द्रष्टव्य है कि धर्मवीर जी प्रेमचन्द का मूल्यांकन किया है, वह साहित्य कम व्यक्तिगत ज्यादा है, जबकि कोई भी साहित्यकार हो उसके व्यक्तित्व और कृतित्व में अन्तर पाया जाता है। इसी आधार पर दलित लेखिका अनिता भारती ने डॉ. धर्मवीर की आलोचना भी की है। इसके साथ ही देष निर्मोही के अनुसार, ‘‘डॉ. धर्मवीर ने प्रेमचन्द के निजी जीवन और लेखन पर जो आरोप लगाये हैं, वे बेबुनियाद हैं।‘‘7 धर्मवीर जी के पक्ष में मोहनदास नैमिषराय जी कहते हैं कि ‘‘बड़े लेखकों से भी चूक होती है। ऐसी ही चूक प्रेमचन्द ने भी की है, जिसे धर्मवीर ने दर्षाया हैं।‘‘8 जबकि मैनेजर पांडे ने धर्मवीर को पैदाइषी स्त्री विरोधी बतलाया है।

साधारणतः किसी भी लेखक को समझने के लिए कुछ आधार बिन्दु हैं- सबसे पहला तो यह कि उसका लेखन, सृजनात्मक है या चिंतनपरक या दोनों, परन्तु मुख्य रूप से सृजनात्मक। दूसरा जो आधार है, लेखक का अपना जीवन व्यवहार और जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि जीवन-व्यवहार के स्तर पर भारत ही नहीं, वरन् विष्व के समस्त साहित्यकारों के जीवन में भी अन्तर्विरोध होता है और साथ किसी भी लेखक के अपने व्यक्तिगत जीवन और उसके लेखन में जमीन-आसमान का अन्तर देखा जा सकता है। उदारणार्थ यदि लेखक की आयु 100 वर्ष की है, तो भी उसका लेखन का जीवन दषकों, सदियों तक भी चल सकता है। इसी प्रकार प्रेमचन्द का लेखन उनके व्यक्तिगत जीवन के प्रति तमाम तरह के प्रतिक्रियाओं के बावजूद भी दीर्घकालीन रहा है और दीर्घाकालीन रहेगा। यहाँ यह भी तथ्य ध्यान में दिया जाना चाहिए कि लेखक के व्यक्तिगत जीवन संबधी प्रामाणिकता की तलाष की जानी ह,ै तो वह लेखक के जीवनकाल में ही अधिक सार्थक होती है। लेखक के मृत्यु के पष्चात् उसके जीवन की घटनाओं पर प्रतिक्रियाएं एक सीमा के बाद निरर्थक प्रतीत होने लगती है या हद से हद उनका महत्व पाठ्यक्रम तक सीमित रह जाता है। अब यदि प्रेमचन्द पर बार-बार जारकर्म के आरोप लगते भी हैं, तो वह अपने आप में निरर्थक ही कहलायेंगे। इसी सन्दर्भ में प्रो. चमनलाल लिखते है कि ‘‘वस्तुगत स्तर पर प्रेमचन्द के किसी भी विमर्ष को उनके जीवन से नहीं, उनके लेखन से व्याख्यायित किया जाना जरूरी भी है और सही तथा वस्तुगत भी। उनके जीवन में बार-बार झांकना कई बार अपनी ही दृष्टि की सीमाओं को जगजाहिर करना सिद्ध हो जाता है।‘‘9 इसी आधार पर प्रेमचन्द को लेकर बार-बार उनके व्यक्तिगत जीवन में झांकना बिल्कुल उचित नहीं है।

इस बात में कोई अतिष्योक्ति नहीं है कि प्रेमचन्द ने करीब साढ़े तीन दषक के अपने लेखन काल में हिन्दी साहित्य को विपुल साहित्य प्रदान किया है। इनके लेखन में सृजनात्मक और चितंनपरक, दोनों प्रकार का साहित्य शामिल है। अगर संख्या की दृष्टि से देंखे, तो उनकी रचनाओं का आंकड़ा हजार के पार पहुँच चुका है, लेकिन यहाँ यह बताना आवष्यक है कि वर्तमान हिन्दी साहित्य में प्रेमचन्द की प्रसिद्धि का एक मात्र कारण उनके साहित्य में दलित-विमर्ष पर अर्न्तद्वन्द्व ही है। इस दलित विमर्ष को प्रेमचन्द साहित्य से निकाल दिया दें, तो शायद प्रेमचन्द उतने साहित्यक चर्चा के विषय नहीं रहेंगे जितना कि अब हैं। ओमप्रकाष वाल्मिकी ने इस बात को प्रामाणिक ढंग से प्रस्तुत करते हुए अपने लेख में लिखते हैं कि ‘‘आज भी प्रेमचन्द जीवित हैं, तो उन निरंतर और नये-नये आयामों से होने वाली चर्चा के कारण। बिना चर्चा के किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचनाएं भी समय के गर्त में खो जाती हैं, उन्हें भुला दिया जाता है। किसी आलोचक ने कोई स्थापना दी, तो क्या आने वाली पीढ़ी को भी उस स्थापना को आँख मूँद कर मानते रहना चाहिए? ‘‘10 जैसा कि दलित साहित्य लिखे जाने से पूर्व प्रेमचन्द-साहित्य के साथ किया जा रहा था। प्रो. चमनलाल भी इसी पक्ष में लिखते हैं कि ‘‘प्रेमचन्द के इस विपुल साहित्य में से उनके सृजनात्मक साहित्य में अभिव्यक्त दलित विमर्ष से ही हिन्दी में अधिकांष विवाद पैदा हुए हैं।.................दलित साहित्य पर पिछले एक दषक से शुरु हुई चर्चा में ‘कफन‘ को दलित विरोधी कहानी कहा गया।‘‘11

ओमप्रकाष वाल्मिकी ने प्रेमचन्द साहित्य को लेकर और भी कई प्रष्न खड़े किये हैं, जिनका उत्तर देना शायद ही गैर दलित लेखकों के वष में हो। उन्होंने कहा है कि ‘‘दलित लेखकों ने प्रेमचन्द के सम्बन्ध में जो सवाल उठाए हैं, उन्हें अतिवादी  दृष्टिकोण कह कर खारिज कर देना, क्या साहित्य की मूल भावना और उसके सामाजिक उत्तरदायित्व के पक्ष में जाता है? क्या दलित रचनाकारों का अपना स्वतंत्र मत निर्मित करना साहित्य-विमर्ष में गैर-जरूरी है? क्या प्रेमचन्द का साहित्य भी धार्मिक साहित्य की श्रेणी में स्थापित कर दिया गया है कि उसकी आलोचना नहीं की जा सकती?‘‘12 गैर-दलित लेखकों ने जब यह तक कहने में संकोच नहीं किया कि दलित लेखक प्रेमचन्द से अच्छा लिख कर दिखाएं तो ओमप्रकाष वाल्मिकी इसका करारा जवाब देते हुए कहा कि ‘‘प्रेमचन्द रूपी लाठी से दलित लेखकों को डराया-धमकाया जाने लगा। जैसे दलित लेखक उनके महत्व को खंडित करने, उनके आरक्षित क्षेत्र में घुसने की कोषिष कर रहे थे, लेकिन इस विद्वानों ने दलित पक्ष को जानने-समझने का प्रयास ही नहीं किया, क्योंकि यह उनके संस्कारों के विरूद्ध हैं। उन्हें सिखाने की आदत है, सीखने की नहीं।‘‘13

                   सर्वप्रथम प्रेमचन्द की जो कहानी दलित-विरोधी घेरे में आयी वह थी- ‘कफन‘। इस कहानी के सन्दर्भ में नैमिषराय जी प्रेमचंद पर दलित पात्रों की अवमानना का आरोप लगाते है- ‘‘क्या प्रेमचन्द दलित चेतना के सूत्रधार थे? दलित चेतना की अवधारणा इतनी सुपरिभाषित है कि इससे प्रेमचन्द को जोड़ पाना सम्भव नहीं है। वह जन्मना कायस्थ थे और दलित इसकी अनदेखी नहीं कर सकता है।‘‘14 प्रारम्भ से ही दलित लेखकों का कहना है कि प्रेमचन्द ने अपने साहित्य में अधिकतर स्थान पर दलित पात्रों के लिए जातिसूचक शब्दों जैसे- चमार, भंगी आदि का प्रयोग बहुतयात से किया है, जो कि उस जाति विषेष को चोट पहुंचाती है। उनका यह भी कहना है कि प्रेमचन्द उक्त जातिसूचक शब्दों के स्थान पर ‘दलित‘ शब्द का प्रयोग भी कर सकते थे, कांतिमोहन इसके जवाब में कहते हैं कि ‘‘प्रेमचन्द के जमाने में दलित शब्द वजूद में होते हुए भी प्रचलन में नहीं था। तत्कालीन साहित्य में अंग्रेजी के शब्द ‘डिप्रेस्ड क्लासेज‘ के लिए कहीं-कहीं ‘दलित‘ या ‘दमित तबके‘ शब्द का प्रयोग मिलता है। यहाँ तक कि 80 के दषक के आरम्भ में, जब हमने इस विषय का अध्ययन आरम्भ किया था, तब भी इन तबकों के लिए अछूत ही चलता था।‘‘15 इसके साथ आज यह भी प्रष्न उठाया जाना अनिवार्य हो गया है कि सन् 1916-1936 के मध्य जब प्रेमचन्द अपने साहित्य में जातिसूचक शब्दों का उल्लेख कर रहे थे, तो आज साहित्य जगत् में इतना हंगामा मच रहा है, जबकि उस समय जातिसूचक के स्थान पर ‘अछूत‘ शब्द का प्रचलन था, जो कि स्वयं में एक सम्मानजनक शब्द तो कतई नहीं है। वहीं दूसरी ओर, आज 21वीं सदी में दलित लेखकों के माध्यम से साहित्य में जातिसूचक शब्दों का प्रयोग धडल्ले से हो रहा है, तो इसे सकारात्मक दृष्टिकोण से देखा जा रहा है, आखिर क्यों?

                   प्रेमचन्द-साहित्य से सम्बद्ध दलित विरोध को लेकर आज दलित साहित्य में कई तथ्य मौजूद हैं। डॉ. धर्मवीर लिखते हैं कि ‘‘दलित की समस्याओं का वर्णन करने से दलित साहित्य का सृजन नहीं हो जाता। दलित की भूख, पीड़ा और त्रासदी के बखान में उसकी इतिश्री नहीं होती। दलित साहित्य का असली सृजन तब होता है, जब उसमें दलित का चिन्तन आता है। सारे गैर-दलित लेखक उसके इसी चिन्तन से घबराते हैं। एक प्रेमचन्द की अलग से क्या कही जाये, कोई भी अन्य गैर-दलित लेखक इसका अपवाद नहीं हो सकता।.......................................................प्रेमचन्द समेत कौन-सा गैर-दलित हिन्दू लेखक है, जो इन बातों को सपनें में भी सोच सकता है?16 जहाँ एक ओर डॉ. धर्मवीर प्रेमचन्द-साहित्य को दलित रचना स्वीकार नहीं करते, वहीं ओमप्रकाष वाल्मिकी को उनकी रचनाओं में दलित चेतना दिखायी पड़ती है और भगवानदास कहते है कि ‘‘यह सच है कि प्रेमचन्द के उर्दू और हिन्दी में लिखे कुछ अफसाने अछूत जीवन की तस्वीर पेष करते हैं, परन्तु यह दलित साहित्य नहीं, दलित लेखकों से प्रभावित साहित्य है।‘‘17 उपरोक्त तीनों लेखकों (धर्मवीर, वाल्मिकी एवं भगवानदास) की बातों को गम्भीरता से लेते हुए यह कहना उचित होगा कि ‘‘डॉ. धर्मवीर जैसे लेखक प्रेमचन्द की किसी भी रचना को दलित रचना नहीं मान रहे हैं, किन्तु वाल्मिकी को उनकी कुछ कहानियों में दलित चेतना दिखायी पड़ रही है, परन्तु भगवानदास की उक्त टिप्पणी को क्या कहा जाए, जिसमें प्रेमचन्द की रचनाओं में तो वे दलित चेतना स्वीकार करते हैं, किन्तु उन्हें दलित लेखकों से प्रभावित बताते हैं। अब इस बात का जवाब तो स्वयं भगवानदास जी दे सकते हैं कि प्रेमचन्द काल में कौन-सा दलित लेखक साहित्य लिख रहा था जिसका प्रभाव प्रेमचन्द पर था? यह बात सच में समझ से बाहर की प्रतीत हो रही है।

                   प्रेमचन्द-साहित्य के सन्दर्भ में इस बात में कोई दूसरी राय नहीं है कि प्रेमचन्द का साहित्य गांधीवाद से प्रभावित था, परन्तु साथ ही कहीं ना वह डॉ. अम्बेडकरवाद, मार्क्सवाद, स्त्रीवाद से भी प्रभावित दिखता है। इनका रचना काल 1916-1936 के मध्य रहा है। यह समय राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्तर पर काफी उथल-पुथल भरा समय था। वह इतिहास का वह समय था, जिसमें उत्तर नवजागरणकालीन समाज-सुधार एवं स्वतंत्रता आन्दोलन चल रहे थे। इस समयान्तराल में ब्रह्य समाज, आर्य समाज, हिन्दू समाज, मुस्लिमलीग, डॉ. अम्बेडकर, गांधी आदि के आन्दोलन भी चरम पर थे। साथ ही किसान आन्दोलन, मार्क्सवाद आन्दोलन का प्रारम्भ भी इसी काल में हुआ। हिन्दी साहित्य के काल विभाजन के अनुसार यह समय ‘छायावाद‘ कहलाया। यह वही समय था जिसमें दलित समस्या ने एक राष्ट्रीय समस्या का रूप लिया और इसी समय डॉ. अम्बेडकर और गांधी दोनां के आन्दोलन चल रहे थे। डॉ. अम्बेडकर की क्रांति में जहाँ दलित मुक्ति शामिल थी, वही गांधी और कांग्रेस का आन्दोलन मात्र अस्पृष्यता निवारण तक ही सीमित था। दक्षिण में जहाँ दलित सुधारक के रूप में डॉ. अम्बेडकर सक्रिय थे, वहीं उत्तर में स्वामी अछूतानंद।

                   यहाँ ध्यानाकर्षण की बात यह भी है कि समाज में उपरोक्त ढेर सारी समस्याएं होने के बावजूद भी प्रेमचन्द के जमाने के साहित्यकार विषेषकर कविता ‘कोलाहल कलह‘ से दूर कहीं ‘नौका विहार‘ कर रही थी, तो कहीं-कहीं ‘राम की शक्ति पूजा‘, तो कहीं इस घोर भौतिक युग में भी शाष्वत और चिरन्तन सुख की लड़ियां गिनी जा रही थीं, परन्तु कहीं दूर निराला ‘चतुरी-चमार‘ जैसी कहानी के माध्यम से गरीब-तबकों की पीठ सहला रहे थी, तो महादेवी ‘घर-बाहर‘ में महिलाओं की समस्याओं का निदान तलाष रही थीं। इसके विपरीत प्रेमचन्द साहित्य पर नजर डालें तो ‘‘प्रेमचन्द ने अपने पूरे साहित्य को भारतीय जनजीवन का गीत बनाकर उसे सामाजिक सरोकारों से सीधा जोड़ दिया। उन्होंने भारत की आत्मा किसान-मजदूरों के दुख-दर्द को अपने साहित्य का विषय बनाया, कथा साहित्य में पहली बार यथार्थ को स्वीकार्य बनाया। प्रेमचन्द के दर्जनों उपन्यास और सैकड़ो कहानियों में शायद ही कहीं किसी राजा-महाराजा या सामन्त वर्ग का कोई नायक मिल जाये। सवर्णो में बहुत हुआ तो कहीं-कहीं ‘कायस्थ‘ नायक आये हैं, जिन्हें बकौल डॉ. धर्मवीर ‘ब्राह्यणों ने शूद्र‘ ही माना है। ब्राह्यण तो उनके कथा साहित्य के खास खलनायक हैं। प्रेमचन्द का यदि सबसे अधिक विरोध किसी से है, तो वह है ब्राह्यणी व्यवस्था और हिन्दू धर्म के पाखंड।‘‘18    प्रेमचन्द के पक्ष में देवेन्द्र चौबे लिखते हैं कि ‘‘गैर-दलित रचनाकारों में प्रेमचन्द को छोड़कर कोई भी लेखक सवर्ण संस्कार से मुक्त दिखायी नहीं पड़ता है।.........................‘19 इसी समय की बात है 1932 में जब डॉ. अम्बेडकर एवं गांधी के मध्य पूना पैक्ट पारित हुआ। देखा जाए तो इसमें डॉ. अम्बेडकर की हार ही हुई थी, क्योंकि गांधीजी ने डॉ. अम्बेडकर पर दबाव बनाया कि वह इसे वापस ले लें। गांधी जी इसमें सफल रहे और पूना पैक्ट के रूप में डॉ अम्बेडकर को झुकना पड़ा। ओमप्रकाष वाल्मिकी इसी सन्दर्भ में कहते हैं कि ‘‘ऐसे वक्त में प्रेमचन्द की भूमिका को भी जान लेना जरूरी है। पूना पैक्ट के बाद जहां अम्बेडकर और दलितों में घोर निराषा थी, वहीं प्रेमचन्द इसे ‘राष्ट्रीयता की विजय‘ कहा था। निर्णाकयक मोड़ आते ही प्रेमचन्द की अछूत-सहानुभूति अपना पक्ष बदल लेती है। अम्बेडकर को प्रेमचन्द हमेषा शंका की दृष्टि से ही देखते रहे। स्वयं चमनलाल ने इस तथ्य को स्वीकार किया है।‘‘20 चमनलाल जी ने इस तथ्य को स्वीकार करते हुए मानते हैं कि प्रेमचन्द जितना गांधी से प्रभावित थे, उतना डॉ. अम्बेडकर से नहीं, लेकिन फिर भी दलित लेखिका अनिता भारती अपने हाल ही में ‘प्रभात पोर्टल‘ पर प्रकाषित लेख (प्रेमचन्द और दलित मत, कुमत) में प्रेमचन्द के पूर्णतः पक्ष में खड़ी हैं- ‘‘दलित चेतना की दृष्टि से प्रेमचन्द की जिन कहानियों पर सर्वाधिक चर्चा रहती है, उनमें मुख्य रूप से ‘सद्गति‘, ‘ठाकुर का कुआँ‘, ‘दूध का दाम‘, ‘कफन‘, ‘मंदिर‘ और ‘पूस की रात‘ है। दलित चेतना के सन्दर्भ में यदि इन कहानियों पर बात की जाए तो ये सारी कहानियां दलित चेतना की सषक्त कहानियां हैं। प्रेमचन्द यर्थाथवादी लेखक थे, उन्होंने समाज में दलितां, शोषितों, वंचितों और स्त्रियों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार का मार्मिक चित्रण किया है।‘‘21

                   अब बात करें ‘ठाकुर का कुआँ‘ (1932) और ‘दूध का दाम (1934)‘ की तो, ये दोनां कहानियां ‘पूना-पैक्ट के बाद में लिखी गयीं। इन पर डॉ. अम्बेडकर के महाड़ और कालाराम मन्दिर प्रवेष आन्दोलन की वैचारिक छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है, बल्कि ‘सद्गति‘ कहानी पर तो ब्राह्मणों द्वारा प्रेमचन्द को ‘घृणा का प्रचारक‘ तक कह दिया गया। हालांकि ‘‘‘सद्गति‘ कहानी में प्रत्यक्ष रूप से कोई दलित संघर्ष नहीं है, लेकिन परोक्ष रूप से इसमें एक बड़ा विद्रोह समाया हुआ है। दलित पीढ़ा की ऐसी मर्मान्तक त्रासदी और व्यवस्था से ऐसी असहमति शायद ही किसी साहित्य में उपलब्ध हो।‘‘22  इन्हीं कहानियां को आधार मानकर अनिता भारती आगे अपने लेख में लिखती हैं ‘‘वहीं  अमूर्त रूप में ‘सद्गति‘, ‘ठाकुर का कुआँ‘, ‘दूध का दाम‘, ‘कफन‘, ‘मंदिर‘ और ‘पूस की रात‘ में सवर्ण वर्गीय जातिगत मानसिकता पर प्रहार करती हैं।‘‘23 मंदिर कहानी आप देख सकते हैं कि सुखिया अपने पल-पल मरते हुए बच्चे को देखने की मार्मिक स्थिति से जूझते हुए अपने मौलिक अधिकार मंदिर प्रवेष को लेकर समाज के समक्ष एक कटु प्रष्न खड़ा करती हुयी कहती है कि ‘क्या भगवान ने चमारों को नहीं सिरजा?‘ इसी प्रकार ‘दूध का दाम‘ कहानी में गरीब दलित बच्चा मंगल, जिसकी माँ गंगी ने अपने बच्चे मंगल के हिस्से का दूध भी बाबू साहेब के बच्चे को पिलाया, जिसका दाम बाबू साहेब की जाति ने कुछ इस तरह चुकाया है कि जिसे पढ़कर या सुनकर पाठक या श्रोता सवर्ण जाति की असंवेदनषीलता तथा हैवानियत देख किसी के भी रौंगटे खड़े हो जाएं।

                   इस सन्दर्भ में अब चर्चा का जो महत्वपूर्ण विषय है, वह है प्रेमचन्द की उत्कृष्ट उपन्यास ‘गोदान‘ की। इसको लेकर भी साहित्यकारों में पर्याप्त मतभेद है। वर्तमान समय में जहाँ एक ओर ‘गोदान‘ के पुनर्पाठ आवष्यकता महसूस ही जा रही है, वहीं दूसरी ओर इसका पुनर्पाठ दलित एवं गैर-दलित लेखक अपने-अपने ढंग से कर रहे हैं। यह भी विचारणीय तथ्य है कि ‘गोदान‘ को लेकर ही दलित लेखकों के ही एक समान मत नहीं है। अगर ओमप्रकाष वाल्मिकी विपक्ष में बोलते प्रतीत होते हैं, तो अनिता भारती ‘गोदान‘ के पक्ष में खड़ी हैं। यहाँ बड़ी ही असमंजस की स्थिति है। जहाँ ओमप्रकाष वाल्मिकी कहते है कि ‘गोदान‘ में सिलिया व मातादीन के बीच की वार्ता में प्रेमचन्द पूर्वाग्रहों पर आधारित है और इसी प्रकार के विरोधाभास प्रेमचन्द की अन्य रचनाओं में भी परिलक्षित होते रहे हैं।‘‘24 ‘गोदान‘ के पक्ष में अनिता भारती अपने ब्लॉग में लिखती हैं कि ‘‘गोदान में उनकी दलित चेतना मूर्त रूप में दिखायी देती है जहाँ वे सीधे तौर पर गाँव के दलितों द्वारा मातादीन के मुँह में ‘हड्डी घुसेड़कर‘  और ‘जनेऊ तोड़कर‘ प्रतिकार करवाती है।‘‘25 (गोदान पृ0- 208-209) हांलाकि मातादीन को गंगा-स्नान कराकर बालू एवं गाय का गोबर आदि खिलवाकर पुनः पवित्र कर लिया जाता है, परन्तु सिलिया वही चमारिन बनी मातादीन की रखैल बनी रहती है। प्रेमचन्द ने मातादीन को अन्त तक नहीं छोड़ा और उसे चमार बनना ही पड़ा। उसके ब्राह्मण बनने की घटना पर प्रेमचन्द जी व्यंग्य करते है कि ‘‘गोबर से उसका मन पवित्र हो गया। मूत्र से उसकी आत्मा के कीटाणु में अषुचिता की कीटाणु मर गये।‘‘ (गोदान, पृ0-285). हरिनारायण जी ‘गोदान‘ के विषय पर अपनी राय देते हुए कहते है कि ‘‘गोदान का गलत ‘पाठ‘ मत कीजिए। ‘गोदान‘ की गाय किसी धर्म की प्रतीक नहीं है, बल्कि आम भारतीय किसान की आषा, आकांक्षा और अभिलाषा की प्रतीक है।‘‘26

                   वर्तमान साहित्य में ‘गोदान‘ की गहरी अर्थ-व्यंजना को समझने की जरूरत है। इसके माध्यम से ब्राह्मणी व्यवस्था पर जोरदार व्यंग्य किया गया है। वैसे यह भी धारण साहित्य जगत् में धीरे-धीरे प्रचलित हो रही है कि ‘गोदान का मुख्य पात्र ‘होरी‘ के स्थान पर ‘धनिया‘ और ‘गोबर‘ हैं। जहाँ ‘होरी‘ को ब्राह्मणवाद के समक्ष हताष दिखाया है, वहीं दूसरी ओर ‘धनिया‘ और ‘गोबर‘ को ब्राह्मणवादी विचारधारा का एक विरोधी दिखाया है। उपन्यास ‘गोदान‘ को पढ़ने के पश्चात् पाठक यह स्वयं महसूस करता है कि ‘धनिया‘ का कहीं भी करुणामय रूदन नहीं दिखाया है। वह आम औरतों के जैसे अपने पति की मृत्यु पर दहाड़े नहीं मारती, अपितु चुपचाप सभी विकट परिस्थितियों का वह धैर्य के साथ सामना करती है। मगर अन्त में गोदान करने के बाद उसका धैर्य टूट ही जाता है और वह पछाड़ खाकर गिर जाती है। उपन्यास ‘गोदान‘ के पक्षधर इसके विषय में बहुत महत्वूपर्ण बात लिखते हैं कि ‘‘गोदान विष्व साहित्य की सबसे बड़ी ट्रेजडी है। कौन ऐसा हृदयहीन होगा, जो ऐसी भीषण त्रासदी पर हिन्दू धर्म की उस व्यवस्था की प्रषंसा करेगा, जिसमें गरीब की मृत्यु पर भी गो-दान की व्यवस्था है?...................................प्रेमचन्द ने गोदान के माध्यम से हिन्दू धर्म और समाज की इस व्यवस्था पर करारा प्रहार किया है।‘‘      27 इनसे यह बात पूर्णतः पुष्ट करती है कि ‘गोदान‘ उपन्यास विष्व साहित्य में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है और सम्पूर्ण विष्व साहित्य में इस उपन्यास का कोई दूसरा सानी नहीं है।

                   प्रेमचन्द साहित्य का अध्ययन करने पर पाठक को एक बात अवष्य खटक रही है कि ‘सेवासदन‘ से ‘गबन‘ और ‘प्रेमाश्रम‘ से ‘गोदान‘ तक की यात्रा में जमींदार हर जगह मौजूद है, किन्तु प्रेमचन्द ने जमींदारों को शायद ही कहीं अपनी कथा या कहानी का खलनायक बनाया हो। यह बात निष्चित रूप से विचारणीय है! आखिर प्रेमचन्द जैसे साहित्यकार ने ऐसा क्यों किया? उनके विचार से यह समय की माँग थी, चूंकि स्वतंत्रता आन्दोलन अपने चरम पर था और सभी समान रूप से इस आन्दोलन में अपनी भागीदारी सुनिष्चित कर रहे थे, लेकिन इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता है कि कहींं-कहीं प्रेमचन्द की सहानुभूति जमीदारों के साथ भी प्रतीत होती है। उपन्यास ‘गोदान‘ में ही देख सकते हैं कि ‘राय साहब‘ एक शोषक के रूप में नजर आता है। थोड़ा और आगे चले तो ‘कफन‘ कहानी में भी जमींदार है, जिस पर डॉ. धर्मवीर नें अंगुली उठायी है, परन्तु कुछ साहित्यकार यहाँ उनके पक्ष लेते हुएकहते है कि जमींदार को दयालु बताना उसकी उदारता से अधिक उसकी कंजूसी और कठोरता पर व्यंग्य है। यह व्यंग्य ‘कफन‘ कहानी में इस प्रकार दिखाया है कि जमींदार होकर भी उसने घीसू को कफन के लिए 2 रूपये फेंककर दिये। सान्त्वना का एक शब्द भी नहीं। उसकी तरफ ताका तक नहीं। उल्टे भला-बुरा भी कहा। प्रेमचन्द के उपन्यास और कहानियों के पात्रों के नाम और उनके परिवेष को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रेमचन्द दलित-पिछड़े व सर्वहारा की कथा कहते हैं, उनके पात्र चाहे जो भी हो माधव, घीसू, धनिया, गोबर, होरी, झुनिया, सिलिया, झींगुर, जोखू, बुधिया, हल्कू, आदि,। प्रेमचन्द ने हमेषा इन पात्रों के माध्यम से ही दलित वर्ग की हृदय स्पर्षी कथा/कहानियां कहीं हैं, जिनमें छिपे मर्म को झुठलाया नहीं जा सकता है।

                   साधारणतः इस आलेख का उक्त विषय अपने आप में एक अनन्त चर्चा का विषय है, जिस पर निरन्तर कुछ ना कुछ चर्चाएं होती रही हैं और भविष्य में भी होती रहेंगी, परन्तु हमें उन परिस्थितियों को नहीं भूलना चाहिए कि जिन परिस्थितियों में प्रेमचन्द जैसे गैर-दलित लेखक दलित समस्या पर लिख रहे थे। इस प्रकार हम उनके दलित बोध का किस प्रकार खारिज कर सकते है? शायद नहीं कर सकते! सत्य तो यह है कि समय के साथ हर व्यक्ति का विचार बनता-बिगड़गता है। यहाँ सवाल यह नहीं है कि प्रेमचन्द गांधी से प्रभावित है या नहीं। सवाल है कि प्रेमचन्द ने क्या और किसके लिए लिखा? उनकी रचनाओं का सन्देष समाज ने किस तरह अपनाया? इसका उत्तर हरिनारायण ठाकुर देते हुए कहते हैं कि ‘‘उनकी नजर में ब्रिटिषकालीन भारत में गुलामी और शोषण के तीन चक्र है्र। पहला चक्र है- अंग्रेजी सत्ता, दूसरा जमींदारी व्यवस्था अथवा सामन्तवाद और तीसरा चक्र है ब्राह्मणी व्यवस्था। आम जनता इन्हीं तीन चक्कों में पिस रही है। कोई राजा बनकर लूट रहा है, कोई सामन्त बनकर...........................दलित सन्दर्भों से जुड़ी प्रेमचन्द की रचनाएं इसी धार्मिक और ब्राह्मणवादी व्यवस्था पर प्रहार करती है।‘‘28           डॉ. धर्मवीर के पक्ष में हरिनारायण कहते हैं कि ‘‘डॉ. धर्मवीर का प्रेमचन्द-विरोध वस्तुतः प्रेमचन्द का नहीं, बल्कि उस जारसत्ता का विरोध है, जिसकी गिरफ्त में दलित समाज सदियों से कैद रहा है। यह शुद्ध रूप से सत्ता-विमर्ष है।‘‘29 प्रेमचन्द ने अपने एक लेख में हिन्दू धर्म और पाखण्डी ब्राह्मणों पर कड़ा प्रहार किया हैं, इस लेख के कुछ अंष प्रो. चमनलाल ने अपनी पुस्तक में प्रकाषित किये हैं-‘‘इसी काषी में हजारों मदसेवी ब्राह्मण और वह भी तितकधारी निकल आएँगें। फिर भी वे ब्राह्मण हैं। ब्राह्मणों के घरों में चमारियाँ हैं, फिर भी उनके ब्राह्मणत्व में बाधा नहीं आती, किन्तु अछूत नित्य स्नान करता हो, कितना ही आचारवान हो, वह मन्दिर में नहीं जा सकता। क्या इसी नीति पर हिन्दू धर्म स्थिर रह सकता है?‘‘30 इसी लेख के पूर्व के कुछ अंष इस प्रकार हैं-‘‘इन मन्दिरों की आड़ में आज बड़े-बड़े लज्जाजनक कृत्य हो रहे हैं। पुजारियों का, महन्तों का और धर्मगुरुओं का जीवन भयानक विलासित से भरा हुआ हैं। वे मन्दिरों की आड़ में जघन्य कर्म करते नहीं शर्माते। ईष्वर को गाना सुनाकर खुष रखने के लिए उन्हें वेष्याएँ चाहिए। इस बहाने वे अपनी राक्षसी कामना को पूरा करते हैं और अपने जीवन को विलास-वासना और पतन के गहरे गड्ढे में डाल देते हैं। तिस पर भी हिन्दू समाज के लिए वे पूज्य हैं, मानवीय हैं और देवतातुल्य हैं, क्योंकि वे पुजारी हैं, महन्त हैं और धर्मगुरु हैं।‘‘31 उक्त उद्धरण देखकर यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए कि जितनी तीखी भाषा में प्रेमचन्द ने पाखण्डी ब्राह्मणों के इस कटु यथार्थ को व्यक्त किया है वैसा शायद किसी दलित लेखक ने भी नहीं किया होगा।

अन्त में यहाँ यह कहना अतिष्योक्ति न होगा कि वर्तमान में दलित साहित्य का अस्तित्व प्रेमचन्द साहित्य के बगैर अधूरा है, क्योंकि दलित साहित्यकारों द्वारा दलित साहित्य समझने के लिए प्रेमचन्द के साहित्य का आलम्बन प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से लिया जाता रहा है और रहेगा। हालांकि ‘जार-प्रष्न‘ एक ज्वलन्त मुद्दा है। कुछ सीमाओं के बावजूद भी प्रेमचन्द का साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है। दलितों के विषय में प्रेमचन्द ने जो भी लिखा है, अपने समकालीन साहित्यकारों से आगे बढ़कर ही लिखा है और यह बात प्रामाणिकता से कही जा सकती है। वर्तमान दलित चेतना के उभार के समय में यदि दलित साहित्यकारों की दृष्टि प्रेमचन्द से अधिक विस्तृत हुई है, तो यह समाज और समय के अनुरूप मूल्यों का विकास ही है। यह प्रेमचन्द जैसे महान साहित्यकारों को सीमित कर देता है, क्योंकि यह प्रेमचन्द की सीमा है, किन्तु इससे प्रेमचन्द खारिज कभी नहीं हो सकते। इसलिए कतिपय सीमाओं के होते हुए भी प्रेमचन्द दलित-चेतना के सन्दर्भ में भी आज भी उतने ही प्रासंगिक बने हुए हैं।

 

 

 

-- :ः सन्दर्भ सूची :ः --

 

1.       प्रेमचन्द और दलित विमर्ष : कान्तिमोहन, स्वराज प्रकाषन, अंसारी रोड, दरियागंज,  दिल्ली, पृ0-11

2.       दलित साहित्य का समाजषास्त्र : डॉ. हरिनारायण ठाकुर, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाषन, नयी दिल्ली, पृ0-134

3.       वही, पृ0-135

4.       वही, पृ0-135

5.       वही, पृ0-135

6.       प्रेमचन्दः सामन्त का मुंषी, डॉ. धर्मवीर भारती, वाणी प्रकाषन, पृ0-80

7.       दलित साहित्य का समाजषास्त्र : डॉ. हरिनारायण ठाकुर, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाषन, नयी दिल्ली, पृ0-138

8.       मोहनदास नैमिषराय, ‘तर्क को कुतर्क से मत काटो‘, ‘वसुधा‘, जुलाई-सितम्बर, वर्ष-2005, सम्पादकीय

9.       प्रो. चमनलाल, ‘प्रेमचन्द साहित्य में दलित विमर्ष‘, ‘कथादेष‘, फरवरी, 2011, पृ0-42

10.     समाचार-पत्र ‘जनसत्ता‘ रायपुर, दि0- 06.03.11 ओम प्रकाष वाल्मीकि (‘प्रेमचन्द और दलित‘)

11.     दलित साहित्य एक मूल्यांकन : प्रो. चमनलाल, राजपाल प्रकाषन, कष्मीरी गेट नयी दिल्ली, पृ0-111

12.     समाचार-पत्र ‘जनसत्ता‘ रायपुर, दि0- 06.03.11 ओम प्रकाष वाल्मीकि (‘प्रेमचन्द और दलित‘)

13.     वही।

14.     दलित साहित्य का समाजषास्त्र : डॉ. हरिनारायण ठाकुर, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाषन, नयी दिल्ली, पृ0-140

15.     प्रेमचन्द और दलित विमर्ष : कान्तिमोहन, स्वराज प्रकाषन, अंसारी रोड, दरियागंज,  दिल्ली, पृ0-13

16.     प्रेमचन्दः सामन्त का मुंषी, डॉ. धर्मवीर भारती, वाणी प्रकाषन, पृ0-63

17.     दलित साहित्य का समाजषास्त्र : डॉ. हरिनारायण ठाकुर, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाषन, नयी दिल्ली, पृ0-140

18.     वही, पृ0-141

19.     आधुनिक साहित्य में दलित विमर्ष : देवेन्द्र चौबे, ओरियंट व्लैकस्वॉन प्रकाषन, नयी दिल्ली, पृ0 -55

20.     समाचार-पत्र ‘जनसत्ता‘ रायपुर, दि0- 06.03.11 ओम प्रकाष वाल्मीकि (‘प्रेमचन्द और दलित‘)

21.     प्रेमचन्द साहित्य और दलित मत, कुमत, अनिता भारती, स्त्रोत-ूूण्चतंइींजांइंतण्बवउध्दवकमध्36461घ्चंहमत्रेवूए दि0 31ण्07ण्11ण्

22.     दलित साहित्य का समाजषास्त्र : डॉ. हरिनारायण ठाकुर, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाषन, नयी दिल्ली, पृ0-150

23.     प्रेमचन्द साहित्य और दलित मत, कुमत, अनिता भारती, स्त्रोत-ूूण्चतंइींजांइंतण्बवउध्दवकमध्36461घ्चंहमत्रेवूए दि0 31ण्07ण्11ण्

24.     समाचार-पत्र ‘जनसत्ता‘ रायपुर, दि0- 06.03.11 ओम प्रकाष वाल्मीकि (‘प्रेमचन्द और दलित‘)

25.     प्रेमचन्द साहित्य और दलित मत, कुमत, अनिता भारती,

स्त्रोत- ूूण्चतंइींजांइंतण्बवउध्दवकमध्36461घ्चंहमत्रेवूए दि0 31ण्07ण्11ण्

26.     दलित साहित्य का समाजषास्त्र : डॉ. हरिनारायण ठाकुर, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाषन, नयी दिल्ली, पृ0-142

27.     वही, पृ0-144

28.     वही, पृ0-150

29.     वही, पृ0-155

30.     दलित साहित्य एक मूल्यांकन : प्रो. चमनलाल, राजपाल प्रकाषन, कष्मीरी गेट नयी दिल्ली, पृ0-116

31.     वही, पृ0-114

 

 

 

 


Friday, May 8, 2020

उत्तराखण्ड के लोकगीतों में समाहित क्रांतिकारी भावना


मानव आदिकाल से ही अपनी रागात्मक भावनाओं की भाषागत अभिव्यक्ति गीतों, कहानियों, उक्तियों आदि के माध्यम से करता आया है।
जन साधारण की यह स्वभाविक भाषागत अभिव्यक्ति ही लोक साहित्य कहलाता है। मूलतः लोकगीत सामुदायिक व जातीय रचनाएं हैं। इनका
सर्जन पूरा लोक समाज करता है। समूची जाति ही लोकगीतों की उद्भावना और पोषण का आधार होती है। एक विशिष्ट व्यक्ति या व्यक्तियों
की वाणी ही धीरे-धीरे लोकवाणी बन जाती है। समय के साथ-साथ लोकगीतों में कुछ नये अंष जुड़ जाते हैं और उसमें यदि कोई
असामाजिक तत्व होता है, तो उसका परिष्कार कर दिया जाता है। अतः लोकगीत अंतवोगत्वा एक निर्वैयक्तिक, सामुहिक और सामाजिक
रचना है, जो इसका एक विषिष्ट गुण है।
लोकगीत हमारे राष्ट्रीय लोक साहित्य की अमूल्य निधि है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश की स्वतंत्रता संघर्ष में राष्ट्रीय व्यवहारिक
साहित्य की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। क्योंकि व्यवहारिक साहित्य कुछ पढ़े-लिखे लोगों तक ही पहंुच सका था। लेकिन
इन राष्ट्रीय लोकगीतों ने लाखों लागों को प्रभावित एवं प्रोत्साहित किया है। राष्ट्रीय लोकगीतों एवं शिष्ट राष्ट्रीय गीतों ने एक-दूसरे हेतु पूर्णता
का कार्य किया है। लोकगीतकारों ने व्यवहारिक साहित्यकारों की अपेक्षा क्रांतिकारियों और गांधीजी की प्रतिभा व शक्ति को अधिक गहराई
से तथा शीघ्र लिया। निःसन्देह ही राष्ट्रीय लोककवि, राष्ट्रीय साहित्यिक कवियों की अपेक्षा अधिक निर्भीक व क्रांतिकारी थे। राष्ट्रीय लोकगीतों
ने परांपरा से हटकर राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष को एक नया आयाम दिया। लोककवियों ने लोक साहित्य का विकास किया और स्वाधीनता
आंदोलन को अत्यधिक व्यापक व शक्तिशाली बनाने में मदद की। यह भी प्रमाणित है कि राष्ट्रीय लोकगीत और राष्ट्रीय व्यवहारिक गीत
एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। लोकगीत चाहे वे किसी भी प्रांत से संबंधित क्यों न हो सदियों से जनता का शोषण करने वाले वर्गों के विरुद्ध
जनता की क्रांतिकारी भावना व विद्रोही प्रवृत्ति की हुंकार सुनाई देती है।
उत्तराखण्ड राज्य में कई देशभक्त पैदा हुए और अपनी जन्मभूमि के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिये। उन्हें अपने देश की पवित्र भूमि,
पर्वत, नदियों, आमजन, तथा उसकी विकसित संस्कृति के गौरवमय इतिहास से बड़ा प्यार था। चंूकि उत्तराखण्ड का भू-भाग दो भागों
गढ़वाल और कुमाउं में बटा है इसलिए यहां के लोकगीत भी दोनों (गढ़वाली व कुमाऊनी) ही क्षेत्रीय भाषा में प्राप्त होते हैं। यहां
उत्तराखण्ड के कुछ मुख्य लोकगीतों के विषय में जानकारी है जिन्होंने देश की क्रांति में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

जब टिहरी नरेश ने अपने कर्मचारियों को यह आदेश दिया कि जिस गांव के मेले में क्रांतिकारी चेतना जगाने वाले गीत गाये जाते हो, उन
पर सामूहिक जुर्माना किया जाए। इस बात का प्रभाव लोगों पर विपरीत प्रभाव पड़ने लगा, स्थानीय लोगों के मन में लोकगीतों के प्रति
लगाव और भी बढ़ गया। रंवाई में शहीद भगत सिंह के संबंध में एक लोकगीत प्रचलित है-
थाली छाटी बल हींग,
आमार देशू मा जरमी गई वीर भगत सींग।
माच्छू मारी बल गाव,
तू भगत सींग ह्वेगै अंगरेजू कू काव।
सोलिया कु बल पेणु,
दिन कु हरची खाणु त्यंूकू रात कु हरची संेणु।
(अर्थात- सुना है कि हमारे देश में भगतसिंह नाम का एक वीर पैदा हो गया है, जो अंगे्रजों के लिए मौत बनकर आया है। उसके भय से
अंगे्रजों का दिन का खाना तथा रातों की नींद उड़ गयी हैं)

इसके बाद 30 मई, 1930 को तिलाड़ी के मैदान में एक बर्बर कांड हो गया। टिहरी नरेश ने तिलाड़ी मैदान में हो रही जनसभा में
गोलियां चलवां दी, जिसमें कई निहत्थे किसान मारे गये और सैकड़ो गंभीर रूप से घायल हो गये। इस बर्बर काण्ड पर रवांई का एक और
लोकगीत इस प्रकार हैः
तिलाड़ी मैदान तीस कु साल,
जरमी गई तेख राजा कु काल।
ऊंद बोलों गंगाडू गंजेलू कु गांज,
तेरु पापी राज पड़लू बांज।
ऊंद बोलो गंगाडू सुप झाड़ी पीठी,
सबी ज्वानू ली लेखी द्यो न चीठी।
अंगे्रज-राजा दुया जन भाई,
गांवू-गांवू मा त्यून वसूली लाई।
उठो मेरा भायो यूं पाप्यों मारो,
अपण नौनू तु फंड तारो।
(अर्थात- सन् 1930 में तिलाड़ी मैदान में राजा ने निहत्थे आदमियों पर गोलियां चलवायी जिसमें कई लोग मारे गये तथा सैकड़ों घायल हो
गये। हे! राजा, तेरा इस प्रकार का अत्याचारी शासन नष्ट हो जाएगा। अत्याचारी अंग्रेज व राजा-दोनों भाई-भाई से लगते हैं। दोनों जुल्मी हैं।
सभी लोगों को पत्र लिख दो कि इनके शासन को मिटाने के लिए काम करें। भाइयों! उठो और इन पापियों को मारकर अपनी आने वाली
पीढ़ी/बच्चों को इन अत्याचारों से मुक्त करो।)

एक अन्य गढ़वाली लोकगीत में भारत को स्वतंत्र कराने में महात्मा गांधी के योगदान तथा उनके त्यागमय साधारण जीवन के विषय में
बताया गया है-
मातमा गांधी बड़ो भागी छ,
देश मुलक को अनुरागी छ!
बकरी को दूद वो खांदू छ,
खादी को लाणू वा लांदू छ!
पंद्र अगस्त हमू दिलैगी वो,
अंगरेजू सणी भगैगी वो!
आजादी हयू दिलैगी वो,
राज किसाणू दिलैगी वो!
मातमा गांधी बडू त्यागी छ,
देश मुलक को अनुरागी छ!
(अर्थात- महात्मा गांधी बड़े भाग्यशाली हैं, देष के प्रेमी हैं। वे बकरी का दूध पीते हैं, खादी के वस्त्र पहनते हैं। वे हमे पन्द्रह अगस्त दे
गये, वे अंगे्रजों को भगा गये, वे हमें स्वतंत्रता दिला गये, वे किसानों को राज दे गये। महात्मा बड़े त्यागी हैं। देश के अनुरागी हैं।)

उत्तराखण्ड का नाम शहीद श्रीदेव सुमन के बगैर अधुरा है। श्रीदेव सुमन गढ़वाल के प्रमुख राष्ट्रीय नेता थे। वह टिहरी नरेख की सामंतषाही
के विरुद्ध 84 दिनों तक अनशन करने के बाद देष की बलिवेदी पर शहीद हुए थे। श्रीदेव सुमन आज भी गढ़वाली के लोग-मानस को
आंदोलित करते हैं। एक गढ़वाली लोकगीत में श्रीदेव सुमन के संघर्ष का गौरवमय बखान इस प्रकार किया गया है-
सड़की को सूत सुमन सड़की को सूत ले,
टीरी मां पैदा ह्वैगे सुमन, सुमन सपूल ले।
गढ़ माता को प्यारो सुमन, सुमन सपूत ले!
अखोडू को कीच सुमन, अखोडू को कीच,
ढंडक शुरू ह्वैगे सुमन, रवांई का बीच,
घाघरी को फेर सुमन, घाघरी को फेर!
× × × × × × × × × × × ×
सुफल होइगे सुमन, तेरो त्यो बलिदान!
गढ़माता की वीर सुमन, तेरो त्यो बलिदान!!

गढ़वाली लोकगीतों के समानान्तर ही उत्तराखण्ड के कुमाऊनी क्षेत्र में भी सुप्रसिद्ध राष्ट्रवादी कवि गुमानी पंत भी निरन्तर अंग्रेजों के
अत्याचारी शासन का घोर विरोध कर रहे थे। उन्होंने अंगे्रजी राज की बुराइयां करते हुए नये राज्य के साथ आयी नयी बातों की ओर ध्यान
आकर्षित कराया। फिरंगियों के आगमन से अल्मोड़ा की स्थिति का वर्णन कुछ इस प्रकार करते हैं-
विष्णु का देवाल उखाड़ा ऊपर बंगला बना खरा,
महाराज का महल ढहाया बेड़ी खाना तहां धरा।
मल्ले महल लड़ाई नंदा बंगलों से भी तहां भरा,
अंगे्रजों न अल्मोडे़ का नक्षा और ही और करा।
(अर्थात- अंगे्रजों ने अल्मोड़े में आकर विष्णु भगवान का मंदिन उजाड़ दिया और पहाड़ी के ऊपर अपना सुंदर बंगला बनवा दिया।
महाराजा का महल उजाड़ कर वहां कारागार बनवा दिया। उन्होंने महल उड़ाकर बंगले बनवा दिये। वास्तव में अंग्रेजों ने तो अल्मोड़े का
नक्षा ही बदल दिया है।)

आगे राष्ट्रवादी कवि गुमानी पंत ने गोरखों के अत्याचारी शासन का वर्णन करते हुए करारा व्यंग्य किया-
दिन दिन खजाना का भार का बोकनाले,
षिव षिव चुलि में का बाल नैं एक कै का।
तदपि मुल्क तेरो छोड़ि नै कोई भाजा,
इतवदति गुमानी धन्य गोरखालि राजा।
(अर्थात- प्रतिदिन खजाना ढोते-ढोते प्रजा के सिर के बाल उड़ गये, पर एकाधिपत्य गोरखों का ही रहा। कोई भी उनका राज्य छोड़कर
नहीं गया। अतः है गोरखाली राजा, तुम धन्य हो।)

कवि गुमानी पंत ने अपनी जनवादी कविता ‘फिरंगी वर्णन‘ में अंगे्रजी शासन पर कुछ इस प्रकार कटाक्ष किया है-
दूर विलायत जल का रास्ता करा जहाज सवारी है,
सारे हिन्दुस्तान भरे की धरती वष कर डारी है।
और बड़े शाहों में सबसे धाक बड़ी कुछ भारी है,
कहे गुमानी धन्य फिरंगी तेरी किस्मत न्यारी है।
× × × × × × × × × × × × × × × ×
अपने घर से चला फिरंगी पहुंचा पहले कलकत्ते,
अजब टोप बन्नाती कुर्ती ना कपड़े ना कुछ लत्ते।
सारा हिन्दुस्तान किया सर बिना लड़ाई कर फत्ते,
कहत गुमानी कलयुग ने याँ सुबजा भेजा अलबत्ते।

कुमाऊनी जनता ने भी 1857 की क्रांति के समय अंग्रेजों के विरुद्ध आवाज उठाकर अपनी क्रांतिकारी चेतना को अभिव्यक्त किया।
लोककवि खिमानंद लिखते हैं-
कंपनी का भारत में देख अत्याचार,
भारत का लोग उठा हैगे मारामार।

कुमाऊं में कुली-बेगार प्रथा के विरुद्ध चले आंदोलन के समय ये लोकगीत गूंज उठा-

अब है गईं गांधी अवतार, झन दिय मंेसो कुली बेगार,
घर घर खादी का कर परचार, अब है गईं गंाधी अवतार।

सुप्रसिद्ध कुमाऊनी जनकवि गौरीदत्त पांडे ‘गोरी‘ ने एक कविता के माध्यम से गांधी जी का सिपाही बनने का संकल्प लिया-
बण गांधी सिपाई रहटा कातुला,
देष का लिजिया हम मरि मिटुला।
× × × × × × × × × × × ×
मेरा मुल्कीया यारो जै गांधी की बोल
झल चूकिया मौका छ जुगति अमोल।

राष्ट्रीय कवि हीरावल्लभ शर्मा ने एक कुमाऊनी गीत में भारत की स्वतंत्रता पर खुषी व्यक्त करते हुए लिखते हैं-
सफल हैगो तिरंगी, हिंदुस्तान बै भाज फिरंगी।
महात्मा सुभाष जवारलाल, लैरोई ख्याल जस गोपाल।

भारतीय लोकमानस में सदा ही लोक कल्याण की भावना व्याप्त रही है। विभिन्न संस्कारों तथा पर्वों के अवसर पर गाए जाने वाले
गीतों में परिवार व समाज के सभी सदस्यों की मंगलकामना की गयी है। कुमाऊं में होली की समाप्ति पर लोगों के घर जाकर सब मंगल
गीत गाये जाते हैं-
हो हो होलक रे, आज को बसंत कैका वर,
आज का बसंत नाम का घर हो हो हो लकर।
यनरो पूर परीवार जी रौ लोख बरीस, हो हो लकरे,
यनरो भरो रौ अन धन लै कुछान, हो हो लकरे।

अतः भारत के स्वाधीनता संग्राम पर उत्तराखण्ड के लोकगीतों का व्यापक प्रभाव को भली-भांति देखा जा सकता है। हमारे
लोककवियों/गीतकारों ने भी स्वतंत्रता सेनानियों का यशोगान किया। शहीद भगतसिंह और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी आदि महापुरुषों
का खुलकर गुणगान किया है। इसमें कोई अतिष्योक्ति नहीं है कि लोकगीतों के माध्यम से क्रांतिकारी भावना जगाने में उत्तराखण्ड का
योगदान प्रमुख रहा है।



’’’ प्रस्तुत लेख में संकलित गढ़वाली लोकगीतों के संग्रहण में निम्न पुस्तकों से सहायता ली गयी है-
1. गढ़वाली लोकगीतः एक सांस्कृतिक अध्ययन, गोविन्द चातक, राधाकृष्ण प्रकाषन-1968, दरियागंज नयी दिल्ली।
2. गढ़वाली लोकमानस, षिवानन्द नौटियाल, अमित प्रकाषन, गाजियाबाद, 1975 ।
3. लोकगीतों में क्रांतिकारी चेतना, विष्वमित्र उपाध्याय, प्रकाषन विभाग, भारत सरकार, 1997।




डॉ० राम भरोसे

Thursday, May 7, 2020

उच्च शिक्षा में बढ़ता जातीय भेदभाव और हमारा उत्तरदायित्व



डॉ. राम भरोसे
असिस्टेंट प्रोफेसर (हिंदी विभागाध्यक्ष)
श.बे.चौ. राजकीय महाविद्यालय पोखरी (क्वीली)
टिहरी-गढ़वाल-249146, उत्तराखंड
9045602061

इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज हमारी उच्च शिक्षा-व्यवस्था पर गंभीरता से पुर्विचार करने की ज़रूरत है. देश के लगभग
अधिकांश महाविद्यालय-विश्वविद्यालयों की वर्तमान हालत को देखकर दुःख भी होता है और रोष भी. स्वयं भी उच्च शिक्षा से जुड़े होने के
कारण यह दुःख-रोष और भी बढ़ जाता है. जिस प्रकार हमारे उच्च शिक्षण संस्थानों में दलित वर्ग से छात्रों के उत्पीड़न की खबरें आम हो
गयी हैं, यह भावी भारत (डिजिटल इंडिया) के लिए कम से कम शिक्षा के क्षेत्र में कतई भी शुभ सन्देश लेकर नहीं लाने वाले हैं. केवल
गिनती कि बात की जाए, तो भारत शिक्षा-तंत्र की उपलब्धियों किसी को आश्चर्य करने के लिए पर्याप्त हैं. संख्यात्मक दृष्टि से तो देश में
स्कूल, कॉलेजों, यूनिवर्सिटिओं में बढ़ोतरी हुई है, परन्तु गुणवत्ता उस अनुपात में नगण्य ही है. इसका प्रमाण इस बात से मिल जाता है-
देश में प्रत्येक वर्ष लाखों की संख्या में बच्चे ग्रेजुएट-पोस्ट ग्रेजुएट होते हैं, लेकिन जब बात रोजगार की आती है, तो अधिकांश संख्या
पढ़े-लिखे बेरोजगारों की ही मिलेगी.
स्पष्ट है कि हमारे देश में मात्र उच्च शिक्षा के नाम पर डिग्री बांटी जा रही है. मूल में स्थिति आज भी संतोषजनक नहीं है. उस पर बड़े
खेद की बात है कि हमारे उच्च शिक्षण संस्थान जातिवाद के गढ़ बन रहे हैं. कही दलित छात्रों को उत्पीडित व अपमानित कर उन्हें
आत्महत्या के लिए मजबूर किया जा रहा है तो कही दलित प्राध्यापक को झूठी शिकायतों को आधार बनाकर उनका निलंबन किया जा रहा
है. यह सब इस बात को प्रमाणित करने हेतु पर्याप्त है कि आज भी दलितों के लिए उच्च शिक्षा कि राह में मनुवादी रोड़े भरपूर हैं. उच्च
शिक्षा में ही क्यों दलित बच्चों को तो उनके प्राथमिक स्तर से अपमान का घूंट पीना पड़ता है. कहीं उनके लिए भोजनमाता भोजन बनाने
के लिए मना कर देती है, तो कहीं उनकों अन्य बच्चों के साथ बैठकर भोजन नहीं कराया जाता आदि. जब भी कभी जातीय उत्पीड़न के
कारण कोई दलित छात्र आत्महत्या करता है, तो लगता है जैसे जातिवाद की बाँहों में शिक्षा अपना दम तोड़ रही है. दलित छात्रों में उच्च
शिक्षण संस्थानों में दाखिले से लेकर नियुक्ति तक की प्रक्रिया में घोर जातिवाद झलकता है. एक ओर जहाँ वर्तमान सरकार नयी शैक्षणिक
नीति बनाने की कोशिश कर रही है, वहीँ उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिवादिता को बढ़ावा देने में सरकार के नुमाइंदों की भी भूमिका कम
प्रतीत नहीं होती.

आखिर हमारी शिक्षा जा किधर रही है? यह एक यक्ष प्रश्न बनता जा रहा है. सरकार चाहे जिसकी रही हो, जातिवाद से पीड़ित
छात्र हर शिक्षण संस्थान में मिल जायेगा. नयी शैक्षणिक नीति के विषय में यू.जी.सी. के पूर्व चेयरमैन व जे.एन.यू. के पूर्व प्रोफेसर
सुखदेव थोराट मानते है कि “उच्च शिक्षा में दाखिले के दर को बढ़ाये जाने की कोशिश होनी चाहिए. इनमें महिलाओं, दलितों-
आदिवासियों, मुसलमानों का प्रतिनिधित्व काफी कम है. इस विषमता को दूर करने के ज़रूरत है.” (इंडिया टुडे, 03.02.16) समाज
विज्ञानी और शिक्षाविद् शिव विश्वनाथन दलित छात्रों की आत्महत्या को लेकर अति गंभीर बात कहते हैं- “यह मामला दिखता है कि वि.वि.
छात्र-छात्राओं के ख्वाबों को किस तरह खत्म कर रहे हैं. खासकर दलितों के. उनके शिक्षकों की चुप्पी सब कुछ बयां कर रही है.”
(इंडिया टुडे, 03.02.16) प्रत्येक शिक्षण संस्थान में द्रोणाचार्य मौजूद है. ओ.पी. सोनिक कहते हैं, “द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा में एकलव्य
का अंगूठा मांग लिया था, पर आज के द्रोणाचार्य तो एकलव्यों को जान देने पर मजबूर कर रहे हैं.” (राष्ट्रीय सहारा 08.11.2011)
रोहित वेमुला जैसी न जाने कितनी ही प्रतिभाएं हमारे शिक्षण केन्द्रों में जातिवाद के कारण अपनी जान गवां चुके हैं. इसकी एक
झलक देख ही आत्मा चीत्कार करने लगती है. यहाँ उनका संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करना उल्लेखनीय भी है और समीचीन भी –
1. अगस्त 2007- आइआइएस, बंगलुरु में शोध छात्र अजय एस.चंद्रा ने आत्महत्या की.
2. जनवरी 2007- आइआइटी मुंबई में बी.टेक. अंतिम वर्ष के दलित छात्र एम.श्रीकांत की आत्महत्या.
3. जनवरी 2007- आइआइटी दिल्ली में दलित छात्र अंजनी कुमार ने आत्महत्या की.
4. फरवरी 2008- हैदराबाद विश्वविद्यालय में पीएचडी छात्र सेंथिल कुमार ने फेलोशिप बंद होने के चलते आत्महत्या का कदम उठाया.
5. जनवरी 2009- आइआइटी कानपुर एम.टेक. अंतिम वर्ष की छात्रा जी.सुमन तथा इससे पूर्व यहाँ 2008 में प्रशांत कुरील ने आत्महत्या
की.
6. मार्च 2010- एम्स, नयी दिल्ली के एमबीबीएस के अंतिम वर्ष के बाल मुकुंद भारती ने जातीय भेदभाव के चलते अपनी जान दे दी.
7. फरवरी 2011- आइआइटी रुड़की के दलित छात्र मनीष कुमार ने अपने उत्पीड़न से तंग आकर आत्महत्या की.
8. मार्च 2012- एम्स, नयी दिल्ली के आदिवासी छात्र अनिल कुमार मीणा ने फांसी लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली.
9. 2013- आइआइटी दिल्ली के दलित छात्र राजविंदर सिंह ने आत्महत्या की.
10. नवम्बर 2013- हैदराबाद विश्वविद्यालय में पीएचडी छात्र एम.वेंकटेश ने कथित तौर पर भेदभाव से तंग आकर आत्महत्या कर ली.
11. सितम्बर 2014- आइआइटी मुंबई में दलित छात्र अनिकेत अम्भोरे की संधिग्ध हालात में मृत्यु (आत्महत्या)
12. जनवरी 2016- हैदराबाद विश्वविद्यालय में पीएचडी छात्र रोहित वेमुला की फेलोशिप बंद होने के चलते आत्महत्या का कदम उठाया.
जिसने पुरे देश को एक बार फिर पुनः हिलाकर रख दिया है और कई सवाल हमारे सामने खड़े कर दिये हैं. (इंडिया टुडे से साभार)

उच्च अध्ययन केन्द्रों में हो रहे जातिगत भेदभाव को क्या माना जाए. यही कि आज मनुवादी डरे हुए हैं कि अगर दलित पूर्ण
रूप से शिक्षित हो गये तो उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन सकते हैं और इसमें कोई संदेह भी नहीं है. मनुवादियों का प्रयास है कि
भारत में फिर कोई ‘अम्बेडकर’ का जन्म न हो जाए. सभी जानते हैं कि आजादी के बाद आरएसएस चाहता था कि ‘मनुस्मृति’ को
आजाद भारत का नया संविधान घोषित किया जाए, परन्तु बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर ने नये ढंग से समतावादी संविधान की रचना
कर उनके प्रयोसों पर पानी फेर दिया. इसे देश का दुर्भाग्य के कहना चाहिए कि स्वंतत्रता के 69 वर्ष बाद भी मनुस्मृति के वैचारिक
अवशेष मौजूद हैं, जो मनुवादियों को जातीय उत्पीड़न के लिए प्रेरित करते हैं.
विडम्बना है कि एक ओर जहाँ दलितों-आदिवासियों, मुस्लिमों का उच्च शिक्षा में प्रतिनिधित्व काफी कम है और दूसरी ओर
दलित-आदिवासी-मुस्लिम बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर, उच्च शिक्षा में ही अपना कैरियर बनाने के सपने संजोये हैं. डॉ. अम्बेडकर के सपने
को साकार करने के लिए दलित छात्र अपने जी-जान से जुटे हैं. अफ़सोस उनकी राह आसान नहीं है. आज यह मिथ्या सा लगता है कि
शिक्षा नये विचारों को जन्म देती है और विचारों में परिवर्तन लाती है; क्योंकि जातिवादी पूर्वाग्रहों के चलते दलित उत्पीड़कों में न तो
समतावादी नये विचार पैदा हो पाए हैं, न ही जातिवादी विचार बदले हैं और न ही शिक्षा से उनके जीवन की विषमतावादी धारा ही बदल
पायी है.
उच्च शिक्षा में दलित छात्रों के नामांकन से लेकर नियुक्ति तक के वास्तविक आंकड़े किसी से छिपे नहीं हैं. उच्च शिक्षण
संस्थानों में उच्च पदों पर दलितों-आदिवासियों व मुस्लिमों की भागीदारी न के ही बराबर है. छात्रों के नामांकन की वास्तविक स्थिति जानने
डीयू के दयाल कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर और एकेडमिक फोरम फॉर सोशल जस्टिस के अध्यक्ष केदार कुमार मंडल ने सुचनाधिकार में
प्राप्त सूचनाओं में पाया कि “2010-11 सत्र में डीयू में दाखिले के करीब 50000 अनुसूचित जाति, जनजाति और ओबीसी समुदाय की सींटे
खाली रह गयी और इनकों बाद में सामान्य वर्ग के छात्रों से भर दिया गया.” (इंडिया टुडे फरवरी 2016) बाद में उनके सुप्रीम कोर्ट में
अपील के बाद फैसला आया कि इन आरक्षित सीटों के लिए न्यूनतम कट-ऑफ जारी किया जाए. केदार कुमार मंडल के अनुसार “यहाँ
नियुक्तियों में भी विसंगतियां हैं और इसके लड़ाई मैं अदालत में लड़ रहा हूँ.” ऐसा ही एक अन्य उदाहरण है- जेएनयू में भेदभाव की
स्थिति को वही के छात्र बाल गंगाधर बताते हैं- “जेएनयू में पीएचडी कर रहे वंचित समुदाय के डेढ़ दर्जन छात्र हर साल बीच में ही पढाई
छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं.” (इंडिया टुडे फरवरी 2016, 17)
छात्रों के नामांकन हेतु प्रतिशतवार आंकड़े क्या कहते हैं – 4% अनुसूचित जनजाति, 13.5% अनुसूचित जाति, 35% ओबीसी,
85% सामान्य (राष्ट्रीय सहारा 30.01.2016)
नियुक्ति के विषय में आंकड़े-

संस्थान का नाम अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति
राष्ट्रीय सहारा 15.09.2012
आरक्षित पद वर्तमान स्थिति आरक्षित पद वर्तमान स्थिति
AMU 283 01 142 0
DU 255 44 128 14
JNU 109 24 55 09
BHU 362 115 181 30


एक ओर मनुष्य की मुक्ति शिक्षा प्राप्त करने पर मानी गयी है, दूसरी ओर जिस प्रकार दलित-आदिवासियों को शिक्षा से दूर
रखने का षडयंत्र किये जा रहे हैं, क्या दर्शाता है? यही कि आज भी अपने को विकसित करने के लिए दलित वर्ग जो प्रयास कर रहा है
उसकी राह बाधित है. वास्तव में अध्ययन स्थलों पर पसरा यह भेदभाव आने वाले समय में देश के लिए घातक साबित होगा, जिससे
किसी का भी भला होने वाला नहीं है. इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद जैसे देश का
दलित युवा (गैर दलित भी आंशिक रूप से शामिल हैं) इकठ्ठा होकर सड़कों पर आ रहे हैं और देश में छोटे-बड़े शहरों में न्याय के लिए
झंडा उठाये हैं.
यह तो स्पष्ट हो ही चूका है कि उच्च शैक्षणिक परिसरों में दलित छात्रों को उपेक्षा, उत्पीड़न, अपमान और भेदभाव के अंतर्धारा
को रोहित वेमुला की आत्महत्या ने एक बार पुनः सतह पर ला दिया है. साथ ही यह भी बता दिया है कि हमारे इन संस्थानों में कुछ भी
ठीक नहीं हैं, वहां सांस्थानिक भेदभाव आज भी मौजूद है. इन आत्महत्याओं की पड़ताल करते हुए राजनीतिक विश्लेषक कुमार नरेंद्र सिंह
लिखते हैं- “उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव के अनुभव, बहिष्कार और अपमान के चलते अधिकतर दलित छात्र आत्महत्या कर लेते हैं.
इनका कारण भारतीय सामाजिक संरचना है, जो ऊँच-नीच पर आधारित सामाजिक दूरी के सिद्धांत पर आधारित है. दलितों को केवल एक
पहचान में तब्दील कर देती है. उच्च शिक्षा संस्थानों में जातीय समूहों का अलग-अलग रहने की प्रवृत्ति सर्वव्यापी है. ऐसा जातीय दुराग्रह
और जातीय दंभ से चलते होता है. बहुधा यह बंटवारा लिंग, धर्म, वर्ग, जाति, राष्ट्रीयता, क्षेत्र और नस्ल के आधार पर स्पष्ट भेदभाव पैदा
होता है. परिसर का माहौल दलितों-गैर दलितों के बीच विभेद बनाये रखता है” अकादमिशियन अनूप सिंह ने आत्महत्याओं के कुछ मामलों
का विश्लेषण करने पर पाया कि “इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि जातिगत भेदभाव ही वह कारण है, जिसके चलते हाशिये पर पड़े
समूहों के छात्र आत्महत्या करने को विविश हैं. इसमें बहुत बड़ी या मुख्य भूमिका संस्थान के उच्च जाति के शिक्षक व छात्र उत्तरदायी
हैं.” शिक्षाविद् शिव विश्वनाथन दलित छात्रों की आत्महत्या को लेकर अति गंभीर बात कहते हैं- “यह मामला दिखता है कि वि.वि. छात्र-
छात्राओं के ख्वाबों को किस तरह खत्म कर रहे हैं. खासकर दलितों के. उनके शिक्षकों की चुप्पी सब कुछ बयां कर रही है.” (इंडिया
टुडे, 03.02.16) उक्त दोनों विद्वानों के कथनों यह स्पष्ट है कि उच्च जाति के शिक्षक उच्च शिक्षा में हो रहे जातीय भेदभाव के काफीहद
तक जिम्मेदार हैं. ऐसी क्रूर और दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ होने के बाद भी जिस प्रकार शिक्षक मौन साधे बैठे रहते हैं, सच में यह बहुत
कष्टकारी स्थिति है. जिनके हाथों में देश के भविष्य को सुरक्षित महसूस करना चाहिए उन्हीं की छत्रछाया में उनके साथ दोगला व्यव्हार
किया जा रहा है. यह अवस्था संतोषजनक तो कतई नहीं कही जा सकती. आज 21वीं सदी में भी हमारे यहाँ कक्षाओं में छात्रों से उनकी
जाति पूछा जाना आम बात है.
शिक्षक युवाओं को भविष्य के लिए तैयार करता है. भारत के पूर्व राष्ट्रपति और बच्चों के चहेते डॉ. अब्दुल कलाम का मानना है कि
“शिक्षकों का महान ध्येय युवा मस्तिष्कों को तेजस्वी बनाना है.” (अदम्य साहस, राजकमल प्रकाशन) सत्य ही है, शिक्षक पर समाज से
हर बुराई दूर करने की खास जिम्मेदारी होती है (यदि वह समझे) परन्तु जब उसके सामने इतना सब अनैतिक हो और वह चुप रहता है
या वह स्वयं भी छात्र शोषण का जिम्मेदार हो, तो हृदय को कष्ट बड़ा कष्ट पहुचता है. क्या हो गया है शिक्षकों को? क्या जाति ही एक
व्यक्ति की पहचान है. एक विद्यार्थी मात्र विद्यार्थी होता है, उसकी कोई जाति नहीं होती. सिर्फ मोटी-मोटी तनख्वाह लेकर अपना स्टेट्स
बढ़ाना ही सब है. समाज के प्रति नैतिक जिम्मेदारी से मुख मोड़ना कहाँ की समझदारी है. परन्तु वे बड़े-बड़े सेमिनारों और संगोष्ठियों में
जोर-जोर से नैतिकता पर चिल्लाते हुए ज़रूर दिख जायेंगे और धरातल पर वही ढाक के तीन पात. कॉलेज हो या यूनिवर्सिटी शिक्षक के
हाथ में बहुत कुछ होता है. लेकिन उनकी उदासीनता का परिणाम रोहित-सेंथिल जैसे होनहार छात्रों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ता
है. आज भी हालत हमारे नियन्त्रण में हैं. आज भी शिक्षक अपने छात्रों के आदर्श होते हैं. यदि किसी भी संस्थान के शिक्षक एकजुट
होकर सभी बच्चों के दिलों-दिमाग से जातीय वैमनस्य को दूर करने के सही अर्थों में प्रयास करें, तो किसी भी छात्र के मन में कभी भी
किसी भी विषम परिस्थिति में आत्महत्या करने का विचार नहीं आएगा. ऐसा पूर्ण विश्वास के साथ कहा जा सकता है. देश के सभी शिक्षण
संस्थानों को जातिगत, लिंग, वर्ण, वर्ग भेद के विरुद्ध समय रहते सचेत हो जाना चाहिए. नहीं तो उस भावी गंभीर स्थिति से सभी परिचित
है.
भविष्य में कोई भी दलित छात्र या किसी भी छात्र की आत्महत्या के पीछे संस्थान की भूमिका न हो, ऐसे प्रयास शीघ्र अति शीघ्र करने
होंगे. राजनीतिक लोग केवल अपना उल्लू सीधा करते हैं. अत: उनके भरोसा छोड़कर शिक्षक जगत और युवा पीढ़ी को जातिगत भेदभाव
दूर करने के लिए स्वयं ही आगे आना होगा. इस विषय पर यू.जी.सी. के पूर्व चेयरमैन डॉ. सुखदेव थोराट का महत्वपूर्ण सुझाव है, जिस
पर सरकार से लेकर तमाम अध्ययन केन्द्रों से जुड़े विद्यार्थी, शिक्षक एवं अन्य सभी कर्मचारियों को मिलकर कार्य करना होगा. उन्होंने कहा
कि “ज़रूरी है कि कॉलेजों/विश्वविद्यालयों में भेदभाव के खिलाफ अलग से प्रावधान किए जायें. इनमे दंड की व्यवस्था हो. लैंगिक भेदभाव
और रैगिंग मामले की तरह जातिगत आधार पर होने वाले भेदभाव के लिए भी दिशानिर्देश जारी किए जायें.” (राष्ट्रीय सहारा 30.01.16)
ऐसा कहना उचित नहीं होगा कि उक्त दशा में कोई सुधार नहीं हुए हैं. निश्चय ही सुधार तो हुआ है, परन्तु जाति अभी भी ज्यों की त्यों
बनी है. आप हर क्षेत्र में देख सकते हैं. दलित-वंचित समुदाय के छात्रों के अन्य छात्रों, अध्यापकों एवं अध्ययन केन्द्रों के प्रशासकों के
साथ सामान्यत: यह देखने को मिल ही जाता है. अभिप्राय है कि हाशिये पर मौजूद छात्रों की समस्याओं का निराकरण करने हेतु हर ओर
से कोशिशें करनी होगी. जातीय भेदभाव के विरुद्ध वैधानिक प्रावधान, नैतिक-सामाजिक शिक्षा के साथ शिक्षा के जरुरतमंदों की हर जरुरी
मदद की जाए और सबसे अंतिम और महत्वपूर्ण बात हमारे सभी सरकारी/गैर सरकारी उच्च शैक्षणिक संस्थानों में निर्णय लेने वाली
कमेटियों में दलितों/ओबीसी की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए तथा सभी इकाइयों में दलित छात्रों/शिक्षकों को प्रतिनिधित्व दिया जाए,
जिससे उनका संस्थान के संचालन में भागीदारी हो. दलितों की इस भागीदारी से ही भविष्य में उच्च शैक्षणिक केन्द्रों में जातीय भेदभाव को
काफहद तक खत्म किया जा सा सकता है.
इस लेख का अंत महान दार्शनिक संत ‘ओशो’ के वाक्य से करना उचित भी होगा और समीचीन भी –
“जो मित्र नहीं है, वो गुरु कैसे हो सकता है.”

धन्यवाद.....


Friday, April 24, 2020

काफिल का कुत्ता

*काफिल का कुत्ता*

ऑनलाइन अध्ययन-अध्यापन के साथ लॉक डाउन में आज दूसरी किताब पढकर पूरी की. पहली किताब के बारे में बात इस किताब के बाद करेंगे. फ़िलहाल तो किताब पढ़ी, वह पांच लम्बी कहानियों का कहानी संग्रह है, यह संग्रह मित्र विक्रम सिंह जी द्वारा रचित है. विक्रम सिंह जी के विषय में यहाँ बताना इसलिए भी ज़रूरी है कि पाठक यह समझ सकें कि साहित्यकार या लेखक किसी क्षेत्र विशेष से सम्बन्ध नहीं रखता. जीवन की भावनाओं और संवेदनाओं को शिरेवार लेखनी के माध्यम से व्यक्त जो भी कर दे और वो लेखनी जन समुदाय तक न सिर्फ पहुंचे बल्कि उनके मानसपटल पर अपना प्रवाह भी अंकित करें, निसंदेह वही लेखक या कवि कहलाये जाने का हकदार होता है. तो इस कहानी संग्रह के लेखक ऐसे ही व्यक्तिव के धनी हैं. विक्रम सिंह जी तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने के बाद वर्तमान में हरिद्वार औधोगिक क्षेत्र के अंतर्गत मुंजाल शोवा लिमिटेड कम्पनी (हीरो मोटोकोर्प) में अभियंता के पद पर कार्यरत हैं. औजार पकड़ने वाले हाथ जब कलम पकड़ते हैं तो समझिये साहित्य में क्रांति होने की संभावना ज्यादा होती है. मशहूर साहित्यकार ओमप्रकश वाल्मीकि के नाम से आप सभी भली प्रकार परिचित हैं. अरे! इसे आप तुलना न समझे, मात्र उदाहरण दे रहा हूँ. लेखन में रूचि रखने वाले और साथ ही अभिनय क्षेत्र में अपना दखल रखने वाले विक्रम जी देश भर के जाने-माने पत्र-पत्रकों में छपते रहते हैं. उनके तीन कहानी संग्रह ‘वारिस’, ‘और कितने टुकडें’ ‘गणित का पंडित’ और ‘काफ़िल का कुत्ता’ और अभी हाल ही में लोकोदय प्रकाशन से उपन्यास ‘यारबाज़’ प्रकाशित हुआ है. लेखन के साथ अभिनय में रूचि रखने वाले विक्रम सिंह जी तीन हिंदी फिल्मों (पी से प्यार फ से फरार, मेरे साइनाथ, पसंद-नापसंद) में भी अभिनय कर चुके हैं. साथ ही इनकी फिल्म स्क्रिप्ट राइटिंग कला आप  ‘पसंद-नापसंद’ फिल्म में देख सकते हैं.
खैर अब बात करते हैं इनके कहानी संग्रह ‘काफ़िल का कुत्ता’ की. पांच लम्बी कहानियों का यह संग्रह रोचकता से भरपूर है. क्रमशः संक्षेप में पाँचों कहानियों पर बात करते हैं. पहली कहानी जिसका शीर्षक है ‘अपना खून’ इस कहानी को यदि लघु उपन्यास कहा जाये तो इस रचना के साथ न्याय हो सकेगा. 66 पृष्ठों की यह लम्बी कहानी पाठक को अंत तक बांधे रखती है. पितृसत्तात्मकता व्यवस्था समाज में कैसे आज भी बनी है इसका बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करती है यह कहानी. यही नहीं  हमारे भारतीय समाज में पितृसत्तात्मकता व्यवस्था को मजबूत करने के लिए महिला किस प्रकार जिम्मेदार है और काफी सीमा तक महिला को मजबूर भी किया जाता है कि वह पितृसत्तात्मकता व्यवस्था को बनाये रखने के लिए बे-मन से सही पुरुष का सहयोग करें. इस कहानी की विशेष बात तो पाठक के रूप में महसूस की वो यह कि इस कहानी में उत्तराखंड बनने की ऐतिहासिकता पर भी काफी प्रकाश डाला गया है.
उत्तराखंड आंदोलन की पृष्ठभूमि दिखाए जाने के चलते कहानी में जिज्ञासा और रोचकता बढ़ती जाती है। इतना ही नहीं उत्तराखंड के गरीबी पहाड़ी जनजीवन को इस कहानी को जिस प्रकार दिखाया गया है, वो आंखे नम कर देता है। इस कहानी को पढ़ने वाला कोई भी पाठक हो, यह जानकर आश्चर्यचकित होगा कि आज भी पहाड़ पर रहने वालों का जीवन अभावग्रस्त ही नहीं बल्कि दुष्कर भी है। हालांकि सरकारी योजनाओं के चलते स्थितियों में काफी सुधार हुआ है, परन्तु इसके बावजूद भी ईजा और दीपा जैसे अनेकों गरीब लाचार परिवार हैं, जिन तक सही मायनों में कोई सरकारी लाभ नहीं पहुंच सका है। जबकि ईजा का पति खड़गराम उन आंदोलनकारियों में शामिल था, जिन्होंने उत्तराखंड को अलग राज्य का दर्जा दिलाने के लिए अपनी जान की बाजी तक लगा दी। बावजूद इसके उसके पीछे उसके परिवार की वही दयनीय स्थिति है।

कहानी में उत्तराखंड में किस प्रकार ब्रिटिशों का आगमन हुआ और कैसे उनसे मुक्ति के लिए पहाड़ों पर संघर्ष हुआ, लेखक ने बखूबी दिखाने का प्रयास किया है। कहानी में दीपा और इंदर की अधूरी प्रेमकथा, कहानी को विस्तार अवश्य प्रदान करती है, परन्तु हर बार की जैसे यह कथा भी पूर्ण होने से पहले ही कहीं खो जाती है। इंदर अपनी माँ के इलाज के लिए शहर जाता है, हाड़-तोड़ प्राइवेट काम करता है लेकिन अंत में अपनी माँ को टीबी की बीमारी से बचा नहीं पाता है और माँ की मृत्यु हो जाती है। माँ की मौत के बाद जब गांव वापस लौटता है, तो दीपा के बारे में पता चलता है कि उसकी तो शादी हो गयी। कहानी के युवा पात्र इंदर के रूप में पहाड़ के युवा बेरोजगार को देख सकते हैं। पहाड़ पर रोजगार के अवसर न होने के चलते वहाँ के युवा किस प्रकार रोजगार की तलाश में तराई के क्षेत्रों में चले जाते हैं और पहाड़ को पलायन का दर्द झेलना पड़ता है।
कहानी फिर कुछ ऐसे आगे बढ़ती है, कहानी का मुख्य पात्र रूप सिंह है जो इंडियन ऑयल प्लांट  में सरकारी मुलाजिम है और शान से मैदानी क्षेत्र में आलीशान घर बनाकर अपनी पत्नी कलावती के साथ रह रहा है। कहानी में सरकारी नौकरी के पहले के संघर्ष को भी बखूबी दिखाया गया।  परन्तु सब होने के बाद भी उसके पास कुछ नहीं, मतलब शादी के कई वर्षों बाद भी वह बाप नहीं बन सका। कमी उसमें नहीं, उसकी पत्नी में थी। इसलिए वह हर शाम शराब में डूब जाता है और दुखी भी होता है।
निःसंतानता के कष्ट के कारण कलावती उससे से एक दिन कह ही देती है कि क्यों न हम बच्चा गोद ले ले। यह सुनकर रूप सिंह को अच्छा नहीं लगता, वह कलावती से कहता है, 'अपना खून चाहता हूँ'। इसके बात कलावती निरुत्तर हो जाती है।
एक दिन इकबाल जो कि रूप सिंह का दोस्त है उससे कहता है यार तू दूसरी शादी क्यों नहीं कर लेता। यह सुनकर रूप सिंह चौंक जाता है और मना करता है। लेकिन बार बार इकबाल के समझाने पर, उसे इकबाल की बात समझ आ जाती है। पर यह बात कलावती से कैसे कहें, इसी चिंता में डूबा रहता है। खैर किसी तरह वह कलावती को मना लेता है या कहिए रूप सिंह को संतान प्राप्ति के लिए वह स्त्री जीवन के सबसे बड़े त्रास यानि सौत रखने के लिए हामी भर देती है। लेकिन उसकी शर्त यह है कि संतान होने के बाद रूप सिंह उसे छोड़ देगा। उस समय रूप सिंह भी उसकी शर्त मां लेता है।
अब लड़की कौन है? रूप सिंह के इस प्रश्न की जिज्ञासा पर इकबाल उसे बताता है कि एक गरीब पहाड़न की तीन लड़कियां हैं, उसकी सबसे बड़ी लड़की के लिए बात करूंगा। इकबाल को गांव में सभी मानते हैं तो ईजा यानी दीपा की माँ, हाँ जी यह वही इंदर की दीपा है, उसकी बात को यह जानते हुए भी मान जाती है कि दीपा की दुगनी उमर का है रूप सिंह। चूंकि घर में खाने के लाले पड़े हैं, तो इसका विवाह कैसे करती, यही सब सोचकर एक मजबूर-बेबस माँ ने हां की।
आखिर इस गरीबी ने फूल सी लड़की को अधेड़ से शादी करा ही दी।
रूप सिंह शादी करके दीपा को घर ले आता है। रूप सिंह की माँ तो खुश है लेकिन स्त्री स्वभाव ऐसे समय कैसे खुश रह सकती थी। कहानी पढ़ते हुए बात मन में आयी क्या ये समाज यही इजाज़त कलावती को भी दे देता, यदि रूप सिंह नपुंसक होता। कभी नहीं।
कलावती न चाहते भी अपना बिस्तर पराई स्त्री को दे देती है। देखते देखते आखिर वो दिन आ ही गया, दीपा पेट से रह गयी। और कुछ समय बाद दीपा सिंह एक बेटी का पिता बन ही गया। उस दिन उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रह गया। पूरे अस्पताल में उसने मिठाई बटवायी। यह बता दे, यह मिठाई लड़की के होने की नहीं, बल्कि उसके सिर्फ बाप बनने की है। यह बात कहानी के अंत में जाकर समझ आती है। हालांकि कलावती उस बच्ची को बड़े प्यार-दुलार से रखती है।
इसके बाद एक दिन कलावती रूप सिंह को उसकी शर्त याद दिलाती है और दीपा को घर से निकालने के लिए कहती है। जबकि इस बात का विरोध रूप सिंह और उसकी माँ दोनों करते हैं। लेकिन कलावती अपनी बात पर अड़ी रहती है। कलावती कहती है संतान तो आपको मिल गयी, अब क्या। इस पर रूप सिंह कहता है मुझे संतान नहीं अपना खून चाहिए। कलावती कहती है बात संतान की हुई थी, वारिस की नहीं। अन्ततः बात इतनी बढ़ जाती है कि पंचायत होती है। पंचायत भी दीपा के हक़ में फैसला आता है और रूप सिंह अपने घर पर दूसरे तल पर मकान बना देता है। कलावती नीचे और दीपा ऊपर रहती है। और दीपा की बेटी का ख्याल कलावती अपने पास रखकर ही करती है, आखिर वो भी उससे उतना ही प्यार जो करती है। समय बीतने के साथ दीपा एक बार फिर गर्भवती हो जाती है, लेकिन इस बार भी उसे बेटी ही होती है। इस बार वह बर्दाश्त नहीं कर पाता और टूट सा जाता है। मतलब जो आदमी कुछ समय पहले सिर्फ बाप कहलवाने के लिए तरस रहा था वही अपने खून यानी बेटे होने के लिए दुखी है। वाह! रे रूप सिंह।
कहानी का एक पक्ष यह भी है कि रूप सिंह अपनी दोनों बेटियों को प्यार भरपूर करता है, लेकिन अपने खून की कसक उसके दिल में बनी रहती है। दोनों बच्चियां अच्छे माहौल में पल-बढ़ रही है। तीसरी बार फिर दीपा के माँ बनने की खबर रूप सिंह को मिलती है। इस बार उसे पूरा विश्वास है कि लड़का ही होगा। लेकिन वक़्त को कुछ और ही मंजूर था। जैसी कि उसकी आदत थी, एक शाम रूप सिंह अपने साथी के साथ घर पर ही शराब पी रहा था। समय से ऑमलेट न मिलने से  नाराज होकर दीपा के सर पर तीन चार घुसे मार देता है। जिससे दीपा की हालत खराब हो जाती है और उसे हॉस्पिटल ले जाना पड़ता है, जहाँ उसका प्रसव भी हो जाता है, इस बार उसे बेटा होता है लेकिन उसकी सर की चोट का असर बच्चे पर पड़ता है और उस बच्चे को आई सी यू में रखना पड़ता है। जहाँ उसकी हालत और खराब हो जाती है और उसका बच्चा मर जाता है। यह सदमा सुनकर अपना सर दीवार पर मारने लगता है और यह खबर सुनकर सबकी आंखें भीग जाती हैं। कुछ सामान्य होने के बाद दीपा रूप सिंह को कुछ ऐसा बोल देती है कि रूप सिंह की नज़रों पुराने दिन फिर आ जाते हैं और कलावती की बातें उसके दिमाग में घूमने लगती हैं। दीपा कहती है, 'मैं जानती हूँ आपको अपने बेटे का दुख है... मैं आगे मां नहीं बन सकती। क्यों ना हम दोनों कोई लड़का गोद ले लें ताकि आपको अपनी संपत्ति का वारिस मिल जाये।'
यह सुनकर रूप सिंह को दीपा के चेहरे में कलावती दिखने लगी। वहीं पुराने मोड़ पर जिंदगी ने उसे फिर खड़ा कर दिया था। उसके अपने खून का सपना, सपना ही रह गया था।

संग्रह की दूसरी कहानी के नाम पर संग्रह का नाम भी रखा गया, 'काफिल का कुत्ता'। यह शीर्षक पढ़कर पहले थोड़ा अजीब सा लगा, फिर कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ती रही तो शीर्षक का रहस्य समझ आ गया।
निश्चय ही यह कहानी आपको अपने बचपन में ले जाती हुई आपके संघर्ष के दिनों में फिर से ले जाएगी। देश में बढ़ती बेरोजगारी पर यह कहानी चोट करती है। सरकार को आईना दिखाती है यह कहानी। देश का हर बेरोजगार युवा इस कहानी में खुद के दर्शन कर सकता है। यही इस कहानी की खास बात है। वर्तमान में हिन्दी साहित्य जगत में जिस तरह कुकुरमुत्ते के तरह लेखक-कवि निकल रहे हैं, उन सबसे अलग यह कहानीकार है क्योंकि इनकी कहानियों में आमजन की पीड़ा और संवेदना की झलक मिलती हैं। फेसबुक पर ख्याली घसीट मारने से कोई लेखक/कवि नहीं बन जाता।
खैर इस कहानी को पढ़कर जान पड़ता है कि इसका नायक स्वयं लेखक ही है। जो अपने बचपन की शरारतों से गुजरते हुए जवानी में रोटी की जद्दोजहद तक पहुंचता है। एक कुत्ते की कहानी को अपने साथ जोड़कर दिखाया जाना कहानी में भावुकता ला देता है। फिर उसके बाद जैसा कि अक्सर हर युवा के साथ घटता ही है कि नौकरी समय से न लगने के चलते नायक की प्रेमकथा बीच में ही दम तोड़ देती है। अब इस कहानी की प्रासंगिकता इससे बढ़ती है कि नौकरी की तलाश में देश का युवा बाहर के देशों की ओर टकटकी लगाएं, मुंगेरीलाल के हसीन सपने सजाने लगता है। कुछ ऐसा ही इस कहानी में भी है। जब कुछ हाथ न लगा तो उसने ड्राइवरी सीख ली। वैसे आज देश में कोई भी काम ले लीजिए पढा लिखा युवा मिल ही जाता है। ड्राइवरी सीखने के बाद अपने मित्र की सलाह पर वह अरब देश में जाने के लिए प्रयास करता है। एजेंट को 70000/- रुपये देकर वीजा लगवाता है और हसीन सपने लेकर सऊदी अरब पहुंच जाता है। अब थोड़ा आप आस पास नजरें घुमाइए तो सही, हमारे नजदीक भी ऐसे कई युवा है जो अरब देशों में नौकरी करके खुद को खपा रहे हैं। ज़रूरी नहीं कि हर वहाँ से रुपयों के बक्से ही भरकर लाता हो। पर सपना तो सबका यही होता है। ड्राइवरी करने के लिए वीजा लगवाया था नायक ने, पर यहाँ आकर पता चलता है कि उसे भेड़-बकरी और ऊँट चराने के लिए यहाँ भेजा गया है। और जंगल में एक तंबू में रखकर उसे यह काम करना था।  यानी दलाल ने उसके साथ धोखा किया। कहानी के अंत में पहुंचते ही, मन ठहर सा जाता है। और उन युवाओं का ख्याल सताने लगता है जो किसी न किसी रूप में ऐसे ही धोखे का शिकार हुए हैं और अब उनकी जिंदगी ऐसे ही मौत से भी बत्तर हो चली होगी। यहाँ आकर उसे उसी कुत्ते की याद आती है, जिसका जिक्र कहानी के मध्य आता है।
तीसरी कहानी की पृष्ठभूमि से दूसरी कहानी की कथावस्तु लिखी गयी। इस कहानी में जो ट्विस्ट आपको मिलेगा वह यह कि एक सरकारी कर्मचारी (तारकेश्वर) अपने लड़के (मृत्युंजय) को गांव में किसानी करने के लिए कहता है और गांव का एक किसान (पलटन) अपने लड़के (धनंजय) को बाहर विदेश में नौकरी करने के लिए भेजता है। अब दोनों लड़के परेशान हैं। क्योंकि स्वभाववश तो मृत्युंजय बाहर जाना चाहता था और धनंजय गांव में रहकर जीवन गुजर करना चाहता था। मृत्युंजय तो गांव में आकर शुरू में परेशान रहता है, पर धीरे धीरे वह ग्रामीण परिवेश का आदि हो जाता है। जबकि धनंजय की स्थिति बहुत दयनीय हो जाती है। जितने रूबल पर उसे नौकरी का वादा किया जाता है उसे उससे कहीं कम रूबल मिलते हैं। ऐसे में वो सोचता है मेरे बाप ने जो समझकर मुझे यहाँ भेजा है, वो तो शायद इस जन्म में तो कभी पूरा नहीं हो सकता। जो और लड़के उसे यहाँ आकर मिलते हैं उनकी हालत भी कुछ ठीक नहीं है, बस वो इस माहौल के अभ्यस्त हो चुके हैं। उन्ही लड़कों के बीच उसे 'बद्दू' नाम मिलता है।
अब कहानी में नया मोड़ कहानी के अंत मे आपको मिलेगा, जिसपर यहाँ लिखकर आपका मजा खराब नहीं करूंगा। लेकिन इतना ज़रूर कहूंगा, अपने बच्चों को विदेशी चकाचौंध से बचाकर रखें, नहीं तो आपके जीवन की चकाचौंध में कमी आ सकती है। उक्त दोनों कहानियों का सार भी आखिर यही है।
संग्रह की चौथी कहानी 'आवारा अदाकार' पिछली तीनों कहानियों से हल्की लगी। मानो लेखक की कलम अपनी दिशा भटक गयी हो। कहानी की शुरुआत संतोषजनक थी, लेकिन मध्य और अंत तक कहानी अपने उद्देश्य से भटकती हुई अंत तक पहुंच ही जाती है। कहानी का मुख्य पात्र गुरुवंश है, जो फिल्मी दुनिया में अपना कैरियर बनाना चाहता है, परन्तु उतना सफल नहीं हो पाता जितना होना चाहिए था, क्योंकि कहानी में उसके संघर्ष पर मेहनत नहीं की गयी, इसलिए उसका किरदार कहानी और असल में सामान्य बनकर ही रह गया। गुरुवंश की प्रेमिका बबनी भी अपने परिवार के दबाव या इज्जत के लिए गुरुवंश से शादी करने में असमर्थता प्रकट कर देती है। गुरुवंश का बाप हर बाप की तरह यही चाहता है कि उसका बेटा भी सम्मान से जीवन यापन कर सके। वह उसे आगे पढ़ने की सलाह देते हैं, पर गुरुवंश फ़िल्म कलाकार बनना चाहता है। मगर फ़िल्म इंडस्ट्री में कामयाब होना, लोहे के चने चबाने के समान है। गुरुवंश का कलाकार बनने का संघर्ष जारी रहता है, परन्तु उसे कामयाबी नहीं मिलती, छोटे रोल तो मिल जाते हैं, पर वो भी हमेशा नहीं। कहानी के अंतिम भाग में बॉलीवुड की उस सच्चाई को सामने लाने की कोशिश की गयी है, जिसका सामना सामान्यतः हर उस शख्स को करना पड़ता है, जो फ़िल्म नगरी में अपना भविष्य बनाना चाहता है। कुल मिलाकर यह कहानी जिस उद्देश्य को लेकर रची गयी, वह काफी हद तक पूरा तो हुआ वैसे।
अब बात करते हैं अंतिम कहानी 'रास्ता किधर है?' इस कहानी संग्रह की सबसे कमजोर कहानी यही लगी। हालांकि कहानी में मध्यम परिवारों की दशा का कटु चित्रण किया गया। शैलीगत आधार पर कहानी कमजोर अवश्य है, परन्तु तथ्यात्मक स्तर पर जीवन की परतों को काफी उघाड़ती ज़रूर है। कहानी की पात्रा बबली, ऐसे परिवार में रहती है जहां उसकी माँ अपने पति यानी बबली के बाप को छोड़कर आ जाती है, क्योंकि उसका किसी और औरत के साथ नाजायज सम्बंध थे। दो भाई बहन और माँ, यही छोटा सा परिवार था। माँ एक स्कूल में नौकरी करती थी और घर को किसी तरह चला रही थी। हालांकि वह अपने पूर्व पति अभिषेक से अभी वही सम्पर्क में रहती थी। अब कहानी में एक भाग आता है जो अक्सर देखने को मिल जाता है। बबली एक लड़के के साथ प्रेम करती है और उसके साथ जीवन बिताना चाहती है, जबकि वह दूसरी जात का है और कमाता भी कम है। सबके विरोध किये जाने के बाद भी वह उस लड़के से शादी कर लेती है। अब शादी तो कर ली, पर क्या वह वहाँ खुश रहती है। इसका जवाब कहानी पढ़कर मिल तो जाएगा, लेकिन हमारे सामने एक यक्ष प्रश्न खड़ा कर देगा, वह यह कि हमे बखूबी यह मालूम है कि बेटियों को कामयाब करने के बाद ही उनकी शादी करनी चाहिए, लेकिन हम फिर भी ऐसा नहीं करते या कर पाते, क्यों? दूसरा एक प्रश्न यह कहानी उन लड़कियों के लिए छोड़ती है, जो अपने दिखावटी प्रेम की खातिर अपने घर परिवार को तो छोड़ ही देती है साथ ही अपने उज्ज्वल भविष्य को बनने से पहले ही बर्बाद कर देती हैं। क्या आज की युवतियां इसे ही प्रेम मानती हैं या मानेगी? इसका जवाब पाठक दें।
अंत में केवल इतना ही कहूंगा कि यह संग्रह अपने उद्देश्य में सफल रहा है, ऐसा मेरा विश्वास है। समीक्षक के तौर पर नहीं, एक पाठक के नजरिये से यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि आज के युवाओं- युवतियों को इस प्रकार की रचनाओं से रूबरू होना चाहिए।
चलते चलते यह भी कहना अपना कर्तव्य समझता हूँ कि प्रिय मित्र विक्रम जी अपनी आगामी रचनाओं को प्रकाशन से पूर्व उनकी पांडुलिपियों की प्रूफ रीडिंग अवश्य कराएं, क्योंकि वर्तनी सम्बन्धी गलतियां अक्सर पाठक को खलती है और अनवरत पढ़ने में व्यवधान पैदा करती है। विक्रम जी को मेरी ओर से उनके लेखन और जीवन के लिए अन्नत शुभकामनाएं
धन्यवाद

23.04.2020
डॉ० राम भरोसे
असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी)
राजकीय महाविद्यालय पोखरी (क्वीली) टिहरी गढ़वाल उत्तराखंड

Thursday, April 16, 2020

वर्तमान साहित्यिक परिवेष के सन्दर्भ में अनुवाद की भूमिकाः एक अध्ययन



भारत एक बहुभाषी विभिन्न संस्कृतियों का देश है। सभी भाषाओं में आपस में आदान-प्रदान प्राचीनकाल से ही हो रहा है। इन भाषाओं-संस्कृतियों के मध्य ‘अनुवाद‘ संवाद-सेतु के रूप में अपनी अपरिहार्य भूमिका निभा रहा है। भूमण्डलीकरण के इस युग में आज पूरा विश्व एक नजर आता है। इस हेतु अनुवाद की महती भूमिका है। आज विश्व के देश एक-दूसरे से सम्पर्क कर अपना ज्ञान-विज्ञान, तकनीक-प्रोद्यौगिकी, साहित्य-विचार सांझा कर रहे हैं। जिसमें अनुवाद की भूमिका असंदिग्ध है। ज्ञान-विज्ञान का कोई क्षेत्र शेष नहीं है, जो किसी न किसी रूप में अनुवाद से संबंधित न हो। बल्कि यह कहना ज्यादा उचित होगा कि अनुवाद ही एक ऐसा माध्यम है, जो आज सम्पूर्ण विश्व को एकसाथ जोड़ने का कार्य कर रहा है। साहित्य हो या गैरसाहित्यिक अनुवाद का मुख्य कार्य ही है कि विश्व में बिखरे सम्पूर्ण ज्ञान को एकत्रित कर उससे सभी लाभान्वित हो सके। साहित्यिक, वैज्ञानिक या तकनीकी संसार की कोई भी भाषा अनुवाद से अछूती नहीं है। विश्व साहित्य की अनुवाद प्रक्रिया प्राचीन काल से ही अनवरत् चली आ रहा है।
वैश्विक परिदृश्य पर अनुवाद का मूलरूप तो वही है, परन्तु आधुनिक रूप में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन अवश्य हुए हैं। डाॅ. कृष्ण कुमार गोस्वामी के शब्दों में ‘‘वास्तव में शताब्दियों के सांस्कृतिक समन्वय की प्रक्रिया के चलते देष में सांस्कृतिक एकीकरण में दृढ़ता आई। देष के विभिन्न भाषाओं, आचार-विचारों और मत-मतांतरों के होने के बावजूद हमारी अखंडता और एकता पर कोई आंच नहीं आई। विविध भाषा-परिवारों की भाषाओं को बोलने वालों में परस्पर सद्भाव बनाए रखने में अनुवाद का बहुत बड़ा योगदान रहा है। आज भी अनुवाद एक सामाजिक आवष्यकता है।‘‘1
मानव सभ्यता के विकास के साथ ही मनुष्य ने भौगोलिक सीमाओं का पार करना शुरू किया, जिससे अन्य समुदायों से युद्ध, मित्रता, व्यापार, धर्म-प्रचार आदि के संबंध में एक-दूसरे से मिलने के फलस्वरूप संप्रेषण का व्यापार बढ़ता गया, जिसका आधार अनुवाद है। प्राचीन समय में संस्कृत और यूनानी ही क्रमषः पूर्व व पष्चिमी की प्राचीनतम क्लासिक भाषाएँ थीं, जिनके पास प्रचुर मात्रा में ज्ञान का भंडार था। अन्य समकालीन भाषाएँ उनके समक्ष बोलियों के रूप में विद्यमान थीं। चूंकि उनके पास इन क्लासिक भाषाओं को देने के लिए कुछ विषेष नहीं था, अतः अन्य भाषाओं से इन भाषाओं मंे अनुवाद का कोई क्रम स्पष्टतः नहीं दिखायी देता। उपरोक्त दो क्लासिक भाषाओं के आधार पर विश्व अनुवाद परंपरा को दो भागों पूर्व अर्थात् भारत में अनुवाद तथा पष्चिम में अनुवाद में विभाजित किया जा सकता है। तथापि विश्व के प्राचीनतम अनुवाद की बात करे तो, इसका वर्णन प्रो. कृष्णकुमार गोस्वामी जी अपनी पुस्तक में करते हैं, ‘‘विष्व का प्राचीनतम अनुवाद रोज़ेटा प्रस्तर पर मिला है, जो लगभग 200 ई.पू. का है और उसमें मिó की दो प्राचीन लिपियों ‘हीरोग्लाइफिक‘ तथा ‘देमांतिक‘ में इतिहास तथा संस्कृति का वृत्तांत है और उसका अनुवाद प्राचीन मिóी भाषा में भी है।‘‘2
अनुवाद परम्परा के सन्दर्भ में प्राचीन भारतीय साहित्य में अनुदित साहित्य प्रायः उपलब्ध नहीं है। जिसका प्रमुख कारण तत्कालीन साहित्य और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में भारत विष्व का सर्वाधिक विकसित देष था। प्राचीन भारतीय साहित्य में लौकिक संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभं्रष आदि भाषाओं के साहित्य को किसी अन्य भाषा में प्रस्तुत/अनुवाद करने का कोई प्रचलन ही नहीं था। सम्भवतः इसकी जरुरत भी नहीं पड़ी होगी। लेकिन काव्यषास्त्र और नाट्यषास्त्र गं्रथों में गाहा सत्सई, वड्डकहा, कर्पूर मंजरी आदि प्राकृत गं्रथों में संकलित अनेक स्थानों का संस्कृत अनुवाद अवष्य किया गया। इसके साथ तत्कालीन नाटकों में पुरुष पात्रों का संवाद संस्कृत में होता होगा। चूंकि स्त्रियां तथा अन्य निम्न वर्ग के पात्रों की बोली प्राकृत थी, तो ऐसे पात्रों के प्राकृत संवादों का संस्कृत पाठ भी साथ-साथ दिया जाता था, जिसे ‘छाया‘ कहा गया। यह एक प्रकार का अंतरभाषिक अनुवाद ही था।
प्रामाणिक रूप से प्राकृत भाषा के अनेक गं्रथों के संस्कृत में छायावाद हुए हैं, जिनमें प्रमुख गुणाढ्य की पैशाची प्राकृत में रचित ‘बडडकहा (बृहत्कथा) के तीन रूपांतर मौजूद हैं- पहला बुध स्वामी कृत ‘बृहत्कथा-श्लोक-संग्रह‘, दूसरा क्षेमेंद्र कृत ‘बृहत्कथा मंूजरी‘ व तीसरा सोमदेव का ‘कथा सरित्सार‘। इनके बाद भारतीय पाली साहित्य में अनुदित गं्रथ नगण्य है। इसी प्रकार प्राकृत अपभ्रंशों में भी अनुदित गं्रथ न के बराबर ही है। अनुवाद की क्रमबद्ध परंपरा भारतीय साहित्य में वैसे तो नगण्य ही है, परन्तु भारतीय साहित्य का विश्व की अन्य भाषाओं में अनुवाद और रूपांतरण होते रहे हैं। सबसे पहले संस्कृत के प्राचीनतम अनुवाद चीनी भाषा में हुए हैं। बौद्ध-धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु एशिया के विभिन्न देशों के साथ ही चीन, जापान, लंका, बर्मा, बाली, बोर्नियों आदि देशों में बौद्ध साहित्य का उन देशों की भाषाओं में अनुवाद हुआ। इसके साथ रामायण और महाभारत की बहुत सी कथाएं एशियाई देशों में पहुंची। अनुवाद की दृष्टि से पंचतंत्र का प्रथम स्थान है। मूलभाषा संस्कृत से इसके अनुवाद अरबी, ग्रीक, इटालियन, स्लाव, हिब्रू, डैनिस, आइसलैंडिक, डच, फ्रांसीसी, अंगे्रजी, फारसी, लेटिन, जर्मन, स्पेनिष आदि अनेक भाषाओं में हुए हैं।3 पंचतंत्र को अरबी में ‘कलील-दमना‘ नाम से जाना जाता है।
अनुवाद के विकास मेें मुगल काल का अपना महत्व है। सम्राट् अकबर ने प्राचीन ग्रंथों के फारसी-अरबी में अनुवाद कराने के लिए एक स्वतंत्र विभाग की स्थापना करायी, जिसमें रामायण, महाभारत व गीता जैसे महान हिन्दू धर्मग्रंथों के फारसी में अनुवाद कराये गये। इसी कड़ी में सन् 1656-1657 में मुगल सम्राट् शाहजहाँ के बड़े पुत्र शहज़ादा दारा शिकोह ने एक महायज्ञ के रूप में 52 उपनिषदों का अनुवाद फारसी में किया। महाभारत के महत्वपूर्ण भाग श्रीमद्भगवद् गीता का अनुवाद विश्व की लगभग सभी प्रमुख भाषओं मंे हो चुका है। इसी प्रकार संस्कृत-तमिल, तमिल-संस्कृत, अंगे्रजी-तमिल-अंग्रेजी, संस्कृत-अंग्रेजी, तेलुगु-संस्कृत, बंगला-संस्कृत, गुजराती-संस्कृत, मराठी व सिंधी अनुवाद भी विश्व साहित्य के परिप्रेक्ष्य में उल्लेखनीय है, जो स्वयं में विशेष अध्ययन की संभावना रखते है।
वैदिक साहित्य के अनुवाद के पश्चात्, आधुनिक काल में हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं से अनुवाद का क्रम ईस्ट इंछिया कम्पनी के शासनकाल तथा अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार-प्रसार से प्रारम्भ होती है। गोस्वामी के अनुसार हिन्दी में अनुवाद की व्यवस्थित परंपरा सोलहवीं शताब्दी से मिलती हैं। अट्ठारहवीं शताब्दी तक प्राचीन साहित्य का अनुवाद होता रहा।.................वषिष्ट कृत संस्कृत वेदांत ग्रंथ ‘योग वषिष्ट‘ का अनुवाद रामप्रसाद निरंजनी की भाषायोग वषिष्ट (1741) को खड़ीबोली हिन्दी गद्य की प्राचीनतम पुस्तक माना जाता है।‘‘4 खड़ीबोली काव्य की प्रथम कृति श्रीधर पाठक की ‘एकांतवासी योगी‘ (1886) आॅलिवर गोल्डस्मिथ की ‘द हरमिट‘ का काव्यानुवाद ही है।
अनुवाद के माध्यम से ईरान में कई शताब्दियों तक गुमनामी के अंधकार में खोये रहे एक फारसी कवि उमर खैय्यमी अचानक 19वीं शताब्दी में विश्व में प्रसिद्ध हो गया। उनकी रूबाइयों का अंग्रेजी में सबसे पहले अनुवाद 1859 में फिट्ज़्ाजेराल्ड ने किया। भारतीय नवजागरण के उदय के साथ ही खड़ी बोली हिन्दी का उद्भव और विकास हुआ। इस सन्दर्भ में अनुवाद की महत्ता और भी बढ़ जाती है। ‘‘यदि नवजागरण दो जातीय संस्कृतियों की टकराहट से उत्पन्न रचनात्मक ऊर्जा है, तो अनुवाद ही वह माध्यम है जो संस्कृतियों में संपर्क और टकराहट लाने में अपनी भूमिका निभाता है।‘‘5 इसमें कोई दो राय नहीं है कि नवजागरण की चेतना के पाश्र्व में अनुवाद की अति महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। खड़ी बोली के विकास में अपनो अद्वितीय योगदान देने वाले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अनुवाद के माध्यम से खड़ी बोली को परिष्कृत करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। भारतेन्दु ने श्री हर्ष कृत ‘रत्नावती‘, कृष्ण मिश्र के ‘प्रबोध चन्द्रोदय‘ नाटक का ‘पाखण्ड विडम्बन‘ (1873), कंचन पंछित के ‘धनंजय विजय‘ (1873), महाकवि विशाखदत्त के ‘मुद्राराक्षस‘ (1875), जैसे संस्कृत गं्रथों के साथ ही शेक्सपीयर के ‘मर्चेंट आॅफ वेनिस‘ का भी ‘दुर्लभ बन्धु‘ नाम से खड़ी बोली में अनुवाद किया। हिन्दी भाषा-साहित्य न केवल संस्कृत से समृद्ध हुआ, अपितु अंगे्रजी साहित्य के अनुवाद से भी हुआ। अंग्रेजी साहित्य के संपर्क में आने पर भारतीय साहित्यकारों ने अंग्रेजी नाटकों के अनुवाद भी आरंभ करत दिये गये। वास्तव में हिन्दी साहित्य को उपन्यास की जिस नयी विधा का परिचय हुआ, वह डेनियल डेफो के अंग्रेजी उपन्यास ‘द लाइफ एंड स्टेंªज एंड सरप्राइजिंग एडवेंचर्स आॅफ रोबिन्सन क्रूसो‘ (1719) के हिन्दी अनुवाद 1860 से हुआ। इस उपन्यास का अनुवाद काशी के पंडित बद्रीलाल ने बंगला से किया था। इसके बाद यह सिलसिला आज तक भी चल रहा है। कई महत्वपूर्ण कृतियां अनुवाद के माध्यम से ही विश्व पटल पर अपना स्थान बना पायी हैं। भारतीय भाषाओं में जो परस्पर अनुवाद हुए हैं, उनमें सर्वाधिक अनुवाद हिन्दी और अंगला के मध्य ही हुए हैं। क्योंकि हमारे देश में मुद्रण एवं पत्रकारिता के आरंभिक काल से ही बंगला व हिन्दी के बीच अनुवाद प्रक्रिया प्रारम्भ हो चुकी थी। परन्तु बंगला व हिन्दी अनुवाद के विषय में यह पहलू भी महत्वपूर्ण है कि जहां बंगला से हिन्दी में अनुवाद करने की प्रवृति अधिक रही है, वहीं हिन्दी से बंगला में अनुवाद की स्थिति संतोषजनक नहीं रही है। अपवाद के रूप में कुछ उल्लेखनीय अनुवाद अवश्य हुए हैं। तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस‘ का अनुवाद विजयकाली भट्टाचार्य ने और प्रेमचंद कृत ‘गोदान‘ और ‘निर्मला‘ का अनुवाद चित्रा देव ने किया।
द्विवेदी युग और उसके बाद अर्थात् देश के स्वाधीनता आन्दोलन ने सारी भारतीय भाषाओं और हिन्दी को आपस में जोड़ दिया, उसके फलस्वरूप अन्य भाषाओं से हिन्दी में तथा हिन्दी से अन्य भाषाओं में अनुवाद का कार्य शीघ्रता से होने लगा।
तेलुगु, मलयालम, कन्नड, तमिल, पंजाबी, कश्मीरी आदि भारतीय भाषाओं और साहित्य में परस्पर अनुवाद व विदेशी भाषाओं से हिन्दी अनुवाद की एक सशक्त और सुदीर्घ परम्परा विद्यमान है। किसी ने स्वेच्छा से और स्वांतः सुखाय से, तो किसी ने व्यावसायिक दृष्टि से अनुवाद किया। भारतीय अनूदित साहित्य को सीमित कर पाना असंभव है। भारत में अनुवाद प्रक्रिया उतनी ही पुरानी है, जितनी मूल लेखन की। अतः अनुवाद का इतिहास-लेखन बड़ा कठिन तथा चुनौती भरा काम है। वास्तव में अनुवाद की इतिहास की संस्कृत के वैदिक-औपनिवेशिक युग में प्रारंभ हो जाता है। ये अनुवाद भारतीयों तथा विदेशियों द्वारा पूरे मन से किय गये हैं। उल्लेखनीय है कि प्रत्येक रचना के अनेक अनुवाद कई अनुवादकों द्वारा किये गये हैं। परन्तु दुःखद है कि भारतीय स्वतंत्रता से पहले हिन्दी भाषी में साहित्यकारों ने संस्कृत, अंग्रेजी, बंगला, मराठी आदि भारतीय भाषाओं के साहित्यों का अनुवाद किया गया, लेकिन स्वतंत्रता के बाद हिन्दी भाषी साहित्यकारों  और अनुवादकों ने भारतीय भाषाओं से नाममात्र के अनुवाद किया, जबकि हिन्दीतर साहित्यकारों-अनुवादकों ने अपनी भाषाओं के साहित्य का अनुवाद स्वयं किया है। वास्तव में लक्ष्य भाषा अनुवादक की मातृभाषा/प्रथम भाषा हो तो उसे अनुवाद करने में अधिक सुविधा होती है और अनुवाद में सहजता और स्वाभाविकता आने की अधिक संभावना रहती है। इस ओर ध्यान देने की अत्यंत आवश्यकता है। इसकी चर्चा आगे करेंगे।
अनुवाद के संक्षिप्त इतिहास को जान लेने के बाद जरूरत है कि क्यों न इसके वर्तमान पक्ष पर नजर डाली जाए। साथ ही अनुवाद के वर्तमान भारतीय भाषाओं के सन्दर्भ में विभिन्न भारतीय साहित्यकारों के विचारों पर प्रकाश डालें।
निश्चित ही यह युग अनुवाद का युग है। इस युग में अनुवाद तथा अनुवादकों की महत्ता व प्रासंगिकता बढ़ रही है। डाॅ. सुरेश सिंघल का मानना है कि ‘‘आज अनुवाद मौलिक विधा एवं अनुषासन के समतुल्य ही नहीं उससे भी आगे निकल रहा है। अनुवादकों तथा अनुवाद से जुड़े साधकों की साधना अब रंग ला रही है। प्रकाषन् संस्थाएं, अकादमियां, विष्वविद्यालय, शोध-संस्थान, भाषा एवं साहित्य सेवी जगत् सभी जगह अनुवाद एक अनिवार्यता बनकर प्रवेष कर चुका है।‘‘6 इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज अनुवाद उपेक्षित, दोयम दर्जे का कार्य का न रहकर मौलिक सृजन के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका है। अनुवादकों ने राष्ट्र के समक्ष यह सिद्ध कर दिया है कि राष्ट्र का बहुमुखी विकास अनुवाद के बिना असम्भव था और है।
उल्लेखनीय है कि एक समय था जब अनुवाद को एक निकृष्ट कार्य समझा जाता था। अनुवाद को स्वीकृति अथवा मान्यता प्राप्त करने के लिए बड़ा लंबा संघर्ष करना पड़ा। आरम्भ में लगभग सभी अनुवादकों की तीव्र आलोचना की जाती थी और यह माना जाता था कि अनुवाद असंभव था। अनुवाद मात्र का उपहास उड़ाते हुए उस समय यह कहा गया कि अनुवाद से अभिप्राय है ‘‘किसी मरे हुए पक्षी की खाल में भूसा भर कर उसे सजावट के लिए टाँग देना या नई बोतल में पुरानी शराब डाल देना अथवा किसी सरस फल को उबालकर उसका सत्व निकाल लेना।‘‘7 अनुवाद को प्रत्येक साहित्य, प्रतिबंधित सामग्री मानता था और अवैध वस्तु के रूप में देखता था। अनूदित सामग्री तस्कर की हुई वस्तु समझी जाती थी। अतः उस समय अनुवाद को निस्सार और निरर्थक माना जाता था। एक इतालवी कहावत के अनुसार ‘अनुवादक वंचक होते हैं।‘ एफ गंुथर ने अनुवाद को अर्थ विज्ञान के साथ जोड़ा है। अनुवाद हेतु एक इतालवी कहावत और है कि ‘निष्ठायुक्त कुरूपता अच्छी है, निष्ठायुक्त संुदरता नहीं। यानि यदि अनुवाद संुदर होगा तो मूलनिष्ठ नहीं होगा और मूलनिष्ठ होगा तो सुंदर नहीं होगा। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि मूल पाठ में अंतर्निहित सौन्दर्य को हम दूसरी भाषा में उतना ही सौन्दर्ययुक्त बनाकर प्रस्तुत नहीं कर सकते। सौंदर्यविहीन अनुवाद साधारणतः टीकाएं मात्र बनकर रह जाते हैं। अनुवादक अपनी रचना से मूल की समानर्थी अभिव्यक्त्यिों की पुनर्रचना तो कर सकता है, परन्तु यथातथ्य प्रतिरूप नहीं। इसी आधार पर ‘मे‘ जैसे विद्वानों ने तो यहां तक मान लिया कि‘‘अनुवाद जैसी कोई वस्तु होती ही नहीं।‘‘ इसी प्रकार अन्य पाश्चात्य साहित्यकारों-आलाचकों के साथ भारतीय साहित्यकारों के अनुवाद संबंधित विचार उसे हीन बनाते नजर आते हैं- उदाहरणार्थ-
सिडनी, ‘‘विचार अनूदित हो सकते हैं लेकिन शब्द और उनकी अर्थ-छायाएँ अनूदित नहीं हो सकती‘‘
जाॅएटे, ‘‘अनुवाद में कुछ कमी अवष्य रह जाती है। प्रायः हर भाषा के शब्दों की अपनी ध्वनियां होती हैं, जिन्हें दूसरी भाषा में ला पाना संभव नहीं होता।‘‘
राबर्ट गेब्ज, ‘‘अनुवाद असत्य या विनम्र असत्य है। वह सत्य हो नहीं सकता ऐसी स्थिति में अनुवादक वंचक हो जाएगा।‘‘
रवीन्द्रनाथ टैगोर, ‘‘अनुवाद पूर्ण संतोष देने वाला नहीं होता।‘‘
मामा वरेरकर, ‘‘लेखक होना आसान है, अनुवादक होना अत्यंत कठिन है।‘‘
खुशवंत सिंह, ‘‘हर एक कृति अनुवाद योग्य है, पर हर कृति का अनुवाद नहीं किया जा सकता।‘‘ (उक्त परिभाषाएं ‘अनुवाद सूक्त्यिां‘ नामक पुस्तक से ली गयी हैं, संपादक- कुसुम अग्रवाल व डाॅ. गार्गी गुप्त, वर्ष 1984)
उक्त इन सभी धारणाओं/विचारों के बावजूद भी अनुवाद होता रहा और उसका मूल्यांकन भी साथ-साथ किया जाता रहा। सुख और दुख की भांति मनुष्य ज्ञान को भी दूसरों के साथ बाँट लेना चाहता है। जो वह स्वयं जानता है उसे दूसरों तक पहुंँचाना चाहता है और जो दूसरे जानते हैं, उसे स्वयं जानना चाहता है। इस प्रक्रिया में भाषा की सीमाएं उसके आड़े आती हैं। इसलिए अनुवाद आज ज्ञान-विज्ञान के विकास और प्रसार का अनिवार्य साधन बन चुका है। सामान्यतः एक भाषा की किसी सामग्री के दूसरी भाषा में रूपांतर को ही अनुवाद कहते हैं। यहां ‘अनुवाद‘ शब्द या उसकी परिभाषाओं पर विस्तार से विचार करने के अपेक्षा उसकी वर्तमान प्रासंगिकता और भावी संभावना पर गहन दृष्टि डालना मुख्य उद्देश्य है। 
आज के ‘विश्व-कुटुम्बकम‘ युग पुनीत भावना को साक्षात् करने का महान समय है। प्राचीन अथाह अभाव वाले युग को भूलकर हम नवीन सूचना-प्रौद्योगिकी के युग में प्रवेश कर चुके हैं। तो निश्चय ही निःसंदेह सूचनाओं-आंकड़ों से भरे इस दुनिया में एक ऐसे माध्यम की महती आवश्यकता है, जो सूचनाओं को एकरूपता से विश्व में प्रचारित-प्रसारित किया जाए। यह महान कार्य भाषाओं के परस्पर ‘अनुवाद‘ के अलावा कोई अन्य माध्यम नहीं कर सकता।आज हम सच में बहुत आगे निकल चुके हैं। विदेशी-बहुद्देशीय व्यापार तंत्र हमारे देश में प्रविष्ट हो चुका है। हमारा व्यापार भी विश्व के अनेक देशों में अपने पैर पसार चुका है। वित्तीय निवेश के साथ हमारे वैचारिक प्रवेश भी विश्व के हर कोने में हो चुका है।निःसंदेह ही हमारी राजभाषा हिन्दी का प्रचार-प्रसार भी अब वैश्विक स्तर पर हो रहा है। इन सभी कार्यांे के लिए आज सर्वाधिक कारगर माध्यम ‘अनुवाद‘ ही है। भारत के प्रसिद्ध अनुवाद विद् तथा भाषा के स्थापित विशेषज्ञ डाॅ. पूरनचन्द टण्डन ने अनुवाद के महत्ता के विषय में यहां तक कह चुके हैं, ‘‘यदि विष्व की कोई एक भाषा तलाषी जाए तो वह ‘अनुवाद‘ ही है।........अनुवाद एक ‘तकनीक‘ भी है,‘कला‘ भी है, ‘विज्ञान‘ भी है और ‘षिल्प‘ भी है।‘‘8 अपने एक अन्य साक्षात्कार में उन्होंने कहा, ‘‘अनुवाद आज विष्व की भाषा बन गया है। पूरे विष्व को एक सेतु बनकर जोड़ रहा है। ऐसा सेतु जो बहु-दिषागामी है और निर्बाध आवागमन के रास्ते खोलता है। अनुवाद राजगारोन्मुख विधा तो है ही, सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर प्रतिष्ठित करने का शस्त्र भी है। आज भूमण्डलीकरण की अवधारणा को साकार करने वाला संलल्प कोई है तो वह है अनुवाद।‘‘9 प्रख्यात भाषाविद् डाॅ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार, ‘‘कुछ लोग अनुवाद को केवल षिल्प मानते हैं, तो कुछ लोग केवल कला। अनुवाद को विज्ञान प्रायः लोग बिल्कुल नहीं मानते। मेरे विचार में अनुवाद षिल्प भी है, कला भी और विज्ञान भी।‘‘10साहित्य की अनेक विधाओं की तरह ‘अनुवाद‘ भी एक विधा के रूप में पहचान बना चुका है। आज के प्रगतिशील युग में अनुवाद की महती आवश्यकता है। ‘‘अनुवाद के कारण आपसी सम्बन्धों में बढ़ोतरी हुई है। इसीलिए तो बीसवीं सदी को अनुवाद या पुनस्सृजन का युग कहा जाता है।‘‘11 बिल्कुल सही है क्योंकि आज अनुवाद की उपयोगिता मात्र भाषा और साहित्य तक ही सीमित नहीं है, वह हमारी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और राष्ट्रीय भावना और साहित्य की सर्जनात्मक चेतना की समरूपता के साथ-साथ, वर्तमान तकनीकी और वैज्ञानिक युग की पूति कर हमारे ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न आयामों को देश-विदेश मंें सयुंक्त करता है। इससे आगे की बात करें तो आधुनिक विज्ञान के विकास की नींव भी अनुवाद के माध्यम से डाली गयी है।
अनुवादों के कारण ही विश्वसाहित्य की अवधारणा अस्तित्व में आयी। साधारणतः व संक्षिप्त रूप से अनुवाद की उपयोगिता कई रूपों में हमारे समक्ष है। इस आधार पर डाॅ. पूरनचंद टंडन का व्यक्तव्य बिल्कुल सटीक व समीचीन है, ‘‘किसी भी समाज-देष का विकास अनुवाद के बिना सम्भव नहीं है।‘‘12 अनुवाद क्यों? या इसकी महत्ता के विषय को प्रसिद्ध अनुवाद शास्त्री डाॅ. रीतारानी पालीवाल अनुवाद-अनुवादक संबंधी प्रासंगिक बात लिखती हैं, ‘‘मानव के पास आयु, समय और साधन की एक सीमा रहती है। हर व्यक्ति संसार की प्रत्येक भाषा नहीं सीख सकता। ऐसी स्थिति में अनुवादक की वह माध्यम है, जिसके द्वारा हम सभी भाषाओं से सम्पर्क स्थापित कर सकते हैं।‘‘13 आज अनुवाद का क्षेत्र इतना विस्तारित हो चुका है कि कोई भी क्षेत्र अनुवाद से अछूता नहीं है। महान् अनुवाद शास्त्री जिन्होंने भारत में भारतीय अनुवाद परिषद का गठन किया और अनुवाद कार्य को पुनीत बनाने का अद्वितीय कार्य किया। अनुवाद की उपयोगिता के क्षेत्र में उनका मानना है, ‘‘अब अनुवाद लगभग एक स्वतंत्र शास्त्र बन गया है। उसके सिद्धान्त निर्धारित हो गये हैं। उसकी समस्याएं भी रेखांकित हो गई हैं। उसकी प्रक्रिया भी स्पष्ट है। इन सभी का अध्ययन शैक्षिक पाठ्यक्रम का एक रोचक अंग बन चुका है। इसलिए इसका निरन्तर विस्तार ही होगा। अनुवाद शास्त्र के इन प्रष्नों की गहरी छानबीन कर सकते हैं और इसके फलस्वरूप काफी सामग्री अध्येता सामने आ सकती है।‘‘14  ज्ञान-विज्ञान की जानकारी के लिए अनुवाद, व्यवहारोपयोगी रूप में अनुवाद, सांस्कृतिक विनिमय की दृष्टि से अनुवाद आवश्यक है, राजनीतिक आदान-प्रदान की जरूरत हेतु अनुवाद, विभिन्न भाषाओं का सम्पर्क स्थापित करने के लिए अनुवाद की आवश्यकता, विदेशी भाषा के अध्ययन हेतु अनुवाद, अर्जित-उपार्जित ज्ञान की निरंतरता स्थापित करने वाला माध्यम, मानव जाति के विकास में अनुवाद की महती भूमिका, भाषा की अभिव्यक्ति क्षमता का विस्तार, वर्तमान विभिन्न भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन में सहायक, अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान का अभिन्न अंग, आमजन के मेल-मिलाप का महत्वपूर्ण साधन, विश्व के महान् साहित्य/गं्रथों का परिचय, सरकारी कामकाज में अनुवाद या कार्यालयी द्विभाषिकता, वैज्ञानिक-प्रौद्योगिकी-विधि साहित्य में अनुवाद की उपयोगिता, विभिन्न देशों द्वारा किया जा रहा शोध कार्यों में अनुवाद, व्यापार-पर्यटन के क्षेत्र में आदान-प्रदान में अनुवाद का उपयोग, पत्रकारिता, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में अनुवाद की उपादेयता, वर्तमान समस्त विमर्शों के अध्ययन-अध्यापन में अनुवाद की उपयोगिता। डाॅ. रामचन्द्र वर्मा के अनुसार, ‘‘आज विष्व बन्धुत्व की भावना बल पकड़ रही है। एक राष्ट्र को दूसरे राष्ट्र के निकट लाने और एक-दूसरे को समझने-समझाने के निरन्तर प्रयास हो रहे हैं। यहां भाषा ही सबसे बड़ी बाधा है। अनुवाद कार्य ही इस बाधा को दूर करने को एकमात्र साधन है।‘‘15
विज्ञान के विकास के साथ ही सूचना का महत्व भी बढ़ रहा है। विज्ञान के क्षेत्र में खोजों/अविष्कारों की जानकारियां वैज्ञानिक तुरंत पाना चाहते हैं। जिस भाषा में वह उपलब्ध है, उसे एकदम अपनी भाषा में पाने हेतु उन्हें अनुवादकों की जरूरत रहती है। विज्ञान व प्रौद्योगिकी के विकास के साथ आज दुनिया भर के लोगों का आपसी संपर्क काफी बढ रहा है। ज्ञान के क्षेत्र के अतिरिक्त व्यापार, उद्योग, पर्यटन आदि के क्षेत्र में विश्व सिमट गया है। भूमंडलीकरण के जमाने में जब मनुष्य एक दूसरे की आवश्यकताओं और उनकी पूर्ति में ज्यादा और निकट का साझीदार हुआ है तब अनुवाद की आवश्यकता और भी बढ़ गयी हे। आज बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रसाद है और इन कंपनियों के माल के बाजार दुनियाभर में विस्तारित हैं। इस बाजारों में माल की खपत हेतु अनुवाद का महत्व अपने ढंग से और बढ़ गया है। कम्पनियों के उत्पाद भाषा की सीमाओं को लांघते हुए अब जगह पहंुच रहे हैं।
चूंकि अनुवाद के परिप्रेक्ष्य में उसकी उपयोगिता से सन्दर्भित रोजगार के प्रत्येक क्षेत्र में पृथक-पृथक शोध किया जा सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि अनुवाद ही वह सशक्त माध्यम है, जिसके द्वारा भारत जैसे देश की एक सूत्रता को सही दिशा मिलती है। अनुवाद की सुविधा के अभाव में हम अपने विशाल बहुभाषी देश में ही अपरिचित जैसे रह जाते। अनुवाद ने सम्पूर्ण राष्ट्र को एकता में बांध रखा है तथा राष्ट्रीयता के सूत्रों को बिखरने से रोका हुआ है। रोजगार की दृष्टि से भी अनुवाद आज अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो रहा है। उदाहरण के लिए वरिष्ठ/कनिष्ठ अनुवादक, हिन्दी अधिकारी, अंग्रेजी-हिन्दी अध्यापक व प्राध्यापक, भाषा निदेशक, उपनिदेशक, राजभाषा अधिकारी, संवाददाता, समाचारवाचक, संपादक, बैंक अधिकारी आदि अनेक पदों पर अनुवादकों की नियुक्तियां हो रही हैं। केन्द्र-राज्य सरकार के कार्यालयों में, अस्पतालों में, बैंक, रेलवे, संसद, पर्यटन, विधानसभा, पत्र-पत्रिकाओं के कार्यालयों में, अकादमियों में, प्रकाशन संस्थानों में, रेडियो-दूरदर्शन, विज्ञापन एजेंसियों में, बीमा क्षेत्रों में, कोश विज्ञान में, भाषा संबंधी निदेशालयों व संस्थानों में, प्रदर्शनियों में, संग्रहालयों में, पुस्तकालयों में, खेलों में, अर्थजगत में, विज्ञान-तकनीकी-प्रौद्योगिकी से संबद्ध कार्यालयों में, विभिन्न विषयों, साहित्य आदि अनेक क्षेत्रों में अनुवाद की उपादेयता एवं प्रासंगिकता पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता। लाखों व्यक्ति इन अनेक क्षेत्रों में अनुवाद के जरिए धनार्जन कर रहे इस सन्दर्भ में अनुवाद शास्त्री डाॅ. पूरनचंद के अनुसार, ‘‘सिनेमा भी आज अनुवाद का बहुत बड़ा मंच बन गया है। टेलीविजन के अनेक चैनल भी आज अनुवाद के माध्यम से ही अपने कार्यक्रम चला रहे हैं। ..............आज डाॅक्टर, इंजीनियर, वकील, जज, फैषन डिजाइनर, इंटीरियर डैकौरेटर, आर्किटैक्ट, मनोवैज्ञानिक, बिल्डल आदि भी अनुवाद के माध्यम से अपने व्यवसाय को व्यापक स्तर पर देष-विदेष में फैलाने-बढ़ाने का कार कर रहे हैं।‘‘16 निःसन्देह ही अनुवाद-कार्य जिज्ञासाओं का शांत करने वाली एक प्रकार की चमत्कारी विधा है। या यूं कहिए अतृप्त को तृप्ति तथा प्यासे को जल प्रदान करने वाली विधा है। अनुवाद शास्त्री डाॅ. पूरनचंद के अनुसार, ‘‘ ‘न होने से कुछ होना बेहतर है‘ तथा कुछ से कुछ और‘ उपलब्ध कराते चलने का मूल मंत्र है अनुवाद। अनुवाद ‘षास्त्र‘ भी और इसी कारण अनुषासन की विधा भी है।‘‘17 भारतीय अनुवाद परिषद् की अधिष्ठात्री, महान अनुवाद शास्त्री व भाषाविद् डाॅ. गार्गी गुप्त ने अनुवाद की उपोदयता, महत्व और प्रासंगिकता को अपने एक वाक्य में समेटते हुए कहा है कि ‘‘अनुवाद वस्तुतः एक ऐसा नीड़ है, जहाँ से विष्व-भर की यात्रा घर बैठे ही हो जाती है- ‘यत्र विष्वम् भवति एक नीडम्।‘‘18
भारतीय साहित्य के सन्दर्भ में अनुवाद की भावी संभावनाओं को कदापि नकारा नहीं जा सकता है। मशहूर लेखिका अमृता प्रीतम ने अपने साक्षात्कार में कहा भी है कि ‘‘ अनुवाद के लिए काफी संभावनाएं हैं। किन्तु काम बहुत ही कम हुए हैं।‘‘19 इनके इस वाक्य से यह तो स्पष्ट है कि भारत में अनुवाद का क्षेत्र तो अति विस्तृत है, लेकिन काम अभी उस स्तर पर नहीं हुआ है, जो कि होना चाहिए था। उसका कारणों पर प्रकाश डालते हुए अपने साक्षात्कार में आगे वे कहती हैं, ‘‘हमारे यहाँ अनुवाद के लिए जमीन तो है किन्तु मौके नहीं। गैर-सरकारी प्रकाषक अनुवाद छापते कहाँ है? सरकारी योजनाअें की अपनी सीमाएं हैं। अनुवाद के के चयन में सरकार का अपना दृष्टिकोण है। अच्छे अनुवादक को सेवा का मौका अक्सर नहीं मिलता है।......अनुवाद भी ज्यादातर -काण्ट्रेट के तौर पर दिया जाता है। अनुवाद पर उसका बुरा असर पड़ता है। पैसे के चक्कर में पड़ने वाला आदमी समर्पित मन से अनुवाद नहीं करेगा। कुछ प्राध्यापक लोग छात्रों से अनुवाद कराकर अपने नाम छपवाते हैं। गरीब लेखकों से अनुवाद कराकर अपना नाम रखने वाले अनुवादक भी हमारे बीच में है। निष्ठा के साथ न करें तो अनुवाद का स्तर अपने आप ही गिर जाएगा।‘‘20  उनकी इन बातों में कितना कड़वा सच छिपा है। इस सच से सामना अक्सर अनुवाद से जुड़े व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से हो ही जाता है। आमतौर पर अनुवादक को लेखक से नीचे पायदान पर माना जाता है। इसके अन्य पहलू पर भी प्रकाश डालना समीचीन होगा कि अनुवादक की निष्ठा अनुवाद के प्रति कमतर होने का मुख्य कारण क्या है? इस सन्दर्भ में प्रसिद्ध अनुवादक सरला जगमोहन का कहना है कि ‘‘अनुवादक को उतने पैसे नहीं मिलते हैं, लेकिन केवल पैसे की ही बात नहीं है- दाम भी नहीं मिलता और नाम भी नहीं मिलता और दुःख तो इस बात का है कि उसे जितना चाहिए उतना यष भी नहीं मिलता है। बड़ी-बड़ी पत्रिकाओं और अखबारों में भी अनुवादकों का नाम पीछे रखा जाता है। खुद कहने में अफसोस होता है कि साहित्य अकादमी जैसे संस्था को हालांकि वह अनुवादक का नाम जरूर देती है, लेकिन गौण बनकर।‘‘21  जबकि होना यह चाहिए कि मूल लेखक के नाम के साथ ही अनुवादक का नाम भी होना चाहिए। पुस्तकों-पत्रिकाओं में भी ऐसे ही अनुवादक का दर्जा नीचा हो जाता है। यह पैसे मिलने से भी ज्यादा दुर्भाग्य की बात है। इस बात की पुष्टि श्रीपाद रघुनाथ जोशी के व्यक्तव्य के होती है, ‘‘अधिकांष अनुवादकों ने उसके लिए मेहनत नहीं की और यह समझा गया कि दो भाषाओं का मामूली ज्ञान हो तो कोई भी अनुवाद कर सकता है।..... इसीलिए हमारे यहां अनुवादों का स्तर बहुत अच्छा नहीं है।‘‘22
अनुवाद की प्रासंगिकता और विलक्षणताओं के प्रकाश में विश्व की सभी भाषाओं में अनुवाद की कई शैलियां और प्रविधियां अपनायी गयी हे। यदि अनुवादक सावधानीपूर्वक शब्द और अर्थ की आत्मा का स्पर्श करते हुए स्त्रोत भाषा की प्रकृति के अनुरूप लक्ष्य भाषा में अनुवाद उपस्थित करता है, तो यही आदर्श अनुवाद होगा। ‘‘श्रेष्ठ अनुवादक को ऐसा कुषल चिकित्सक कहा गया है, जो बोतल में रखी दवा को अपनी सिरिंज के द्वारा रोगी के शरीर तक यथावत् पहुंचा देता है।‘‘23  अनुवादक ही स्त्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा की मूल कड़ी होता है, इसलिए अनुवाद के क्षेत्र में अनुवादक की भूमिका ही सबसे महत्वपूर्ण होती है। अनुवादक का चाहिए कि उसका उक्त दोनों भाषाआंे पर प्रभुत्व हो। जब तक प्रभुत्व नहीं होता तब तक अनुवाद नहीं करना चाहिए। ज्यादा से ज्यादा शब्दकोशों को प्रयोग करने की आदत डालनी चाहिए। प्रमुख अनुवाद के क्षेत्र में जाना पहचाना नाम है श्रीपाद रघुनाथ जोशी, उनके अनुसार अनुवादक की योग्यता, ‘‘अनुवादक के पास अनुवाद के लिए वैसी ही प्रतिभा होनी चाहिए, जैसी मौलिक लेखक के पास होती है। दोनों भाषाओं पर आपको ऐसा अधिकार होना चाहिए जैसे दोनों मातृभाषाएँ हों।.........मौलिक लेखन की अपेक्षा अनुवाद में अधिक परिश्रम, अधिक बुद्धि और अधिक प्रतिभा की जरूरत होती है।‘‘24 अनुवादकों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए और उनकों उत्साहित करने के उद्देश्य से वह आगे कहते हैं, ‘‘अनुवादकों से मैं यह कहूँा कि भाई, पहले तो अपने लिए समझो कि मैं अनुवादक हूँ और साहित्यिक समाज का महत्वपूर्ण अंग हूँ। मैं कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हूँ या दूसरे दर्जे का लेखक नहीं हँ। समझो कि मैं वेसा ही लेखक हूँ, जैसाकि कोई दूसरा लेखक होता है। मैं भी उतना ही महत्वपूर्ण हॅँू। यह अस्मिता उसमें पहले आनी चाहिए। मैं अपनी ‘टम्र्स डिक्टेट‘ कर सकता हूँ, यह स्वाभिमान उसमें आना चाहिए।‘‘25 अनुवाद कार्य कम होने का एक अन्य मुख्य कारण अनुवाद की आवश्यकतानुसार शब्दकोशों का न मिलना या अधूरा शब्दकोश मिलना है। कोश हमारी एक मुख्य समस्या है। अभी भी हमारे यहां पारिभाषिक शब्दों भारी कमी है। यह कमी वैज्ञानिक, विधि, प्रौद्योगिकी, कार्यालयी अनुवाद के क्षेत्र में विशेषकर खलती है। वैसे हमारे यहाँ सभी भाषाओं में पारिभाषिक शब्दों का अभाव बड़ी आम बात है। वैसे इस क्षेत्र में कई प्रयास हुए हैं और हो रहे हैं। सरला जगमोहन इस विषय में कहती हैं, ‘‘केन्द्रीय हिन्दी निदेषालय के पारिभाषिक शब्दकोष के दो खण्ड हैं, लेकिन वे भी पर्याप्त नहीं। उनमें जिस तरह के जिस सावधानी और चैकसी से काम होना चाहिए था और जितने उत्साह से काम होना चाहिए था, वह नहीं हो पाया है।‘‘26  परन्तु इसमें एकदम सख्त होना भी लाज़मी नहीं होगा क्योंकि जिस भाषा में अनुवाद होगा, तो उसमें जो प्रचलित शब्द प्रयोग में आते जाएंगें, उनसे अलग या हटकर भी कुछ नये प्रयोग करने को अनुवादक को तैयार रहना चाहिए।
जैसा कि कुछ लोग मानते है कि अनुवाद छल है, कपट है, प्रवन्चना है, पाप है। कुछ लोग यह तक मानते है कि अनुवाद में मौलिकता नहीं होती। अनुवादक का प्रदेय उल्लेखनीय नहीं होता। कोई भी विधा या अनुशासन छोटा या बड़ा नहीं होता। अनुवाद और मौलिक लेखन भिन्न-भिन्न दो प्रक्रियाएं हैं, लेकिन एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी एक का दूसरे से ऊँचा या नीचा मानने की गलती जो आज तक हम करते आ रहे हैं, वह अब बन्द होनी चाहिए। डाॅ. शरद चन्द्रा इस विषय में कहते हैं कि ‘‘अनुवाद कार्य को हीन कार्य शायद वे लोग मानते हैं, जिनको अनुवाद का कोई अनुभव नहीं होता। जो लोग इसे हीन मानते हैं, उन्हें शब्दकोष लेकन बैठा दीजिए, फिर देखिए वे क्या करते हैं। जो लोग स्वयं मौलिक लेखन करते हैं और अनुवाद कार्य भी करते है, वही जानते हैं कि अनुवाद मौलिक लेखन की तुलना में कितना दुष्कर कार्य है।‘‘27
अनुवाद के भविष्य के विषय में हिन्दी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डाॅ. श्यामसिंह ‘शशि‘ का चिंतन कुछ प्रकार है ‘‘आज जब सारा विष्व अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव तथा सह-अस्तित्व की दिषा में आगे बढ़ रहा है, सैकड़ों भाषाओं में विचारों के आदान-प्रदान हो रहे हैं, तो अनुवाद का भविष्य भी उज्ज्वल दिखायी पड़ता है।...... आज आवष्यकता है अनुवाद के नये क्षेत्रों को खोजने तथा अच्छे अनुवादक तैयार करने की ताकि अनुवाद का पथ प्रषस्त हो, भविष्य और अधिक उज्ज्वल हो।‘‘28 अनुवाद आज विश्व की भाषा बन गया है। पूरे विश्व को एक सेतु बनकर जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। यह सेतु बहु-दिशागामी है और निर्बाध आवागमन के रास्ते खोलता है। अनुवाद रोजगारोन्मुख विद्या तो है ही, सामाजिक तथा सांस्कृतिक स्तर पर प्रतिष्ठित करने का शस्त्र भी है। आत्मविश्वास प्रदान करने का सूत्र भी अनुवाद ही है। आज भूमण्डलीकरण की अवधारणा को साकार करने वाला संकल्प यदि कोई है तो वह है अनुवाद।आज के युग में अनुवाद को जितना महत्व मिल रहा है, वह पहले कभी नहीं मिला, क्योंकि आज अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भाषा का परस्पर सम्पर्क पहले की अपेक्षा में बढ़ गया है। आज विभिन्न देशों की संस्कृतियों की विपुल संपदा हमारे सामने है और हम उनसे सांस्कृतिक आदान-प्रदान करने हेतु उत्सुक है। इसलिए अनुवाद को सेतु बनाना हमारी विवशता भी है और जरूरत दोनों ही है। यदि अनुवाद न किये गये होते तो आज वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, कबीर आदि विदेशों में तो क्या शायद अपने ही देश में भी न जाने जाते। अनुवाद न होता तो अरस्तु, प्लेटों, सुकरात, शैली, शेक्सपियर, मोपांसा, चेखव आदि महान् लेखकों की विचार-सम्पदा से सारा विश्व कैसे लाभान्वित होता। टैगोर, बंकिम और शरतचन्द्र केवल बंगाल तक ही सीमित रह जाते। अर्थात् साहित्य और साहित्यकारों का अस्तित्व का आधार बिन्दु यदि अनुवाद को कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए।
विभिन्न साहित्यिक विमर्शों की आधारशिला भी अनुवाद के माध्यम से ही मजबूत हुई है। दलित, स्त्री, आदिवासी, पसमांदा, अल्पसंख्यक चाहे कोई भी साहित्यिक विमर्श क्यों न हो विभिन्न भाषाओं से हुए परस्पर हुए अनुवाद के कारण ही आज साहित्य जगत में उक्त विमर्शों पर चर्चा करना संभव हो पाया है। अभी हाल ही 30 सितम्बर को अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस मनाया गया। दिनांक 30.09.2016 के दैनिक हिन्दुस्तान में संपादकीय पृष्ठ पर वरिष्ठ लेखिका मधु बी जोशी का सारगर्भित लेख ‘कुछ अनुवाद जिन्होंने पूरी दूनिया ही बदल दी‘ में उन्होंने तीन अनूदित धर्मग्रन्थों रामायण, बाइबिल व रामचरितमानस की अनुवाद के सन्दर्भ में संक्षिप्त पर अनोखी चर्चा की। उनके लेख से स्पष्ट होता है कि अनुवाद मात्र एक ऐसा माध्यम है, जो पूरे विश्व को बदलने की क्षमता रखता है।
वर्तमान युग अनुवाद का युग है। सोच व व्यवहार के प्रत्येक स्तर पर हम अनुवाद पर आश्रित हैं, अनुवाद के आग्रही है। जीवन का कोई क्षेत्र शायद ही ऐसा हो, जिसमें अनुवाद की उपादेयता प्रमाणित न की जा सके। अपरिहार्य तौर पर अनुवाद एक व्यापक और प्रासंगिक स्थिति है। इसलिए यह सर्वथा स्वाभाविक ही है कि नये संसाधनों के विकास और व्यापकतर मानवीय सम्पर्कों के संदर्भ में अनुवाद के महत्व, प्रासंगिकता और भविष्य का अनुशीलन किया जाये। विश्व में प्रयुक्त पांच हजार से अधिक भाषाओं और बोलियों के बीच वैचारिक, सर्जनात्मक और कार्यात्मक सामंजस्य स्थापित रखने के लिए अनुवाद ही सर्वाधिक लोकप्रिय एवं उपयोगी माध्यम बन गया है।
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---ःसन्दर्भ सूचीः---
1. भारत की समसांस्कृतिक भाषाएँ और अनुवाद, ले. प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी, अनुवाद त्रैमासिक, जनवरी-मार्च 2016, अंक 166, पृ0 26
2. अनुवाद विज्ञान की भूमिका, कृष्ण कुमार गोस्वामी, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2008, पृ0-473
3. वही, पृ0-434 
4. वही, पृ0-443 
5. वही, पृ0-446
6. प्राक्कथन, अनुवाद अनुभूति एवं अनुभव, प्रधान संपादक डाॅ. सुरेश सिंघल, संजय प्रकाशन, नयी दिल्ली, वर्ष 2006
7. अनुवाद मूल्यांकन, प्रधान संपादक डाॅ. नीता गुप्ता, भारतीय अनुवाद परिषद, वर्ष 2002, पृ0-20
8. अनुवाद के विविध आयाम, डाॅ. पूरनचन्द टण्डन, हरीष कुमार सेठी, तक्षशिला प्रकाशन नयी दिल्ली, वर्ष 2012, भूमिका से
9. अनुवाद अनुभूति एवं अनुभव, प्रधान संपादक डाॅ. सुरेश सिंघल, संजय प्रकाशन, नयी दिल्ली, वर्ष 2006, पृ0 321
10. अनुवाद विज्ञान और संपे्रषण, प्रो. हरिमोहन, तक्षशिला प्रकाशन, वर्ष 2014 से उदृधत, पृ019
11. अनुवादः स्वरूप और समस्याएं, डाॅ. गिरीश सोलंकी, पैराडाईज पब्लिशर्स, जयपुर, वर्ष 2012, पृ0 51
12. राजभाषा के विकास में अनुवाद की भूमिका, मुख्य संपादक डाॅ. गार्गी गुप्ता, भारतीय अनुवाद परिषद, नयी दिल्ली, पृ0163
13. अनुवाद प्रक्रिया एवं परिदृश्य, रीतारानी पालीपाल, वाणी प्रकाशन नयी दिल्ली, वर्ष 2010, पृ0 105
14. पश्चिम में अनुवाद कला के मूल स्त्रोत, पृ0 107
15. अनुवाद कला, डाॅ. रामचन्द्र वर्मा शास्त्री, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, वर्ष 2012, पृ0 10
16. राजभाषा के विकास में अनुवाद की भूमिका, मुख्य संपादक डाॅ. गार्गी गुप्ता, भारतीय अनुवाद परिषद, नयी दिल्ली, पृ0168-169
17. अनुवाद का व्याकरण, मुख्य संपादक डाॅ. गार्गी गुप्ता व भोलानाथ तिवारी, भारतीय अनुवाद परिषद, नयी दिल्ली, पृ023
18. वही, पृ0134
19. अनुवाद अनुभूति एवं अनुभव, प्रधान संपादक डाॅ. सुरेश सिंघल, संजय प्रकाशन, नयी दिल्ली, वर्ष 2006, पृ0 6
20. वही, पृ0 6-7
21. वही, पृ0 59
22. अनुवाद अनुभूति एवं अनुभव, प्रधान संपादक डाॅ. सुरेश सिंघल, संजय प्रकाशन, नयी दिल्ली, वर्ष 2006, पृ0 69
23. इ.ग.रा.मु.विवि के पाठ्यक्रम पी.जी.डी.टी.-01 से साभार
24. अनुवाद अनुभूति एवं अनुभव, प्रधान संपादक डाॅ. सुरेश सिंघल, संजय प्रकाशन, नयी दिल्ली, वर्ष 2006, पृ0 78
25. वही, पृ0 81)
26. वही, पृ0 61)
27. वही, पृ0 210)
28. (अनुवाद का भविष्य, डाॅ. श्यामसिंह ‘शशि‘, अनुवाद बोध, संपादक-डाॅ. गार्गी गुप्ता व डाॅ. पूरन चंद टंडन, भारतीय अनुवाद परिषद, नयी दिल्ली, वर्ष 2001, पृ0 147)