Sunday, February 28, 2021

अमीर भिखारी!

 


अमीर भिखारी! शीर्षक से अचंभित हो गए न? जी हाँ भिखारी और वो भी अमीर। अमीर भी ऐसा वैसा नहीं करोड़ोपति, करोड़ का मालिक। तो फिर गरीब कैसे। जनाब गरीब नहीं है मांगना इनका पेशा बन चुका है और मांग मांग कर इन्होंने इतना कमा लिया है कि मायानगरी तक में एक सरकारी नोकरी वाला जहां अच्छा या अच्छी जगह फ्लैट नहीं ले पाता वहां ये जनाब रहते हैं। इस दुनिया में अमीर से अमीर आदमी भी है और ऐसे भी लोग हैं जिन्हें दो वक्त तो क्या दो दिन में एक बार भी भोजन नसीब नहीं होता। एक देश है वेनेजुएला जिसके बारे में एक बार खबर आई थी कि बीस साल पहले जो सम्पन्न देश था वहां आज भुखमरी इतनी बढ़ गई है कि एक ब्रेड के टुकड़े के लिए महिलाएं अपना जिस्म तक बेच रही थीं। 

खैर अभी एक खबर पढ़ी की सभी मांगने वाले भिखारी ही हो ऐसा नहीं है। हमारे यहां भी एक भीख मांगने आता था जिसका बेटा अमेरिका में अच्छे पद पर है। 

खबर पढ़ी जो वो ये है -


ये हैं भारत के 5 सुपर रिच भिखारी, करोड़ों में है संपत्ति, फ्लैट और कैश


देश में सबसे अमीर भिखारियों की लिस्ट में जो सबसे पहला नाम है वो भरत जैन का है. वो ज्यादातर मुंबई के परेल क्षेत्र में भीख मांगते हैं. रिपोर्ट के अनुसार उनके पास दो अपार्टमेंट हैं जिनका कीमत 70 लाख रुपये प्रति प्लैट है.



करोड़ों में है भारत के टॉप भीख मांगने वालों की संपत्तिमुंबई में एक भीख मांगने वाले के पास दो-दो फ्लैट

दुनिया में हर आदमी अपना और परिवार का पेट भरने के लिए कोई ना कोई काम या नौकरी करता है और उससे पैसे कमाता है. अगर आप से पूछा जाए कि आप एक साल में कितना कमाते हैं और कितना बचाते हैं? तो आपका जवाब होगा कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप दुनिया में कहां रहते हैं, और आपकी जीवनशैली कैसी है? लेकिन अगर हम बताएं कि कुछ भिखारी आपसे ज्यादा पैसे कमाते हैं तो आप यह सुनकर हैरान हो जाएंगे. लेकिन यह बिल्कुल सच है.


आज हम आपको भारत के ऐसे ही सबसे अमीर 5 भिखारियों के बारे में बताएंगे. भारत के इन सुपर-रिच भिखारियों  के पास अपार्टमेंट में फ्लैट हैं, बहुत सारी संपत्तियां हैं और बड़ा बैंक बैलेंस है. लेकिन फिर भी, वे सड़कों पर भीख मांगते हैं.


पत्रिका में छपी रिपोर्ट के मुताबिक देश में सबसे अमीर भिखारियों की लिस्ट में जो सबसे पहला नाम है वो भरत जैन का है. वो ज्यादातर मुंबई के परेल क्षेत्र में भीख मांगते हैं. रिपोर्ट के अनुसार उनके पास अपार्टमेंट में दो फ्लैट हैं जिनकी कीमत 70 लाख रुपये प्रति फ्लैट है. मतलब ये कि उनके पास एक करोड़ 40 लाख की तो यही संपत्ति हैं. वह प्रति माह लगभग 75,000 रुपये भीख मांगकर कमाते हैं जो भारत में औसतन एक नौकरीपेशा की कमाई से कई गुना ज्यादा है.


सबसे अमीर भिखारियों की लिस्ट में कोलकाता की लक्ष्मी दूसरे नंबर पर हैं. लक्ष्मी ने 1964 से कोलकाता में सिर्फ 16 साल की उम्र से भीख मांगना शुरू कर दिया और 50 से अधिक वर्षों के अपने जीवन में इन्होंने भीख मांग-मांग कर लाखों रुपये जुटाए. इनके सभी पैसे बैंकों में जमा हैं. लक्ष्मी आज भी 1 हजार रुपये हर दिन भीख मांगकर कमाती है. अगर महीने के हिसाब से देखें तो वो हर महीने कम से कम 30 हजार रुपये कमाती हैं.



मुंबई की रहने वाली गीता अमीर भिखारियों की लिस्ट में तीसरे नंबर पर हैं. गीता मुंबई के चरनी रोड के पास भीख मांगती है और कथित तौर पर उन पैसे से उसने एक फ्लैट खरीद ली है जिसमें वो अपने भाई के साथ रहती हैं. वह प्रति दिन भीख मांगकर लगभग 1,500 रुपये कमाती है. महीने में करीब 45 हजार रुपये उनकी आमदनी है.


पत्रिका की रिपोर्ट के मुताबिक कथित तौर पर भीख मांग कर अपना गुजारा करने वाले चंद्र आजाद के पास गोवंडी में घर,  8.77 लाख रुपये खाते में जमा और लगभग 1.5 लाख रुपये नकद हैं. 2019 में रेल दुर्घटना में अपनी जान गंवाने के बाद उनकी सारी संपत्ति मुंबई पुलिस ने ढूंढ कर निकाली थी.


रिपोर्ट के अनुसार बिहार के पटना में रेल प्लेटफॉर्म पर भीख मांगने वाले पप्पू भी अमीर भिखारियों की लिस्ट में शामिल हैं. एक दुर्घटना में पैर फ्रैक्चर हो जाने के बाद पप्पू ने पटना के रेलवे स्टेशनों पर भीख मांगने का काम शुरू किया था. कुछ रिपोर्टों के अनुसार पप्पू कुमार के पास  लगभग 1.25 करोड़ रुपये की संपत्ति है। 


साभार आजतक 




Sunday, February 14, 2021

राजनीति, खेल, सिनेमा से निकली प्यार की दस सच्ची कहानियाँ

 



इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी



इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी- भारतीय राजनीति की में इंदिरा और फिरोज गांधी की लवस्टोरी बहुत चर्चित रही. दोनों की मुलाकात 1930 में हुई थी. आजादी की लड़ाई में इंदिरा की मां कमला नेहरू एक कॉलेज के सामने धरना देने के दौरान बेहोश हो गई थीं. उस समय फिरोज गांधी ने उनकी बहुत देखभाल की थी. कमला नेहरू का हालचाल जानने के लिए फिरोज अक्सर उनके घर जाते थे. इसी दौरान उनके और इंदिरा गांधी के बीच नजदीकियां बढ़ीं. फिरोज जब इलाहाबाद में रहने लगे उस दौरान वो आनंद भवन जाते रहते थे. फिरोज से इंदिरा की शादी 1942 में हुई. लेकिन जवाहर लाल नेहरू इस शादी के खिलाफ थे. हालांकि महात्मा गांधी के हस्तक्षेप के बाद दोनों की शादी हुई. फिरोज को बापू ने अपना सरनेम भी दिया. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान इंदिरा और फिरोज साथ में जेल भी गए.




रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका गांधी


रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका गांधी- देश के सबसे बड़े सियासी घराने की बेटी प्रियंका गांधी औ रॉबर्ट वाड्रा की लव स्टोरी भी बेहद दिलचस्प है. दोनों की मुलाकात एक कॉमन फ्रेंड के घर पर हुई थी. एक मैगजीन को दिए इंटरव्यू में रॉबर्ट वाड्रा ने अपनी लवस्टोरी के राज खोले. रॉबर्ट ने बताया था कि जब वो ब्रिटिश स्कूल में साथ पढ़ते थे तो उन्हें लगता था कि प्रियंका उनमें दिलचस्पी रखती हैं. दोनों में काफी बातचीत होती थी और धीरे-धीरे नजदीकियां बढ़ीं. दोनों के बीच की दोस्ती प्यार में बदलने लगी. प्रियंका की सादगी पर रॉबर्ट का दिल आ गया था. कहा जाता है कि जब रॉबर्ट ने प्रियंका से शादी का फैसला किया था तब रॉबर्ट के पिता इससे खुश नहीं थे. हालांकि बाद में वो शादी के लिए राजी हो गए और रॉबर्ट-प्रियंका 1997 में शादी के बंधन में बंधे.



सोनिया गांधी और राजीव गांधी



सोनिया गांधी और राजीव गांधी- गांधी परिवार की दूसरी सबसे चर्चित लवस्टोरी रही राजीव और सोनिया की. अगर इनकी लवस्टोरी को 'लव एट फर्स्ट साइट' कहा जाए तो गलत नहीं होगा. सोनिया इटली के साधारण परिवार से थीं और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रही थीं. यहीं उनकी मुलाकात राजीव गांधी से हुई थी. सोनिया पढ़ाई के साथ ग्रीक रेस्टोरेंट में पार्ट टाइम जॉब भी करती थीं. इसी रेस्टोरेंट में एक बार राजीव आए. दोनों की नजरे मिलीं और प्यार की शुरुआत हुई. सोनिया ने अपनी फैमिली को खत लिखकर बताया कि वो एक भारतीय लड़के से प्यार करती हैं. राजीव का प्यार ही उन्हें भारत लेकर आया और वो यहीं की होकर रह गईं. दोनों ने 1968 में शादी की.


अखिलेश यादव और डिंपल यादव



अखिलेश यादव और डिंपल यादव- उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और डिंपल यादव की लव स्टोरी सिंपल और स्वीट है. अखिलेश यादव ऑस्ट्रेलिया से पढ़ाई करके लौटे ही थे कि उनकी मुलाकात डिंपल से हुई. उस समय अखिलेश 25 साल के थे, जबकि डिंपल की उम्र 21 थी. अखिलेश फुटबॉल के दीवाने थे और डिंपल को घुड़सवारी का शौक था. डिंपल बहुत अच्छी पेंटर हैं, वहीं अखिलेश को मेटालिका (हार्ड रॉक) सुनना बहुत पसंद है. इसके बावजूद दोनों एक दूसरे को दिल दे बैठे. मुलायम सिंह को ये रिश्ता मंजूर नहीं था, लेकिन अखिलेश अपनी जिद पर अड़े रहे. अखिलेश ने अपने पिता को मनाया. कहते हैं अमर सिंह ने मुलायम सिंह को मनाने में अहम भूमिका निभाई थी. दोनों के बीच रोमांस चला और फिर नवंबर 1999 में अखिलेश और डिंपल की शादी हो गई.




सचिन तेंदुलकर-अंजली तेंदुलकर



सचिन तेंदुलकर और अंजली- सचिन तेंदुलर के क्रिकेट करियर की तरह उनकी लवस्टोरी भी दिलचस्प है. सचिन और अंजली के बीच 'लव एट फर्स्ट साइट' हुआ. मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर दोनों ने पहली बार एक-दूसरे को देखा था. 1990 में सचिन अपने पहले क्रिकेटिंग टूर से लौट रहे थे और अंजली अपनी मां को रिसीव करने आई थीं. इसके बाद सचिन और अंजली एक कॉमन फ्रेंड के घर पर मिले. दोनों ने पांच साल डेट की. अंजली सचिन से 6 साल बड़ी हैं और पेशे से डॉक्टर थीं. 1995 में दोनों ने शादी कर ली और उसके बाद से ही साथ हैं. सचिन ने जब इंटरनेशनल क्रिकेट से संन्यास लिया था तो उन्होंने अपनी फेयरवेल स्पीच में कहा था- 'जब मैं अंजलि से पहली बार मिला, वह जिंदगी का एक खुशनुमा पल था.'




शाहरुख खान-गौरी खान



शाहरुख खान और गौरी- 1984 में गौरी से मिलने के बाद आज तक जिस तरह शाहरुख उनके प्यार में डूबे नजर आते हैं, उसे देख कर कहा जा सकता है कि इस प्यार में बहुत गहराई है. अपने प्यार को पाने के लिए शाहरुख को हर तरह की लड़ाई लड़नी पड़ी. पंजाबी ब्राह्मण और प्योर वेजिटेरियन फैमिली को मनाना शाहरुख के लिए लोहे के चने चबाने जैसा था. उसके ऊपर शाहरुख फिल्म इंडस्ट्री में करियर बनाने के जुगाड़ में थे जिससे हालात और भी बिगड़ गए. यह सब कुछ करना जैसे नामुमकिन था. गौरी की फैमिली इस रिश्ते पर राजी नहीं थी. कुछ समय बाद गौरी अपने कुछ फ्रेंडस के साथ मुंबई चली आईं. फैमली में शाहरुख को एंट्री दिलाने के लिए पहले गौरी ने उन्हें हिंदू ही बताया जिसका नाम अभिनव था. इससे पहले भी अपने फर्स्ट सीरियल फौजी के करेक्टर अभिमन्यु के नाम से वो गौरी के बर्थडे में पार्टिसिपेट कर चुके थे तो उन दोनों को लगा कि यही सही आइडिया है घर में जगह बनाने का. छह साल लंबी कोर्टशिप के बाद फैमिली के सर्पोट से 1991 में शाहरुख और गौरी की शादी हुई.





सैफ अली खान-करीना कपूर



सैफ अली खान और करीना कपूर- 'सैफीना' की लव स्टोरी भी कुछ अलग अंदाज में शुरू हुई थी. दोनों की उम्र में भी 10 साल का अंतर है. दौरान सैफ अली खान ने करीना के साथ काफी समय बिताया. सैफ की एक शादी हो चुकी थी, 1991 में अमृता सिंह से शादी के बाद दोनों 2004 में अलग हो गए थे. सैफ ने करीना के साथ काफी समय बिताया. अक्टूबर 2007 से दोनों डेटिंग करना शुरू किया. इसके बाद दोनों अक्सर साथ ही नजर आते थे. सैफ ने तो अपने हाथ पर 'करीना' के नाम का टैटू भी कराया. 16 अक्टूबर 2012 को दोनों ने शादी कर ली.




सौरव गांगुली-डोना गांगुली



सौरव गांगुली और डोना- सौरव गांगुली और डोना की लवस्टोरी किसी हिंदी फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं है. सौरव और डोना पड़ोसी थे. दोनों बचपन से बहुत अच्छे दोस्त रहे हैं. हालांकि दोनों परिवारों के बीच रिश्ते अच्छे नहीं थे. इंग्लैंड में अपने करियर का पहला टेस्ट मैच खेलने के लिए जा रहे गांगुली ने जाने से पहले डोना को प्रपोज किया था. डोना ने भी हां कर दी. लेकिन दोनों परिवार वालों को इस रिश्ते से ऐतराज था. 12 अगस्त 1996 को दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली. कुछ समय तक मनमुटाव के बाद दोनों परिवारों ने 21 फरवरी 1997 को पूरे रीति-रिवाज से दोनों की शादी करवाई.




रोहित शर्मा-रितिका सजदेह



रोहित शर्मा-रितिका सजदेह- इंग्लैंड के खिलाफ मौजूदा टेस्ट सीरीज में शतकीय पारी खेलने वाले रोहित शर्मा और रितिका सजदेही की लव स्टोरी भी बेहद रोमांटिक है. रितिका पहले उनकी मैनेजर हुआ करती थीं. यहीं से इन दोनों की लव स्टोरी की शुरुआत भी हुई थी. रोहित और रितिका एक-दूसरे को छह सालों से जानते थे. रितिका युवराज सिंह की राखी बहन भी हैं. रोहित के साथ-साथ युवराज भी रितिका के क्लाइंट थे. रोहित-रितिका पहले दोस्त हुए और बाद में बेस्ट फ्रेंड्स बन गए. जल्दी ही यह दोस्ती प्यार में बदल गई. छह साल एक दूसरे को डेट करने के बाद रोहित ने इस रितिका को शानदार तरीके से प्रपोज किया. रोहित शर्मा ने उस स्थान पर रितिका को प्रपोज किया, जिसका उनके जीवन में बहुत अहम स्थान है. रोहित ने घुटनों के बल बैठक उन्हें बोरिवल स्पोर्ट्स क्लब, मुंबई नें एक अंगूठी के साथ प्रपोज किया. यह वही मैदान है, जहां रोहित ने 11 साल की उम्र में क्रिकेट खेलना शुरू किया था. दोनों ने साल 2015 में शादी की.



धोनी और साक्षी


धोनी और साक्षी- टीम इंडिया के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और साक्षी लव स्टोरी भी काफी 'कूल' है. धोनी और साक्षी की मुलाकात भारत और पाकिस्तान के बीच कोलकाता में हुए टेस्ट मैच के दौरान हुई थी. साक्षी रावत तब ताज होटल में इंटर्नशिप कर रही थीं और धोनी टीम के साथ उस होटल में ठहरे हुए थे. साक्षी ने होटल मैनेजमेंट का कोर्स किया है. यहीं पर दोनों ने एक-दूसरे के फोन नंबर लिए और बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया. धोनी और साक्षी रांची के डीएवी श्यामली स्कूल के दोस्त हैं. दोनों के पिता एक ही कंपनी में काम किया करते थे. साक्षी का परिवार उनके पिता के रिटायरमेंट के बाद देहरादून चला गया था और धोनी का परिवार रांची में बस गया. 4 जुलाई 2010 देहरादून के निकट एक रिजॉर्ट में धोनी ने अपनी मंगेतर साक्षी रावत के साथ शादी रचाई.

साभार आजतक


Wednesday, February 3, 2021

वर्तमान सामाजिक परिप्रेक्ष्य में दलित साहित्य की प्रमाणिकता एवं प्रासंगिकता




वर्तमान सामाजिक परिप्रेक्ष्य में दलित साहित्य की प्रमाणिकता एवं प्रासंगिकता 

डाॅ. राम भरोसे
हिन्दी विभागाध्यक्ष
असिस्टेंट प्रोफेसर
शहीद बेलमती चैहान राजकीय महाविद्यालय पोखरी (क्वीली) टिहरी-गढ़वाल
$919045602061,
                                                                                                                    

‘‘जन्म लेने से पहले ही
व्यवस्था की भंेट चढ़ जाते हैं
क्या हम कभी
जन्म भेद से होने वाली
देष की क्षति का
आकलन करते हैं
हिसाब लगाते हैं।‘‘ 
                                  (ष्योराज सिंह ‘बैचेन‘)

बीसवीं शताब्दी में दलितों-वंचितों की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिति में परिवर्तन लाने हेतु कई दलित आंदोलन चलाये गये। दलित आंदोलन की षुरूआत उन्नीसवीं शती में ही हो चुकी थी, जब सामाजिक अस्पृश्यता/छुआछूत, दलितों की शिक्षा एवं मंदिर-प्रवेश आदि समस्याओं के समाधान की ओर कदम बढ़ाए गये।वस्तुतः दलित आन्दोलन जातिविहीन समाज की रचना के लिए प्रतिबद्ध सांस्कृतिक, सामाजिक एवं राजनीतिक आन्दोलन रहा है। इस आन्दोलन का वैचारिक आधार महात्मा बुद्ध, ज्योतिबा फुले दर्शन एवं बाबा साहेब डाॅ. अम्बेडकर का जीवन संघर्श है। शाहू जी महाराज द्वारा सामाजिक समानता के खातिर किये गये प्रयास भी महत्वपूर्ण एवं सराहनीय रहे हैं। आगे यह वैचारिकता बुद्ध के दर्शन से सिद्ध एवं नाथ पंथियों ने प्रेरणा ग्रहण की और इसी परंपरा में मध्ययुगका संत साहित्य आता है। कबीरदास, रविदास, चोखामेला आदि संतों ने अपने काव्य और वाणी द्वारा धार्मिक आडम्बरों को छोड़कर सामाजिक समानता पर बल दिया। बाबा साहेब अम्बेडकर ने बुद्ध, कबीर एवं फुले विचारधारा को आत्मसात् किया। उन्होंने अपने चिंतन में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व तथा लोकतांत्रिक मूल्यों का समावेश किया और सामाजिक लोकतंत्र की अवधारणा सशक्त करने की बात की। बाबा साहेब ने भारतीय संविधान में न केवल दलितों के अधिकारों को स्थान दिलाया बल्कि संविधान में मौलिक अधिकारों के द्वारा भी दलितों, वंचितों, पिछड़ों व स्त्रियों के अधिकारों की लड़ाई की जिम्मेदारी भी निभायी। ज्योतिबा फुले ने जहाँ भारतीय दलित-वंचित समाज में अपने अधिकारों की प्राप्ति हेतु चेतना जगायी, वहीं बाबा साहेब ने उन्हें अपने अधिकारों की प्राप्ति हेतु संघर्श का मार्ग दिखाया और समाज की मुख्य धारा के साथ चलने पर बल दिया। उन्होंने ही सबसे पहले राजनीति में दलितों के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की मांग की। जिस हिन्दू धर्म और जाति व्यवस्था ने दलितों को हमेशा अमानवीय जीवन जीने को विवश किया, प्रत्येक प्रकार के अधिकारों से वंचित रखा, उसी के खिलाफ उन्होंने दलितों को जाग्रत किया। अपने भाशणों में व्यक्त विचारों द्वारा दलितों से जाति मुक्त होकर स्वाभिमान के साथ जीने के लिए प्रेरित किया। जाति के नाम पर सवर्ण जातियों द्वारा दलितों के साथ जो अमानवीय व्यवहार किया जा रहा था,उनसे मुक्ति प्राप्त कर सामाजिक हैसियत पाने के स्वप्न के साथ दलित संघर्श के लिए आगे बढ़े। इस चेतना ने दलितों को वैचारिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कतिक, आर्थिक एवं साहित्यिक सभी स्तरों पर समृद्ध किया।
हमारी भारत की प्राचीन संस्कृति में समाज के सभी वर्गों को सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक व आर्थिक विकास के समान अवसर प्राप्त नहीं हो सके, यह सर्वमान्य और कटु सत्य है। जिसके फलस्वरूप आज समाज के दलित, शोशित एवं उत्पीड़ित वर्गों के संघर्शाें ने ही दलित साहित्य की पृश्ठभूमि को तैयार किया है। आज भारतीय साहित्य में दलित विमर्श की अनिवार्यता व प्रासंगिकता निरन्तर बढ़ती जा रही है। साहित्य के आगे ‘दलित‘ विशेशण जुड़ने पर निर्मित शब्द ‘दलित साहित्य‘ एक विशेश अर्थ की अभिव्यंजना करता है। संक्षेप में बता दें कि‘दलित‘ षब्द उन्नीसवीं षताब्दी के सुधारवादी आन्दोलन काल की उपज है। जिसका प्रयोग विवेकानंद, एनी बेसेंट तथा रानाडे जैसे समाजसुधारकों ने, जो अपने आप में विस्तृत अर्थ लिये था, किया था। परन्तु वर्तमान में ‘दलित‘ षब्द का प्रयोग उन जाति विषेश के लिए प्रयोग करना ‘रूढ़‘ और प्रासंगिक हो गया है, जिनको महात्मा गांधी ने ‘हरिजन‘ कहकर पुकारा था। लेकिन दलितों ने ‘हरिजन‘ षब्द का उपहास किया और स्वयं को ‘दलित‘ कहना प्रारम्भ किया। हालांकि षुरुआत में ‘दलित‘ षब्द स्वीकार करने में भी विद्वानों, चिंतकों और साहित्यकारों में मतभेद अवष्य हुए, परन्तु आज ‘दलित‘ षब्द पर सभी मतएक्य हैं। क्योंकि यह षब्द निष्चय ही दलितों में नयी सोच-विचार, क्रांति और जागृति का संचार करता है। सरल और सीधे षब्दों में दलित वर्ग में वे सभी जातियां आती हंै, जो निम्न स्तर पर हैं, जिन्हें सदियों से सताया गया है,जिनको मानवीय अधिकारों से वंचित रखा गया ओर सामाजिक तौर पर जिनको नकारा गया है। खैर, साहित्य की बात करें तो दलित साहित्य के विशय में प्रबुद्ध प्रोफेसर-साहित्यकार डाॅ. श्यौराज सिंह ‘बैचेन‘ लिखते हैं,‘‘दलित साहित्य एक उद्देष्यपूर्ण लेखन है। सामाजिक विषमता, सांस्कृतिक-साहित्यिक पराधीनता दलितों की सामाजिक गुलामी को स्थाईयित्व देती रही है। ऐसे में दलित साहित्यकार लूथरकिंग, नेल्षन मंडेला और बराक ओबामा के रंग और नस्ल के खिलाफ किये गये संघर्षों को स्वदेष के गंाधी-अम्बेडकर विवाद, अछूतानंद-प्रेमचंद अलगाव, रैदास-कबीर-तुलसीदास का पंथ भेद के अंतरद्वन्द्वों को समझते हुए अपने मौलिक और अलग पहचान के ऐतिहासिक रास्ते पर आगे बढ़ रहा है।‘‘1महान संपादक और समाजसेवी डाॅ. रमणिका गुप्ता के शब्दों में ‘‘दलित साहितय दलित की पीड़ा, उत्पीड़न, शोषण और उसके विरूद्ध उनके आक्रोष तथा परिवर्तन के संकल्प का साहित्य है, जो जातिविहीन समाज का सपना पालता है।‘‘2प्रबुद्ध विचारक-आलोचक ओमप्रकाश वाल्मीकि ने दलित साहित्य को ‘आन्दोलन‘ की संज्ञा दी है।
यह बताना भी वांछनीय होगा कि सन् 1927 में प्रकाशित ‘चाँद‘ के अछूत अंक में पंडित रामभरोसे दीक्षित की कविता ‘अछूतों का उद्धार हो‘ शीर्शक से प्रकाशित हुई, जो इस तथ्य को सिद्ध करती है कि ‘दलित‘ शब्द का हिन्दी में मराठी भाशा से पूर्व हुआ था। यह विचार संक्षेप रूप से बताना अनिवार्य था, क्योंकि कुछ साहित्यिक विद्वान व विचारक यह मानते हैं कि ‘दलित‘ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग मराठी भाशा में हुआ। हांलाकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि दलित विद्रोह और चेतना का संचार का केन्द्र मराठी दलित साहित्य ही रहा है। जिसके मार्गदर्षन में ही हिन्दी दलित साहित्य आज पल्लवित और पुश्पित हो रहा है।
उल्लेखनीय है कि संत साहित्य और नाथ साहित्य में धार्मिक आडम्बरों से उठकर मानवीय संवेदना का संचार करने का प्रयास किया, जो दलित चेतना की वैचारिकता से सम्बंधित है, परन्तु इसके बीच लगभग 500 वर्शाें का लम्बा अन्तराल है। या कह सकते हैं कि दलित चेतना का उद्भव व संचरण मध्यकाल के निर्गुण संत कबीर व रविदास से होती हुई ‘हीरा डोम‘ और ‘अछूतानंद‘ तक हुआ है। इस मध्य कुछ कवित रहे होंगे, जिन्होंने वर्चस्ववादी हिन्दू धर्म और संस्कृति के विरूद्ध आवाज उठायी होगी। सन् 1914 के बाद भी दलित कविता कभी लोकगीतों के रूप में, तो कभी रविदास और कभी अम्बेडकर के जीवन और विचारों के काव्यात्मक आख्यानों के रूप में लगातार विकास करती ही। परन्तु साठ के दशक में मराठी के दलित कवियों ने अपनी विद्रोही चेतना से सम्पूर्ण मराठी साहित्य की नींव हिला दी। जिनमें नामदेव ढसाल का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इसी कारण उसे देश में ही नहीं, अन्तर्राश्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता प्राप्त हुई। वही से प्रेरणा लेकर हिन्दी के दलित कवियों ने भी कविता का सृजन प्रारम्भ किया, जो अब प्रतिश्ठित होकर ‘दलित साहित्य‘ नाम से स्थापित हो गया है।
 दलित साहित्य और दलित आन्दोलन का गहरा सम्बंध है। स्वतंत्रता से पूर्व भारत के विभिन्नहिस्सों में वर्ण-व्यवस्था और जातिभेद के विरूद्ध आन्दोलन हुए महाराश्ट्र, पंजाब में आदि धर्म आन्दोलन, उत्तर प्रदेश में आदि हिन्दू आन्दोलन, तमिलनाडु में आदि-द्रविड आन्दोलन, बंगाल में नामशूद्र-आन्दोलन, केरल में नारायण स्वामी गुरु आन्दोलन, तटीय आन्ध्र प्रदेश में आदि आन्ध्र आन्दोलन, हैदराबाद में आदि हिन्दू आन्दोलन शामिल था। लेकिन 1972 में दलित पैंथर की स्थापना के साथ ही दलित आन्दोलन को नया स्वरूप व ऊर्जा मिली। जिसने आन्दोलन को सक्रियता प्रदान करने के साथ-साथ उसे एक ऐसी तीव्रता भी प्रदान की जिसने दलित चेतना को विकसित किया। दलित साहित्य को गहरी आन्तरिक ऊर्जा से भी परिपूर्ण किया।
आज दलित साहित्य सवर्णों की आंखों की किरकिरी बनता जा रहा है, क्योंकि उनके हिसाब से दलित व्यक्ति कभी रचनाकार हो ही नहीं सकता और वे किसी भी रूप में दलित साहित्य के अस्तित्व और प्रासंगिकता को न समझते हुए उसको नकारने का प्रयास करते रहते हैं। मूर्धन्य साहित्यकार डाॅ. एन. सिंह अपनी पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं, ‘‘हिन्दी साहित्य में दलित विमर्ष जैसे-जैसे एक अनिवार्यता बनती गयी, वैसे-वैसे सवर्ण साहित्यकार इस बात पर केन्द्रित होते गये कि कैसे दलित साहित्यकारों में विघटन उत्पन्न किया जाए।‘‘3 विघटन की बात इसलिए कि अपने सवैंधानिक अधिकारों के प्रति ये लोग लामबंद न हो सके। दलित साहित्य पर बातचीन के दौरान यह प्रतिक्रिया आम हो चुकी है कि बस्स बहुत हो गया, जहाँ देखो दलित साहित्य की बात हो रही है, शोध में, पाठ्यक्रम में, रेडियों पर, टी.वी. पर, पत्र-पत्रिकाओं में, संगोश्ठियों में, कौन है दलित, कहाँ है दलित, अब कहाँ होता है भेदभाव। इस प्रतिक्रिया पर डाॅ. बैचन अपनी सटीक बात लिखते हैं, ‘‘अभी तक जो काम दलित साहित्य के प्रसंग में हो रहा है वह अभी नाकाफी है। दलित भारत की अभिव्यक्ति-रचनाषीलता समुद्री लहरों और उसमें छिपे रत्नों की भांति है, जो सामने है वह बूँद-दो बूँद भर है। जो व्यक्त होने-सृजित होने को बाकी है, वह महासिंधु है।‘‘4ओमप्रकाश वाल्मीकि इस व्यथा को इस प्रकार अभिव्यक्त करते हैं, ‘‘हिन्दी दलित साहित्य ने साहित्य और समाज सापेक्ष और वस्तुनिष्ठ बनने की प्रक्रिया से जोड़ने की पहल की है। हिन्दी के अनेक आलोचक, विद्वान आज भी दलित साहित्य की आन्तरिकता और उसकी चेतना को समझने के बजाय दलित रचनाकारों को कविता के शास्त्रीय तत्व सिखाने की कोषिष करते हैं, ऐसे आलोचक दलित साहित्य का, सामन्तवादी, ब्राह्मणवादी दृष्टि और मानसिकता के साथ, विष्लेषण करने की चेष्टा करते हैं।‘‘5प्रबुद्ध साहित्यकार आदरणीय डाॅ. जयप्रकाष कर्दम दलित साहित्य की स्वीकारोक्ति के विशय में लिखते हैं, ‘‘साहित्यकारों के एक बड़े वर्ग द्वारा दलित साहित्य को, चाहे मजबूरी में ही सही, स्वीकार कर लिया गया है।‘‘6बावजूद इसके दलित साहित्य के विरोध का स्वर अभी भी मुखरित हैं। दलित साहित्य के इन झंडाबरदारों में कोई इसे ‘कास्ट काम्पलेक्स‘ अर्थात जातीय चेतना से युक्त मानकर इसे उन्माद की संज्ञा देता है, तो कोई इसे साहित्यिक दुकानदारी घोशित करता है। यह कहने में कोई बुराई नहीं है कि दलित साहित्य उनको हज़म नहीं हो रहा है।


दलित साहित्य पर विभाजन का एक गंभीर आरोप लगाकर इसका विरोध किया जाता है। हिन्दी साहित्य के जाने-माने साहित्यकार-आलोचकों का मानना है कि दलित साहित्य से साहित्य जगत में विभाजन हुआ है, जो उचित नहीं है। चलो यदि मान भी लें कि साहित्य में विभाजन नहीं होना चाहिए। परन्तु क्या यह बात सिर्फ साहित्य पर ही लागू होनी चाहिए? डाॅ. जयप्रकाश कदर्म इस विशय में बड़ी सटीक और कड़वी टिप्पणी करते हुए कहते हैं, ‘‘समाज, धर्म, राजनीति, दर्षन, भाषा कौन सा ऐसा क्षेत्र है जहाँ विभाजन नहीं है। सारे धर्मों को मिटाकर एक धर्म की ही स्थापना हो, सारे दार्षनिक सिद्धान्तों को खत्म कर एक ही दर्षन हो, एक ही भाषा हो, जाति का नाष हो अर्थात् पूरा समाज संगठित और इकाई बनकर रहे इसके लिए आवाज क्यों नहीं उठती? क्या यह विभाजन उचित है? यदि यह विभाजन उचित है तो साहित्य का विभाजन भी उचित क्यों नहीं होना चाहिए? .......दलितों की संस्कृति न हिन्दू संस्कृति है, न इस्लाम संस्कृति, उनकी संस्कृति अलग है। उनकी परम्पराएँ, विष्वास और मान्यताएँ अलग हैं। जब संस्कृति साहित्य का आधार है तब पृथक सांस्कृतिक पहचान रखने वाले दलितों का भी अलग साहित्य होना आपत्तिजनक क्यों लगना चाहिए। फिर दलित साहित्य को लेकर इतनी हाय-तौबा क्यों है?‘‘7
निःसन्देह दलित साहित्य का विरोध करने वाली यह मानसिकता वही है, जो एक ओर दलितों को अछूत-अस्पृष्य घोशित कर वर्ण-व्यवस्था से बाहर अंत्यज बनाए रखती है और दूसरी ओर उनके द्वारा हिन्दू धर्म से इतर धर्म ग्रहण करने पर उनको अपना भाई कहकर गला फाड़कर चीख़ती है। आप दलितों को अपने घर में रखंेगे नहीं, उनका घर बनने नहीं देंगे, जो बने है उन्हें उजाड़ेंगे-जलाएंगें, यह तो सरासर दादागिरी है। कहने की जरूरत नहीं मित्रों कि इस दादागिरी में आकर दलित साहित्य अपने अस्तित्व के संघर्श को छोड़ ब्राह्मणवाद की चरण वन्दना करने लगेगा, यह सोच दलित साहित्य के विरोधियों को छोड़ देनी होगी।
शोशण चाहे मानसिक हो या सामाजिक, धार्मिक हो या आर्थिक, या फिर राजनैतिक, उसकी खिलाफत लाज़मी है। भले ही उसमें समय कितना भी लगे। भारत में हजारों वर्श बीत गये, धर्म के नाम पर एक वर्ग को सामाजिक, मानसिक और आर्थिक शोशण-अत्याचार सहते हुए, लेकिन जैसे ही इस वर्ग में थोड़ी चेतना आयी, उसके विद्रोह का विस्फोट हुआ। उस विस्फोट का ही परिणाम है दलित साहित्य। दलित साहित्य के विशय में डाॅ. एन. सिंह लिखते हैं, ‘‘दलित साहित्य दलित लेखकों द्वारा लिखित वह साहित्य है, जो सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और मानसिक रूप से उत्पीड़ित लोगों की बेहतरी के लिए लिखा गया हो, जो सच्चे अनुभवों पर आधारित हो और जीवन्त भाषा में लिखा गया हो।‘‘8दलित साहित्य की अवधारणा समझने हेतु कुछ अन्य दलित साहित्यकारों की परिभाशाएं देना भी यहाँ समीचीन होगा। 
‘‘दलित साहित्य वर्ण-व्यवस्था से पीड़ित समाज की वेदना का शब्द रूप है।‘‘9(कंवल भारती)
‘‘दलित साहित्य दलितोत्थान साहित्य, यानि दलितोत्थान हेतु लिखा गया, यह एक ऐसा साहित्य है, जो भोगे हुए सच पर आधारित है। जमीन से जुड़े दलित, शोशित, उपेक्षित, सर्वहारा वर्ग से सम्बंधित है जो दशा और दिशा को इंगित करता है और जिसमें विद्रोह और उद्बोधन के साथ संवेदना जागृत करने की ऊर्जा है।‘‘10(डाॅ. सोहनलाल ‘सुमनाक्षर‘)
‘‘दलित साहित्य वह है जिसे दलित लेखक लिखता है।‘‘11(डाॅ. धर्मवीर)
‘‘दलित साहित्य दलितों का, दलितों द्वारा, दलितों की भाशा में लिखा गया जीवन्त साहित्य है जो अपने सच्चे अनुभवों से सोए हुए साथियों को जगाकर उसकी गरिमा, गौरव, अस्मिता, आत्मभिमान तथा अस्तित्व के प्रति विश्वास करने का साहित्य है।‘‘12(डाॅ. प्रेमशंकर)
‘‘दलित साहित्य वह साहित्य है, जो सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनैतिक क्षेत्रों में पिछड़े हुए उत्पीड़ित, अपमानित शोशित जनों की पीड़ा को व्यक्त करता है। दलित साहित्य कठोर अनुभवों पर आधारित साहित्य है। दलित साहित्य में आक्रोश और विद्रोह की भावना प्रमुख है।‘‘13(माताप्रसाद)
‘‘दलित साहित्य यानि बहुजन समाज के सभी मानवीय अधिकारों और मूल्यों की प्राप्ति के उद्देश्यों से लिखा गया साहित्य है, जो संघर्श से उपजा है, जिसमें समता और बन्धुता का भाव है और वर्ण व्यवस्था से उपजे जातिभेद का विरोध है।‘‘14(मोहनदास नैमिशराय)
उपर्युक्त सभी परिभाशाओं पर देखने पर स्पश्ट हो जाता है कि दलित जातियों में उत्पन्न लेखकों द्वारा दलित जीवन की विसंगतियों पर लिखा गया साहित्य ही दलित साहित्य है, जो दलितों में परम्परागत शोशण परक मान्यताओं के विरूद्ध विद्रोह की भावना जागृत करता है, जिसमें आक्रोश का भाव है, जो विभेद के प्रति संघर्श करता है और शोशण से मुक्ति प्राप्त कर समतापूर्ण जीवन जीने के सूत्र सौंपता है, जो जातपाँत का विरोधी है और सबकों समान मानता है। वरिश्ठ दलित साहित्यकार आलोचक ओमप्रकाश वाल्मीकि के शब्दों में, ‘‘दलित साहित्य भाषावाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद को नकारता है तथा पूरे देष को एक सूत्र में पिरोने का कार्य करता है। दलित शब्द उन्हें सामाजिक पहचान देता है, जिनकी पहचान इतिहास के पृष्ठों से सदा के लिए मिटा दी गयी, जिनकी गौरवपूर्ण संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर कालचक्र में खो गयी।‘‘15
निश्चय ही दलित साहित्य सामाजिक न्याय की दृश्टि से भारतीय मुख्यधारा का साहित्य है। दलित साहित्य समता का साहित्य है, जो भारतीय सन्दर्भों में निश्चय ही एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर रहा हे। यह अपनी तीक्ष्णता, तीव्रता और जीवनान्मुख उपादेयता के कारण मुख्य स्थान रखता है। दलित सृजन की वेदना-विद्रोह और भविश्य निर्माण की व्यवस्थित रूपरेखा ने संसार भर के साहित्य प्रेमियों को आकर्शित किया है। वे जो साहित्य के जरिए भारत की जाति व्यवस्था, ऊँच-नीच, छुआछूत, सामाजिक बहिश्कार जैसी अमानवीय व्यवस्थाओं को समझना चाह रहे हैं, वे दलित साहित्य को अपने साहित्यिक ज्ञान का माध्यम बना रहे हैं। दलित साहित्यकारों हेतु कविता, कहानी, उपन्यास, आत्मकथा, निबंध आदि विधाएं अपनी संवेदनाओं, पीड़ा, भोगा हुआ कटु यथार्थ और व्यवथाओं को कहने का अच्छा माध्यम सिद्ध हुई हैं। अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने अतीत की रोशनी में वर्तमान को जाँचा-परखा है और एक स्वस्थ, समतामूलक भविश्य की कल्पना की है। जो साहित्य का मूल ध्येय होना चाहिए।
दलित साहित्य का मूल्यांकन करते वक्तेअक्सर एक अन्य प्रश्न सामने आता है कि क्या कोई गैर-दलित साहित्यकार भी दलित साहित्य लिख सकता है या क्या गैर-दलित साहित्यकारों द्वारा दलित समस्याओं पर लिखा गया साहित्य भी दलित साहित्य के अन्तर्गत आता है?साहित्य जगत में इस प्रश्न पर काफी चर्चा भी हो चुकी है और विवाद भी। परन्तु अब इस बात में कोई सन्देह शेश नहीं कि दलितों द्वारा दलितों के लिए लिखा गया साहित्य ही दलित साहित्य है, क्योंकि यदि कोई गैर-दलित लेखक दलित समस्याओं पर लिखता है तो उसमें सहानुभूति होती है, आक्रोश व संघर्श नहीं। इस सन्दर्भ में वरिश्ठ दलित साहित्यकार-पत्रकार मोहनदास नैमिशराय का व्यतव्य दृश्टव्य है, ‘‘दूर बैठकर कल्पना के आधार पर दलितों की पीड़ा के वर्णन को दलित साहित्य कहना न्यायसंगत नहीं है। यह बिल्कुल ऐसे ही होगा जैसे दलित, शोषितों को दूर से फेंकरकर रोटी दान करना। जबकि दलित वर्ग से आये लेखकों ने जो लिखा है उनकी रचनाओं में अथाह पीड़ा रही, आक्रोष का ज्वार बार-बार उफनता रहा, इसलिए कि वह सामाजिक विषमता के भुक्तभोगी थे।‘‘16डाॅ. एन. सिंह ने स्पश्ट माना है कि ‘‘हिन्दू धर्मषास्त्रों पर आस्था रखकर दलित समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता‘‘17 इस बात के ऐतिहासिक प्रमाण हंै, जिन पर डाॅ. विमल कीर्ति लिखते हैं, ‘‘जो महात्मा गांधी और विवेकानन्द हिन्दूवाद जातिवाद से मुक्त नहीं हुए, जो हिन्दू धर्मषास्त्रों की गुलामी से मुक्त नहीं हुए, वह दलितों की, पिछड़ों की, मुक्ति के आदर्ष पुरुष कैसे हो सकते हैं।‘‘18दलित्तेर साहित्यकारों हेतु दलितों की दुःख, पीड़ा, यन्त्रणा भयावह एवं रोमांचक हो सकती है, वे उसका वर्णन किसी दलित लेखक से भी बेहतर कर सकते हैं, लेकिन उसकी प्रामाणिकता सन्देहास्पद है और उससे न किसी दलित का भला होगा और न ही साहित्य का। वरिश्ठ हिन्दी साहित्यकार-आलोचक डाॅ. मैनेजर पांडेय का इस विशय कहना है, ‘‘दलित लेखकों के पास भले ही कला न हो, लेकिन उनके मन में कुछ कहने की, अपनी भावनाएँ व्यक्त करने की बेचैनी है। उनकी आत्माभिव्यक्ति की अकांक्षा को समझे बिना, कला की माँग करना उनके साथ ज्यादती है।‘‘19दलित लेखक/कवि ही दलितों की पीड़ा कलमबद्ध कर सकता है क्योंकि ‘‘दलित लेखक बेषक कला का बाजीगर नहीं है, लेकिन दलित समाज के प्रति उसकी धारणा, जागृति और प्रेरणा की है, जिससे वह षिक्षित संगठित और समस्याओं के समाधान के लिए संघर्षषील हो सके। दलित लेखक पात्रों को घृणित और पराजित नहीं दिखते, बल्कि उनकी पूर्ण जिजीविषा के साथ संघर्ष करते हुए चित्रित करते हैं, न कि आत्महत्या करते हुए। दलित साहित्य का उद्देष्य दलितों को अपराधी, हत्यारे और बागी बनाना भी नहीं है। दलित साहित्य दलितों को अपने हक की लड़ाई लड़ना सिखाता है।‘‘20वरिश्ठ दलित चिंतक डाॅ. एन. सिंह का यह व्यतव्य गैर-दलित लेखकों द्वारा लिखी दो कहानियांे (निश्कासन और ग्रहण) की समीक्षा करने बाद लिखा गया था। दलित साहित्य के मूल्यांकन के विशय में वरिश्ठ दलित चिंतक-साहित्यकार सूरजपाल चैहान का एक महत्वपूर्ण वक्तव्य पढ़ने को मिला जिसमें उन्होंने लिखा है, ‘‘अब तक दलित साहित्य के इतिहास में पाँच पड़ाव आये हैं। पहले चरण में वेदना की अभिव्यक्ति हुई, दूसरे चरण में आक्रोष की, तीसरे चरण ब्राह्मणवादी समाज व्यवस्था का सम्पूर्ण नकार रहा, चैथे चरण में अपनी दुर्दषा की सामाजिक स्थिति का गम्भीर विष्लेषण किया गया है और वर्तमान चरण में अर्थात् पांचवें चरण में नया विजन, नयी सामाजिक दृष्टि, वैकल्पिक समाजिक संरचना की खोज अम्बेडकरवादी विचार-दर्षन के अनुसार चल रही है।‘‘21लेकिन फिर भी यहां इतना अवष्य कहना चाहूँगा कि दलित साहित्यकार प्रेमचन्द की ‘दलित दृश्टि‘ पर जो सवाल उठाते हैं और उनकी रचनाओं को सम्मान की दृश्टि से न देखते हुए उनकी विचारधारा को दलित विरोधी करार देते हैं। इस तथ्य से पूर्णतः सहमति नहीं है। क्योंकि सभी जानते है, कि पहले प्रेमचन्द डाॅ. अम्बेडकर के विरोध में अवष्य थे, परन्तु समय के साथ-साथ वे अम्बेडर के उद्देष्य को समझने लगे थे। इसीलिए प्रेमचन्द साहित्य और सामाजिक दृश्टि ‘महाड आन्दोलन‘ (1927), ‘मन्दिर प्रवेष आन्दोलन‘ (1930) से प्रभावित भी और उनकी कहानियां ‘सद्गति‘, ‘ठाकुर का कुआँ‘, ‘दूध का दाम‘, ‘आहुति‘, ‘मंदिर‘ और ‘मन्त्र‘ में इन आन्दोलनों का प्रभाव भी देखा जा सकता है। उनकी कहानियांे में दलित चेतना का दृश्टिकोण भले ही उस स्तर का न हो, परन्तु साहित्य के माध्यम से प्रेमनचन्द ने दलित जीवन की सच्ची तस्वीर अवष्य प्रस्तुत की हैं। जो तत्कालीन रूप से सराहनीय और साहसिक साहित्यिक कदम था। वर्तमान परिप्रेक्ष्य को देखते हुए उनकी रचनाओं का मूल्यांकन करना, न्याय नहीं होगा। हालांकि इसमें भी कोई सन्देह नहीं होना चाहिए कि दलित साहित्य केवल दलितों का ही साहित्य है। वही इस पर इमानदारी से सोच-विचार कर सकता है क्योंकि वे स्वयं भुक्तभोगी भी हैं।
फिर भी मेरे ख्याल से ‘दलित साहित्य‘ को मात्र दलितों तक सीमिति नहीं किया जाना चाहिए। साहित्य साहित्य होता है, जिसके सृजन का अधिकार सभी को है। लेकन हाँ, निश्ठा, संवेदना और प्रतिबद्धता आवष्यक है। केवल बाहरी सहानुभूति से चेतना की धारा में उपस्थित नहीं हुआ जा सकता। गैर-दलित लेखन में यदि दलितों के प्रति वास्तविक सहानुभूति, संवेदना और उनकी मुक्ति की चिंता, संघर्श, वेदना और चेतना है, तो ऐसे साहित्य और साहित्यकारों का दलित साहित्यकारों द्वारा स्वागत किया जाना चाहिए।आगे चलकर वरिश्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार मोहनदास नैमिषराय ने भी इस बात से सहमति प्रकट करते हुए अपने एक साक्षात्कार में कहा है कि ‘‘दलित एवं षोशित वर्ग की पीड़ा को उभारने वाला साहित्य ही दलित साहित्य कहलाता है। चाहे किसी दलित द्वारा लिखा गया हो या फिर गैर दलितों द्वारा। और जो दलितों के बारे में लिखेगा वहीं दलित साहित्यकार कहलाएगा, यह जरूरी भी नहीं है। साहित्यकार सिर्फ साहित्यकार होता है। उसके मन में इसांफ की पाने की ललक होती है। जुल्म से लड़ने के लिए जब उसकी लेखनी चलती है तब वह इंसान होता है, न दलित होता है और न गैर दलित। लेकिन षर्त यह है कि दलितों पर लिखने वाला कथाकार इमानदारी से लिखे।‘‘22
दलित साहित्य के नामकरण पर कई सवाल उठाये जाते हैं, हालांकि आज साहित्यिक दृश्टिकोण से यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा कि आज ‘दलित साहित्य‘ को किसी की स्वीकारोक्ति की आवश्यकता नहीं है। वह अपने आप में सम्पूर्ण है और परम्परागत और समकालीन साहित्य को चुनौती दे रहा है। इन सबके बाद भी दलित साहित्य इस समय जिन समस्याओं से जूझ रहा है, उनमें एक नामकरण भी है। इसमें सिर्फ इतना कहना काफी होगा कि क्योंकि ‘दलित‘ शब्द स्वयं में व्यापक अर्थ में पीड़ित मानवता का प्रतिनिधित्व करता है। अर्थात् ‘दलित साहित्य‘ भारतीय समाज के उस ‘बहुजन‘ का साहित्य है, जो असमानता पर आधारित अभिजात्यवाद के कलात्मक झूठ का पर्दाफाश करने की क्षमता रखता है। कुछ विद्वानों का ऐसा मत भी है कि साहित्य दलित हो नहीं सकता और न ही साहित्यकार। अरे! भाई जब सन्त साहित्य हो सकता है, नाथ साहित्य हो सकता है, बौद्ध साहित्य, जैन साहित्य, आदिवासी साहित्य हो सकता है, तो फिर दलित साहित्य क्यों नहीं हो सकता? अतः यह बात निराधर व निरर्थक है, इस पर बहस करके अपनी ऊर्जा क्यों कम की जाए। वास्तव में जो इस प्रकार की बातें करते हैं उनका मन्तव्य कुछ और ही है। यह साहित्य दलितों की संवेदना, उनकी पीड़ा को, उनकी ही बोलचार में अभिव्यक्ति देता है। इसलिए इसे ‘दलित साहित्य‘ ही कहा जाने का आग्रह है। दलित साहित्य का अस्तित्व-अवधारणा को श्री रूपचन्द गौतम अपने शब्दों में इस प्रकार व्यक्त करते हैं, ‘‘दलित साहित्य से हमारा आषय सामाजिक न्याय के सन्दर्भ में संवैधानिक मूल्यों, स्वतन्त्रता एवं बन्धुता पर आधारित समता के समाज और सत्ता-व्यवस्था की निर्मित संरचना के लिए विचार से, संवेदना से, विचार के धरातल पर सचेत एवं सजग साहित्यकारों की संगठित क्रांति चेतना से सृजित अस्तिमतादर्षी साहित्य से है, जिनमें नैेतिकता, चरित्र और राष्ट्रीयता का प्राधान्य है। दलित होने की पीड़ा एवं शोषण की प्रथम अनुभूति दलित को ही हो सकती है न कि गैर-दलित को। अतः दलित साहित्य का अधिक प्रचलित अर्थ है वह साहित्य, जो दलितों का, दलितों के लिए, दलितों द्वारा चरित है।‘‘23
संवैधानिक मूल्यों, आधुनिक मान्यताओं और प्रजातांत्रिक विचारधारा ही ‘दलित साहित्य‘ का आधार बिन्दु है। शिक्षा के प्रचार-प्रसार ने सदियों से शोशित, पीड़ित एवं सामाजिक अवमानना के शिकार दलितों के मन में एक चेतना जगायी है, अधिकार-प्राप्ति की चेतना, स्वाभिमान से जीन की चेतना। आजादी के बाद संवैधानिक प्रावधानों के फलस्वरूप दलितों को अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर मिला और आज विविध क्षेत्रों में श्रेश्ठ प्रतिभाएं सामने आ रही हैं। दलित साहित्य ने मानव-विरोधी पक्षों के चेहरे से नकाब हटाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। यह इतना जीवंन और प्राणवान इसलिए लगता है क्योंकि इसमें रचा गया यथार्थ समाज में उपस्थित है। दलित साहित्य में दलितों के कश्ट और संताप ही नहीं वरन् सदियों के शोशण के विरूद्ध विद्रोह और कहीं-कहीं प्रतिहिंसा का स्वर भी मौजूद है। किसी भी भारतीय भाशा में लिखे गये दलित साहित्य में उनके समाज की पीड़ा, संघर्श और समतामूलक समाज की स्थापना के स्वप्न का चित्रण देखा जा सकता है।
दलित साहित्य का मूल लक्ष्य समतामूलक समाज की स्थापना ही है। शुरू से ही इसके माध्यम से ऐसे बीज बोये गये हैं, जो स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के वटवृक्ष का रूप ग्रहण करें और सामाजिक कुरीतियों का निर्मूलन करते हुए मानवाधिकारों को सुरक्षित रखें। दलित साहित्य की जरूरत को रेखांकित करते हुए साहित्यकार कमलेश्वर ने लिखते हैं, ‘‘दलित साहित्य का उन्मेष मात्र साहित्यिक पुनर्मूल्यांकन करना चाहता है। दलित साहित्य का निरपेक्षतावादियों, सौंदर्यवादियों और निराशावादियों के लिए भी एक उत्तर है, जो यह समझ बैठे हैं कि साहित्य की कोई सक्रिय भूमिका नहीं रह गयी है।‘‘24दलित साहित्य दलितोें-वंचितों हेतु एक उम्मीद की किरण बनकर उत्पन्न हुआ है। यही उम्मीद उनको ऊर्जावान और संभावनापूर्ण बनाए हुए है। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी पुस्तक ‘दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र‘ में दलित साहित्य को भविश्य का साहित्य कहा है, तो कँवल भारती ने अपने लेख ‘दलित साहित्य की अवधारणा‘ में दलित साहित्य को जीवन का और जिजीविशा का साहित्य कहा है।दलित साहित्यकारों के लिए कविता, कहानी, उपन्यास, आत्मकथा, निबंध, आलोचना आदि विधाएं अपनी संवेदनाओं और व्यथाओं को कहने का अच्छा माध्यम साबित हुई है। उनकी रचनाओं में उन्होंने अतीत की रोशनी में वर्तमान की पड़ताल की है और एक स्वस्थ, समतामूलक, लोकतांत्रिक भविश्य की कल्पना की है।
दलित साहित्य की प्रासंगिकता और मूल्यांकन का अनुसंधान करते हुए पाया कि वर्तमान में दलितों पर अत्याचारों की संख्या में पिछले 6-7 वर्शाें में 25 प्रतिशत वृद्धि हुई है। इसके कई पक्ष हैं लेकिन एक पक्ष जो अत्यन्त महत्वपूर्ण है वह यह कि दलित साहित्य के माध्यम से दलितों में एक चेतना का उदय हुआ है, जो उन्हें अत्याचार के विरूद्ध आंदोलन करने का साहस देता है। यदि अपवादित घटनाओं या चर्चाओं को छोड़ देवें तो, आज से दो दशक पूर्व तक भी आरक्षण के खिलाफत इस स्तर पर नहीं थी, जो वर्तमान में देखने को मिलती है। सोशल मीडिया से लेकर प्रिंट मीडिया के साथ इलेक्ट्राॅनिक मीडिया तक में आरक्षण के विरूद्ध कैम्पेनिंग चलायी जा रही है। क्यों? क्योंकि आज दलित-पिछड़ा वर्ग अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होकर शिक्षित बन रहा है। दलित युवा वर्ग शिक्षित होकर आज अपने को स्थापित करने हेतु कड़ा संघर्श कर रहा है। यह बात सवर्णवादियों और उनके पैरोकारों का हजम नहीं हो रही है। बगैर आरक्षण के पीछे की भावना, विचार व अर्थ को समझे, अपने राजनैतिक और धार्मिक लाभ-स्वार्थ के चलते एक वर्ग देश के युवाओं को आरक्षण के नाम पर उनमें फूट डाल उन्हें आपस में एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर रहा है। साथियों, यदि पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर कभी चिंतन करेंगे, तो पाएंगे कि यदि बाबा साहेब अम्बेडकर ने भारतीय संविधान में दलितों-वंचितों-पिछड़ों यहाँ तक कि महिलाओं के अधिकारों का संरक्षण न किया होता, तो आज उनकी स्थिति पूर्व की भांति जानवरों से भी गयी गुजरी होती। यह हमारो दुर्भाग्य है कि स्वतंत्रता के 71 वर्श पूर्ण हो गये है, परन्तु आज भी हमारे देश में कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ जाति के नाम पर दलितों के साथ घिनौने कृत्य किये जाते हैं, जो यदि कागज पर लिखें जाये तो कलम भी रो पड़े। जिसकी कुछ झल्कियांच्च्ज्के माध्यम से दिखाने का प्रयास करूंगा। फिर ऐसे में यदि आज दलितों में षिक्षा के माध्यम से आगे बढ़ने, सम्मान से जीवन यापन करने की भावना का उदय हो रहा है, तो कुछेकलोगों को क्यों तकलीफ हो रही है। यहाँ इस प्रसंग की चर्चा इसलिए भी प्रसांगिक है, क्योंकि दलित हो या वंचित या फिर स्त्री ही क्यों न हो सभी में अपने अधिकारों व सम्मान के प्रति जागरूकता का बीज दलित साहित्य, चाहें वह किसी भी रूप या भाशा में हो, ने बोया है। यह महत कार्य षिक्षा से होता हुआ आज दलित साहित्य के रूप में हमारे सामने है। इसकी पुश्टि वरिश्ठ षिक्षाविद्, दलित विचारक व चिंतक डाॅ. विमल थोरात अपने एक संपादकीय में लिखते हैं, ‘‘दलित साहित्य की समता की चाहत और मुखर सषक्त सृजनात्मकता से ब्राह्मणवाद त्राहि-त्राहि कर उठा और इरादतन समतावादी मूल्यों की अवहेलना करके और प्रतिक्रिया में ब्राह्मणवाद आज अधिक मजबूत हुआ है।‘‘25यह कहना भी जरूरी है कि आज दलित और वंचित वर्गों में दलित अस्मिता की मेधा दलित साहित्य के फलस्वरूप ही आयी है।
दलित साहित्य के नाम से अभी जो नाक भौंएं चढ़ाते हैं और इसके अस्तित्व, प्रासंगिकता और प्रामाणिकता पर सवाल खड़े करते हैं या जो दलित साहित्य को जातिवादी साहित्य बताने की अज्ञानता प्रदर्षित करते हैं,उनको यह जान लेना जरूरी है कि यह साहित्य ही मानव को मानव-प्रेम यानि मानवता की ओर ले जा रहा है, वैदिक काल से लेकर अभी 70-80 के दशकों में जो परम्परागत साहित्य लिखा गया, वह एक पक्षीय था। वह साहित्यिक दृश्टिकोण से उत्कृश्ट साहित्य भला ही रहा हो, परन्तु ‘साहित्य समाज का दर्पण होता है‘, इस तथ्य पर खरा उतरता प्रतीत नहीं होता। वरिश्ठ दलित चितंक, साहित्यकार व आलोचक सूरजपाल चैहन का दलित साहित्य की आवश्यकता व प्रासंगिता के विशय में सपश्ट मत है कि ‘‘हिन्दी के गैर-दलित साहित्य में दलितों का अपमान और हीनताबोध के अलावा कुछ नहीं है। दलित चेतना की सार्थक अभिव्यक्ति दलित रचनाकारों की रचनाओं में ही देखी जा सकती है। सैकड़ों वर्षों के बाद अब मूक क्रंदन को दलित साहित्य के माध्यम से वाणी मिल रही है। सच कहा जाए तो हिन्दी का दलित साहित्य एक जलते हुए दीपक के समान है, जिसकी रोषनी से राह से भटका हुआ पाठक सोच-समझकर अपने गन्तव्य की ओर चल पड़ता है।‘‘26दलित साहित्य के विशय में किसी की कोई भी राय क्यों न हो यह तो सर्वमान्य है कि दलित साहित्य आज की जरूरत है। दलित साहित्य आज पारम्परिक साहित्य के समानान्तर ही गतिमान है। 
निष्चय ही दलित साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र निर्धारित करना तात्विक रूप से कठिन कार्य है। क्योंकि दलित साहित्य मात्र साहित्य नहीं है बल्कि दलितों की जिंदगी, संस्कृति व राजनीति से उसका प्रत्यक्ष सम्बंध है। यह सच है कि दलित साहित्य की वस्तु में ना ताजमहल का सौन्दर्य और न ही लाल किले जैसी भव्यता। मामूली से मामूली गरीब, लाचार, अनपढ़, फटीचर, घर-बार हीन, गूंगा ही इस साहित्य के केन्द्र में होता हुआ उसका नायक है। उसे इतिहास की किसी प्रकार की कोई भी समझ नहीं है। उसका पूरा दिन दो वक्त की रोटी जुटाने में लग जाता है और फिर भी वह भूखा रहता है। इस भूखे-गूंगे आदमी की आवाज है ‘दलित साहित्य‘ और यदि आप भूखे आदमी की कराह-पीड़ा से उपजे साहित्य में साहित्य का परम्परागत सौन्दर्य ढूंढते हैं तो इसे क्या कहा जाए? यह प्रष्न आपके लिए। अपने एक लेख में सूरजपाल चैहान लिखते हैं, ‘‘यह पहली बार दलित साहित्य ने ही किया है कि अपने सौन्दर्यषास्त्रीय कसौटियां ही बदल दीं। अब सौन्दर्यषास्त्र की जगह समाजषास्त्र प्रमुख हो गया है।‘‘27इस सम्दर्भ में डाॅ. ष्यौराज बैचेन का मत उल्लेखनीय है, ‘‘ऐसा नहीं है कि दलित साहित्य में सौन्दर्यषास्त्र नहीं है। अपितु जीवंत और भारतीय मूल का सौन्दर्य केवल दलित साहित्य में ही मिल सकता है। इसके लिए हमें भाषा, शैली, भाव, बिम्बों, प्रतीकों, अलंकारों की दलित मौलिकता को मथकर सौन्दर्य देना है।‘‘28दलित साहित्य के गंभीर चिंतक प्रोफेसर टी.वी. कट्टीमनी ने ‘दलित साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र का समाजविज्ञान‘ नामक षीर्शक में लिखा है, ‘‘क्योंकि दलित साहित्य केवल ग्रांथिक नहीं है, जो कहा नहीं गया है, वह अभी भी अपार और असीम है। दलित साहित्य एक गहरे घाव की कहानी है और घाव न भरने की कहानी है। दलित कहानी एक दर्दभरा राग है। इसी तरह अपने निजी दुःख को परिवेष की पीड़ा के रूप में देखना, दलित साहित्य के सौन्दर्यषास्त्र का अपना महत्व हैं पारम्परिक सौन्दर्यषास्त्र के मानदंड अपने मायने खो बैठे हैं, क्योंकि उन मानदंडों, का, समाज विज्ञान के साथ कोई वास्ता ही नहीं था। लेकिन आज दलित सौन्दर्यषास्त्र का यदि रूपायन हुआ है, तो उसके रूपायन में समाज विज्ञान का मेजर शेयर है, क्योंकि दलित साहित्य की मूल ऊर्जा स्वयं भारतीय समाज है।‘‘29हिन्दी साहित्य में हिन्दी दलित साहित्यकारों को जन्म देने वाले और प्रतिश्ठित करने वाले महान संपादक, साहित्यकार व आलोचक डाॅ. राजेन्द्र यादव का वक्तव्य साहित्य के नवीन सौन्दर्यशास्त्र की समझ को विकसित करता है। वे लिखते है, ‘‘जो नया सौंदर्यषास्त्र बनेगा, वह संघर्ष से शुरू होगा, उस यातना से शुरू होगा, चाहे वह उसका रिअलाइज करने अथवा उस यातना को, उसकी तकलीफ को, उसके भेदक रूप को समझने के रूप में हो और उसके बाद बदलने की मानसिकता के रूप में हो, जिसे हम संघर्ष कह सकते हैं। तीसरा-एक स्वप्न के रूप में होगा, हमें करना क्या है? हमें समानांतर सौंदर्यषास्त्र देना है, वैकल्पिक समाज बनाना है, यह सारा संघर्ष साहित्य में भी  है और समाज में भी।‘‘30
दलित साहित्य में उपर्युक्त तीनों तत्व विद्यमान हैं। अंबेडकर-दर्शन एवं विचार ने दलित साहित्य में संघर्शशीलता को गति प्रदान की है। वर्ण व्यवस्था और भारतीय समाज-व्यवस्था ने दलितों पर जो अमानुशिक उत्पीड़न किया है, उस यातना की निचली तह से उठकर ऊपर आनेवाला दलित साहित्यकार अपने भीतर जिस आँच को अनुभव करता है, वह भुक्तभोगी ही समझ सकता है। दलित साहित्य की दिषा और दृश्टि उसे जीवनतता प्रदान करती है। प्रबुद्ध साहित्यकार डाॅ. कुमुद पांवड़े के अनुसार, ‘‘दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र पर विचार करने हेतु किसी भी रचना के ‘आकार‘ व ‘आषय‘ को ध्यान में रखना होगा। जिस रूप में हम देखते हैं वह उस रचना का ‘आकार‘ होता है और इसमें जो सारतात्विक बोध विद्यमान होता है, वह ‘आषय‘कहलाता है। हिंदी साहित्य हो या संस्कृत साहित्य वह आकृतिनिष्ठ ही है। वहाँ आकार की प्रधानता है। शब्द की रमणीयता समीक्षकों के लिए बौद्धिक विलास का काम करती है।‘‘31
मित्रों, दलित साहित्य किसी को क्रोधित या चिढ़ाने हेतु नहीं रचा जा रहा है। दलित लेखन शब्दों का जाल नहीं बुन रहा है और नहीं शब्दों की जुगाली करता है। प्रत्येक विधा मंे, परिदृष्यों में सहजता और स्वाभविकता कायम रखना दलित साहित्य की षिल्पगत विषेशता है।दलित साहित्यकारों ने गहराई से अपने परिवेष का अनुसंधान कर अध्ययन किया है। तर्क-विवेक के आधार पर अपने परिवेष की सच्चाइयों का मूल्यांकन किया है। अपने समुदाय के निजी जीवन की स्थितियों, दशाओं और परिस्थितियों की जड़ में विद्यमान कारणों पर गहन विचार-मंथन किया है। उनके विचारों को अनुभवों ने पोशण प्रदान कर उन्हें पुश्ट किया, जिसको उन्होंने कलमबद्ध कर दलित साहित्य का निर्माण किया।
दलित साहित्य की उपलब्धि और सम्भावनाओं के विशय में इतना ही कहना उचित होगा कि आज दलित साहित्य अपनी पहचान के संकट से गुजरते हुए एक सच्चाई बन चुका है। उसके लिए भाशा का प्रष्न अति महत्वपूर्ण नहीं रह गया है, अब भारत की लगभग सभी भाशाओं में दलित साहित्य रचा जा रहा है।  जहाँ तक इसके भविश्य का सवाल है, तो समस्त हिन्दी के विद्वान इसके भविश्य को लेकर आश्वस्त हैं। हिन्दी साहित्य जगत के प्रसिद्ध आलोचक डाॅ. नामवर सिंह के कहते हैं, ‘‘आज इसे स्वीकार करने के अलावा कोई चारा नहीं है। दलितों द्वारा लिखा गया साहित्य, मात्रा और गुण दोनों ही में काफी आ गया है।....इसका भविष्य उज्ज्वल है।‘‘32हिन्दीसाहित्यकार कमलेष्वर मानते हैं कि ‘‘भविष्य तय है। तय इसलिए क्योंकि दलित साहित्य अब तक ठीक दिषा की ओर चला है। दलित साहित्य और साहित्यकार ने भूमण्डीकरण और अन्य सवालों का सामना किया है। दलितों की लोकधर्मिता, लोकधर्मी संस्कृति ही इन सवालों का जवाब हो सकती है। उन्हीं की संस्कृति अब बड़े रूप में हमारे सामने आएगी।‘‘33दलित साहित्य के विशय में अशोक वाजपेयी की मान्यता है कि-‘‘दलित विमर्ष ने जो नयी प्रष्नवाचकता पैदा की है वह हमारे साहित्य, समाज और राजनीति के लिए अन्ततः गुणकर है और वह ऐसी प्रवृत्ति है जो आगे काफी समय सक्रिय और उर्वर रहने वाली है।‘‘34डाॅ. रमणिका गुप्ता, जो दलित साहित्य आन्दोलन के साथ प्रारम्भ से ही जुड़ी रही हैं, की बेबाक टिप्पणी है, ‘‘दलित साहित्य का ही भविष्य उज्ज्वल है, बाकी सब कुंठाग्रस्त हैं। जो अभिजात साहित्य है, अपनी-अपनी कुंठाएँ लिखता है। दलित और आदिवासी पूरे समाज की बात लिखते हैं। परिवर्तन की बात करते है। यह गैर दलित साहित्य और अहम् को तोड़ता है। यह देवता और भगवान् नहीं, मनुष्य की बात करता है।‘‘35
दलित साहित्यकारों की रचनाओं का विश्वविद्यालय स्तर पर पाठ्यक्रमों में पढ़ाया जाना इस बात का द्योतक है कि वर्तमान सामाजिक स्तर पर इन साहित्य की अनिवार्यता है। यह अनिवार्यता इसलिए भी है क्योंकि जिन दबे-कुचलों को इतिहास के पन्नों से दूर रखा गया, आज उनकी प्रासंगिकता उतनी ही बढ़ गयी है।
हिन्दी दलित साहित्य के पुराने रचनाकारों ने जिन्होंने संघर्श करके साहित्य जगत में जमीन तलाश की और एक नयी दृश्टि व दिशा प्रदान की उनका संक्षेप में नाम लेना न्याय संगत होगा- ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिषराय, डाॅ. जय प्रकाश कर्दम, डाॅ. एन. सिंह, डाॅ. ष्यौराज सिंह ‘बैचेन‘, कंवल भारती, डाॅ. सुशीला टाॅकभौरे, सोनकर आदि का नाम प्रमुखता से आता है। जिन्होंने लगभग सभी विधाओं दलित साहित्य को समृद्धि प्रदान की। वहीं दूसरी ओर युवा पीढ़ी के हिन्दी दलित साहित्यकार भी इस दृश्टि और दिशा को विश्वस्तर पर फलक दे रहे हैं, जिनमें मुख्य- अनीता भारती, रजतरानी ‘मीनू‘, रजनीतिलक, डाॅ. सुमित्रा मरौल, डाॅ. कौशल पंवार, सुरेश कुमार, डाॅ. सूरज बड़त्या, अमित कुमार, डाॅ. कर्मानन्द आर्य आदि के नाम आते हैं।
थोड़ी बात की करें तो, मीडिया में दलितों, पिछड़ों व महिलाओं की स्थिति और भागीदारी बड़ी निराषाजनक है। वंचित तबके के यदि न के बराबर पत्रकार होंगे तो खबरों का चयन जातिगत पूर्वाग्रहों के आधार पर ही होगा। इसका सषक्त उदाहरण है ‘आषा कोटल‘, जो अखिल भारतीय दलित महिला अधिकार मंच की संयुक्त महासचिव है। जिसने गत 1 जुलाई, 2018 को संयुक्त राश्ट्र के दलित मानवाधिकारी काउंसिल में भाशण दिया है, जो सम्पूर्ण भारत के लिए गर्व की बात है। आपको यह खबर पता थी या है? क्योंकि यह खबर न आपको प्रिंट मीडिया में दिखी होगी और न ही इलेक्ट्राॅनिक मीडिया में। यह तो उपलब्धि की बात है, यहाँ की मीडिया तो इस कदर जातिगत पूर्वाग्रहों से युक्त है कि दलितों-पिछड़ों पर होने वाले अत्याचारों की खबरों को भी पचा जाता है। यदि दिखाता भी है तो सिर्फ टीआरपी बढ़ाने के लिए यानि नमक-मिर्च लगाकर। जो तिरस्कार दलितों को अपने षहर-गांव, कस्बांे, कार्य स्थलों में नहीं झेलना पड़ता वह मीडिया में झेलना पड़ता है। जितना जातिगत भेदभाव हमारे समाज, षासन-प्रषासन में है उससे कहीं ज्यादा मीडिया में देखने को मिल जाएगा।
दलित उत्पीड़न की खबरें भले ही उस अनुपात में न सही, लेकिन यदाकदा चटकारे के रूप में मीडिया में दिख ही जाती हैं। मगर दलित साहित्य के सन्दर्भ में मीडिया की भूमिका अपवाद छोड़ षून्य ही है। दलित आन्दोलन आज लेखन के माध्यम से होता हुआ ‘दलित साहित्य‘ के रूप में हमारे सामने है। लेकिन लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया ने कभी भी दलित लेखन के रू-ब-रू होकर उसके सवालों से टकराने का जरा भी प्रयास नहीं किया। पत्रकार हीरालाल नागर ने लिखा है, ‘‘दलितों के अधिकारों तथा उनके साथ होने वाले अत्याचारों से प्रिंट तथा इलेक्ट्राॅनिक्स मीडिया ने कभी परहेज नहीं किया, मगर उसने दलित साहित्य को कभी गम्भीरता से नहीं लिया।‘‘35 दलितों के विशय में मीडिया का नजरिया भी सषक्त नहीं है, बल्कि मीडिया दलितों पर हो रहे अत्याचारों की खबरों के नाम पर बाजारीकरण करता है, मीडिया अतिरंजना के साथ उसे उत्पाद के रूप में बदलता है और दलितों के साथ खास कोण के साथ व्यवहार किया जा रहा है।
निश्कर्शतः यदि कहना उपयुक्त होगा किदलित साहित्य वास्तव में मुक्ति का साहित्य है। दलित जीवन अब साहित्य की वस्तु बन गया है, अतः इसमें जो उद्देश्य उभरकर आये हैं, उनमें, दलितत्व से मुक्ति, शूद्रत्व से मुक्ति, ऊँच-नीच के पदानुक्रम से मुक्ति, शोशण से मुक्ति और समतावादी समाज की दृश्टि और स्थापना भी है।साथ ही दलित साहित्य के माध्यम से यथासम्भव समस्याओं की तह में पैठ कर निरपेक्ष भाव से उन्हें प्रकाषमें आया है। इस साहित्य के माध्यम से ही दलित जातियां अपने पिछड़ेपन से अवगत हो उनमें चेतना जागृत हुई है। जिससे वे स्वयं भी अपना विकास भगवान भरोसे ने मानकर स्वयं प्रयास करें। दलित साहित्य ने भारतीय साहित्य को नये अनुभव, नयी अनुभूति, नये शब्द, नये नायक, नयी दृश्टि और वेदना-विद्रोह का रसायन दिया है। साथ ही इसने भारतीय साहित्य समीक्षा को आत्म-परीक्षण करने के लिए लगा दिया है, और पाठक समीक्षकों के मन में मूलभूत प्रश्न पैदा किये है। निःसन्देह दलित साहित्य के कारण ही भारतीय साहित्य की समीक्षा का क्षितिज विस्तृत हुआ है और यह पाठकों की अभिरूचि बदलनें में भी सहायक हुआ है।यह शोधालेख दलित साहित्य की पड़ताल करने हेतु छोटा सा प्रयास है मित्रों।
जो विचार अन्याय, अपराध, गुलामी, षोशण, छुआछूत और असमानता के विरूद्ध संघर्श करने की क्षमता और आक्रोष पैदा करें, वही दलित चेतना है। मेरे ख्याल से यह सभी न्यायप्रिय लोगों की भी चेतना होनी चाहिए, जिसे मानवीय चेतना भी कह सकते हैं। मानवीय चेतना हर चेतस व्यक्ति के व्यक्तित्व का अनिवार्य हिस्सा है। निःसन्देह जो व्यक्ति मानवीय चेतना और न्याय से लैस है, वह दलित चेतना या दलित साहित्य का पक्षधर आखिर क्यों नहीं होगा। समाज में न्याय पसंद और समानता का पक्षधर व्यक्ति दलित चेतना के बिल्कुल करीब है। इसलिए प्रत्येक चेतनाषील व्यक्ति को हमेषा षोशितों, दलितों, पिछड़ों की आवाज को बुलन्द करना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया तो भारतीय साहित्य में सामाजिक न्याय की अवधारणा जिसकी की अति आवष्यकता है, को प्रवाहमान कैसे बनाया जा सकेगा।
अतः आप सहमत होंगे कि आज दलित साहित्य अपनी व्यापकता में इसलिए विषेश महत्व रखता है कि इसने अब तक हाषिए पर पड़े हुए दलित समुदाय को केन्द्र में रखा। इसमें दलित समुदायों की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक सभी स्थितियों के प्रति संवेदनषीलता जाहिर की है। दलित समाज का सर्वांगीण विकास, उसकी समृद्धि ही दलित साहित्य का प्रमुख लक्ष्य है। 
अंत में डाॅ. एन. सिंह की कविता ‘आओ साथ बढ़े‘ की चंद पंक्तियां साझा करना चाहूँगा कि-
‘‘दुकान हमारी भी है
और तुम्हारी भी
ये बात और है कि
ळमारी दुकान पर बिकता है
जूता
और तुम्हारी दुकान पर
रामनामी
हमारे लिए जूते का महत्व
वही है
हमारे लिए जो है रामनामी का
आओ समानता का
ये तार पकड़ें
एकता के सूत्र गढ़ें
साथ बढ़ें।‘‘ 
                              (डाॅ. एन. सिंह)


---सन्दर्भ सूची---
सामाजिक न्याय और दलित साहित्य, सं.-डाॅ. श्यौराज सिंह चैहान, संपादकीय से, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2014, पृ.-11
हिंदी दलित साहित्य संचयिता, सं.-प्रीति सागर, भूमिका से, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2015, पृ.-6
दलित साहित्य के प्रतिमान, ले.-डाॅ. एन. सिंह, भूमिका से, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2012, पृ.-9
सामाजिक न्याय और दलित साहित्य, सं.-डाॅ श्यौराज सिंह चैहान, संपादकीय से, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ-12
दलित साहित्य ‘अनुभव, संघर्श एवं यथार्थ‘, ले.-ओम प्रकाश वाल्मीकि, राधाकृश्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2017 पृ.-33
इक्कीसवीं सदी में दलित आंदोलन (साहित्य एवं समाज-चिंतन), ले.-डाॅ. जयप्रकाश कर्दम, पंकज पुस्तक मंदिर, दिल्ली, 2010, पृ.-34
वही, पृ.-35
दलित साहित्य के प्रतिमान, ले.-डाॅ. एन. सिंह, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2012, पृ.-23
दलित कविता का अर्थ, ले. कंवल भारती, दलित साहित्यः चिंतन के विविध आयाम, सं.-डाॅ. एन. सिंह, पृ.-97
दलित साहित्य के प्रतिमान, ले.-डाॅ. एन. सिंह, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2012, पृ.-69 से उद्धृत
दलित साहित्य की परिभाशाः समग्रता और पूर्णता की ओर, ले.-डाॅ. धर्मवीर, दलित साहित्य वार्शिकी 1999, सं.-डाॅ. जयप्रकाश कर्दम, पृ.-39
दलित संघर्शः संस्कृति एवं साहित्य की सबल अभिव्यक्ति, ले.-डाॅ. प्रेमशंकर, प्रशासक, त्रैमासिक, मसूरी, जनवरी-मार्च 1997, खण्ड-11, पृ.-212-213
दलित साहित्य के प्रतिमान, ले.-डाॅ. एन. सिंह, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2012, पृ.-70 से उद्धृत
वही, पृ.-70 से उद्धृत
दलित साहित्य के प्रतिमान, ले.-डाॅ. एन. सिंह, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2012, पृ.-70
भारत में दलित लेखकों की संघर्श यात्रा, ले.- मोहनदास नैमिशराय, भीम चेतना (स्मारिका), 14.04.1994, प्र.सं. डाॅ. तारा परमार, उज्जैन, पृ.-23
दलित साहित्य के प्रतिमान, ले.-डाॅ. एन. सिंह, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2012, पृ.-73
वक्त की बात, सम्पादकीय, ले.-डाॅ. विमल कीर्ति, ‘अंगुतर‘, त्रैमासिक, नागपुर, अप्रेल-जून 1994, पृ.-5
मासिक पत्रिका ‘तद्भव‘, अंक-4, अक्टूबर, वर्श 2000, पृ.-50
दलित साहित्य के प्रतिमान, ले.-डाॅ. एन. सिंह, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2012, पृ.-15
ताकि सनद रहे- समकालीन हिन्दी दलित साहित्यः एक विचार-विमर्श, वाणी प्रकाशन, 2017 पृ.-48
दलित पत्रकारिताः सामाजिक व राजनैतिक चिंतन, ले.-मोहनदास नैमिषराय, नटराज प्रकाषन दिल्ली, 2005, पृ.-242
दलित लेखक और दलित साहित्य, शैलेष मटियानी, राश्ट्रीय सहारा, दैनिक, दिल्ली, 26.11.1992
हिंदी दलित साहित्य संचयिता, सं.-प्रीति सागर, भूमिका से, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2015, पृ.-6
जाति प्रथा के अभिशाप से त्रस्त विश्व का महान जनतंत्र, ले.-डाॅ. विमल थोरात, ‘दलित अस्मिता‘ संयुक्तांक-8,9, जुलाई-दिसंबर, 2012, पृ.-6
ताकि सनद रहे- समकालीन हिन्दी दलित साहित्यः एक विचार-विमर्श, वाणी प्रकाशन, 2017 पृ.-46
वही, पृ.-47
सामाजिक न्याय और दलित साहित्य, सं.-डाॅ श्यौराज सिंह चैहान, संपादकीय से, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2014, पृ-10
वही. पृ.-26-27
राजेन्द्र यादव, युद्धरत आम आदमी, सं.-डाॅ. रमणिका गुप्ता, अंक 41, 1998, पृ.-126
डाॅ. कुमुद पांवडे, दलित साहित्य और सौंदर्यशास्त्र, युद्धरत आम आदमी, सं.-डाॅ. रमणिका गुप्ता, अंक 41, 1998 पृ. 92-93
मासिक पत्रिका ‘हंस‘, दिल्ली, अगस्त 2004, पृ.194
वही, पृ.197
वही, पृ.223
वही, पृ.233
दलित साहित्य और मीडिया, ले.-डाॅ. हरिसंह पाल, पु.-सामाजिक न्याय और दलित साहित्य, सं.-डाॅ. श्यौराज सिंह चैहान, संपादकीय से, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2014, पृ.314  






















Friday, January 22, 2021

फ़िल्म रिव्यू : रंगों में डूबती उतराती द लास्ट कलर


 साल 2019 में एक फ़िल्म खूब तारीफें बटोरती है और ऑस्कर तक के लिए नामित होती है लेकिन जब साल 2020 में वह रिलीज की जाती है तो उसकी टीम से जुड़े निर्देशक कहते हैं कि उनसे रुपए मांगे गए हैं अच्छे रिव्यू या अच्छी समीक्षा और चार स्टार रेटिंग देने के लिए। मैं इस फ़िल्म को मात्र 2 स्टार दूँगा। मेरी इस फ़िल्म से जुड़े किसी भी टीम से कोई दुश्मनी या मित्रता नहीं है। लेकिन फ़िल्म की थीम अच्छी होने के बावजूद इसमें काफी झोल है जो आप देखेंगे तो खुद समझ जाएंगे। 


खैर फ़िल्म की कहानी की बात करें तो एक छोटी सी लड़की है 6-7 साल की जो बनारस में गंगा तट पर रहती है। छोटी सी लड़की है इसलिए नाम भी छोटी ही है। उसी तट पर एक उसका मानस भाई है चिंटू। छोटी पढ़ाई कर रही है पर कहाँ यह नहीं बताया गया है बस उसे तीन सौ रुपए स्कूल की फीस भरनी है। वे दोनों फूल बेचते हैं और छोटी रस्सी पर भी चलती है यानी खेल तमाशा भी दिखाती है। चिंटू जुए में रुपए हार जाता है उसके पास फिर से जमा किए हुए साठ रुपए ही हैं उसका भी वह जुआ खेलना चाहता है। इसी चक्कर में चार महीने हवालात में बंद हो जाता है। छोटी उसकी तलाश में है। इसी तलाश में वह एक किन्नर और एक विधवा से मिलती है। विधवा बनी नीना गुप्ता जिसका नूर नाम है के साथ छोटी का रिश्ता अच्छा बन जाता है। एक दिन अनारकली यानी किन्नर का मर्डर कर दिया जाता है राजा नाम के दरोगा द्वारा। छोटी ये सब देख लेती है और वह डर जाती है। नूर उसकी खोज करती है। उसे अपने विधवा आश्रम लेकर आती है। लेकिन वहां राजा आ जाता है छोटी को ले जाकर जेल में बंद कर देता है। यहां छोटी और चिंटू एक साथ दिखाई देते हैं लेकिन उनको मिलते हुए नहीं दिखाया गया है। खैर आश्रम वाले नूर को छत से फेंक कर मार देते हैं अब जबकि एक दिन छोटी ने नूर से कहा था कि वह उसे रंग लगाएगी उसका पसंदीदा रंग गहरा गुलाबी तो वह उसकी जा रही मृत्यु की डोली पर ही रंग फेंक देती है और इसके बाद कहानी घूमती है एक बार फिर से उसी आश्रम में होली बनाने को लेकर। दरअसल वह छोटी अब सुप्रीम कोर्ट में सीनियर वकील है उसी ने लड़ाई करके किन्नरों के लिए और विधवाओं के हकों में फैसले लिखवाए हैं। जाहिर है कहानी अच्छी है। इसके कुछ एक संवाद लाजवाब हैं। 

लेकिन इस फ़िल्म में झोल भी है मसलन छोटी किस स्कूल में पढ़ रही है? आगे की पढ़ाई उसने कैसे मुक्कमल की? उसे रास्ता किसने दिखाया? चिंटू का अंत में क्या हुआ? अनारकली के मामले का क्या हुआ? इस तरह के कई सारे सवाल यह फ़िल्म छोड़कर जाती है। कभी कभी इस फ़िल्म का  अतिशय लम्बा होना भी अखरने लगता है। फ़िल्म के एक दो संवाद दिल जीत लेते हैं मसलन


"छोटी तेरे को ना जीवन में कई बार ऐसे लोग मिलेंगे जो तुझे गिराना चाहेंगे, हराना चाहेंगे, दबाना चाहेंगे तो बिल्कुल मत डरना, बिल्कुल पीछे मत हटना समझ गई। ये तेरे को अछूत कहते हैं ना तू इतना ऊपर उठना ऐसी ऊंचाइयों को छूना कि ये तुझे छू भी न सके।"


"मेरे दादा जी चाहते थे मैं पढूं। तब देश नया नया आजाद हुआ था। दादा जी कहते थे अगर देश को आगे बढ़ना है तो देश की बेटियों को पढ़ाना जरूरी है।"


लेकिन खाली एक दो संवाद से पूरी फिल्म को नहीं चलाया या ढोया जा सकता। अभिनय की बात करें तो नीना गुप्ता सबसे उत्तम रहीं हैं। उनकी पिछली कुछ फिल्में भी लाजवाब थीं। इसके अलावा दरोगा भी अपने अभिनय की छाप छोड़ते हैं। गीत संगीत फ़िल्म के अनुसार औसत ही है। इसमें भी काफी सुधार की गुंजाइश नजर आती है। गंगे गंगे जो थीम सांग है वह जरूर तेज आवाज में सुना जाए तो प्रभावित करता है और रोंगटे से खड़े होने लगते हैं। रेटिंग 2 स्टार  इस फ़िल्म की समीक्षा और इस फ़िल्म को अच्छी स्टार रेटिंग देने के भी आरोप इसके निर्देशक विकास खन्ना ने लगाए थे। जब फ़िल्म बोस्टन फ़िल्म फेस्टिवल में दो अवार्ड एक बेहतरीन अभिनय के लिए और एक बेहतरीन फीचर फिल्म के लिए जीत चुकी है तो उस फिल्म को स्टार रेटिंग की जरूरत क्यों आन पड़ी यह बात भी समझ से परे है। दूसरा विधवाओं पर आधारित कई बेहतरीन फिल्में इससे पहले आ चुकी हैं।


हमारे लिए समीक्षा लिखी तेजस पूनियां ने 

Tuesday, January 19, 2021

धर्म गुरु या सेक्स गुरु 'ओशो रजनीश' पुण्यतिथि विशेष

 


ओशो अपने क्रांतिकारी और सुलगते विचारों से हमेशा विवादों में रहे. ओशो के विचारों से प्रभावित होकर लोग सब कुछ त्याग कर उनके पीछे चलने को तैयार थे. रजनीश ओशो के भक्त उन्हें भगवान ओशो कहकर संबोधित करते थे लेकिन कुछ लोगों के लिए ओशो एक 'सेक्स गुरु' का नाम है. ओशो ने लोगों को मोक्ष का नया रास्ता बताया जिसे सुनकर स्थापित मान्यताएं हिल गई थीं. ओशो के स्वतंत्र विचार कई और प्रतिष्ठानों के लिए खतरा बन चुके थे. आइए ओशो की 31वीं पुण्यतिथि (Osho Death Anniversary) के मौके पर जानते हैं उनके विवादित सफर और मौत से जुड़े रहस्य के बारे में...



11 दिसंबर, 1931 को मध्य प्रदेश के कुचवाड़ा में उनका जन्म हुआ था. जन्म के वक्त उनका नाम चंद्रमोहन जैन था. उन्होंने अपनी पढ़ाई जबलपुर में पूरी की और बाद में वो जबलपुर यूनिवर्सिटी में लेक्चरर के तौर पर काम करने लगे. उन्होंने अलग-अलग धर्म और विचारधारा पर देश भर में प्रवचन देना शुरू किया. उनका व्यक्तित्व का आकर्षण ऐसा था कि कोई भी आसानी से प्रभावित हो जाए. प्रवचन के साथ ध्यान शिविर भी आयोजित करना शुरू कर दिया. शुरुआती दौर में उन्हें आचार्य रजनीश के तौर पर जाना जाता था. नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने नवसंन्यास आंदोलन की शुरुआत की. इसके बाद उन्होंने खुद को ओशो कहना शुरू कर दिया.



70 और 80 के दशक में यह आंदोलन खूब विवादों में रहा. भारतीय पारंपरिक मूल्यों के खिलाफ अपने विचारों से पहले भारत में और फिर अमेरिका में भी ओशो को विरोध का सामना करना पड़ा. सोवियत रूस में भी ओशो रजनीश के आंदोलन को बैन कर दिया गया. भारतीय संस्कृति की सकारात्मक छवि का विरोधी होने के कारण सोवियत सरकार ने ओशो और उनकी विचारधारा दोनों को खारिज कर दिया.




साल 1970 में ओशो मुंबई में रहने के लिए आ गए. भौतिकतावादी जीवन से ऊब चुके पश्चिम के लोग भी उन तक पहुंचने लगे. इसी वर्ष सितंबर में मनाली में आयोजित अपने एक शिविर में ओशो ने नव-संन्यास में दीक्षा देना प्रारंभ किया. सन 1974 में वे अपने बहुत से संन्यासियों के साथ पूना आ गए जहां श्री रजनीश आश्रम की स्थापना हुई. पूना आने के बाद उनकी प्रसिद्धि विश्व भर में फैलने लगी.



ओशो कोई पारंपरिक संतों की तरह कोई रामायण या महाभारत आदि का पाठ नहीं कर रहे थे, न ही व्रत-पूजा या धार्मिक कर्मकांड करवाते थे. वह स्वर्ग-नर्क और अन्य अंधविश्वासों से परे उन विषयों पर बोल रहे थे जिन पर लोगों ने अब तक चुप्पी साधी थी. ओशो के विषय बिल्कुल अलग थे. ऐसा ही एक विषय था- सम्भोग से समाधि की ओर जो आज भी विवाद का विषय बना हुआ है. ओशो के जीवन और उनके आश्रम पर नेटफ्लिक्स पर 'वाइल्ड वाइल्ड कंट्री' नाम से एक सीरीज भी आई थी.



ओशो का अमेरिका प्रवास- 1981 में स्वास्थ्य खराब होने की वजह से चिकित्सकों के परामर्श पर ओशो अमेरिका चले गए. साल 1981 से 1985 के बीच वो अमेरिका रहे. ओशो के यहां बड़ी संख्या में अनुयायी थे. उनके अमेरिकी शिष्यों ने ओरेगॉन राज्य में 64000 एकड़ जमीन खरीदकर उन्हें वहां रहने के लिए आमंत्रित किया. इस रेगिस्तानी जगह में ओशो कम्यून खूब फलने-फूलने लगा. यहां करीब 5000 लोग रह रहे थे. ओशो का अमेरिका प्रवास बेहद विवादास्पद रहा. महंगी घड़ियां, रोल्स रॉयस कारें, डिजाइनर कपड़ों की वजह से वे हमेशा चर्चा में रहे. ओरेगॉन में ओशो के शिष्यों ने उनके आश्रम को रजनीशपुरम नाम से एक शहर के तौर पर रजिस्टर्ड कराना चाहा लेकिन स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया.



उनकी शिष्या रहीं ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक गैरेट ने बीबीसी से बताया था, "हम एक सपने में जी रहे थे. हंसी, आजादी, स्वार्थहीनता, सेक्सुअल आजादी, प्रेम और दूसरी तमाम चीजें यहां मौजूद थीं. "शिष्यों से कहा जाता था कि वे यहां सिर्फ अपने मन का करें. वे हर तरह की वर्जना को त्याग दें, वो जो चाहें करें. गैरेट कहती हैं, "हम एक साथ समूह बना कर बैठते थे, बात करते थे, ठहाके लगाते थे, कई बार नग्न रहते थे. हम यहां वो सब कुछ करते थे जो सामान्य समाज में नहीं किया जाता है."




पहले यह एक आश्रम था लेकिन देखते ही देखते यह एक पूरी कॉलोनी बन गई, जहां रहने वाले ओशो के अनुयायियों को ‘रजनीशीज’ कहा जाने लगा. धीरे-धीरे ओशो रजनीश के फॉलोवर्स और रजनीशपुरम में रहने वाले लोगों की संख्या बढ़ने लगी, जो ऑरेगन सरकार के लिए भी खतरा बनता जा रहा था.



अक्टूबर 1985 में अमेरिकी सरकार ने ओशो पर अप्रवास नियमों के उल्लंघन के तहत 35 आरोप लगाए और उन्हें हिरासत में ले लिया. उन्हें 4 लाख अमेरिकी डॉलर की पेनाल्टी भुगतनी पड़ी. साथ ही, उन्हें देश छोड़ने और 5 साल तक वापस ना आने की भी सजा हुई. कुछ रिपोर्ट्स में ये दावा किया जाता है कि इसी दौरान उन्हें जेल में अधिकारियों ने थैलियम नामक धीरे असर वाला जहर दे दिया था. 14 नवंबर 1985 को अमेरिका छोड़कर ओशो भारत लौट आए. इसके बाद ओशो नेपाल चले गए.





किताब 'कौन है ओशो: दार्शनिक, विचारक या महाचेतना' में लेखक शशिकांत सदैव लिखते हैं, फरवरी 1986 में ओशो ने विश्व भ्रमण की शुरुआत की लेकिन अमेरिकी सरकार के दबाव की वजह से 21 देशों ने या तो उन्हें देश से निष्कासित किया या फिर देश में प्रवेश की अनुमति नहीं दी. इन देशों में ग्रीस, इटली, स्विटजरलैंड, स्वीडन, ग्रेट ब्रिटेन, पश्चिम जर्मनी, कनाडा और स्पेन प्रमुख थे.



ओशो 1987 में पूना के अपने आश्रम में लौट आए. वह 10 अप्रैल 1989 तक 10,000 शिष्यों को प्रवचन देते रहे. 19 जनवरी, वर्ष 1990 में ओशो रजनीश ने हार्ट अटैक की वजह से अपनी अंतिम सांस ली. कहा जाता है कि अमेरिकी जेल में रहते हुए उन्हें थैलिसियम का इंजेक्शन दिया गया और उन्हें रेडियोधर्मी तरंगों से लैस चटाई पर सुलाया गया जिसकी वजह से धीरे-धीरे ही सही वे मृत्यु के नजदीक जाते रहे. खैर इस बात का अभी तक कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं हुआ है लेकिन ओशो रजनीश के अनुयायी तत्कालीन अमेरिकी सरकार को ही उनकी मृत्यु का कारण मानते हैं.

साभार आजतक न्यूज चैनल

Saturday, January 16, 2021

देखिए एक लोक कलेण्डर में 'शौर्य गाथा' उत्तराखंड की मिट्टी की


 देवभूमि उत्तराखंड न केवल देव स्थानों के लिए विख्यात है बल्कि इस देवभूमि पर समय-समय पर ऐसे योद्धाओं ने भी जन्म लिया है जिन्होंने अपनी मातृभूमि को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। ऐसे ही योद्धाओं की छवियों और उनकी शौर्य गाथाओं को दर्शाता हुआ यह कलेण्डर आदरणीय लक्ष्मी जी के माध्यम से प्राप्त हुआ। लक्ष्मी जी और उनकी पूरी टीम नाट्य कला और थियेटर के जरिए गत कई वर्षों से उत्तराखंड की लोक संस्कृति एवं परम्पराओं को प्रसारित, प्रचारित करने का महती कार्य कर रही है।


आज किसी भी देश या समाज की संस्कृति या परम्पराओं को जिंदा रखना एक चुनौती बन चुका है। एक समय था जब हर पीढ़ी के द्वारा अपनी भावी पीढ़ी तक अपनी सभ्यता-संस्कृति-परम्पराओं को हस्तांतरित करने के लिए कई प्रकार के प्रयास किये जाते रहे। परन्तु आज इस फेसबुक-सोशल मीडिया की दुनिया में किसे इतनी फुर्सत कि अपनी जड़ों को सींचने के लिए कुछ करें। बावजूद इसके वास्तव में कुछ लोग बिना हल्ला किये ऐसा महत्वपूर्ण काम कर रहे होते हैं कि उनके काम को साधारणतः शब्दों में बांधना असाधारण होता है। लक्ष्मी जी ऐसा ही कार्य कर रही हैं, जो उत्तराखंड निवासियों को अपनी संस्कृति और योद्धाओं पर गौरवान्वित होने के लिए प्रेरित करता है। कम से कम इस कलेण्डर को हर उत्तराखंड के घर में ही नहीं बल्कि सरकारी दफ्तरों में भी होना चाहिए। इस पंचांग के माध्यम से उत्तराखंड की लोक कथाओं/गाथाओं के नायक-नायिकाओं से पूर्णतः परिचय मिलता है। लक्ष्मी जी और उनकी पूरी टीम इसके लिए बधाई एवं साधुवाद के पात्र हैं। 

यह कोई सामान्य कलेण्डर नहीं जो आपको सिर्फ तारीखें बताता है बल्कि इसे मैंने नाम दिया है *लोक कलेण्डर* क्योंकि यह उत्तराखंड के उन शूरवीरों से हमारा संक्षेप में किंतु प्रभावशाली  परिचय कराता है, जिनसे आज की पीढ़ी अनभिज्ञ है।

साथ ही इस कलेण्डर में आपको उत्तराखंड के लोक संस्कृति और परम्पराओं से जुड़े त्यौहारों और मेलों के बारे में भी जानने को मिलेगा।  



इसमें जिन शूरवीरों का परिचय है जिसमें सबसे पहले माधो सिंह भंडारी हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि 400 साल पहले उत्तराखंड की धरती पर पहाड़ का सीना चीर उसमें से नदी निकालकर अपने गाँव लाए जो आज भी मलेधा गाँव को समृद्ध बनाए हुए है। 



रानी कर्णावती भारत की सबसे शक्तिशाली रानियों में गिनी जाने वाली जिन्हें नाक काटी रानी के रूप में भी जाना जाता है। 



रिलोखा लोधी शक्तिशाली उत्तराखंड का यौद्धा जिसे भीम भी कहा जाता है।



सती रानी धना जिनके बारे में कहा सुना जाता है कि उन्होंने कालीचंद के विवाह प्रस्ताव को एक शर्त के साथ स्वीकार किया जिसमें उन्होंने कहा कि वे अपने पति का संस्कार पंचेश्वर में करेंगी उसके बाद उससे विवाह करेगीं लेकिन वे कालीचंद को मार देती हैं और पति के शव के साथ सती हो जाती है। 



राजा अजयपाल सिकंदर लोदी के समकालीन व बावन गढ़ों को जीतकर एक साथ मिलाने वाले महात्मा तथा आदिनाथ कहलाए। 



माता संतला हिन्दू मंदिरों के नष्ट होने पर माँ दुर्गा का आह्वान कर मुगलिया सेना को अंधा बना देने वाली और फिर खुद पाषाण में तब्दील हो जाने वाली महिला। जिसकी इस घटना के बाद मुगलों ने किसी देवी मंदिर को नष्ट नहीं किया। 



 पंथ्या दादा


तत्कालीन राजा के रोज़ा कर के विरोध स्वरूप स्वयं आत्मदाह कर बलिदान कर दिया। बाद में राजा जो वह कर निरस्त करना पड़ा।



तीलू रौतेली


अपने पिता और भाइयों का मौत का बदला लेनी वाली वीरबाला।



 कुफ़्फ़ु चौहान


राजा के जुल्मों के आगे न झुकने वाला वीर योद्धा जिसने अपनी मातृभूमि के लिए अपना सर कटना मंजूर किया।



 राजकुमारी रानी


पिता और भाइयों द्वारा देश की रक्षा में कोई कमी ना रहे, इसके लिए अपनी दोनों बहनों को मारकर स्वयं का सिर भी कलम कर दिया।



 रानी जिया


एक ऐसी राजमाता जिसने तुर्कों के आगे अपने सम्मान की रक्षा करने के लिए खुद को शीला में परिवर्तित कर दिया।




धन्यवाद




डॉ० राम भरोसे
(एम.ए. हिन्दी, यू.जी.सी. नेट, पीएचडी, एम.ए. संस्कृत)
असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी)
राजकीय महाविद्यालय पोखरी (क्वीली)
टिहरी गढ़वाल-249146 (उत्तराखण्ड)
9045602061
dr.rambharose2012@rediffmail.com
ramharidwar33@gmail.com
sabhyatakateesrapaksh.blogspot.com


Tuesday, January 12, 2021

स्वामी विवेकानंद के विचारों की प्रासंगिकता

 


आज का युवा जाग कर उठ तो चुका है, परन्तु वो उल्टी दिशा में उल्टे लक्ष्य की ओर दौड़ रहा है। 



बाकी स्वामी जी के विचार भी आज भी प्रासंगिक हैं, परन्तु खेद है कि जिस प्रकार उनके विचारों का युवाओं के बीच प्रसार प्रचार होना था, नहीं हो सकें। इसके विपरीत हमारे युवाओं को जानबूझकर धर्म-जाति-सम्प्रदाय के नाम पर उल्टे लक्ष्य की ओर भगाया जा रहा है। हमेशा के तरह राजनैतिक लोग युवाओं पर ही अपनी रोटियां सेंक रहे हैं। वर्तमान शिक्षा और रोजगार की बुरी स्थिति से सभी वाकिफ है। यह भी युवाओं के भटकाव की मुख्य वजह है। इतना ही नहीं गत वर्षों में हमारे युवाओं को जिस प्रकार धर्म और जाति के नाम पर अंधविश्वासी और कट्टर बनाया जा रहा है, इसका दुष्प्रभाव देखने भी आने लगे हैं। ऐसे में इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा, जो ये सब कर रहे हैं उनके खुद के बच्चे देश- विदेश के बड़े बड़े संस्थाओं में अपने भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। 

ये जिम्मेदारी हर उस कामयाब और लक्ष्य प्राप्ति कर चुके व्यक्ति को लेनी होगी, कि वह कम से कम एक युवा को उसके सही लक्ष्य की ओर अग्रसारित करें। तभी स्वामी जी कप असल रूप में हम अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं। स्वामी जी की तरह हर युवा यदि अपने लिए सद्गुरु की तलाश कर उनके प्रति पूर्णतः समर्पित हो जाए तो उसकी सभी समस्याएं यूँ ही दूर हो जाएगी। लेकिन शर्त यही है कि इसके लिए नरेंद्र बनना होगा, तभी राम कृष्ण परमहंस जैसे गुरु की उपलब्धि होगी।


स्वामी विवेकानंद जी जन्मदिवस के सुअवसर पर समस्त देशवासियों को हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।





धन्यवाद


डॉ० राम भरोसे
(एम.ए. हिन्दी, यू.जी.सी. नेट, पीएचडी, एम.ए. संस्कृत)
असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी)
राजकीय महाविद्यालय पोखरी (क्वीली)
टिहरी गढ़वाल-249146 (उत्तराखण्ड)
9045602061, 9719177319

Sunday, November 15, 2020

रिव्यू : जज्बे और बुलंद हौसलों की कहानी 'छलाँग'



फिल्म:छलांग


कलाकार : राजकुमार राव, नुसरत भरुचा, मोहम्मद जीशान अयूब, सौरभ शुक्ला, सतीश कौशिक, बलजिंदर कौर 

निर्देशक :हंसल मेहता


राजकुमार राव और नुसरत भरुचा स्टारर फिल्म छलांग अमेजन प्राइम वीडियो पर रिलीज हो चुकी है। इस फ़िल्म का मुझे विशेष रूप से इंतजार था।  जिंदगी में हिम्मत ना हारना जैसी सीख बहुत सी जगह से मिलती रहती है। लेकिन बात तब बनती है जब हम उस सीख को अपने जीवन में धारण कर पाएं। क्योंकि जब तक हम खुद अपने   लिए कुछ नहीं करते तब तक दूसरों का बोलना जाया ही जाता है। अपने हालातों को बेहतर बनाने, आगे बढ़ने, की सीख यह फ़िल्म देती है। 

इधर बॉलीवुड में खेलों पर आधारित कई फिल्में आई हैं। और अमूमन हर खेल से जुड़ी फ़िल्म में जज्बा विशेष रूप से देखने को मिलता है। 

फिल्म की कहानी  हरियाणा के एक गाँव से शुरू होती है जहां  महेंद्र हुड्डा उर्फ मोन्टू यानी राजकुमार राव एक सरकारी स्कूल का पीटीआई  टीचर है। मोन्टू की जिंदगी बड़े आराम से कट रही है। वो स्कूल के बच्चों को कभी-कभी कुछ सिखा देता है अन्यथा खेल के मैदान में बैठा बस टाइमपास करता रहता है। मोन्टू ने अपनी जिंदगी में अभी तक कुछ बड़ा नहीं किया है। वह हर चीज को अधूरा छोड़ देता है। और तो और उसकी नौकरी भी उसे अपने पिता के कहने पर उसी स्कूल में मिली है, जिसमें वो बचपन में पढ़ा था। 


मोन्टू की दोस्ती उसी के स्कूल टीचर वेंकट यानी सौरभ शुक्ला से है। सब सही चल रहा है लेकिन उसकी जिंदगी स्कूल में नीलिमी मैडम यानी नुसरत भरुचा के आते ही बदलने लगती है। नीलिमा जो एक कंप्यूटर टीचर है, को  पटाने के लिए मोन्टू कोशिशें करने लगता है। लेकिन अब प्रेमी कहानी शुरू हुई है तो विलेन भी होगा ही। यहां आते  हैं नये पीटी टीचर मिस्टर सिंह यानी मोहम्मद जीशान अयूब। मिस्टर सिंह के आने से मोन्टू की नौकरी, छोकरी और इज्जत सब छिनने की कगार पर आ जाती है। ऐसे में अपना हीरो क्या फैसला लेता। और वह स्पोर्ट्स के कौन-कौन से कम्पटीशन लड़ने का फैसला करता है जानने के लिए आपको फ़िल्म देखनी होगी। इसके अलावा खेल देखते हुए आपके मनोभाव भी उसी दिशा में गोते खाने लगते हैं। और आप भी चाहते हैं कि अपना हीरो जीते।

 

ख़ैर परफॉरमेंस की बात करें तो राजकुमार राव बॉलीवुड के उन एक्टर्स में से हैं, जो आपको कभी निराश नहीं करते। उन्हें कोई भी रोल दे दिया जाए वो उसे बहुत आराम से निभा जाते हैं। छलांग में भी उन्होंने ऐसा ही किया है। इसके अलावा नीलिमा के रोल में नुसरत भरुचा ने अच्छा काम किया है। उनका रोल भले ही छोटा रहा हो लेकिन उनका काम और अंदाज देखने लायक है। 


बात सपोर्टिंग किरदारों की हो तो मोन्टू के पिता के रोल में सतीश कौशल, दोस्त और टीचर के रोल में सौरभ शुक्ला, मां के रोल में पंजाबी सिनेमा की बेहतरीन अदाकारा बलजिंदर कौर और स्कूल की प्रिंसिपल के रोल में ईला अरुण ने कमाल का काम किया है। किसी भी सीन में ये मंझे हुए एक्टर्स आपको निराश नहीं करते। फिल्म के 'विलेन' मिस्टर सिंह के रोल में मोहम्मद जीशान अयूब ने भी बढ़िया काम किया है।  स्कूल के बच्चों की तारीफ विशेष रूप से करनी होगी वे सभी कमाल के थे। यदि कहूँ कि उन्होंने ही इस फिल्म में जान डाली है तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। 



डायरेक्टर हंसल मेहता जानते हैं कि इतनी बढ़िया स्टारकास्ट के लिए उन्हें अच्छी कहानी चाहिए और उन्होंने वही दर्शकों को दी भी है। फ़िल्म की कहानी लव रंजन ने लिखी है और बहुत समय बाद लव रंजन की लिखी कहानी में कोई लड़की लड़के को ठगने का काम नहीं कर रही है।  स्कूल और पीटी टीचर की जिंदगी, हरियाणा के गांव और अन्य सेट को हंसल मेहता ने करीने से दिखाया है। फिल्म का म्यूजिक बढ़िया है। बैकग्राउंड स्कोर खास करके खेल के समय लाजवाब बन पड़ा है। फ़िल्म में कुछ कमियां भी नजर आती हैं। लेकिन उन्हें नजरअंदाज करके इसे देखा जाए तो एक एंटरटेनिंग है और जीवन की सीख देकर जाती है। 



अपनी रेटिंग 3.5



Review By Tejas Poonia


Sunday, November 8, 2020

बुक रिव्यू : दलित आंदोलन से गुजरते हुए हिन्दी दलित आत्मकथाएं - एक मूल्यांकन : पुनीता जैन

 



पुस्तक : हिन्दी दलित आत्मकथाएँ, एक मूल्यांकन

लेखक : पुनीता जैन

प्रकाशक : सामयिक पेपरबैक्स, नई दिल्ली

संस्करण : 2018

मूल्य : रु. 300

हिन्दी साहित्य में अवतरित हुए तमाम आंदोलनों-विमर्शों में स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श, दलित विमर्श आदि ने हिन्दी साहित्य की चिंतन प्रक्रिया को एक नवीन मोड़ प्रदान किया है । इन विमर्शों ने साहित्य की परंपरागत गति को आम जन के दर्द से जोड़कर जो नवीनता उत्पन्न की है, उससे साहित्य में विमर्श के मायने बदले हैं । हिन्दी में दलित आत्मकथाओं के मूल्यांकन के माध्यम से लेखिका पुनीता जैन ने इन मान्यताओं को एक नवीन दृष्टि प्रदान करते हुए दलित आत्मकथाओं के चिंतन को सर्वग्राह्यता प्रदान की है ।

हिन्दी के नवजागरण काल से ही दलित-विमर्श ने साहित्य में अपना स्थान निर्धारित किया । दलितों के साथ-साथ गैर-दलित लेखकों ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया । साहित्य में मुख्यधारा की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ने इस विषय पर विशेषांक निकालकर दलित आंदोलन को तीव्रता प्रदान की । पिछले दशकों में दलितों के बीच से कई अच्छे लेखक सामने आए, जिन्होंने दलितों की पीड़ा को ‘भोगे हुए यथार्थ’ के रूप में सामने रखा । इन लेखकों ने कविता, कहानी, उपन्यास, लेख तथा आत्मकथाओं के माध्यम से दलितों के सदियों पुराने दर्द को समाज से रूबरू करवाया । इन विधाओं में आत्मकथाओं का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान रहा । दलित विमर्श को ‘हंस’ के वर्ष दो हजार चार में निकले विशेषांक ने एक विशेष गति प्रदान की । 

वास्तव में देखा जाए तो दलित लेखन में जो ‘भोगा हुआ यथार्थ’ था, वह दलित आत्मकथाओं में विशेष रूप से उजागर हुआ । इन आत्मकथाओं में दलित लेखकों ने अपने समय और समाज को स्वयं की आंखों से देखा, परखा और भूतकाल से तुलना करते हुए उस यथार्थ को अपने लेखन में उतारा । समीक्ष्य पुस्तक ‘हिन्दी दलित आत्मकथाएं, एक मूल्यांकन’ में लेखिका पुनीता जैन ने दलित लेखकों द्वारा लिखी गईं लगभग सभी आत्मकथाओं को बड़ी ही सूक्ष्मता के साथ कुछ ऐसे प्रस्तुत किया कि इनआत्मकथाओं से अन्जान पाठक भी लेखक और उसके समाज के सच से परिचित हो सके । खालिस परिचित ही नहीं बल्कि गहराई से परिचय प्राप्त कर सके । 

पुस्तक के ‘फ्लैप’ पर डॉ. सूर्यनारायण रणसुभे लिखते हैं “सृजनात्मक साहित्य के निर्माण के मूल में लेखक की अकुलाहट, बेचैनी-यही एकमात्र बड़ा कारण होती है । लेखक अपनी अनुभूति के बोझ से मुक्त होने हेतु लिखने लगता है । सृजनात्मक समीक्षक की भी यही स्थिति होती है । एक मनुष्य होने के नाते पुनीता जैन, धर्म, जाति, पन्थ के परे जाकर दलितों की संवेदनाओं से, उनकी व्यथाओं से उनकी मर्मांतक पीड़ाओं से इस कदर प्रभावित, प्रेरित हो जाती हैं कि वह उनकी सहयात्री ही बन जाती हैं ।  इस सहयात्रा में एक ओर वे उस पीड़ा को भोगती भी हैं तथा उसी समय उस पीड़ा को, उसके भोगनेवाले को पूरी तटस्थता से देखती भी हैं ।” 

वास्तव में मूल पुस्तकों पर किए गए लेखन की पहली शर्त होती है कि लेखक मूल के अंतर्मन में पहुँचकर उस मूल संवेदना को निकालकर सामने लाए जिसको पढ़ते हुए ही मूल को पढ़ने और समझने की जिज्ञासा बढ़ जाए । उक्त पुस्तक में लेखिका ने मूल रचनाओं की उस मूल जड़ को बखूबी पकड़ा है । 


(सुनील मानव)

पुस्तक का आरंभ भूमिका के परिचय के साथ दलित साहित्य और उसमें भी दलित आत्मकथाओं की पृष्ठभूमि के परिचय से होता है जो इस पुस्तक की मूल विषय वस्तु का आधार बनी है । 

हिन्दी साहित्य की पृष्ठभूमि पर यदि दृष्टि डालें तो इस साहित्य की रचना में कुछ सामाजिकताओं के साथ स्वान्त:सुखाय एवं वाग्विलाश का भाव अधिक रहा है लेकिन दलित साहित्य दलितों के साथ सदियों से चले आ रहे अन्याय एवं अत्याचार, समाज में उनकी दयनीय स्थित अथवा कहा जाए कि वर्णव्यवस्था के अत्याचारों के प्रति स्वर उठाने की प्रक्रिया में हुआ । लेखिका पुनीता जैन ने प्रथम अध्याय ‘हिन्दी दलित साहित्य की पृष्ठभूमि’ में इन पूरी प्रकिया की पृष्ठभूमि को स्पर्श करते हुए वेदकाल से लेकर अंबेडकर के आंदोलन तक अपनी सूक्ष्म दृष्टि दौड़ाई है । इस संदर्भ में आपने इस बात को प्रमुखता से इंगित किया है कि वर्तमान में यदि कहा जाए कि अब से पहले दलितों को लेकर कोई आंदोलन नहीं हुए अथवा साहित्यिक रूप में कुछ लिखा नहीं गया तो यह बात पूरी तरह सही नहीं है । आप लिखती हैं “वर्तमान दलित लेखन, साहित्य पर यह आरोप नहीं लगा सकता कि उसके पक्ष में कभी आवाज नहीं उठी । वर्णव्यवस्था के विरोध में चार्वाक् से कबीर तक और कबीर से प्रेमचंद तक की लम्बी परम्परा दिखाई देती है ।” आपका यह निष्कर्ष पुस्तक के प्रति तटस्थता को मज़बूती प्रदान करता है । 

पुस्तक के द्वितीय अध्याय ‘हिन्दी दलित आत्मकथन का परिदृश्य’ में लेखिका ने वर्तमान दलित लेखन की प्रेरणा के बिन्दुओं के साथ-साथ मराठी के दलित लेखन को हिन्दी दलित साहित्य लेखन की पृष्ठभूमि के रूप में प्रस्तुत किया है । आपने हिन्दी साहित्य के आदिकाल के सिद्ध और नाथ साहित्य से लेकर मध्यकाल के संत कवियों की वाणियों को दलित साहित्य की नींव के रूप में इंगित किया है । इसके आगे लेखिका कहती हैं कि “आधुनिक काल में महाराष्ट्र में ज्योतिबा फुले व अंबेडकर के प्रभाव ने कथित शूद्र को ‘दलित’ नाम दिया तथा अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा दी । इसके प्रभाव से हुए सामाजिक, शैक्षिक जागरण ने उनके उत्पीड़न के दीर्घ इतिहास को वाणी देना आरम्भ किया । हिन्दी में दलित लेखन का प्रादुर्भाव इसी पृष्ठभूमि में मराठी साहित्य के प्रभाव से हुआ ।” अपने इस निष्कर्ष को सिद्ध करते हुए पुनीता जी तमाम संदर्भ भी प्रस्तुत करती हैं जो उनकी शोध दृष्टि की भी परिचायक है । 

तृतीय अध्याय ‘हिन्दी दलित आत्मकथाएं और उनका सौन्दर्य-मूल्य’ के संदर्भ में लेखिका ने दलित आत्मकथाकारों की उस दृष्टि को समझने का प्रयास किया है जिसके तहत कोई लेखक लिख पाता है । अपने परिवेश की सुन्दरता को संपूर्णता में देखना और उसके सार्वभौम स्वरूप को शब्दों में बाँधना, किसी भी लेखक के लिए बहुत सहज नहीं होता है । कोई भी लेखक उस सत्य को तभी शब्दों में पिरो पाता है जब वह उस परिवेश का ‘भोक्ता’ हो । ‘भोक्ता’ होने से सत्य को समझना थोड़ा आसान हो जाता है और यहीं से आत्मकथ्य के सूत्रों का सूत्रपात हो जाता है । लेखिका ने इन अध्याय में दलित लेखकों को उनकी आत्मकथाओं के संदर्भ में इसी स्वरूप में समझने का प्रयास किया है । सौंदर्यशास्त्र और कुछ आगे बढ़ते हुए दलित सौंदर्यशास्त्र को और स्पष्टता प्रदान करते हुए लेखिका ने डॉ. तुलसीराम के शब्दों को सौंदर्यशास्त्र की स्थापना के रूप में प्रस्तुत किया है कि “सौंदर्यशास्त्र का उद्देश्य साहित्य के माध्यम से व्यक्ति की सामाजिकता को परिष्कृत करना और उसके जीवन को उच्च स्तरीय बनाना है । इस प्रकार सौंदर्यबोध वैयक्तिक जीवन को उसकी संदर्भवत्ता देने और सामाजिक सम्बद्धता को सुदॄढ़ करने व गहनता प्रदान करने का दायित्त्व निभाता है ।”

हिन्दी साहित्य के आरम्भ से लेकर वर्तमान परिवेश और उसकी केन्द्र की विषय वस्तु पर दृष्टि दौड़ाई जाए तो आदिकाल के नाथ, जैन और रासो साहित्य में आम आदमी नहीं दिखता; मध्यकालीन साहित्य में ईश्वर और ईश्वर बनने की ललक के साथ ही बुर्जुवा वर्ग का चित्रण मिलता है । 1857के बाद परिस्थितियाँ कुछ बदलीं । धीरे-धीरे ही सही, साहित्य के मूल में आम आदमी की स्थिति मज़बूती पकड़ने लगी । और दलित साहित्य तक आते आते आम आदमी ने स्वयं अपनी स्थितियों को साहित्य के मूल में प्रस्तुत करना आरम्भ कर दिया । पुस्तक के चौथे अध्याय ‘दलित आत्मकथन और उसका समाज वैज्ञानिक पक्ष’ में लेखिका ने उक्त वस्तुस्थिति को गहराई से स्पष्ट किया है । लेखिका लिखती हैं कि “हिन्दी साहित्य में लम्बे समय तक ‘आम आदमी’ विषय के केन्द्र में नहीं था । जातिभेद के कारण उत्पन्न वास्तविक सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति का न्यूनतम उल्लेख हिन्दी में दिखाई देता है, जबकि साहित्य में वर्णित पात्र और परिवेश के द्वारा पाठक समाज की पृष्ठभूमि में कार्यशील स्थितियों से परिचित होता है ।”आपने इस अध्याय में लेखक और पाठक के बीच स्थापित तादात्म्य को भी स्पष्ट करने का प्रयास किया है । दलित लेखकों की आत्मकथाओं के माध्यम से पाठक को दलित वर्ग की सामाजिक परिस्थितियों का परिचय स्थापित करने का भी प्रयास है यह अध्याय । 

उक्त से आगे बढ़ते हुए पुनीता जैन ने ‘हिन्दी की दलित आत्मकथाएँ और स्त्री’ के संदर्भों को भी व्याख्यायित किया है । स्त्री की स्थिति प्रत्येक स्तर पर दयनीय रही है । वह मनुष्य कम ‘भोग्या’ अधिक मानी गई है । इस अध्याय में लेखिका ने दलित आत्मकथाओं में स्त्री की स्थिति को भी सूक्ष्मता से स्पष्ट किया है । ऐसा करते हुए लेखिका ने उन सभी आत्मकथाओं का जिक्र किया है जिनमें दलित स्त्री की वेदना को स्वर प्रदान किया गया हो । इसके साथ ही उक्त आत्मकथाओं में स्त्री की सामाजिकता को विशेष रूप में स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है । 

यहाँ तक आते आते पुस्तक का प्रथम खण्ड समाप्त हो जाता है और अगले खण्ड ‘अन्तर्पाठ’ के माध्यम से दलित आत्मालापों के आख्यानों का अन्तर्पाठ आरम्भ होता है । इन अन्तर्पाठों के माध्यम से लेखिका एक-एक कर हिन्दी की तमाम आत्मकथाओं का उनके मूल स्वर के साथ विवेचन-विश्लेषण करना आरम्भ करती है । लेखिका ने समस्त दलित आत्मकथाओं को उनकी विषय वस्तु के साथ स्पष्ट रूप से प्रकट करने का प्रयोग किया है । इन आत्मकथाओं की विषय वस्तु के साथ आत्मकथा लेखन से गुजरते हुए लेखक की मनोदशा और मूल लेखक के आस-पास को लेखिका पुनीता जैन ने बड़ी ही स्पष्टता से प्रस्तुत किया है । 

वर्ष 1995 में प्रकाशितमोहनदास नैमिशराय की ‘अपने अपने पिंजरे’ से आरम्भ हुए सफर को लेखिकावर्ष 2017में प्रकाशित हुई रजनी तिलक की आत्मकथा ‘अपनी ज़मीं अपना आसमां’तक पूरी ईमानदारी से लेकर आई हैं । इतिहास की विसंगतियों से लेकर समय के बदलाव को लेखिका ने इन आत्मकथाओं में बखूबी इंगित किया है । 

दलित आत्मकथाओं से पहले की जो आत्मकथाएँ थीं, उनमें उपदेश और सीख देने की प्रधानता के साथ-साथ लेखक के अभिजातीय दंभ भी देखने को मिलता रहा था । दलित आत्मकथाओं ने इस अभिजातीय दंभ, उपदेशात्मकता और मनोरंजकता के स्थान पर अपनी विषय वस्तु में एक आम आदमी के दर्द को, उसकी व्यथा को, उसके वातावरण को पूरी सच्चाई व आत्मनिष्ठा से उकेरने का प्रयास किया । वास्तव में यही वह विषय वस्तु थी जो लेखक की अपनी सच्चाई थी । पुनीता जैन ने आत्मकथा लेखकों की समीक्ष्य कृतियों के माध्यम से ‘एक आम जन की व्यथा’ को उसकी संपूर्णता प्रदान की है । पुनीता जैन ने इन अलग-अलग आत्मकथाओं के बिखरे सूत्रों को एक माला में पिरोते हुए संवेदना के सूत्र को एक साथ स्थापित किया है । 

अपने अपने पिंजरे, जूठन, दोहरा अभिशाप, झोपड़ी से राजभवन, घुटन, नागफनी, मेरा बचपन मेरे कंधों पर, मुर्दहिया, मणिकर्णिका, शिकंजे का दर्द, दु:ख-सुख के सफर में आदि आत्मकथाओं का जो विवेचन-विश्लेषण लेखिका पुनीता जैन ने किया है, बड़ा ही स्तुत्य है । आपने अपनी इस कृति को दलित लेखन का आख्यान बना दिया है । लेखिका ने प्रस्तुत आत्मकथाओं का एक-एक कर सिलसिलेबार कुछ ऐसा सूक्ष्म विश्लेषण किया है कि सामान्य से सामान्य पाठक भी मूल रचनाओं से अपना सहज संवाद स्थापित कर सके । 

अपनी विषय-वस्तु से इतर भी इस पुस्तक की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता और परिलक्षित होती है । वह यह कि पुस्तक को शोधपूर्ण दृष्टि से लिखा गया है । आत्मकथाओंके साथ ही उसको पूर्णता प्रदान करने के लिए लेखिका ने संबंधित लेखकों की अन्य स्वीकारोक्तियों तथा आत्मकथाओं पर अन्य समीक्षकों / आलोचकों की टिप्पणियों को जो संदर्भ रूप में प्रस्तुत किया है, वह पुस्तक की गरिमा और गहराई को और भी बढ़ाती है । 

वह पाठक जो हिन्दी की दलित आत्मकथाओं के स्वरूप और उसकी वैचारिकी को एक साथ एक ही स्थान पर समझना चाहते हैं, यह पुस्तक उन पाठकों के लिए बड़े काम की सिद्ध हो सकती है । सामान्य पाठकों के अतिरिक्त दलित विषयों पर शोध करने वाले विद्यार्थियों के लिए तो अत्यंत महत्त्वपूर्ण है ही । 

  सुनील मानव

मानस स्थली, एन.एच.24

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