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Saturday, February 8, 2020
Friday, February 7, 2020
Friday, January 31, 2020
कोरोना वायरस एक चिंतनशील विचारणीय बिंदु
कोरोना वायरस
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जो कोरोना वायरस एक नई महामारी के रूप में उभरकर सामने आया है और जिसने चीन में आपातकालीन स्थितियां निर्मित कर दी हैं, उसका एपिसेंटर वुहान प्रांत का हुआनान सीफ़ूड होलसेल मार्केट बताया गया है। किंतु मैं तो जहां भी नज़र घुमाता हूं, मुझको हुआनान सीफ़ूड होलसेल मार्केट दिखलाई देते हैं।
चीन के लोगों को सर्वभक्षी होने का बड़ा चस्का है। इधर यह फ़ैशनपरस्ती में भी शुमार हो गया। तो वो तमाम तरह की चीज़ें खाते हैं। तमाम तरह के पशुओं का कच्चा-पक्का मांस। वुहान के हुआनान सीफ़ूड होलसेल मार्केट में एक सेक्शन है, जहां 120 प्रकार के पशुओं का मांस बेचा जाता है। इन पशुओं को ख़रीदे जाने के बाद मारकर पकाया जाता है। अकसर तो वे जीवित ही उन्हें पकाते हैं। एक फ़ैशन यह भी है कि तश्तरी में ऐसा भोजन हो, जिसमें प्राण अभी शेष हों। मांसभक्षण अपने आपमें क्रूर है। तिस पर यह अतिचार तो मनोरोग की ही श्रेणी में आएगा, जो दक्षिण-पूर्व एशिया को ग्रस चुका है।
चीन में सांपों को खाया जाता है। कुत्तों को मारकर पकाया जाता है। इधर इंटरनेट पर ऐसी युवतियों की तस्वीरें प्रसारित हुईं, जो चमगादड़ों को खा रही थीं। एग्ज़ॉटिक फ़ूड के नाम पर वे कुछ भी खाते हैं। झींगा और केकड़ा तो पुरानी बात हो गई, अब रेस्तरां में जाकर वे फ़रमाइश करते हैं कि बीयर्स-पॉ खाना है। हिरन खाना है। शुतुरमुर्ग़ और पेंगोलिन का गोश्त चखना है। प्रवासी परिंदों की वैराइटीज़ उनकी जीभ को चाहिए। गंदा सी-फ़ूड वे चाव से खाएंगे। उनकी देखा-देखी रॉ-फ़िश वाला सुषी अब भारत में भी खाया जाने लगा है।
वो ये सब खा तो रहे हैं, किंतु शरीर अब प्रतिकार करने लगा है। राक्षसी-वृत्ति महंगी पड़ रही है। कोरोना वायरस अभी तक लगभग 110 लोगों की जान ले चुका है। यह एक क़िस्म का फ़्लू या न्यूमोनिया है, जिस पर एंटीबायोटिक्स बेअसर होती हैं। अगर रोगी में प्रतिरोधक-क्षमता है, तो वह संघर्ष करेगा। अन्यथा उसके प्राण बचाए नहीं जा सकेंगे।
चीन में इससे पूर्व सार्स नामक ऐसी ही एक महामारी फैल चुकी थी। सार्स यानी सीवियर एक्यूट रेस्पिरैटरी सिंड्रोम। वर्ष 2003 में यह महामारी फैली थी, तब वहां के पर्यावरणविदों ने चेताया था। किंतु सुने कौन? चाइना बायोडायर्विटी कंज़र्वेशन एंड ग्रीन डेवलपमेंट फ़ाउंडेशन के महासचिव शिनफ़ेन्ग शोऊ ने मांग की है कि चीन के ऐसे वाइल्डलाइफ़ मार्केट्स पर फ़ौरी रोक नहीं बल्कि पूर्णरूपेण पाबंदी लगाई जाए। वो ना केवल बीमारियों का अड्डा हैं, बल्कि जैव-विविधता के विनाश का भी कारण बन रहे हैं। कोई ना कोई उदारवादी बौद्धिक अभी चीन में उठकर सामने आएगा और कहेगा कि हम क्या खाएं, क्या ना खाएं, यह तय करने वाले आप कौन? जैसे कि ईश्वर ने पशुओं को इसीलिए रचा था कि मनुष्य उनको मारकर खा जाए? कुछ और बुद्धिमान फ़ूड-ट्रेड का हवाला देकर किंतु-परंतु करेंगे। हुकूमत में विवेकशीलता होगी तो वह ऐसे बुद्धिमानों की अनसुनी करके ज़रूरी क़दम उठाएगी। क्योंकि ग़ैरक़ानूनी एनिमल ट्रेडिंग के चलते आज पशुओं की 8775 प्रजातियां संकट में आ गई हैं।
गार्डियन की रिपोर्ट बतलाती है कि कहने को तो चीन में एक वाइल्डलाइफ़ प्रोटेक्शन लॉ है, लेकिन तीस सालों से उसे सुधारा नहीं गया है। ना ही अधिकारियों की उसमें कोई रुचि है। प्राकृतिक संसाधनों और वन्यजीवन का नि:शंक दमन इस देश के गुणसूत्रों में है। पशुओं के प्रति क्रूरता में यह पश्चिमी जगत को भी मात दे चुका है। अमेज़ॉन और ऑस्ट्रेलिया के दावानल के बाद यह कोरोना वायरस बीते एक साल की तीसरी बड़ी प्राकृतिक आपदा है, और अगर अब भी नहीं चेते तो गम्भीर परिणाम भुगतना होंगे।
मालूम हुआ है कि यह कोरोना वायरस सांपों, चूहों, साहियों और पेंगोलिन को खाने से फैल रहा है। बाज़ार में ये पशु खुले पिंजरों में क़ैद रखे जाते थे और मारे जाने की प्रतीक्षा करते थे। रेस्तरां की मेज़ पर सब कुछ सुंदर और सुथरा मालूम होता है, किंतु जब आप कुछ खाने का ऑर्डर देते हैं तो भीतर रसोईख़ाने में उसे कैसे तैयार किया जा रहा है, यह जानने में भी दिलचस्पी होनी चाहिए। जिस पशु का मांस ऑर्डर किया गया है, वह किन परिस्थितियों में रखा गया था, इसकी किसी को चिंता नहीं है। वे भोले और निर्दोष पशु अत्यंत शोचनीय जीवन-परिस्थितियों में रहते हैं। उनके पिंजरे तंग और गंदे होते हैं। वे अपने ही अपशिष्ट में लिथड़े रहते हैं और अनेक संक्रामक रोगों से ग्रस्त होते हैं।
जब मैं कहता हूं कि हुआनान सीफ़ूड होलसेल मार्केट मुझे सब तरफ़ दिखलाई देते हैं, तो उसका आशय यही है कि मांसभक्षण के लिए मारे जाने वाले पशुओं को सदैव ही मैंने शोचनीय दशा में देखा है। अलबत्ता ऐसा कहने का यह अभिप्राय नहीं कि अगर उन्हें साफ़-सुथरी दशा में रखा जाता है, तब आप उन्हें मारकर खा सकते हैं, जैसा कि अमेरिका के कुछ स्लॉटर-हाउस दावा करते हैं कि हम बहुत क्लीन हैं। मनुष्य नैसर्गिक रूप से मांसभक्षी है या नहीं, इस पर एक लम्बी बहस चलती है। किंतु वह सर्वभक्षी तो निश्चय ही नहीं है। मांसभक्षी भी वह फ़ूड-चेन में अपनी शक्ति के आधार पर ही हो सकता है। किंतु मास-स्लॉटर हाउसेस और फ़ैक्टरी-फ़ॉर्म्स की वधशालाओं से कौन-सी फ़ूड-चेन बनती है? निहत्था मनुष्य आमने-सामने की लड़ाई में किस पशु को मारकर खा सकता है? और अगर वह ऐसा नहीं करता, तो शेष सभी प्रकार के मांसभक्षण अनैतिक तो हैं ही, अप्राकृतिक भी हैं।
प्लेग, रैबीज़, एंथ्रेक्स, बर्ड-फ़्लू, स्वाइन-फ़्लू, सार्स के बाद अब कोरोनावायरस हमारे सामने है, जो पशुओं से फैलता है। मनुष्य के अहंकार और उद्दंडता की सीमा नहीं। ऐसी किसी भी महामारी के फैलने पर वह उलटे पशुओं का सामूहिक-वध करने लगता है, स्वयं के आचरण में नैतिकता का समावेश करने की नहीं सोचता। उसे अपने किए पर ग्लानि भी नहीं होती। करुणा की तो बात ही रहने दें। पशुओं को जीवन का अधिकार है, यह तो तब कौन कहे? मैं तो इसको भी अनैतिक ही मानूंगा कि मनुष्य पशुओं से फैलने वाली महामारी के डर से उन्हें मारकर खाना बंद कर दे। पशु-वध के प्रतिकार का आधार तो करुणा और नैतिकता ही होना चाहिए। किंतु अगर वैसी महामारियां फैलती हैं और मनुष्यता का सर्वनाश करती हैं तो शिक़ायत करने का नैतिक-अधिकार किसी को नहीं है। मनुष्य-जाति का विनाश या तो किसी पिंड के पृथ्वी से टकराने से होगा, या युद्धों से होगा, या महामारियों से होगा, या कोई और प्राकृतिक आपदा धरती को मनुष्यों से शुद्ध करेगी- यह तो निश्चित ही है।
मुझको तो इधर हर बात पर गांधी जी याद आते हैं। गांधी जी ने बहुत आहार-चिंतन किया है और उनकी आत्मकथा में भी अनेक प्रकरण इस पर केंद्रित हैं। अनेक पढ़े-लिखे चतुरसुजान इस बात पर उपहास भी करते हैं कि गांधी जी आहार को इतना महत्व क्यों देते हैं। हम क्या खाएं, क्या नहीं खाएं, इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है? उन्हें मालूम नहीं कि हम जो खाते हैं, उससे हमारी चेतना की निर्मिति का गहरा सम्बंध है। जैसा अन्न, वैसा मन। भोजन का शुद्ध, नैतिक, प्राकृतिक और सात्विक होना अत्यंत आवश्यक है।
मैं इस लेख का समापन "सत्य के प्रयोग" के कुछ अंशों से करता हूं। आहार-लिप्सा से सर्वनाश की ओर बढ़ रही दुनिया के लिए एक भारत-मूर्ति के ये विचार हैं-
"मेरा अनुभव तो मुझे यह सिखाता है कि जिसका मन संयम की ओर बढ़ रहा है, उसके लिए आहार की मर्यादा और उपवास बहुत मदद करने वाले हैं। अपनी त्रुटियों का मुझे ठीक दर्शन होने से मैंने उन्हें दूर करने के लिए घोर प्रयत्न किए हैं और फलतः मैं इतने वर्षों तक इस शरीर को टिका सका हूँ और इससे कुछ काम ले सका हूँ। जब प्रत्येक इंद्रिय शरीर के द्वारा आत्मा के दर्शन के लिए ही कार्य करती है, तब उसके रस शून्यवत् हो जाते हैं और तभी कहा जा सकता है कि वह स्वाभाविक रूप से बरसती है। ऐसी स्वाभाविकता प्राप्त करने के लिए जितने प्रयोग किए जाएं, कम ही हैं।"
सुशोभित सर की फेसबुक वॉल से साभार
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जो कोरोना वायरस एक नई महामारी के रूप में उभरकर सामने आया है और जिसने चीन में आपातकालीन स्थितियां निर्मित कर दी हैं, उसका एपिसेंटर वुहान प्रांत का हुआनान सीफ़ूड होलसेल मार्केट बताया गया है। किंतु मैं तो जहां भी नज़र घुमाता हूं, मुझको हुआनान सीफ़ूड होलसेल मार्केट दिखलाई देते हैं।
चीन के लोगों को सर्वभक्षी होने का बड़ा चस्का है। इधर यह फ़ैशनपरस्ती में भी शुमार हो गया। तो वो तमाम तरह की चीज़ें खाते हैं। तमाम तरह के पशुओं का कच्चा-पक्का मांस। वुहान के हुआनान सीफ़ूड होलसेल मार्केट में एक सेक्शन है, जहां 120 प्रकार के पशुओं का मांस बेचा जाता है। इन पशुओं को ख़रीदे जाने के बाद मारकर पकाया जाता है। अकसर तो वे जीवित ही उन्हें पकाते हैं। एक फ़ैशन यह भी है कि तश्तरी में ऐसा भोजन हो, जिसमें प्राण अभी शेष हों। मांसभक्षण अपने आपमें क्रूर है। तिस पर यह अतिचार तो मनोरोग की ही श्रेणी में आएगा, जो दक्षिण-पूर्व एशिया को ग्रस चुका है।
चीन में सांपों को खाया जाता है। कुत्तों को मारकर पकाया जाता है। इधर इंटरनेट पर ऐसी युवतियों की तस्वीरें प्रसारित हुईं, जो चमगादड़ों को खा रही थीं। एग्ज़ॉटिक फ़ूड के नाम पर वे कुछ भी खाते हैं। झींगा और केकड़ा तो पुरानी बात हो गई, अब रेस्तरां में जाकर वे फ़रमाइश करते हैं कि बीयर्स-पॉ खाना है। हिरन खाना है। शुतुरमुर्ग़ और पेंगोलिन का गोश्त चखना है। प्रवासी परिंदों की वैराइटीज़ उनकी जीभ को चाहिए। गंदा सी-फ़ूड वे चाव से खाएंगे। उनकी देखा-देखी रॉ-फ़िश वाला सुषी अब भारत में भी खाया जाने लगा है।
वो ये सब खा तो रहे हैं, किंतु शरीर अब प्रतिकार करने लगा है। राक्षसी-वृत्ति महंगी पड़ रही है। कोरोना वायरस अभी तक लगभग 110 लोगों की जान ले चुका है। यह एक क़िस्म का फ़्लू या न्यूमोनिया है, जिस पर एंटीबायोटिक्स बेअसर होती हैं। अगर रोगी में प्रतिरोधक-क्षमता है, तो वह संघर्ष करेगा। अन्यथा उसके प्राण बचाए नहीं जा सकेंगे।
चीन में इससे पूर्व सार्स नामक ऐसी ही एक महामारी फैल चुकी थी। सार्स यानी सीवियर एक्यूट रेस्पिरैटरी सिंड्रोम। वर्ष 2003 में यह महामारी फैली थी, तब वहां के पर्यावरणविदों ने चेताया था। किंतु सुने कौन? चाइना बायोडायर्विटी कंज़र्वेशन एंड ग्रीन डेवलपमेंट फ़ाउंडेशन के महासचिव शिनफ़ेन्ग शोऊ ने मांग की है कि चीन के ऐसे वाइल्डलाइफ़ मार्केट्स पर फ़ौरी रोक नहीं बल्कि पूर्णरूपेण पाबंदी लगाई जाए। वो ना केवल बीमारियों का अड्डा हैं, बल्कि जैव-विविधता के विनाश का भी कारण बन रहे हैं। कोई ना कोई उदारवादी बौद्धिक अभी चीन में उठकर सामने आएगा और कहेगा कि हम क्या खाएं, क्या ना खाएं, यह तय करने वाले आप कौन? जैसे कि ईश्वर ने पशुओं को इसीलिए रचा था कि मनुष्य उनको मारकर खा जाए? कुछ और बुद्धिमान फ़ूड-ट्रेड का हवाला देकर किंतु-परंतु करेंगे। हुकूमत में विवेकशीलता होगी तो वह ऐसे बुद्धिमानों की अनसुनी करके ज़रूरी क़दम उठाएगी। क्योंकि ग़ैरक़ानूनी एनिमल ट्रेडिंग के चलते आज पशुओं की 8775 प्रजातियां संकट में आ गई हैं।
गार्डियन की रिपोर्ट बतलाती है कि कहने को तो चीन में एक वाइल्डलाइफ़ प्रोटेक्शन लॉ है, लेकिन तीस सालों से उसे सुधारा नहीं गया है। ना ही अधिकारियों की उसमें कोई रुचि है। प्राकृतिक संसाधनों और वन्यजीवन का नि:शंक दमन इस देश के गुणसूत्रों में है। पशुओं के प्रति क्रूरता में यह पश्चिमी जगत को भी मात दे चुका है। अमेज़ॉन और ऑस्ट्रेलिया के दावानल के बाद यह कोरोना वायरस बीते एक साल की तीसरी बड़ी प्राकृतिक आपदा है, और अगर अब भी नहीं चेते तो गम्भीर परिणाम भुगतना होंगे।
मालूम हुआ है कि यह कोरोना वायरस सांपों, चूहों, साहियों और पेंगोलिन को खाने से फैल रहा है। बाज़ार में ये पशु खुले पिंजरों में क़ैद रखे जाते थे और मारे जाने की प्रतीक्षा करते थे। रेस्तरां की मेज़ पर सब कुछ सुंदर और सुथरा मालूम होता है, किंतु जब आप कुछ खाने का ऑर्डर देते हैं तो भीतर रसोईख़ाने में उसे कैसे तैयार किया जा रहा है, यह जानने में भी दिलचस्पी होनी चाहिए। जिस पशु का मांस ऑर्डर किया गया है, वह किन परिस्थितियों में रखा गया था, इसकी किसी को चिंता नहीं है। वे भोले और निर्दोष पशु अत्यंत शोचनीय जीवन-परिस्थितियों में रहते हैं। उनके पिंजरे तंग और गंदे होते हैं। वे अपने ही अपशिष्ट में लिथड़े रहते हैं और अनेक संक्रामक रोगों से ग्रस्त होते हैं।
जब मैं कहता हूं कि हुआनान सीफ़ूड होलसेल मार्केट मुझे सब तरफ़ दिखलाई देते हैं, तो उसका आशय यही है कि मांसभक्षण के लिए मारे जाने वाले पशुओं को सदैव ही मैंने शोचनीय दशा में देखा है। अलबत्ता ऐसा कहने का यह अभिप्राय नहीं कि अगर उन्हें साफ़-सुथरी दशा में रखा जाता है, तब आप उन्हें मारकर खा सकते हैं, जैसा कि अमेरिका के कुछ स्लॉटर-हाउस दावा करते हैं कि हम बहुत क्लीन हैं। मनुष्य नैसर्गिक रूप से मांसभक्षी है या नहीं, इस पर एक लम्बी बहस चलती है। किंतु वह सर्वभक्षी तो निश्चय ही नहीं है। मांसभक्षी भी वह फ़ूड-चेन में अपनी शक्ति के आधार पर ही हो सकता है। किंतु मास-स्लॉटर हाउसेस और फ़ैक्टरी-फ़ॉर्म्स की वधशालाओं से कौन-सी फ़ूड-चेन बनती है? निहत्था मनुष्य आमने-सामने की लड़ाई में किस पशु को मारकर खा सकता है? और अगर वह ऐसा नहीं करता, तो शेष सभी प्रकार के मांसभक्षण अनैतिक तो हैं ही, अप्राकृतिक भी हैं।
प्लेग, रैबीज़, एंथ्रेक्स, बर्ड-फ़्लू, स्वाइन-फ़्लू, सार्स के बाद अब कोरोनावायरस हमारे सामने है, जो पशुओं से फैलता है। मनुष्य के अहंकार और उद्दंडता की सीमा नहीं। ऐसी किसी भी महामारी के फैलने पर वह उलटे पशुओं का सामूहिक-वध करने लगता है, स्वयं के आचरण में नैतिकता का समावेश करने की नहीं सोचता। उसे अपने किए पर ग्लानि भी नहीं होती। करुणा की तो बात ही रहने दें। पशुओं को जीवन का अधिकार है, यह तो तब कौन कहे? मैं तो इसको भी अनैतिक ही मानूंगा कि मनुष्य पशुओं से फैलने वाली महामारी के डर से उन्हें मारकर खाना बंद कर दे। पशु-वध के प्रतिकार का आधार तो करुणा और नैतिकता ही होना चाहिए। किंतु अगर वैसी महामारियां फैलती हैं और मनुष्यता का सर्वनाश करती हैं तो शिक़ायत करने का नैतिक-अधिकार किसी को नहीं है। मनुष्य-जाति का विनाश या तो किसी पिंड के पृथ्वी से टकराने से होगा, या युद्धों से होगा, या महामारियों से होगा, या कोई और प्राकृतिक आपदा धरती को मनुष्यों से शुद्ध करेगी- यह तो निश्चित ही है।
मुझको तो इधर हर बात पर गांधी जी याद आते हैं। गांधी जी ने बहुत आहार-चिंतन किया है और उनकी आत्मकथा में भी अनेक प्रकरण इस पर केंद्रित हैं। अनेक पढ़े-लिखे चतुरसुजान इस बात पर उपहास भी करते हैं कि गांधी जी आहार को इतना महत्व क्यों देते हैं। हम क्या खाएं, क्या नहीं खाएं, इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है? उन्हें मालूम नहीं कि हम जो खाते हैं, उससे हमारी चेतना की निर्मिति का गहरा सम्बंध है। जैसा अन्न, वैसा मन। भोजन का शुद्ध, नैतिक, प्राकृतिक और सात्विक होना अत्यंत आवश्यक है।
मैं इस लेख का समापन "सत्य के प्रयोग" के कुछ अंशों से करता हूं। आहार-लिप्सा से सर्वनाश की ओर बढ़ रही दुनिया के लिए एक भारत-मूर्ति के ये विचार हैं-
"मेरा अनुभव तो मुझे यह सिखाता है कि जिसका मन संयम की ओर बढ़ रहा है, उसके लिए आहार की मर्यादा और उपवास बहुत मदद करने वाले हैं। अपनी त्रुटियों का मुझे ठीक दर्शन होने से मैंने उन्हें दूर करने के लिए घोर प्रयत्न किए हैं और फलतः मैं इतने वर्षों तक इस शरीर को टिका सका हूँ और इससे कुछ काम ले सका हूँ। जब प्रत्येक इंद्रिय शरीर के द्वारा आत्मा के दर्शन के लिए ही कार्य करती है, तब उसके रस शून्यवत् हो जाते हैं और तभी कहा जा सकता है कि वह स्वाभाविक रूप से बरसती है। ऐसी स्वाभाविकता प्राप्त करने के लिए जितने प्रयोग किए जाएं, कम ही हैं।"
सुशोभित सर की फेसबुक वॉल से साभार
Wednesday, January 22, 2020
रिव्यू : बेहतरीन मगर बेअसर है 'ताना जी'
यह एक ऐतिहासिक फ़िल्म है। जो अच्छी तरह से किक मारती है, बीच में फड़फड़ाती है और फिर चरमोत्कर्ष में कुछ अच्छे घूंसे मारती है।
पीरियड ड्रामा या ऐतिहासिक थकान नामक एक स्थिति इसमें है। इस फ़िल्म का उद्देश्य भारतीयों पर गर्व करना है, जो हमें अतीत में वापस ले जाती है, 17 वीं शताब्दी के अंत तक, जब हम “सोने के चिडिया” हुआ करते थे, तब तक "बाहरी ताक़त" (विदेशी आक्रमणकारियों) ने आकर हमें अलग कर दिया। फिल्म की शुरुआत में एक वॉयसओवर कहता है, "हम आपके हैं पर गुन्हगार हैं। (हम अपनी ही मातृभूमि में दोषी हो गए)।" हालाँकि, मराठा सम्राट शिवाजी के सबसे बहादुर जनरलों में से एक, तानाजी मालुसरे के जीवन के काल्पनिक (अस्वीकरण के कारण) और एक हास्य-पुस्तक है, जो काम करने का प्रबंधन करती है आंशिक रूप से।
1670 में ताना जी (अजय देवगन) अपने बेटे रेबा की शादी की तैयारी में व्यस्त है, जब उसे शिवाजी (शरद केलकर) के लिए मिशन पर जाने के लिए यह सब एक तरफ छोड़ना पड़ता है और मुगलों से मराठों के लिए कोंधना किले को फिर से हासिल करना पड़ता है। औरंगज़ेब द्वारा दक्षिण भारत में मुग़ल विस्तार के आधार के रूप में रणनीतिक किले का उपयोग करने की योजना का एक हिस्सा है और यह किला उनके राजपूत अधिकारी उदयभान राठौड़ (सैफ अली खान) के नियंत्रण में है।
अजय देवगन की उड़ान के साथ चीजें अच्छी तरह से किक करती हैं। जल्द ही यह सब एक के बाद एक लड़ाई के सेट का टुकड़ा बन जाता है। गीत-और-नृत्य के अतिरिक्त, सभी को 3 डी में बनाया गया है जो इस फ़िल्म को तेजी से बढ़ता है, सैन्यवादी ध्वनि, विशेष रूप से घमासान। भगवा (गेरू / केसर) रंग पर बहुत कुछ खेला जाता है, मराठा सेना के भीतर कुछ षडयंत्रकारी असंतोष, औरंगजेब और ईरान के शाह के बीच मानव शतरंज का खेल लेकिन खूंखार इस्लामोफोबिया निहित है, हालांकि पूरी तरह से दूर नहीं किया गया है।
भव्य पैमाने और निष्पादन के बावजूद, बीच में एक निश्चित एन्नुई स्थापित होना शुरू हो जाता है। हालाँकि, जलवायु के क्रम में चीजें फिर से प्रभावी रूप से सामने आती हैं। कोंढाना के खड़ी पहाड़ी किले की स्केलिंग, उदयभान के साथ ताना जी की गति, लड़ाई और जीत के बाद आखिरी हड़ताल। यह कुछ इस प्रकार के सामूहिक कैथारिस और एड्रेनालाईन रश के लिए ही काम करता है।
नायक और खलनायक सुविधाजनक चरम सीमा पर बैठे नजर आते हैं। अजय देवगन उपयुक्त रूप से कुशल है क्योंकि वह कुछ भी गलत नहीं कर सका है फ़िल्म में । लेकिन उदयभान (सैफ) को अलाउद्दीन खिलजी की व्याख्या मिलती है, शायद औरंगजेब के साथ उसके जुड़ाव के कारण। सैफ अली खान उन्मत्त, अशिक्षित चरित्र को निभाते हैं। कमल (नेहा शर्मा) नामक लड़की के प्रति उसके प्रेम के रास्ते में आने वाली वर्ग राजनीति के बारे में बैकस्टोरी का एक संकेत अब उसकी कैद में विधवा के रूप में है। इसने अपनी खलनायकी को एक अच्छा संदर्भ दिया जा सकता है, लेकिन यहां एक्टिंग का धागा लटका हुआ है। शरद केलकर एक सुंदर और प्रतिष्ठित शिवाजी के रूप में काम करते हैं, जैसा कि हमने उन्हें इतिहास की किताबों और अमर चित्र कथाओं में अपनी पत्नी के माध्यम से जाना है। और महिलाएं - शिवाजी की माँ राजमाता जीजाबाई (पद्मावती राव) और ताना जी की पत्नी सावित्री (काजोल) - से अपेक्षा की जाती है कि पुरुष सहमति के रक्षक होने के अलावा उनकी कोई भूमिका नहीं होगी।
अपनी रेटिंग - ढाई स्टार
Saturday, January 11, 2020
रिव्यू: आँखे नम करती है छपाक
कल जब हम 'छपाक' देख रहे थे, डिस्टर्बिंग विज़ुअल्स के चलते एक आदमी पर पैनिक अटैक हुआ। संयोग से दर्शकों में एक डॉक्टर थीं। फ़िल्म रोककर ग़श खाये उस आदमी को नॉर्मल करने की कोशिश की गयी। यह वैसी फ़िल्म नहीं है, जिसे देखकर आप सहज बने रहें। जैसे-जैसे दृश्य आगे बढ़ते हैं, आपके भीतर कुछ दरकता चला जाता है। फ़िल्म का निचोड़ यह है कि एसिड पहले आपके दिमाग़ में जगह बनाता है, फिर उसकी बोतल आपके हाथों में आती है।
किसने आख़िर ऐसा समाज रच डाला है
जिसमें बस वही दमकता है, जो काला है
मैं मालती और आमोल (असल में लक्ष्मी और आलोक) के संघर्ष को लगभग शुरुआती दिनों से जानता हूँ। ये जीवट वाले लोग हैं और इनका आंदोलन अभी जारी है। जब तक बर्बरताएँ इस धरती पर हैं, उसके ख़िलाफ़ संघर्ष का साहस भी इसी धरती पर है। हमें अपने ग़मे-रोज़गार में इस तरह मुब्तिला नहीं हो जाना चाहिए कि लड़ने वाले लोग अकेला महसूस करें। यह वक़्त सड़क पर उतरे न्यायप्रिय लड़ाकाओं के साथ सॉलिडरिटी दिखाने का है, उनके साथ क़दमताल करने का है।
हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की ज़रूरत बाक़ी है
मेघना गुलज़ार और दीपिका पादुकोण के लिए एक ज़ोरदार सलाम बनता है!
Avinash Das की फेसबुक
वाल से
किसने आख़िर ऐसा समाज रच डाला है
जिसमें बस वही दमकता है, जो काला है
मैं मालती और आमोल (असल में लक्ष्मी और आलोक) के संघर्ष को लगभग शुरुआती दिनों से जानता हूँ। ये जीवट वाले लोग हैं और इनका आंदोलन अभी जारी है। जब तक बर्बरताएँ इस धरती पर हैं, उसके ख़िलाफ़ संघर्ष का साहस भी इसी धरती पर है। हमें अपने ग़मे-रोज़गार में इस तरह मुब्तिला नहीं हो जाना चाहिए कि लड़ने वाले लोग अकेला महसूस करें। यह वक़्त सड़क पर उतरे न्यायप्रिय लड़ाकाओं के साथ सॉलिडरिटी दिखाने का है, उनके साथ क़दमताल करने का है।
हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की ज़रूरत बाक़ी है
मेघना गुलज़ार और दीपिका पादुकोण के लिए एक ज़ोरदार सलाम बनता है!
Avinash Das की फेसबुक
वाल से
Thursday, January 2, 2020
समकालीन हिंदी कविता का प्रतिनिधि स्वर आर चेतन की कविताएँ
समकालीन दौर में बहुत ही कम या कहें अंगुली पर गिने जा सकने योग्य लोग ही श्रेष्ठ और बेहतर कविताएँ लिख रहे हैं। उनमें से एक है आर चेतन क्रांति, इनकी कविताएँ सभ्यता और समाज का अंदरूनी हिस्सा हमें दिखाती है। और चीख चीख कर हमें मौजूदा हालातों से रूबरू कराती हैं। नि:संदेह समकालीन हिंदी कविता काफ़ी समृद्ध है। पुराने दौर के कवियों को छोड़ दिया जाए तो वर्तमान समय के या कहें समकालीन दौर के कवियों का कविता संसार भरा पूरा है। इन कवियों के पास अनुभव के लम्बे-लम्बे रेशे हैं। देवी प्रसाद मिश्र, कात्यायनी,अनामिका जैसे प्रतिष्ठित और समृद्ध कवियों- कवयित्रियों के बाद के इन कवियों की कलम में वह माद्द्दा है, जो सह्रदय और संवेदनशील ही नहीं अपितु आम पाठक वर्ग को भी भावाविभुत कर सकता है। आरचेतन क्रांति की कविताओं में धूमिल की छवि दिखाई पड़ती है। जिस तरह के यथार्थ बोध से धूमिल अपने पाठकों को बैचेन कर देते थे कुछ ऐसा ही कर गुजरने वाली कविताएँ आर चेतन क्रांति की भी हैं। जिस तरह नागार्जुन, कबीर या त्रिलोचन को पढ़ते हुए बाबा तुलसी याद आते हैं उसी तरह चेतन क्रांति भी अपना प्रभाव अन्य कवियों की भांति साहित्य जगत में छोड़ते नजर आते हैं।
‘वीरता पर विचलित’ काव्य संग्रह की कविताएँ एक साधारण पाठक को भी सोचने समझने पर मजबूर कर देती हैं। अपनी पहली ही कविता ‘पावर’ में वे लिखते हैं –
पावर गली-गली थी, छज्जे पे भी खड़ी थी
छत पे लगाके आला, घर-घर झाँकती थी।
पावर का था ‘विधाला’, पावर की थी पढ़ाई
टीचर भी किया करता था पावर की ही बड़ाई।
चेतन क्रांति की इस कविता में पावर का यानी ताकत का जिस तरह चित्रण हुआ है वैसा आजतक कहीं ओर नहीं देखा गया है। बिल्कुल साधारण और आसान से शब्दों में वे पावर के भारी भरकम शरीर का स्पष्ट चित्रण कर जाते हैं। वीर होना एक मनुष्य के गौरवशाली और सम्पूर्ण होने का अभिप्रेत है। लेकिन यह वीरता आर चेतन क्रांति को विचलित करती है। वे सभ्यता, संस्कृति और साम्प्रदायिकता के गठजोड़ का मजाक उड़ाते हैं। ‘सीलमपुर की लड़कियाँ’ कविता पर आर चेतन क्रांति को भारत भूषण अग्रवाल स्मृति सम्मान भी मिला था। लेकिन वीरता पर विचलित काव्य संग्रह में वे ‘सीलमपुर के लड़के’ के नाम से कविता लिखते हैं।
सीलमपुर के लड़के भूखे और बेरोजगार हैं
घर-परिवार और समाज से बेजार हैं
जिंदगी के बारे में कोई नक्षा उनके पास नहीं है
उनके सामने टीवी पर राम और युधिष्ठिर मनोरंजन करके नई भूमिकाओं में चले गए
उनके सामने चार सौ साल पुरानी एक मस्जिद गिरी और नया जमाना आया
उनके सामने मोबाइल की स्क्रीनों पर लड़कियाँ उग आईं जिन्हें वे मसलते रहे
रघुवीर सहाय को हम सभी ने निसंदेह पढ़ा है। उनकी एक कविता है ‘रामदास’ तो रामदास को पता है कि हत्या होग्ही, निश्चित होगी और वह अपनी हत्या के लिए प्रस्तुत भी होता है उसकी हत्या होने के बाद सब गवाह हैं लेकिन रामदास बदल जाता है। उसे तनख्वाह इस बात की मिलती है कि वह एक प्रोफेशनल हत्यारा है। आर चेतन क्रांति की कविता इस प्रोफेशनल रामदास से मिलाती है।
उसको एक चाक़ू दिया गया
और तनख्वाह
कि जब मरते हुए आदमी को देखकर
तुम्हारा हाथ काँपे
तुम करुणा से बाज रहो
तो वह जब घर में घुसा
उसके हाथ में सिर्फ आदेश था
उसने बैठकर मकलूत की पूरी बात सुनी
उसे दया आई, हमदर्दी हुई
आदत के तहत उसके दिल ने कहा
छोड़ दो
लेकिन उसे पीछे रह जाने से डर लगा
और थोड़ी देर बाद
अपने थैले में
एक सिर ठूंस कर निकला जिसकी आँखें खुली थी
यह नया रामदास है जो मार रहा है और मर रहा है। उसकी तनख्वाह उचित होना या ना होना साबित करने के लिए।
एक अन्य कविता में आज की मॉल सभ्यता पर चेतन क्रांति लिखते हैं
गू-मूत-कीचड़-धूल-शोर
खून दर्द उल्लास
धक्कामुक्की और भीड़ के चौराहे पर
एक वस्तुसम्त दिशा देखकर
खड़ा किया वह नन्हा सा स्वर्ग
साफ़ और चमकीला
जो दो ही महीनें में
सदियों पुराने शहर से ज्यादा शाश्वत दिखने लगा
ये मॉल हमें वैभव के अलावा हमारी अतृप्त इच्छाओं पर भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिखाता है। ऐसी इच्छाएँ जिनका हमें अब तक भान ही नहीं था। सब कुछ तृप्त करने वाले यह मॉल ऐसा राक्षस है जिससे बाहर निकलने के बाद हमारा क्या होता है उसके बारे में हमने आजतक न सोचा और न सोचने की जहमत उठाई। आर चेतन क्रांति के पास कविताओं की बहुत सी वैराइटी है। उनके पास एक सीधा और तना तना हुआ शिल्प है, जिसमें छंद सधे हुए हैं। उनके इस संग्रह में गीत हैं, गजलें हैं लेकिन कुछ भी रूमानी नहीं। उनकी मिजाज कड़क है जो सीधे व्यक्ति के दिल में जाकर चुभती है। आर चेतन क्रांति कविता के मामले में सभ्यताओं का एक एक कर जब पर्दा उठाते हैं तो नियत लक्ष्य पर वार करने लायक कविताएँ ही बाहर निकलती है।
इक्कीसवीं सदी बाजार की संस्कृति ही नहीं बल्कि अपनी खोई हुई अस्मिता को जगाने की सदी भी है। आज की हिंदी से आदिवासी, दलित, स्त्री सभी जाग्रत हो रहे हैं। सैकड़ों सालों से हम पर पसरी हुई, जमी हुई काई और खुदकश निगाहों से उस वक्त को देशभक्त कविता के माध्यम से चेतन क्रांति हटाते हैं और लिखते हैं –
सपाट सोच, इकहरा दिमाग, दिल पत्थर
सैकड़ों साल से ठहरी हुई काई ऊपर
बेरहम सोच की खुदकश निगाहबानी से फरार
तुम जो फिरते हो लिये सर पे कदीमी तलवार
तुमको मालूम भी है वक्त कहाँ जाता है
और इस वक्त से इंसान का क्या रिश्ता है!
चेतन क्रांति की एक अन्य कविता है भय प्रवाह। जिसमें में सत्ता से लड़ते हैं और अपने बागी तेवर इस कविता में दिखाते हैं। यह लंबी कविता हमें उस दौर में ले जाती है जहाँ सत्ता अपने मद में चूर अभिव्यक्ति की आजादी को दबाने की कोशिश करती हुई दिखाई देती है। सत्ताधीनों के चेलों के उस व्यवहार को इस कविता में प्रदर्शित किया गया है जहाँ वे अपनी लिप्सा, कामना के लिए किसी भी हद तक की चाटुकारिता तक करने को तैयार हो जाते हैं। इसी तरह की एक कविता सीधी सड़क- टेढ़ी सड़क में वे स्वार्थ भावना को इंगित करते हुए एक टुच्चे से स्वार्थ के लिए लोगों की करनी पर वार करते हैं।
कुलमिलाकर आर चेतन क्रांति के कविता संग्रह ‘वीरता पर विचलित’ एक ऐसा काव्य संग्रह है जिसमें हर वर्ग,जाति, संस्कृति, सभ्यता पर खुले विचारों से लिखा गया है। भले वह ‘प्यार का पावर डिस्कोर्स’ हो, ‘तुम अगर वेश्या होती’, ‘सुनो, दुनिया को वहाँ से मत देखो जहाँ तुम पैदा हुई थी’, ‘देह-बोध’, ‘क्या मेरे भीतर से उगोगी तुम?’, ‘स्त्री होने के लिए’ ‘अब मन की मेहनत कर,ताऊ’, ‘नंगी लड़की का बयान’ ये सभी कविताएँ हमें समाज का आइना दिखाती हैं और चीख चीख कर उसका बयाना देती है। क्योंकि जब तक लड़ेंगे नहीं तब तक बदल नहीं सकते और हमें लड़ना होगा एक बेहतर समाज के लिए, बेहतर देश के लिए
डॉ० राम भरोसे
असिस्टेंट प्रोफेसर (हिंदी)
राजकीय महाविद्यालय पोखरी (क्विली)
टिहरी गढ़वाल , उत्तराखंड
Monday, December 23, 2019
किसान क्यों जरूरी है। राष्ट्रीय किसान दिवस
राष्ट्रीय किसान दिवस 2019 - 12 अक्टूबर
किसान दिवस क्या है?
किसान दिवस हर साल 12 अक्टूबर को मनाया जाता है! खेती का पेशा लगभग 12,000 साल पहले पशुधन के वर्चस्व के साथ शुरू हुआ क्योंकि शिकारी / इकट्ठा करने वाले लोग बस गए और अपना भोजन बनाना शुरू कर दिया। संक्षेप में, खेती सबसे पुरानी नौकरियों में से एक है। तो आइए हम सभी किसानों को कुछ प्यार देने के लिए एक क्षण लेते हैं जो हमें साल भर खिलाने के लिए अथक परिश्रम करते हैं।
किसान दिवस का इतिहास
कृषि दुनिया के सबसे पुराने और महत्वपूर्ण व्यवसायों में से एक है। किसान अपने माल पर निर्भर रहने वाले लोगों को लगातार भोजन देते हुए आर्थिक विकास में सबसे अधिक योगदान देने वालों में से एक बने हुए हैं। मूल रूप से पुराने किसान दिवस के रूप में जाना जाता है, किसानों द्वारा अपनी फसल उगाने में लगाई गई कड़ी मेहनत का जश्न मनाने के लिए राष्ट्रीय किसान दिवस की खेती की गई थी। 12 अक्टूबर की तारीख के बारे में आया क्योंकि यह पारंपरिक कटाई की अवधि के अंत में भूमि है, जिससे किसानों को उत्सव में भाग लेने की अनुमति मिलती है, जो कभी-कभी महीने की संपूर्णता को पूरा कर सकती है। इसके अतिरिक्त, हर तीन साल में, हार्वेस्ट चंद्रमा अक्टूबर की शुरुआत में गिर जाएगा, पूर्ववर्ती और 12 वीं पर राष्ट्रीय किसान दिवस तक अग्रणी होगा।
वास्तव में, लुइसैंगर, लुइसियाना में, एक पुराना किसान दिवस समारोह है जो आज की आधुनिक और वैज्ञानिक उद्यम बनने से पहले खेती की परंपराओं और कार्यप्रणाली को मनाता है और दिखाता है। आमतौर पर, उत्तरी अमेरिका के राज्यों में, पहली ठंढ अक्टूबर की शुरुआत में होती है, यदि मध्य नहीं, तो सर्दियों की तैयारी के लिए कई किसानों को अपनी फसल काटने की आवश्यकता होती है। अब, खेती की तकनीक में वैज्ञानिक विकास के कारण, उपज और लाभ को बढ़ाने के लिए पारंपरिक बढ़ती अवधि को बढ़ाया जा सकता है, इस कारण से कि राष्ट्रीय किसान दिवस ग्रामीण क्षेत्रों में अपने उत्सवों को राष्ट्रीय किसान दिवस तक विस्तारित करने के लिए है।
कृषि दुनिया के सबसे पुराने और महत्वपूर्ण व्यवसायों में से एक है। किसान अपने माल पर निर्भर रहने वाले लोगों को लगातार भोजन देते हुए आर्थिक विकास में सबसे अधिक योगदान देने वालों में से एक बने हुए हैं। मूल रूप से पुराने किसान दिवस के रूप में जाना जाता है, किसानों द्वारा अपनी फसल उगाने में लगाई गई कड़ी मेहनत का जश्न मनाने के लिए राष्ट्रीय किसान दिवस की खेती की गई थी। 12 अक्टूबर की तारीख पारंपरिक कटाई अवधि के अंत में उतरती है, जिससे किसानों को उत्सव में भाग लेने की अनुमति मिलती है, जो कभी-कभी पूरे महीने चल सकता है।
आप कहते हैं कि आप विद्रोह चाहते हैं
ब्रिटिश कृषि क्रांति कृषि उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि के कारण शुरू हुई।
1902 में राष्ट्रीय किसान संघ की स्थापना हुई।
NFU टेक्सास में दस परिवार के किसानों द्वारा स्थापित किया गया था। संघ ने महिलाओं के लिए मतदान के अधिकार, किसानों के लिए उचित बाजार पहुंच और सहकारी अधिकारों में वृद्धि की वकालत की।
लॉस एंजिल्स में किसान बाजार शुरू हुआ, किसानों और व्यापारियों के लिए स्थायी स्टालों से अपने माल बेच सकते हैं।
राष्ट्रीय कृषि दिवस क्या है?
कृषि क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सभी क्षेत्रों को मान्यता देने के लिए राष्ट्रीय कृषि दिवस बनाया गया। यह दिन 14 मार्च को प्रतिवर्ष मनाया जाता है।
स्थानीय किसान बाजार में खरीदारी करके अपने स्थानीय किसानों का समर्थन करें। ध्यान रखें कि छोटे व्यवसायों के साथ खरीदारी करके, आप एक उद्यमी को उनके परिवार के लिए सहायता प्रदान कर रहे हैं या उनके व्यवसाय का विस्तार कर रहे हैं। अमेरिका में पारिवारिक खेती का इतिहास है और आपका समर्थन उनके सपनों को जीवित रखने में मदद करता है।
अपना खुद का मिनी फार्म शुरू करें
शीर्ष कैनसस सिटी पीआर फर्मों में से एक के अनुसार, केवल 2% अमेरिकी अपना भोजन खुद ही उगाते हैं। अपने किसान बनने की तुलना में राष्ट्रीय किसान दिवस मनाने का इससे बेहतर तरीका क्या हो सकता है? सोचिये अगर आपके पिछवाड़े में आपके पसंदीदा फल या सब्जी बढ़ रहे हों तो यह कितना बढ़िया होगा। एक यार्ड नहीं है? कोई दिक्कत नहीं है। कई पड़ोस में सामुदायिक उद्यान हैं जहाँ आप अपने हरे रंग के अंगूठे का परीक्षण कर सकते हैं।
एक किसान के तन के साथ अपनी पट्टियाँ कमाएँ
हम आपके सूरज ब्लॉक को बाहर फेंकने के लिए नहीं कह रहे हैं, लेकिन अपने स्वयं के टी-शर्ट तन को खेलकर अपने स्थानीय किसानों के साथ एकजुटता दिखाने में मज़ा आ सकता है! धूप के दिन का आनंद लें और एक किसान टैन का सही अर्थ जानें।
खेती दुनिया भर में स्वतंत्र रूप से विकसित हुई, चाहे वह चावल, गेहूं, केले, झींगा, या बादाम की खेती थी, दुनिया भर में किसान दुनिया भर का पेट भरने के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं।
वे हमारा भोजन उगाते हैं
फलों और सब्जियों तक पहुंच के बिना दुनिया की कल्पना करना कठिन है। सौभाग्य से, पेशेवरों का एक समूह है जो खुद को पूर्ण उत्पादन बढ़ने के लिए समर्पित करता है। किसी भी समय फल और सब्जियां खरीदने की विलासिता प्रदान करके किसान हमारे समाज में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
किसान समर्पित हैं, मेहनती हैं
किसान होने का निर्णय एक ऐसा निर्णय है जिसे कई लोग हल्के में नहीं लेते हैं। खेत बनाने के लिए निवेश, कठिन परिश्रम, उपकरण, समय और बढ़ते भोजन के जुनून की आवश्यकता होती है।
राष्ट्रीय किसान दिवस की परंपराएं
एक किसान को धन्यवाद
वे ब्रेडबैकेट की रीढ़ हैं और जो इस देश को न केवल खिलाती है, बल्कि कृषि के रूप में कई अन्य राष्ट्रों में आम तौर पर एक प्रमुख निर्यात है। सुनिश्चित करें कि आप एक किसान को धन्यवाद देते हैं कि वे अपनी मेहनत के लिए आज हर जगह टेबल पर रोटी रखते हैं!
किसान को धन्यवाद देने का एक सबसे अच्छा तरीका आपके बटुए के साथ है। एक किसान के बाजार में आने या स्थानीय सीएसए (कृषि समर्थित कृषि) में शामिल होने के लिए कुछ ताजा, स्थानीय उत्पाद, अंडे या यहां तक कि घास खिलाया जाने वाला मांस प्राप्त करें।
एक बगीचा शुरू करो या खुद बन जाओ किसान ! अपने स्वयं के भोजन को उगाना राष्ट्रीय किसान दिवस मनाने के लिए सबसे स्थायी और पुरस्कृत तरीकों में से एक है। इसमें सिर्फ कुछ टमाटर लगाने और उगाने के लिए एक कठिन सीखने की अवस्था हो सकती है, लेकिन बेल से टमाटर का स्वाद सही है, यह इसके लायक बना देगा।
राष्ट्रीय किसान दिवस के बारे में आँकड़े
20%
अमेरिकी कृषि का बीस प्रतिशत से अधिक निर्यात किया जाता है, जो सभी पचास राज्यों में ग्रामीण क्षेत्रों का समर्थन करता है। ऑड्स हैं, आपके राज्य में कम से कम एक किसान दूसरे देश में फसल बेचता है और दुनिया भर के परिवारों को खिलाता है।
50 बिलियन
2014 में संयुक्त राज्य अमेरिका से मकई निर्यात करने के लिए कितना पैसा बनाया गया था। यह मकई की कर्नेल की बहुत सारी जीरो है।
90 मिलियन
संयुक्त राज्य अमेरिका में गायों और बछड़ों की अनुमानित आबादी, जो कि कैलिफोर्निया, टेक्सास और फ्लोरिडा के संयुक्त राज्यों की तुलना में अधिक आबादी है।
#nationalfarmersday
Saturday, December 21, 2019
रिव्यू: किसे चाहिए चुलबुल पांडे 'दबंग 3'

दबंग 3 की शुरुआत में, सलमान खान का चरित्र अपने मातहतों के साथ बातचीत कर रहा है, जब की वह वहाँ एक भद्दी टिप्पणी की तरह लगता है। इस क्रॉस-सेक्शनल अपील को बनाए रखने का प्रयास इस फ़िल्म में बेहद नीरस और क्लिचड रूप में है, जो इसे रूढ़िवाद और उदारवाद के इस तरह के एक मिस-मैश बनाता है, लगभग अपनी उलझन में।
दबंग 3 में खान की तीसरी स्क्रीन पर चुलबुल पांडे, कॉमिक-गंभीर पुलिसकर्मी हैं, जिनके पास आम लोगों की सेवा करने के लिए कानून को दरकिनार करने के बारे में कोई योग्यता नहीं है। हॉलीवुड में मुझे सुपरहीरो की कहानियों को परोसने की प्रवृत्ति के साथ, यह बॉलीवुड उद्यम के बारे में है कि चुलबुल नामक एक बेकार, उद्देश्यहीन साथी कैसे बन गया, अब हम उसे जानते हैं: बुराई का नाश करने वाला चित्रण कभी मजाक के रूप में चित्रित नहीं किया जा सकता।
'दबंग 3' में लेखकों का उद्देश्य अनजानी विडंबनाओं के कई दृश्यों की ओर ले जाता है। जैसे कि जब चुलबुल महिलाओं के सम्मान की बात करता है और उन पुरुषों पर भड़क उठता है जो 2014 के हिट गीत 'जुम्मे की रात' में नाचते हुए दिखाए जाने के कुछ ही समय बाद महिलाओं को "मल्ल" के रूप में संदर्भित करते हैं, जिसमें खान की अपनी खुद की हिट फिल्म को उठाया जाता है जैकलिन फर्नांडीज की स्कर्ट बिना उनकी जानकारी के उनके दांतों बीच नजर आती है और नृत्य करते समय उनका पीछा किया जाना भी इसमें शामिल है। इसके बाद चुलबुल ने दहेज और महिलाओं की शिक्षा के बारे में एक स्पष्ट रूप से नारीवादी रुख अपनाया, यहां तक कि वह खुद को एक महिला के "रखवाला" (रक्षक) के रूप में वर्णित करता है जिससे वह शादी करने का इरादा रखता है। उसकी उदारता की आत्म-चेतना और द्वंद्व कुछ समय बाद देखने के लिए समाप्त हो जाते हैं।
समान रूप से थकावट, तुकबंदी से भरे हुए संवाद हैं, जो चालाक वर्डप्ले में कई असफल शॉट साबित होते हैं। जैसे चुलबुल कहता है, "हम अनहु कोठोते हैं जो जोराट से जियादा भोक्त है" (मैं केवल उन लोगों से टकराता हूं जो बहुत ज्यादा भौंकते हैं)। दूसरी तरफ रज्जो अपने पति से कह रही है, "हमरे पेटीकोट में छेड चटाई करवाना" (कृपया मेरे पेटीकोट में छेद न करें)
इन सभी दृश्यों को हंसी उड़ाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। और फिर इस तरह की पंक्तियाँ हैं जो कि स्मार्ट ध्वनि के लिए कोई संदेह नहीं हैं, लेकिन ऐसा नहीं करते हैं: चुलबुल कहता है, "एक होता है पोलिसवाला और एक ईका होत है गुंडा, हम कहलाते हैं पुलिसवाले (वहाँ पुलिसकर्मी हैं और गुंडे हैं, और फिर मेरे जैसे वे लोग हैं जो पुलिस और गुंडे संयुक्त हैं)।
फ़िल्म की कहानी भी याद करने लायक नहीं है। ऐसा लगता है कि खाना पकाने के बर्तन में एक साथ फेंके गए असमान अवयवों का एक गुच्छा है यह फ़िल्म। तो क्या साजिद-वाजिद के संगीत ने अतीत में सलमान खान अभिनीत फिल्मों के लिए कई यादगार धुनें बनाई हैं। यहाँ वे पहले दबंग शीर्षक ट्रैक को रीसायकल करते हैं, फिर दो नंबर देते हैं जो दबंग के 'तेरे मस्त मस्त दो नैन ’के पहले चचेरे भाई की तरह लगते हैं, एक बहुत ही उबाऊ गीत है जिसमें चुलबुल ने रज्जो और - कैमून से रोमांस किया, वे भी कोशिश नहीं कर रहे हैं - 'मुन्ना बदनाम हुआ।'
SFX खराब हैं। यहां तक कि कोरियोग्राफी के लिए कुछ भी नया नहीं है, जो इक्का कोरियोग्राफर-कम-डांसर प्रभुदेवा ने इस फिल्म को निर्देशित किया है, जो अजीब है।
जहाँ तक अभिनय जाता है, खान का आकर्षण पतला हो जाता है क्योंकि वह 2010 में दबंग में इतनी अच्छी तरह से काम करने वाले गौरव और हास्य के उस असामान्य मिश्रण को फिर से जीवित करने के लिए कड़ी मेहनत करता है। यहाँ वह लगभग शर्मिंदा किशोर के रूप में आता है।
सिन्हा के पास करने के लिए बहुत कम है कि वह पाउट करें और सुंदर दिखें। उसके बजाए रज्जो प्रतिभाशाली महिला खुद को क्यों बर्बाद कर रही है? समझ नहीं आता।
Saiee Manjrekar नामक एक बेमिसाल नवागंतुक को एक बड़ी सहायक भूमिका मिलती है, जिसके लिए वह कुछ भी नहीं बल्कि अपने सहज रंग और सुंदर आकृति को उधार देती है। बाकी कलाकारों ने बेशर्मी की।
जिस किसी ने भी सुदीप को अपनी कन्नड़ फिल्मों में देखा है, वह जानता है कि उसके पास सलमान से मेल खाने का करिश्मा है, लेकिन वह यहां एक दबंग 3 में एक स्केचली लिखे हुए चरित्र के सामने नहीं खड़ा होता है, जो बहुत कम होता है, लेकिन अपनी आकर्षक शैली का प्रदर्शन करता है।
इस फिल्म में इतनी अधिक चंचलता और अपरिपक्वता है कि क्लाइमैटिक फाइट सीक्वेंस सदमे के रूप में आता है। यह इतना घोर हिंसक और आपका चेहरा है कि मैं मुश्किल से खुद को स्क्रीन पर देख सका। और निश्चित रूप से क्योंकि यह मुख्य रूप से एक प्रमुख पुरुष स्टार के साथ व्यावसायिक रूप से केंद्रित निर्देशक द्वारा एक मसाला फिल्म है, इसे सख्त ए के बजाय यूए रेटिंग दी गई है जो इसके हकदार हैं।
और तो और यह मनोरंजक नहीं है जब दो पुरुष अभिनेताओं के शानदार शरीर बिना किसी कारण के अपनी शर्ट उतार देते हैं। यह एक मजेदार उपकरण था, जब इसे पहली बार पेश किया गया था, खासकर इसलिए कि इससे पहले दशकों तक, पुरुष सितारे अपने शरीर के बारे में पूरी तरह से लापरवाह रहे थे और यह उद्योग और दर्शकों दोनों द्वारा ग्रहण किया गया था कि केवल महिलाएं की और से आपत्ति जा सकती थी। सज्जनों, हम इस तथ्य से प्यार करते हैं कि आप बाहर काम करते हैं, इसलिए अपने स्क्रिप्ट राइटर को एक और कल्पनाशील तरीका खोजने के लिए अब आपको अपने सेक्सी टॉरोस को प्रदर्शित करने दें?
अपनी रेटिंग 2 स्टार
Review By Tejas Poonia
दबंग 3 की शुरुआत में, सलमान खान का चरित्र अपने मातहतों के साथ बातचीत कर रहा है, जब की वह वहाँ एक भद्दी टिप्पणी की तरह लगता है। इस क्रॉस-सेक्शनल अपील को बनाए रखने का प्रयास इस फ़िल्म में बेहद नीरस और क्लिचड रूप में है, जो इसे रूढ़िवाद और उदारवाद के इस तरह के एक मिस-मैश बनाता है, लगभग अपनी उलझन में।
दबंग 3 में खान की तीसरी स्क्रीन पर चुलबुल पांडे, कॉमिक-गंभीर पुलिसकर्मी हैं, जिनके पास आम लोगों की सेवा करने के लिए कानून को दरकिनार करने के बारे में कोई योग्यता नहीं है। हॉलीवुड में मुझे सुपरहीरो की कहानियों को परोसने की प्रवृत्ति के साथ, यह बॉलीवुड उद्यम के बारे में है कि चुलबुल नामक एक बेकार, उद्देश्यहीन साथी कैसे बन गया, अब हम उसे जानते हैं: बुराई का नाश करने वाला चित्रण कभी मजाक के रूप में चित्रित नहीं किया जा सकता।
'दबंग 3' में लेखकों का उद्देश्य अनजानी विडंबनाओं के कई दृश्यों की ओर ले जाता है। जैसे कि जब चुलबुल महिलाओं के सम्मान की बात करता है और उन पुरुषों पर भड़क उठता है जो 2014 के हिट गीत 'जुम्मे की रात' में नाचते हुए दिखाए जाने के कुछ ही समय बाद महिलाओं को "मल्ल" के रूप में संदर्भित करते हैं, जिसमें खान की अपनी खुद की हिट फिल्म को उठाया जाता है जैकलिन फर्नांडीज की स्कर्ट बिना उनकी जानकारी के उनके दांतों बीच नजर आती है और नृत्य करते समय उनका पीछा किया जाना भी इसमें शामिल है। इसके बाद चुलबुल ने दहेज और महिलाओं की शिक्षा के बारे में एक स्पष्ट रूप से नारीवादी रुख अपनाया, यहां तक कि वह खुद को एक महिला के "रखवाला" (रक्षक) के रूप में वर्णित करता है जिससे वह शादी करने का इरादा रखता है। उसकी उदारता की आत्म-चेतना और द्वंद्व कुछ समय बाद देखने के लिए समाप्त हो जाते हैं।
समान रूप से थकावट, तुकबंदी से भरे हुए संवाद हैं, जो चालाक वर्डप्ले में कई असफल शॉट साबित होते हैं। जैसे चुलबुल कहता है, "हम अनहु कोठोते हैं जो जोराट से जियादा भोक्त है" (मैं केवल उन लोगों से टकराता हूं जो बहुत ज्यादा भौंकते हैं)। दूसरी तरफ रज्जो अपने पति से कह रही है, "हमरे पेटीकोट में छेड चटाई करवाना" (कृपया मेरे पेटीकोट में छेद न करें)
इन सभी दृश्यों को हंसी उड़ाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। और फिर इस तरह की पंक्तियाँ हैं जो कि स्मार्ट ध्वनि के लिए कोई संदेह नहीं हैं, लेकिन ऐसा नहीं करते हैं: चुलबुल कहता है, "एक होता है पोलिसवाला और एक ईका होत है गुंडा, हम कहलाते हैं पुलिसवाले (वहाँ पुलिसकर्मी हैं और गुंडे हैं, और फिर मेरे जैसे वे लोग हैं जो पुलिस और गुंडे संयुक्त हैं)।
फ़िल्म की कहानी भी याद करने लायक नहीं है। ऐसा लगता है कि खाना पकाने के बर्तन में एक साथ फेंके गए असमान अवयवों का एक गुच्छा है यह फ़िल्म। तो क्या साजिद-वाजिद के संगीत ने अतीत में सलमान खान अभिनीत फिल्मों के लिए कई यादगार धुनें बनाई हैं। यहाँ वे पहले दबंग शीर्षक ट्रैक को रीसायकल करते हैं, फिर दो नंबर देते हैं जो दबंग के 'तेरे मस्त मस्त दो नैन ’के पहले चचेरे भाई की तरह लगते हैं, एक बहुत ही उबाऊ गीत है जिसमें चुलबुल ने रज्जो और - कैमून से रोमांस किया, वे भी कोशिश नहीं कर रहे हैं - 'मुन्ना बदनाम हुआ।'
SFX खराब हैं। यहां तक कि कोरियोग्राफी के लिए कुछ भी नया नहीं है, जो इक्का कोरियोग्राफर-कम-डांसर प्रभुदेवा ने इस फिल्म को निर्देशित किया है, जो अजीब है।
जहाँ तक अभिनय जाता है, खान का आकर्षण पतला हो जाता है क्योंकि वह 2010 में दबंग में इतनी अच्छी तरह से काम करने वाले गौरव और हास्य के उस असामान्य मिश्रण को फिर से जीवित करने के लिए कड़ी मेहनत करता है। यहाँ वह लगभग शर्मिंदा किशोर के रूप में आता है।
सिन्हा के पास करने के लिए बहुत कम है कि वह पाउट करें और सुंदर दिखें। उसके बजाए रज्जो प्रतिभाशाली महिला खुद को क्यों बर्बाद कर रही है? समझ नहीं आता।
Saiee Manjrekar नामक एक बेमिसाल नवागंतुक को एक बड़ी सहायक भूमिका मिलती है, जिसके लिए वह कुछ भी नहीं बल्कि अपने सहज रंग और सुंदर आकृति को उधार देती है। बाकी कलाकारों ने बेशर्मी की।
जिस किसी ने भी सुदीप को अपनी कन्नड़ फिल्मों में देखा है, वह जानता है कि उसके पास सलमान से मेल खाने का करिश्मा है, लेकिन वह यहां एक दबंग 3 में एक स्केचली लिखे हुए चरित्र के सामने नहीं खड़ा होता है, जो बहुत कम होता है, लेकिन अपनी आकर्षक शैली का प्रदर्शन करता है।
इस फिल्म में इतनी अधिक चंचलता और अपरिपक्वता है कि क्लाइमैटिक फाइट सीक्वेंस सदमे के रूप में आता है। यह इतना घोर हिंसक और आपका चेहरा है कि मैं मुश्किल से खुद को स्क्रीन पर देख सका। और निश्चित रूप से क्योंकि यह मुख्य रूप से एक प्रमुख पुरुष स्टार के साथ व्यावसायिक रूप से केंद्रित निर्देशक द्वारा एक मसाला फिल्म है, इसे सख्त ए के बजाय यूए रेटिंग दी गई है जो इसके हकदार हैं।
और तो और यह मनोरंजक नहीं है जब दो पुरुष अभिनेताओं के शानदार शरीर बिना किसी कारण के अपनी शर्ट उतार देते हैं। यह एक मजेदार उपकरण था, जब इसे पहली बार पेश किया गया था, खासकर इसलिए कि इससे पहले दशकों तक, पुरुष सितारे अपने शरीर के बारे में पूरी तरह से लापरवाह रहे थे और यह उद्योग और दर्शकों दोनों द्वारा ग्रहण किया गया था कि केवल महिलाएं की और से आपत्ति जा सकती थी। सज्जनों, हम इस तथ्य से प्यार करते हैं कि आप बाहर काम करते हैं, इसलिए अपने स्क्रिप्ट राइटर को एक और कल्पनाशील तरीका खोजने के लिए अब आपको अपने सेक्सी टॉरोस को प्रदर्शित करने दें?
अपनी रेटिंग 2 स्टार
Review By Tejas Poonia
Thursday, December 19, 2019
पुस्तक समीक्षा: जिंदा होने का सबूत है 'बोलना ही है'
हमारी संविधान की पुस्तक के बाद बहुत ही कम पुस्तकें हमारे पास ऐसी होती हैं, जो आपके नागरिक होने का आपको महत्व और हक़ बताती है। इतना ही नहीं आपके जिंदा रहने का मतलब क्या है और देश में रहते हुए देश के प्रति क्या जिम्मेदारियां हैं, उन सबसे रू-ब-रू कराती है रैमॉन मैग्सेसे अवार्ड 2019 से सम्मानित निर्भीक पत्रकार रवीश सर की कथेतर विधा में लिखी यह पुस्तक, जिसका नाम है *बोलना ही है* लोकतंत्र, संस्कृति और राष्ट्र के बारे में. रवीश सर की The Free Voice: On Democracy, Culture and the Nation का यह पुस्तक हिन्दी अनुवाद है, जो अक्टूबर 2019 में ही राजकमल प्रकाशन से पुस्तक रूप में आया है।
इस पुस्तक के बारे में और कुछ भी लिखने से पूर्व इस पुस्तक की समर्पण पंक्ति की ओर आपका ध्यान आकृष्ट कराना चाहूंगा-
"नॉयना, तनिमा और तनिशा को जो मेरे बोलने और लिखने का मोल चुकाते हैं..."
इस एक पंक्ति में पूरी किताब का सार समाहित है, बाकी आप किताब पढ़ने के बाद इसकी गहराई और संवेदनशीलता को समझेंगे, ऐसा विश्वास है।
तीन महीने के लंबे अंतराल के बाद अमेजॉन से मिली और एक रात के कुछ घण्टों की सीटिंग में पढ़कर पूरी कर दी। 12 अध्यायों में विभक्त यह पुस्तक कई मायनों में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। देश आज जिन भयावह स्थितियों से गुजर रहा है, तो उनका ठोस कारण और निवारण मिलता है इस किताब में। यह किताब जवाब है उन सत्ताधारियों के लिए, जो आमजनों की आवाज़ को नेस्तोनाबूद कर उन्हें हमेशा हमेशा के लिए चुप करा देना चाहते हैं। यह देश ऐसे ही नहीं बना न ही यह किसी एक धर्म-सम्प्रदाय या जाति विशेष की बपौती नहीं है। देश का नागरिक होने के नाते यह बात जितना शीघ्र हमे समझ आ जाये, उतना ही बेहतर हमारे लिए होगा। लोकतंत्र, संस्कृति और राष्ट्र की विस्तृत व्याख्या आपको इस किताब में मिलेगी। साथ ही फिलहाल देश में क्या हो रहा है, क्यों, कैसे और किनके द्वारा किया जा रहा इसका जवाब भी देती है यह किताब। और हाँ एक ज़रूरी बात यह पुस्तक हर भारतीय को पढ़ना चाहिए, जिनको पढ़ना नहीं आता उनको यह पुस्तक किसी शिक्षित आदमी को साथ में बैठाकर सुननी चाहिए। रिक्शा वाले से लगाकर, आईएएस ऑफिसर, हमारे राजनेताओं को, यानि सभी को इस किताब से मुखातिब होना लाज़मी है। मेरा व्यक्तिगत आग्रह यह भी है कि सरकार के पक्ष-विपक्ष के सभी लोगों को इस किताब को अनिवार्य रूप से पढ़ना चाहिए। आपको आज के सरकारी तंत्र का ही नहीं अब से पहले सभी सरकारों का पोस्टमार्टम होता मिलेगा किताब इस किताब में। हर चिंतक और पत्रकार को यह पुस्तक सावधानी से पढ़कर इसपर खुलकर खुले मंचों पर विचार विमर्श करना चाहिए। देश की यथास्थिति को हू-ब-हू हमारे सामने रखती है। इसके शब्द दिल-दिमाग पर ऐसे छपते हैं कि जिसके निशान काफी लंबे समय तक रहने वाले हैं, शायद न भी जाएं।
किताब पढ़ने के बाद यदि यह कहा जाए कि इस पुस्तक को लिखना जितना साहसिक कदम रहा है, उतना ही साहसी कदम इसे पढ़ना भी है। यक़ी न हो तो खुद पढ़कर, आप अंदाजा कर सकते हैं।
आदरणीय रवीश सर से मेरी निजी गुजारिश है यदि सम्भव हो सके तो इस किताब की ऑडियो अपनी पत्रकारीय, तेज तर्रार, बुलंद और प्रभावशाली आवाज़ में निकाले। उसका प्रभाव अलग होगा सर।
इस पुस्तक की भाषा सरल, सहज और आम बोलचाल की है, जिसे साधारण से साधारण आदमी आसानी से समझ सकता है। और शैली पत्रकार वाली, या कहिये एक ईमानदार, निस्वार्थी, निर्भीक, संवेदनशील पत्रकार की शैली।
कंटेंट की बात करूं तो 12 भागों की इस पुस्तक का हर अध्याय, आत्मा (यदि जिंदा हो) को झकझोर देता है। यहाँ उन अध्यायों के नाम देखिए और सोचिए-
1. बोलना
2. रोबो-पब्लिक और नए लोकतंत्र का निर्माण
3. डर का रोज़गार
4. जहाँ भीड़, वहीं हिटलर का जर्मनी
5. जनता होने का अधिकार
6. बाबाओं के बाजार में आप और हम
7. हम सबके जीवन में प्रेम।8. निजता का अधिकार: संविधान की किताब में एक सुंदर-सी कविता
9. डरपोक क़िस्म की नागरिकता गढ़ता मुख्यधारा मीडिया
10. 2019 में 1984 पढ़ते हुए
11. पंद्रह अगस्त को एक आइसक्रीम जरूर खाएँ
12. नागरिक पत्रकारिता की ताकत
अब इन अध्यायों के आधार पर सोचिए कि इस पुस्तक की सामग्री किस हद तक आपको एक नागरिक होने के नाते प्रभावित करेगी। किस किताब में कई तथ्य ऐसे हैं जिनका आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते। वो सिर्फ आप पढ़कर-समझकर ही जान पाओगे। केवल छठे अध्याय का जिक्र करूँ तो इतना ही कहूंगा कि हमारी धर्मांधता को तथाकथित संत/बाबाओं द्वारा कैसे बाजार में बदला जाता है और इससे कैसे बचें इनका सविस्तार वर्णन किया गया है।
नोट:- एक प्राध्यापक होने के नाते इस पोस्ट के माध्यम से एक निवेदन ज़रूर करना चाहूंगा कि किसी भी विश्वविद्यालय या महाविद्यालय का विद्यार्थी/शोधकर्ता यदि इस पुस्तक को पढ़ना चाहता है और इसका शुल्क (250/-) जमा करने के स्थिति में नहीं है, तो इनबॉक्स में सम्पर्क करें, यह महत्वपूर्ण दस्तावेज व्यक्तिगत रूप से उनको उपलब्ध कराऊंगा। इसलिए क्योंकि इस पुस्तक को पढ़ना-पढ़ाना और पढ़वाना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।
बाकी आप अवश्य पढ़कर इसका मूल्यांकन स्वयं भी करें।
पुनः रवीश सर को इस साहसिकता के लिए दिल से धन्यवाद देना चाहता हूँ।
अपनी बात का अंत रवीश सर के ही शब्दों में करना उचित होगा-
मैंने लोकतंत्र और आज़ादी के हक़ में एक नारा लिखा है--
"एक मान, एक हानि
एक राष्ट्र, एक मान
सवा रुपये का सबका सम्मान!"
*"कितना बढ़िया नारा है! टेम्पों पर लाउडस्पीकर लेकर निकल जाइए। सबको सुनाइए।"*
धन्यवाद
Monday, December 16, 2019
मोम एक प्रेम कथा
कहानी
मोम एक प्रेम कथा
बिक्रम सिंह
यह जो कॉलोनी हैं यह भारत देष है। रूकिये, रूकिये कॉलोनी भारत है इसका मललब यह नहीं कि कॉलोनी की रूपरेखा भारत के मैप से मिलती है और ऐसा भी नहीं है कि ऊपर हैलीकॉप्टर से जाते हुए इस कॉलोनी को देखने से भारत के मैप सा दिखता है। किसी की चालाकी कहिए या बदमाषी जिसने इसे मिनी इंडिया बना दिया है। हाँ तो, इस कॉलोनी के लोग कॉलोनी को मिनी इंडिया कहते हैं। इस कॉलोनी में मेरे अनुमान से करीब चार हजार से भी ज्यादा क्वार्टर होंगे। अरे यह क्या, मैं बिल्डरों/प्रॉपटी डीलरों की तरह क्वार्टर के हिसाब-किताब में कहाँ लग गया, आप ऐसा ही कहेंगे ना, लेकिन मेरी कहानी में इस बात का जिक्र करने की जरूरत है। तभी तो साबित कर पाऊँगा कि इस कॉलोनी को मिनी इण्डिया क्यो कहते हैं? इस कॉलोनी में पंजाबी दौहड़ा,उड़िया दौहड़ा,मुस्लीम दौहड़ा, हिन्दू दौहड़ा‘ में बटी है यह कॉलोनी। हाँ तो आप यह भी सोच रहे होंगे की दौहड़ा का मतलब क्या है? अगर आप का इस कॉलोनी में कोई परिचित या रिष्तेदार,दोस्त हो तो वह अब किस जाति का होगा मुझे पता नहीं, मान लेते है अगर आप हिन्दू हो और कॉलोनी में आकर कहेंगे, जी कृष्ण यादव (काल्पनिक नाम मान लेते है) कहाँ रहते हैं। तो कॉलोनी का जो भी होगा, वह कहेगा,’’ बनारसी दौहड़ा चले जाइये वहाँ पूछ लीजिएगा।’’ तो इस तरह इस कॉलोनी में दौहड़े तैयार हुए। दौहड़ा को मोहल्ला भी कह सकते हैं मुझे कोई ऐतराज नहीं होगा। मगर मुझे इस दौहड़ो को बनाने में कोलियरी के मैनेजर की खुराफात लगती है। जब उसने क्वार्टर अलाटमेंट किया होगा तो जरूर धर्म्ा देख कर ही किया होगा। एक ही धर्म के लोगों को एक ही तरफ क्वार्टर दिया होगा।
हाँ तो यहाँॅ हर दौहड़े के युवा मिलकर सब काम करते हैं। जैसे की सरस्वती पूजा,काली पूजा। हर दौहड़े से चन्दा मिलता है। सब मिलकर पीर बाबा के मेले भी जाते हैं, कितने हिन्दू भी चादर चढा आते हैं। वह तो छोड़िये, वोट भी एक ही पार्टी को दे आते हैं। क्रिकेट भी सभी मिलकर खेलने जाते हैं। कभी कभार क्रिकेट मैच भी अलग-अलग दौहड़ो में होता है। जो दौहड़ा जीत जाता है वह उस दिन शाम को पार्टी करता है। हाँ तो, कुल मिला जुलाकर हर दौहड़ो की अपनी टीम है।
मोम एक प्रेम कथा
बिक्रम सिंह
यह जो कॉलोनी हैं यह भारत देष है। रूकिये, रूकिये कॉलोनी भारत है इसका मललब यह नहीं कि कॉलोनी की रूपरेखा भारत के मैप से मिलती है और ऐसा भी नहीं है कि ऊपर हैलीकॉप्टर से जाते हुए इस कॉलोनी को देखने से भारत के मैप सा दिखता है। किसी की चालाकी कहिए या बदमाषी जिसने इसे मिनी इंडिया बना दिया है। हाँ तो, इस कॉलोनी के लोग कॉलोनी को मिनी इंडिया कहते हैं। इस कॉलोनी में मेरे अनुमान से करीब चार हजार से भी ज्यादा क्वार्टर होंगे। अरे यह क्या, मैं बिल्डरों/प्रॉपटी डीलरों की तरह क्वार्टर के हिसाब-किताब में कहाँ लग गया, आप ऐसा ही कहेंगे ना, लेकिन मेरी कहानी में इस बात का जिक्र करने की जरूरत है। तभी तो साबित कर पाऊँगा कि इस कॉलोनी को मिनी इण्डिया क्यो कहते हैं? इस कॉलोनी में पंजाबी दौहड़ा,उड़िया दौहड़ा,मुस्लीम दौहड़ा, हिन्दू दौहड़ा‘ में बटी है यह कॉलोनी। हाँ तो आप यह भी सोच रहे होंगे की दौहड़ा का मतलब क्या है? अगर आप का इस कॉलोनी में कोई परिचित या रिष्तेदार,दोस्त हो तो वह अब किस जाति का होगा मुझे पता नहीं, मान लेते है अगर आप हिन्दू हो और कॉलोनी में आकर कहेंगे, जी कृष्ण यादव (काल्पनिक नाम मान लेते है) कहाँ रहते हैं। तो कॉलोनी का जो भी होगा, वह कहेगा,’’ बनारसी दौहड़ा चले जाइये वहाँ पूछ लीजिएगा।’’ तो इस तरह इस कॉलोनी में दौहड़े तैयार हुए। दौहड़ा को मोहल्ला भी कह सकते हैं मुझे कोई ऐतराज नहीं होगा। मगर मुझे इस दौहड़ो को बनाने में कोलियरी के मैनेजर की खुराफात लगती है। जब उसने क्वार्टर अलाटमेंट किया होगा तो जरूर धर्म्ा देख कर ही किया होगा। एक ही धर्म के लोगों को एक ही तरफ क्वार्टर दिया होगा।
हाँ तो यहाँॅ हर दौहड़े के युवा मिलकर सब काम करते हैं। जैसे की सरस्वती पूजा,काली पूजा। हर दौहड़े से चन्दा मिलता है। सब मिलकर पीर बाबा के मेले भी जाते हैं, कितने हिन्दू भी चादर चढा आते हैं। वह तो छोड़िये, वोट भी एक ही पार्टी को दे आते हैं। क्रिकेट भी सभी मिलकर खेलने जाते हैं। कभी कभार क्रिकेट मैच भी अलग-अलग दौहड़ो में होता है। जो दौहड़ा जीत जाता है वह उस दिन शाम को पार्टी करता है। हाँ तो, कुल मिला जुलाकर हर दौहड़ो की अपनी टीम है।
इसी कॉलोनी के मुस्लिम दौहड़े़े में बुलबुल षेख नाम का लड़का रहता था। वह दो माँॅ का इकलौता लड़का था। हाँ, आपके मन में यह प्रष्न आ गया होगा दो माँ का एक लड़का कैसे हुआ। दरअसल हुआ यह कि बुलबुल के अब्बू नौषाद षेख को पहली पत्नि यासमीन से कोई औलाद नहीं हुई। काफी पीर‘- फकीर,मस्जिद में गये मगर कोई फल नहीं मिला था। न तो बड़े‘-बडे़ डॉक्टरो की दवाएँ और न ही दुआएँ काम आई। जब निकाह को सात साल बीत गये तो बुलबुल की बड़ी माँ अर्थात नौषाद की पहली बीबी यासमीन ने उसे दूसरे निकाह के लिए कह दिया था। पर नौषाद इसके लिए तैयार नहीं हुए थे। मगर यासमीन की जिद्द के आगे उन्हे झुकना पड़ा था। मगर दूसरे निकाह के लिए लड़की कहाँ से आती। यासमीन ने अपने सगे मामा की लकड़ी जरीना षेख से नौषाद का निकाह करवा दिया था। नौषाद की दूसरी बेगम जरीना षेख से बुलुबुल हुआ था। मगर किस्मत ही ऐसी थी कि बुलबुल के होने के कुछ दिन बाद ही नौषाद का इन्तकाल हो गया। दरअसल नौषाद कोलियरी में डयूटी जाया करता था। जब नाइट षिफ्ट कर के वह वापस आता था। कुछ गली के कुत्ते एक साथ उनकी साइकिल के पीछे भौं....भौं..... कर दौड़ने लगते थे। उस वक्त नौषाद अपनी साइकिल की पैंडिल को जोर‘-जोर से मारने लगता था। हाँ, अगर कोई कुत्ता एकदम पैडिंल के पास आ जाता तो वह हैन्डिल को जोर से पकड़कर अपने पैरो को ऊपर उठा लेता और जोर से एक लात कुत्ते को रसीद कर देता था। कत्ुता कू-कू करता हुआ भाग जाता था। दूसरे कुत्ते भी उसके पीछे भाग जाते थे, जैसे सब कुत्ते उसे पूछ रहे हों, लात कैसी लगी भाई और जा इंसानो के लात के पास। एक दिन वह नाईट षिफ्ट कर के आ रहा था। एक कुत्ता उसके पैडिंल के पास भौंकता हुआ आ गया था। उन्होने जैसे ही लात उठाकर मारने की कोषिष की,कि कुत्ते ने उसका पैर अपने दाँतो से पकड़ लिया अर्थात सीधी भाषा में कहूँ तो नौषाद को कुत्ते ने काट लिया। कहते हैं कि नौषाद को कुत्ते ने नहीं गली की पागल कुतिया ने काट लिया था। कुतिया ने चार पिल्ले दिए थे। चारो एक ही दिन किसी गाड़ी के नीचे आ गये थे। बस उस दिन से कुतिया अपने बच्चो को न पाकर पगला गई थी। नौषाद को भी षायद इस बात का अंदाजा नहीं हुआ था कि उसे पागल कुतिया ने काट लिया है। उस दिन उन्होने घर जाकर किसी को यह बात नहीं बताई। किसी फकीर से दवा लेकर खा ली थी। षायद उन्हे डाक्टरो से ज्यादा फकीर पर विष्वास था। कुछ सालों बाद नौषाद की तबियत खराब हो गई थी। उन्हे पहले‘-पहल तो बुखार चढा था। मगर किसी फकीर की दवा काम नहीं आई। मौलवी से झाड़‘-फूँक भी करवाया मगर तबियत सही होने की बजाय बिगड़ती चली गई। वह पानी से डरने लगा। कुत्तो की तरह भौंकने लगा। तत्काल ही बडे़ अस्पताल लेकर गए। मगर षरीर में रबीस आ गया था। डॉक्टरो ने मना कर दिया था। कहते हैं डॉक्टरो ने ही नौषाद को जहर का इंजेक्षन लगाकर मार डाला था।
नौषाद के इन्तकाल के बाद छोटी बेगम जरीना षेख को अनुकम्पा में नौकरी मिल गई। बड़ी बेगम यासमीन घर का काम‘-काज और बुलबुल की परवरिष करने लगी थी।
बुलबुल को नाचने का षौक था। काली पूजा,दुर्गा पूजा के वक्त होने वाले डांस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया करता था। वह ब्रेकडांसर था। बप्पी लहरी के हैबी बा गाने,माईकल जेक्सन के गानो में अपने षरीर को ऐसे तोड़ता था वह उँगली से तोड़ता हुआ कलाई,कोहनी,कंधे,छाती से पैर तक षरीर तोड़ देता था कि कॉलोनी के हर लड़कियाँ‘-लड़के उसके डांस को देख कर तालियाँ और सीटी बजाते थे। वह हर एक प्रतियोगिता में फर्स्ट आता था। डांस की वजह से उसका नाम बुलबुल पड़ गया था। वैसे बुलबुल का नाम बुलबुल नहीं मुख्तार षेख था। लोग उसे बुलबुल नाम से ही जानते थे। सही मायने में कॉलोनी के लोग उसे माईकल जेक्सन कहते थे। मुस्लिम दौहड़ा के लोग मानते थे कि एक दिन यह बच्चा मुस्लिम दौहड़ा का नाम करेगा।
हिन्दू दौहड़ा में ही दीनदयाल सिंह राजपूत रहता था। उसके तीन लड़के एक लड़की थी। जिसका नाम मोम था। बह बहुत ही खूबसूरत थी। कहते हैं दीनदयाल पाँच भाई थे। पाँचो सरकारी नौकरी में थे। पाँचो भाईयो के घर सिर्फ लड़के ही थे। जब दीनदयाल के घर तीसरा बच्चा भी लड़का हुआ तो उसकी पत्नी ईष्वर से लडक़ी के लिए प्रार्थना करने लगी। कई व्रत भी रखे क्यांकि वह कहती थी भाईयो की एक बहन भी होनी चाहिए जो भाईयो की कलाई में राखी बाँधे। जैसे ईष्वर ने उनकी सुन ली। चौथी संतान लड़की मोम पैदा हुई। इस तरह उनकी ख्वाहिष पूरी हुई। मोम को बड़े लाड‘-प्यार से पाला जा रहा था। वह घर के कोई काम नहीं करती थी। सुबह भी वह करीब आठ‘-नौ बजे सो कर उठती थी। उसके लाड‘-प्यार से पलने की वजह से वह खूबसूरत और फूल की तरह कोमल थी। इस वजह से उसे सब मोम कहने लगे थे। मगर असल में उसका नाम कनुप्रिया था। कॉलोनी में हर एक लड़का उस पर डोरे डालता रहता था।
आजकल मोम नौ बजे की बजाये दस बजे तक सोई रहती है। वह चाहती है कि इसी तरह सोई रहे। दरअसल उसके स्वप्न में बुलबुल आता है। वह बुलबुल के साथ स्वप्न में नाच रही होती है। बुलबुल काला कोट पैन्ट पहने हुए होता है। मोम नीली चमकीले फ्राक में होती है। दोनो एक‘-दूसरे के बाहों में बाहें डालकर नाच रहे होते हैं। धीमी आवाज में गाना बज रहा होता है। मोम इस स्वप्न से जागना नहीं चाहती। उसके इस रवैए से तीनो भाई गुस्से में चिल्लाने लगते हैं। मगर पापा दीनदयाल और माँ कहती,उसे मत उठाओ, कच्ची नींद से उठ गई तो उसका मूंड खराब हो जाएगा।
जब मोम स्वप्न में होती उसी वक्त बुलबुल अपनी साइकिल से घंटी बजाता हुआ, हिन्दू दौहड़ा से होता हुआ, अपने स्कूल को जाता था। ऐसा नहीं था कि मोम स्कूल नहीं जाती थी। मोम स्कूल जाती थी। मगर उसके स्कूल का समय ग्यारह बजे का होता था। वह ठीक दस बजे उठती और तैयार हो स्कूल चली जाती थी। आप यह भी मत सोचिये की यह एक तरफा प्यार था। सिर्फ मोम ही बुलबुल के प्यार में पागल थी। इधर कुछ दिनो से बुलबुल भी हिन्दू दौहड़ा से स्कूल जाने लगा था। उसने डांस करते वक्त मोम को देखा था। एक झलक में ही मोम का दिवाना हो गया था। उसके बाद वह मोम के बारे में पता लगाने लगा था लेकिन क्या करता किसी से खुले आम कुछ पता भी नहीं लगा सकता था। उसे कुछ भी पता लगाना इसलिये भी मुष्किल था क्यांकि उसे न तो लड़की के नाम का पता था, न ही उसके घर का पता था। इस वजह से बुलबुल स्कूल जाने के पहले अपनी साइकिल पर सवार हो घंटी बजाता हुआ, सारे दौहड़े के चक्कर लगाता हुआ स्कूल जाता था। इस परिक्रिया में वह स्कूल लेट भी हो जाता था। स्कूल में आकर चुपके से दबे पांव आखिरी बेंच पर बैठ जाता था।
हाँ तो कहते हैं न किसी को भी किस्मत से ज्यादा समय से पहले कुछ नहीं मिलता है। बुलबुल कॉलेज में आ गया था, साइकिल की जगह उसके पास बाईक थी। वह आँखो में रंगीन चष्में लगाये ठीक वैसे ही कॉलोनी में अपनी बाईक को घुमाता हुआ क्लास में आया था। बुलबुल का कॉलेज में पहला दिन था। उसने पहले ही दिन मोम को अपने क्लास में देखा था। मोम ने भी बुलबुल को अपने क्लास में देखा। बुलबुल जितना खुष मोम को देख कर हुआ था, मोम भी उतनी ही खुष हुई थी। कुल मिलाजुलाकर मामला फिफ्टी-फिफ्टी था। मोम को सपनो का राजकुमार मिल गया था। अब देर तक सुबह सोने की जरूरत नहीं थी। बुलबुल ने अल्लाह का नाम लेकर कहा,पूरी कॉलोनी नहीं भटकना पड़ेगा। मगर मामला जस का तस बना हुआ था। वह एक दूसरे को देख षरमा रहे थे। वह एक दूसरे को चाहते हैं यह उनके षरमाने भर से पता चल जा रहा था।
बुलबुल हर दिन एक छोटे से पेपर में आई लव यू लिखकर घूमने लगा था मगर दे नहीं पा रहा था। इधर कॉलेज में एक नया तरीका भी चलता था। कोई भी बोर्ड में चौक से ल़़ड़की का नाम लिखकर आई लव यू लिख देता था। जैसे पिंकी आई लव यू,सिमरन आई.लव.यू इत्यादि। एक दिन बुलबुल ने भी कॉलेज जल्दी आकर मोम आई.लव.यू लिख दिया था। मगर अफसोस कि अपना नाम नीचे लिखने में उसे षर्म आ रही थी। मोम ने आकर जब बोर्ड देखा तो गुस्से से भर गई थी क्योंकि जब से कॉलेज में वह आई थी उसी दिन से एक ल़ड़का उस पर नजर डाले हुआ था। उसे पूरा विष्वास था कि यह काम उसी का है। इससे पहले कि वह उस लड़के के पास जाती कि प्रोफेसर साहब आ गये डस्टर से ब्लैक बोर्ड को मिटा दिया था। प्रतिदिन ही इसी तरह प्रोफेसर आते थे ब्लैक बोर्ड पर लिखे किसी भी षब्द पर प्रतिक्रिया किये बिना चुपचाप मिटा कर पढ़ाने लगते थे। उस दिन क्लास खत्म होते ही वह उठकर लड़के के पास गई और उसके गाल पर एक चांटा जड़ दिया। इसके पहले कि वह लड़का कुछ समझ पाता वह बोली,बोर्ड पर तूने यह क्या लिखा था? लड़के ने झट से कहा,पागल हो गई हो मैंने नहीं, उसने लिखा था। उसने बुलबुल की तरफ उंगली करते हुए कहा। यह सुन उसे लगा अभी इसको गले लगाकर इसका मुँह चूम लूँ। उसे सॉरी कह उसका गाल सहलाने लगी। यह देख बुलबुल क्लास से सरक गया था।
अगले दिन जब बुलबुल क्लास में आया था तो उसने बोर्ड पर लिखा देखा था। बुलबुल आई.लव.यू। पहले पहल तो बुलबुल समझ नहीं पाया था कि यह किसने लिखा है। मगर क्लास में मोम को मुस्कुराता देख बुलबुल साफ समझ गया था। इतने दिनो तक हाथ में आई लव यू का जो पर्चा लेकर घूम रहा था । वह मोम को कॉलेज के बाहर थमा दिया था। इस तरह एक प्रेम कहानी षुरू हो गई थी
उसके अगले दिन ही जब बुलबुल और मोम पहली दफा मिले थे, कई घंटे तक बिना किसी से कुछ कहे षरमाए से यूँ ही बैठे रह गए थे। चुपचाप उठकर चले गए थे।
उस रात मोम अपने रूम में बैठी बुलबुल को एक प्यार भरा खत लिखने की कोषिष कर रही थी। आप सोच रहे होगे जब मिली थी तब कुछ नहीं कहा, बाद में पत्र लिखने कि क्या जरूरत पड़ी। सही मायने में पत्र लिखने की वजह भी यही थी। उसने पत्र में यह लिखा था,’’बुलबुल क्या हम सिर्फ चुपचाप बैठने के लिये मिलते हैं। अब हम जब दोबारा मिलें तो कुछ तो बोलना।’’ बस यह दो लाईन ही लिखा था लेकिन वह अपने इस लाईन से सन्तुष्ट नहीं हो पा रही थी वह जिस जोष से लिख रही थी, उतने ही बेरूखी से पत्र की लाइनों को काट भी रही थी। उस वक्त उसके पास पूरा मौका और समय था। माँ खाना बना रही थी, पिता दीनदयाल टीवी में लाफ्टर षौ देख रहे थे। चूकि दीनदयाल को पान खाने की आदत थी। हमेषा उनके मुँह में पान होता और हाथो में गीला चूना लगा पान का डन्ठल होता था। जिसे बीच-बीच में चाटते रहते थे। लाफ्टर षौ देख कर जोर का ठहाका लगाते हुए,ऊ नमः षिवाये बोल रहे थे। क्वार्टर के पीछे जो गंदी नाली बहती थी वहाँ थूकते रहते थे। अभी उन्हे टीवी से उठने में दिक्कत हो रही थी। वह पान की थूक को निगलते जा रहे थे। टीवी में लाफ्टर षौ ने चूतड को सोफे में फैबी कॉल की मजबूत जोड़ की तरह चिपका रखा था। मोम इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी। वह इस तरह का पत्र लिखना चाहती थी। जिसे पढ कर बुलबुल उसके प्यार में पूरा डूब जाए और फिर कभी बाहर ना निकल पाए। बेषक वह इसमें सफल रही थी। इस पत्र ने बुलबुल पर असर किया था। वह उसे कॉलेज के मैदान के आस‘-पास फैले जंगल के अंदर ले गया था। वह एक पेड़ के नीचे बैठ गए थे। पेड़ काफी विषाल था। जहाँ धूप नीचे नहीं आ रही थी। पेड़ के नीचे छाँव थी। मदहोष कर देने वाली हवा चल रही थी। चारो तरफ पेड़ के सुखे पत्ते गिरे थे। हवा से पत्ते भी सरसरा कर उड़ रहे थे। एकदम यष चोपड़ा की फिल्मो के सीन की तरह हो रहा था सब कुछ। यह सीन ऊपर वाले का बनाया हुआ था। हकीकत में पृथ्वी के हर सीन ऊपर वाला ही तैयार करता है। अमूमन ऐसा सभी कहते हैं। पेड़ न बरगद न ही पीपल का था। यह पेड़ इमली का था। यह कई वर्ष पुराना पेड़ था। इस पेड़ के नीचे कितने प्रेम सम्बन्ध बने और टूटे थे। मगर यह इमली का पेड़ अब भी ज्यूँ का त्यूँ खड़ा था। षायद इस पेड़ को अभी और प्रेम कहानियो को देखना अभी बाकी था। उस पेड़़ के नीचे बुलबुल और मोम गले लग एक दूसरे को चूम रहे थे।
उस रात मोम और बुलबुल दोनो को नींद नहीं आई थी। जब पूरी दुनिया दिन भर के काम‘-काज से दिमाग में उपजी पाप,पुण्य,भाग्य,दुर्भाग्य,भ् रष्टाचार, आदि विषयों से बोझिल होने के बाद गहरी नींद में सो अपने दिमाग को रिफ्रेष कर दुबारा अगली सुबह इसी कार्य के लिये उठना चाहती थी, बुलबुल और मोम को जल्द अगले दिन सुबह होने का इंतजार था। वह दोनो अपने प्रेम के बिताए पल को सो कर अपने दिमाग को रिफ्रेस नहीं करना चाहती थी। उस समय के एक-एक पल को जीना चाहते थे। सुबह का इंतजार से कहीं ज्यादा इमली के पे़ड़ के नीचे दुबारा मिलने की इच्छा थी। इसी पेड़ के नीचे उनका प्यार एक दूसरे के प्रति गहरा हुआ था, इमली के पेड़ के जड़ो सा गहरा। चूंकि मोम अब बच्ची से बड़ी हो रही थी, माँ से हर एक बात षेयर करती थी, आज किसने मुझे छेड़ा, किसने मुझे प्रपोज करने की कोषिष की,कौन ल़ड़का सुन्दर लगा इत्यादि। माँ उसकी सब बात सुनती रहती और हँसती रहती, बस एक बात जो गम्भीर हो कहती, जब तुम कोई लड़का पसंद करना बस सुन्दर, सुषील और पढा‘-लिखा तो हो पर वह एक तो हिन्दू हो, दूसरा कम से कम अपना विरादरी का हो। इस वजह से वह बुलबुल की बात को मॉ के साथ षेयर नहीं कर पाई थी। उसने यह कभी जानने की कोषिष ही नहीं की कि बुलबुल कौन सी विरादरी का है। षायद इस वजह से मोम ने बुलबुल से कभी ना छोड़ने की गारन्टी ली थी। पर षायद अब किसी चीज की गारन्टी नहीं वारन्टी होती है। बुलबुल और मोम ने ऐसा ही किया होगा। मगर मोम को पहली बार फर्स्ट ईयर के रिजल्ट की लिस्ट में नाम खोजते समय उसे बुलबुल का नाम पता चला था मुख्तार षेख। उस दिन उसे पता चला था कि वह मुस्लिम है। मगर उसने बुलबुल डांसर से प्यार किया था। जिसका नाम मुख्तार षेख नहीं बुलबुल है। मोम ने बुलबुल को स्वप्न में बुलबुल के साथ डांस वाली बात बताई थी। बुलबुल ने कॉलेज के एनुअल फंक्षन में उसके स्वप्न को पूरा करने की सोची थी। उसे डांस रिहर्सल करवाने लगा था। दो सप्ताह में मोम डांस सीख गई थी। दोनो ने बाजार से कपड़े खरीदे थे। एनुअल फक्षन में मोम ने आसमानी फ्रॉक और बुलबुल ने ब्लैक कोर्ट‘-पैंट पहनकर नाचे थे। उस दिन पूरे कॉलेज में दोनों को देख खूब ताली बजी थीं। सबको डांस जोड़ा बहुत पसंद आया था। दोनो को ईनाम भी मिला था। मगर कुछ हिन्दू लोगो को यह एकदम भी बर्दाषत नहीं हुआ था कि कोई मुस्लिम लड़के के साथ हिन्दू लड़की प्रेम करे क्योंकि इन्ही लड़को में से कुछ ऐसे भी थे जो मोम को पटाने की खूब कोषिष की थी, मगर दाल गली नहीं थी। उन्हे इस बात का अच्छी तरह पता था जब सीधी उँगली से बात ना बने तो टेड़ी करनी पड़ती है। एक दिन मोम कॉलेज के मैन गेट से क्लास की तरफ जा रही थी, उन लड़को ने मोम का पीछा किया और गंदी-गंदी बात बोलना षुरू कर दिया था। मोम गुस्से से भर तो जरूर गई थी मगर इस तरह की बातो से उसके आँखो में आँसू भर गये थे। वह तेज कदमो से क्लास की तरफ चलने लगी थी। क्लास पहुँचते‘-पहुँचते आँसुओं से मुँह धुल गया था। उस दिन जब बुलबुल क्लास में आया तब वह रो रही थी। बुलबुल बार‘-बार पूछ रहा था क्या हुआ, मगर मोम बताने के बजाए रोये जा रही थी। आखिर तक बक दिया। जब इस बात का पता चला तो वह बौखलाता हुआ उन लड़को से झगड़ने लगा और अंततः बुलबुल वहाँ पिटने लगा। मोम उन्हे रोकने की कोषिष करती रही। मगर तभी कॉलेज के कुछ लड़के जो मुस्लिम थे। वह बुलबुल को जानते थे, वह इस तरह उसे निहत्था पिटते देख लड़ाई में कूद गए ,उन सब की जमकर पिटाई कर दी। पिटाई करने के बाद उन्हे विवाद का पता चला। मोम और बुलबुल के प्रेम के बारे में उन्हे भी पता था। चिंता मत कर बुलबुल हम तेरे साथ है। हिन्दू लड़की को पटा कर तुमने कौम का नाम रोषन किया है। गदर मचा दे, गदर! बुलबुल उन्हे सिर्फ देखता रह गया था। मोम समझ नहीं पाई थी वह किससे बच पाई थी। दोनो ही तो उसके लिए घातक थे। उस दिन मोम और बुलबुल का प्रेम इमली के पेड़ के जड़ो से भी गहरा हुआ था। उन्हे समझ आया था कि वह कहीं सुरक्षित नहीं हैं। उस दिन वह अपने आपको एक‘-दूसरे के पास सुरक्षित महसूस किया था। लोगो से छुप-छुप के मिलना षुरू कर दिया था। वह कॉलेज समय में दूर किसी पार्क में चले जाते थे। वहां घंटो बैठ, बाते कर कॉलेज का समय खत्म होने पर वापस आ जाते थे। अगर कॉलेज में होते भी तो दूर‘-दूर ही रहते थे। दोनो को यह अच्छा नहीं लगता था। मगर दोनो चालाकी से ही काम लेना चाहते थे क्योकि अभी उनका कैरियर बनाने का समय था। ऐसे में वह झूठ-मूठ का पंगा कर कोई भ़ी मुसीबत नहीं मोल लेना चाहते थे। दोनो का मानना था किसी भी अच्छी चीज की षुरूवात में अगर पंगे हों तो वह काम अंत तक पहुँचता ही नहीं है। वह इस बात को नहीं मानते थे कि अंत भला तो सब भला।
नौषाद के इन्तकाल के बाद छोटी बेगम जरीना षेख को अनुकम्पा में नौकरी मिल गई। बड़ी बेगम यासमीन घर का काम‘-काज और बुलबुल की परवरिष करने लगी थी।
बुलबुल को नाचने का षौक था। काली पूजा,दुर्गा पूजा के वक्त होने वाले डांस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया करता था। वह ब्रेकडांसर था। बप्पी लहरी के हैबी बा गाने,माईकल जेक्सन के गानो में अपने षरीर को ऐसे तोड़ता था वह उँगली से तोड़ता हुआ कलाई,कोहनी,कंधे,छाती से पैर तक षरीर तोड़ देता था कि कॉलोनी के हर लड़कियाँ‘-लड़के उसके डांस को देख कर तालियाँ और सीटी बजाते थे। वह हर एक प्रतियोगिता में फर्स्ट आता था। डांस की वजह से उसका नाम बुलबुल पड़ गया था। वैसे बुलबुल का नाम बुलबुल नहीं मुख्तार षेख था। लोग उसे बुलबुल नाम से ही जानते थे। सही मायने में कॉलोनी के लोग उसे माईकल जेक्सन कहते थे। मुस्लिम दौहड़ा के लोग मानते थे कि एक दिन यह बच्चा मुस्लिम दौहड़ा का नाम करेगा।
हिन्दू दौहड़ा में ही दीनदयाल सिंह राजपूत रहता था। उसके तीन लड़के एक लड़की थी। जिसका नाम मोम था। बह बहुत ही खूबसूरत थी। कहते हैं दीनदयाल पाँच भाई थे। पाँचो सरकारी नौकरी में थे। पाँचो भाईयो के घर सिर्फ लड़के ही थे। जब दीनदयाल के घर तीसरा बच्चा भी लड़का हुआ तो उसकी पत्नी ईष्वर से लडक़ी के लिए प्रार्थना करने लगी। कई व्रत भी रखे क्यांकि वह कहती थी भाईयो की एक बहन भी होनी चाहिए जो भाईयो की कलाई में राखी बाँधे। जैसे ईष्वर ने उनकी सुन ली। चौथी संतान लड़की मोम पैदा हुई। इस तरह उनकी ख्वाहिष पूरी हुई। मोम को बड़े लाड‘-प्यार से पाला जा रहा था। वह घर के कोई काम नहीं करती थी। सुबह भी वह करीब आठ‘-नौ बजे सो कर उठती थी। उसके लाड‘-प्यार से पलने की वजह से वह खूबसूरत और फूल की तरह कोमल थी। इस वजह से उसे सब मोम कहने लगे थे। मगर असल में उसका नाम कनुप्रिया था। कॉलोनी में हर एक लड़का उस पर डोरे डालता रहता था।
आजकल मोम नौ बजे की बजाये दस बजे तक सोई रहती है। वह चाहती है कि इसी तरह सोई रहे। दरअसल उसके स्वप्न में बुलबुल आता है। वह बुलबुल के साथ स्वप्न में नाच रही होती है। बुलबुल काला कोट पैन्ट पहने हुए होता है। मोम नीली चमकीले फ्राक में होती है। दोनो एक‘-दूसरे के बाहों में बाहें डालकर नाच रहे होते हैं। धीमी आवाज में गाना बज रहा होता है। मोम इस स्वप्न से जागना नहीं चाहती। उसके इस रवैए से तीनो भाई गुस्से में चिल्लाने लगते हैं। मगर पापा दीनदयाल और माँ कहती,उसे मत उठाओ, कच्ची नींद से उठ गई तो उसका मूंड खराब हो जाएगा।
जब मोम स्वप्न में होती उसी वक्त बुलबुल अपनी साइकिल से घंटी बजाता हुआ, हिन्दू दौहड़ा से होता हुआ, अपने स्कूल को जाता था। ऐसा नहीं था कि मोम स्कूल नहीं जाती थी। मोम स्कूल जाती थी। मगर उसके स्कूल का समय ग्यारह बजे का होता था। वह ठीक दस बजे उठती और तैयार हो स्कूल चली जाती थी। आप यह भी मत सोचिये की यह एक तरफा प्यार था। सिर्फ मोम ही बुलबुल के प्यार में पागल थी। इधर कुछ दिनो से बुलबुल भी हिन्दू दौहड़ा से स्कूल जाने लगा था। उसने डांस करते वक्त मोम को देखा था। एक झलक में ही मोम का दिवाना हो गया था। उसके बाद वह मोम के बारे में पता लगाने लगा था लेकिन क्या करता किसी से खुले आम कुछ पता भी नहीं लगा सकता था। उसे कुछ भी पता लगाना इसलिये भी मुष्किल था क्यांकि उसे न तो लड़की के नाम का पता था, न ही उसके घर का पता था। इस वजह से बुलबुल स्कूल जाने के पहले अपनी साइकिल पर सवार हो घंटी बजाता हुआ, सारे दौहड़े के चक्कर लगाता हुआ स्कूल जाता था। इस परिक्रिया में वह स्कूल लेट भी हो जाता था। स्कूल में आकर चुपके से दबे पांव आखिरी बेंच पर बैठ जाता था।
हाँ तो कहते हैं न किसी को भी किस्मत से ज्यादा समय से पहले कुछ नहीं मिलता है। बुलबुल कॉलेज में आ गया था, साइकिल की जगह उसके पास बाईक थी। वह आँखो में रंगीन चष्में लगाये ठीक वैसे ही कॉलोनी में अपनी बाईक को घुमाता हुआ क्लास में आया था। बुलबुल का कॉलेज में पहला दिन था। उसने पहले ही दिन मोम को अपने क्लास में देखा था। मोम ने भी बुलबुल को अपने क्लास में देखा। बुलबुल जितना खुष मोम को देख कर हुआ था, मोम भी उतनी ही खुष हुई थी। कुल मिलाजुलाकर मामला फिफ्टी-फिफ्टी था। मोम को सपनो का राजकुमार मिल गया था। अब देर तक सुबह सोने की जरूरत नहीं थी। बुलबुल ने अल्लाह का नाम लेकर कहा,पूरी कॉलोनी नहीं भटकना पड़ेगा। मगर मामला जस का तस बना हुआ था। वह एक दूसरे को देख षरमा रहे थे। वह एक दूसरे को चाहते हैं यह उनके षरमाने भर से पता चल जा रहा था।
बुलबुल हर दिन एक छोटे से पेपर में आई लव यू लिखकर घूमने लगा था मगर दे नहीं पा रहा था। इधर कॉलेज में एक नया तरीका भी चलता था। कोई भी बोर्ड में चौक से ल़़ड़की का नाम लिखकर आई लव यू लिख देता था। जैसे पिंकी आई लव यू,सिमरन आई.लव.यू इत्यादि। एक दिन बुलबुल ने भी कॉलेज जल्दी आकर मोम आई.लव.यू लिख दिया था। मगर अफसोस कि अपना नाम नीचे लिखने में उसे षर्म आ रही थी। मोम ने आकर जब बोर्ड देखा तो गुस्से से भर गई थी क्योंकि जब से कॉलेज में वह आई थी उसी दिन से एक ल़ड़का उस पर नजर डाले हुआ था। उसे पूरा विष्वास था कि यह काम उसी का है। इससे पहले कि वह उस लड़के के पास जाती कि प्रोफेसर साहब आ गये डस्टर से ब्लैक बोर्ड को मिटा दिया था। प्रतिदिन ही इसी तरह प्रोफेसर आते थे ब्लैक बोर्ड पर लिखे किसी भी षब्द पर प्रतिक्रिया किये बिना चुपचाप मिटा कर पढ़ाने लगते थे। उस दिन क्लास खत्म होते ही वह उठकर लड़के के पास गई और उसके गाल पर एक चांटा जड़ दिया। इसके पहले कि वह लड़का कुछ समझ पाता वह बोली,बोर्ड पर तूने यह क्या लिखा था? लड़के ने झट से कहा,पागल हो गई हो मैंने नहीं, उसने लिखा था। उसने बुलबुल की तरफ उंगली करते हुए कहा। यह सुन उसे लगा अभी इसको गले लगाकर इसका मुँह चूम लूँ। उसे सॉरी कह उसका गाल सहलाने लगी। यह देख बुलबुल क्लास से सरक गया था।
अगले दिन जब बुलबुल क्लास में आया था तो उसने बोर्ड पर लिखा देखा था। बुलबुल आई.लव.यू। पहले पहल तो बुलबुल समझ नहीं पाया था कि यह किसने लिखा है। मगर क्लास में मोम को मुस्कुराता देख बुलबुल साफ समझ गया था। इतने दिनो तक हाथ में आई लव यू का जो पर्चा लेकर घूम रहा था । वह मोम को कॉलेज के बाहर थमा दिया था। इस तरह एक प्रेम कहानी षुरू हो गई थी
उसके अगले दिन ही जब बुलबुल और मोम पहली दफा मिले थे, कई घंटे तक बिना किसी से कुछ कहे षरमाए से यूँ ही बैठे रह गए थे। चुपचाप उठकर चले गए थे।
उस रात मोम अपने रूम में बैठी बुलबुल को एक प्यार भरा खत लिखने की कोषिष कर रही थी। आप सोच रहे होगे जब मिली थी तब कुछ नहीं कहा, बाद में पत्र लिखने कि क्या जरूरत पड़ी। सही मायने में पत्र लिखने की वजह भी यही थी। उसने पत्र में यह लिखा था,’’बुलबुल क्या हम सिर्फ चुपचाप बैठने के लिये मिलते हैं। अब हम जब दोबारा मिलें तो कुछ तो बोलना।’’ बस यह दो लाईन ही लिखा था लेकिन वह अपने इस लाईन से सन्तुष्ट नहीं हो पा रही थी वह जिस जोष से लिख रही थी, उतने ही बेरूखी से पत्र की लाइनों को काट भी रही थी। उस वक्त उसके पास पूरा मौका और समय था। माँ खाना बना रही थी, पिता दीनदयाल टीवी में लाफ्टर षौ देख रहे थे। चूकि दीनदयाल को पान खाने की आदत थी। हमेषा उनके मुँह में पान होता और हाथो में गीला चूना लगा पान का डन्ठल होता था। जिसे बीच-बीच में चाटते रहते थे। लाफ्टर षौ देख कर जोर का ठहाका लगाते हुए,ऊ नमः षिवाये बोल रहे थे। क्वार्टर के पीछे जो गंदी नाली बहती थी वहाँ थूकते रहते थे। अभी उन्हे टीवी से उठने में दिक्कत हो रही थी। वह पान की थूक को निगलते जा रहे थे। टीवी में लाफ्टर षौ ने चूतड को सोफे में फैबी कॉल की मजबूत जोड़ की तरह चिपका रखा था। मोम इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी। वह इस तरह का पत्र लिखना चाहती थी। जिसे पढ कर बुलबुल उसके प्यार में पूरा डूब जाए और फिर कभी बाहर ना निकल पाए। बेषक वह इसमें सफल रही थी। इस पत्र ने बुलबुल पर असर किया था। वह उसे कॉलेज के मैदान के आस‘-पास फैले जंगल के अंदर ले गया था। वह एक पेड़ के नीचे बैठ गए थे। पेड़ काफी विषाल था। जहाँ धूप नीचे नहीं आ रही थी। पेड़ के नीचे छाँव थी। मदहोष कर देने वाली हवा चल रही थी। चारो तरफ पेड़ के सुखे पत्ते गिरे थे। हवा से पत्ते भी सरसरा कर उड़ रहे थे। एकदम यष चोपड़ा की फिल्मो के सीन की तरह हो रहा था सब कुछ। यह सीन ऊपर वाले का बनाया हुआ था। हकीकत में पृथ्वी के हर सीन ऊपर वाला ही तैयार करता है। अमूमन ऐसा सभी कहते हैं। पेड़ न बरगद न ही पीपल का था। यह पेड़ इमली का था। यह कई वर्ष पुराना पेड़ था। इस पेड़ के नीचे कितने प्रेम सम्बन्ध बने और टूटे थे। मगर यह इमली का पेड़ अब भी ज्यूँ का त्यूँ खड़ा था। षायद इस पेड़ को अभी और प्रेम कहानियो को देखना अभी बाकी था। उस पेड़़ के नीचे बुलबुल और मोम गले लग एक दूसरे को चूम रहे थे।
उस रात मोम और बुलबुल दोनो को नींद नहीं आई थी। जब पूरी दुनिया दिन भर के काम‘-काज से दिमाग में उपजी पाप,पुण्य,भाग्य,दुर्भाग्य,भ्
बुलबुल और मोम ने ग्रेजुएषन कर लिया था। वह दोनो यूनिवर्सिटी में जाने की तैयारी कर रहे थे। चूंकि यूनिवर्सिटी कॉलोनी से करीब पचास किलोमीटर दूर था, सो दीनदयाल अपनी बेटी को आगे पढाना नहीं चाहते थे। उन्हे इतनी ही खुषी थी कि बेटी ग्रेजुएट हो गई थी। वह चाहते थे कोई अच्छा सा लड़का देख उसका व्याह कर दिया जाए। मगर मोम यूनिवर्सिटी जाना चाहती थी। नहीं तो बुलबुल का साथ जो छूट जाएगा। उसने घर वालो को मना लिया था। दीनदयाल ने हाँ कर दी थी। मगर बेटी जवान हो गई है। इस वजह से उन्होने लड़का ढूँढना षुरू कर दिया था। मगर मार्केट में कोई नौकरी वाला लड़का मिलना इतना आसान नहीं था। उन्हे कोई लड़का पसंद नहीं आ रहा था। उनकी यह भी षर्त थी कि मेरी पसन्द के बाद मोम की भी पसंद होनी चाहिए, फिर व्याह फाइनल होगा। हाँ यह सब होने के बाद तीसरी जो षर्त वह लड़के वालो से रखते वह यह कि व्याह एम.एस.सी होने के बाद होगा,तब लड़के वालो को तब तक रूकना होगा। कुल मिलाजुलाकर वह अपने प्रयास में लगे हुए थे। इसी बीच एकबार माँ ने मोम से उसकी भी पसंद पूछी थी। वह जानती थी आज के जमाने में हर एक लड़का लड़की की कोई‘-न-कोई पसंद होती है। वह जमाना कहाँ रहा जब माता पिता व्याह पक्की कर आते थे। दूल्हा हो या दुल्हन दोनो को एक दूसरे के चेहरे का दीदार व्याह के बाद ही होता था। मोम ने अपनी पसंद बताई थी। माँ ने लड़के का नाम, विरादरी सब पूछा था। सब कुछ जानने के बाद उसके पैर तले से जमीन खिसक गई थी। उसने इस रिष्ते को यंहीं खत्म कर देने को कहा था। उसने मुस्लिम समाज और हिन्दू समाज के बीच अन्तर एक गहरी खाई की तरह बताया था। माँ ने यह भी कहा था अगर तुम्हारे पापा जान गये तो समझ लो अनर्थ हो जायेगा। तुम्हारी पढ़ाई भी यहीं बंद समझो। मोम ने पापा के पास इस बात का खुलासा करने से मना कर दिया था। माँ ने भी उसे अपनी कसम खिलाई थी कि तुम बुलबुल से अपना सम्बन्ध खत्म कर दोगी। कोई भी गलत कदम नहीं उठाओगी। उस दिन के बाद से सही मायने में मोम यूनिवर्सिटी नहीं जाना चाहती थी। मगर फिर भी जाने लगी थी क्योंकि दीनदयाल का भी अब सपना हो गया था कि बेटी एम.एस.सी करे। वह सीना तान कर सबको कहते बेटी साइन्स साइड से एम.एस.सी कर रही है। जो मोम एक वक्त सुबह देर तक सोई रहती थी, आजकल उसे नीद नहीं आ रही थी। जो बुलबुल एक दिन स्वप्न में आया करता था, अब वह एक स्वप्न ही हो जाएगा। मगर उसके लिए इतना आसान नहीं था बुलबुल को भूल पाना। एक तरफ वह माँ-बाप थे जिन्होने उन्हे इतने लाड‘-प्यार से पाला था। एक तरफ वह बुलबुल जिसे वह बेइंताह प्यार करती थी। यूनिवर्सिटी में वह बुलबुल के साथ तो होती मगर महसूस ऐसा करती जैसे बुलबुल के पास नहीं है। एक दिन बुलबुल ने उसे पूछा, ’आजकल तुम बहुत उदास रहती हो क्या हुआ? मोम बोली, ’बस ऐसे ही मूंड हमेषा एक सा नहीं होता है।’ उसने कहा,’’चलो फिर आज फिल्म देखने चलते हैं। तुम्हारे फैवरेट हीरो सलमान खान की फिल्म लगी है।’’हाँ मोम जब छोटी थी तो माँ की उँगली पकड़ कॉलानी की कई औरतो के साथ वह पहली दफा सिनेमा देखने गई थीं। वह फिल्म ’मैंने प्यार किया’ ही थी। उसी फिल्म से वह सलमान की फैन हो गई थी। माँ भी सलमान की फिल्म कभी छोड़ती नहीं थी। आज उसे यह बात समझ नहीं आ रही थी। जब बुलबुल मुस्लिम है तो सलमान भी तो मुस्लिम है। अगर बुलबुल नही ंतो सलमान भी नहीं। उसने बुलबुल से कहा,’नहीं बुलबुल और फिर कभी चलेगे। अच्छा बुलबुल एक बात बताओ।’
’’बोलो मेरी जान’’
’’त्ुम मुस्लिम हो’’
बुलबुल तो पहले चौका,’’नहीं मैं मुस्लिम नहीं मुझे बनाया गया है। पैदा तो मैं भी इंसान के रूप में हुआ था। तिलक और आरती कर के जैसे तुम्हे हिन्दू बनाया गया। इसी तरह इतिहास चल रहा है। चलता रहेगा।’’
’’बुलबुल तुम्हे एक बात कहूँ मुझे गलत तो नहीं समझोगे।’’
’’नहीं’’
’’देखो मैं तुमसे प्यार करती थी, करती हूँ ,करती रहूँगी,। मगर षायद हम इस रिष्ते को इसे आगे नहीं बड़़ा पाएगे।’’
ब्ुलबुल कुछ समझ नहीं सका था। मगर फिर भी पूछ बेठा था। ’’क्या तुम्हारा यह आखिरी फेसला है।’’
’’हाँ’,’मोम इतना कह तेज-तेज कदमो से चलने लगी थी। षायद मोम ने बुलबुल को भुलाने का पूरा दृढ़ निष्चय कर लिया था। बुलबुल उसे पीछे से जाते हुए देख रहा था। देख रहा था इमली के पेड़ की ऊँचाई को। जैसे उसका प्यार इमली के पेड़ की जड़ की तरह गहरा नहीं हुआ था, सिर्फ ऊँचा हुआ था। जिसकी तने डालियाँ सब कमजोर थी। एक हल्की सी आँधी आने के बाद ढह गया था।
मेम उस रात खूब रोई थी। इसके सिवा उसके पास कोई चारा नहीं था।
मेम के लिये ल़ड़का ढूँढा जा रहा था। मगर वही दीनदयाल अपनी षर्त पर अड़े हुए थे। मोम किसी लड़के को पसंद नहीं करती थी। वह अपनी करनी पर पछतावा कर रही थी। जैसे किसी पाप का प्रायष्चित कर रही हो। उसकी तबियत भी खराब रहने लगी थी। मोम ने सही तरीके से खान‘-पान छोड़ दिया था। उसका षरीर भी सूखने लगा था। भूरे लम्बे बाल झड़ कर छोटे होने लगे थे। आप को किसी लड़की के अंदर इतना परिवर्तन सुन हैरानी हो रही होगी। मगर जब प्यार रूह में समा जाये तो यही होता है। प्यार होने के समय भी परिवर्तन होता है। प्यार के बिछड़ने पर भी परिवर्तन होता है। एक दिन किसी ने मोम के हथेलियो के ऊपर सफेद दाग देखा। ठीक वैसा ही दाग उसकी गरदन में भी देखा गया। धीरे धीरे यह दाग फैलने सा लगा। किसी ने कहा यह तो फिलेरी की बीमारी है। तत्काल ही उपचार षुरू हुआ था। ऐलापति अर्थात अंग्रेजी से लेकर आयुर्वेद तक की दवा ली गई। जिसमें गौ मूत्र से लेकर कई मरहम तक थी। जिसे लगाकर मोम को धूप में बैठा दिया जाता था। कहते हैं मोम के ऊपर उस दवाई का कुछ खास असर नहीं हो रहा था। उल्टा वह दाग ठीक होने के बजाय और फैलता जा रहा था। गरदन से होते हुए यह दाग आधे चेहरे में धब्बे‘-धब्बे सा फैल गया था। घर में दीनदयाल और उसकी पत्नी चिंता में थे कैसे अब लड़की का व्याह होगा। हो भी ऐसा ही रहा था कोई भी लड़का अब मोम को पसंद नहीं कर रहा था। दीनदयाल अपनी षर्तो से हट गये थे और लड़के वालो की किसी भी षर्त को मानने के लिये तैयार थे।
माँ के मन में अब यह विचार आ रहा था कि यह सब बुलबुल के चक्कर में हो रहा है। उसके मन में यह आया कि इस तरह तो एक दिन अपनी बेटी ही खो देगी। क्यो ना बुलबुल से ही इसका व्याह कर दिया जाये। मगर इसके लिये मोम के पापा को राजी करना पड़ेगा। उसने दीनदयाल के सामने एक बात रखी, मोम एक लड़के को पसंद करती है। लड़का भी उसे पसंद करता है।’’ डूबते को जैसे तिनके का सहारा मिला हो।’’तो फिर अब तक बताया क्यो नहीं?’’जैसे उनकी बात से येसा लगा घर में छोरा और गली-गली ढिंढोरा। ’’मगर एक बात की कमी है।’’ यह सुनते ही दीनदयाल ने पान की थूक को थूकने के बजाये निगल लिया। ’’ऊँ नव षिवाये! किस बात कमी है?’’ जैसे वह इस वक्त कोई कमी नहीं सुनना चाहते थे।
’’लड़का मुस्लिम है ,मुस्लिम दौहड़ा में रहता है।’’
दीनदयाल को ऐसा लगा उनका हिन्दूत्व किसी समुन्दर की गहराई में समा गया हो बड़ी-बड़ी मछलियाँ उसे खाने लग गई हो। गहराई से पत्नी ने तुरन्त निकाल लिया। जी क्या हुआ लड़के को कहेंगे अगर वह मोम से व्याह करना चाहता है तो हिन्दू धर्म अपना ले। कितने मुस्लिम तो हिन्दू बने है।
बुलबुल को उसी कॉलेज में बुलाया गया था जहाँ वह मोम से पहली दफा मिला था। कॉलेज इसलिये चुना गया क्योंकि कॉलेज के अंदर कई लड़के लड़कियो के बीच उन्हे कोई घ्यान नहीं देगा। ना ही उन सब की कोई बात सुनेंगा। मोम,उनके माता-पिता और बुलबुल इमली के पेड़ के नीचे मिले थे। मोम का चेहरा उसने देखा । अब उसे यही चेहरा पसंद आया था। सुन्दर लड़कियों से उसे नफरत जो हो गई थी। मोम की माँ ने बुलबुल को देखा उसे खूबसूरत लगा। दीनदयाल ने कहा,’’देखो बेटा मोम तुमसे बहुत प्यार करती है। हम चाहते तुम दोनो का व्याह हो जाए। क्या तुम हम सब की एक बात मानोगे।’’
’’जी अंकल कहिए।’’
’’क्या तुम हिन्दू धर्म ग्रहण करोगे?’’
बुलबुल खामोष रहा।
दीनदयाल ने अपना प्रष्न फिर दोहराया।
’’जी मैं मुस्लिम हूँ। मोम हिन्दू है। मोम के हिन्दू होने पर मुझे कोई एतराज नहीं है। उसी तरह मेरे मुस्लिम होने पर आपको कोई एतराज नहीं होना चाहिये। मोम मंदिर जाकर पूजा करेगी, मुझे कोई एतराज नहीं होगा। मैं भी मोम के साथ मंदिर चला जाऊँगा। मेरे नवाज पढ़ने, मस्जिद जाने से मोम को कोई एतराज नहीं होना चाहिये। अगर मोम मेरे साथ मस्जिद जाना चाहे तो चले। मैं कभी उसको चलने के लिये नहीं कहूँगा।’’
उसकी यह फिलोजॉफी वाली बात दीनदयाल को समझ नहीं आई थी। पान के पीक को थूकते हुए कहा’’इसका मतलब तुम हिन्दू धर्म नहीं ग्रहण करोगे।’’
’’मैं आज हिन्दू धर्म ग्रहण कर भी लूँ। तो क्या मैं हिन्दू हो जाऊँगा। मैं हिन्दू धर्म के बारे में कुछ नहीं जानता हूँ। कितने हिन्दू धर्म वालो ने दूसरी षादी करने के लिये मुस्लिम धर्म को अपना लिया था। क्या वह मुस्लिम बन कर रहे?आज अगर मैं मोम से व्याह के लिये हिन्दू धर्म ग्रहण कर लूं कल को मैं हिन्दू बनकर नहीं रहा। तो आप कहेंगे यह मुस्लिमो को काफिरो के पास झूठ बोलना जायज हैं। मोम से व्याह करने के लिए यह सब किया था। मैंने सिर्फ मोम से प्यार किया था। मोम ने सिर्फ मुझसे किया था। हम दोनो ने धर्म जात से प्यार नहीं किया। हम दोनो के बीच कोई धर्म नहीं आना चाहिये।’’
दीनदयाल बौखला गया गुस्से से उल्टे पैर घर वापस चला आया। पूरा परिवार जब दुखी था। मोम पहले से भी ज्यादा खुष हो बस हँस रही थी। वह समझ गई थी कि प्यार के सामने धर्म का कोई वजूद नहीं है। पृथ्वी में जितनी भी प्रजाति बनी है। वह दो जोड़ो की प्रेम की ही निषानी है। उसे समझ आ गया था कि उसकी पसंद सही थी। घर में सबको लग रहा था कि मोम की दिमागी हालत दिन‘- ब‘-दिन खराब होती जा रही है। दीनदयाल का गुस्सा सर आसमान छूने लगा था। मोम उस दिन अपने पिता के साथ चुपचाप चली आई थी। उसने कोई विरोध नहीं किया था। मगर, उसने उस दिन बुलबुल को मुड़कर देखा था। वह उसे षायद यह कह रही थी मैं तुमसे कुछ पलो के लिए जुदा हो रही हूँ मगर जल्द ही हमेंषा के लिए तुम्हारे पास आ जाऊँगी। मोम ने बुलबुल को कॉलेज के उसी पेड़ के नीचे मिलने के लिये कहा था। कहीं दूर ऐसी दुनिया चलते हैं। जहाँ कोई धर्म ना हो, जहाँ धर्म के नाम पर कोई मौत ना हो,जहाँ धर्म के नाम पर कोई वोट ना हो। जहाँ सिर्फ फूल हो,प्यार, हो। हम दोनो हो।
अगले दिन की सुबह खामोषी लेकर आई। लेकिन रात हलचल से भरी....। उस रात बुलबुल और मोम के घर तनाव युक्त माहौल था। न बुलबुल का कुछ पता था, न मोम का...। देखते ही देखते दोनो पक्षो ने पुलिस में रिर्पोट लिखवाई। लेकिन पुलिस ने हर बार रटे रटाये अंदाज में जवाब दिया, फिकिर क्यों करते हो जवान लड़का-लड़की मोज-मस्ती कर खुद ही वापस चले आाएंगे।
पर उस रात जो दोनो घरों में हलचल पैदा हुई थी। वर्षो तक खत्म नहीं हुई। आखिर कहाँ चले गये दोनो? अब जितने मुँह उतनी बातें थी। कुछ का यह मानना था। लड़के के परिवार वालो ने दोनो को ठिकाने लगा दिया होगा। कोई कहता लड़की वालों ने इज्जत बचाने के लिए दोनो को ठिकाने लगा दिया होगा। कुछ का ऐसा भी मानना था कि दोनो ने आत्महत्या कर ली होगी। लाष को चील- कौओ कुत्तो ने खा लिया होगा।
क्या सचमुच दोनो कहीं दूर ऐसी दुनिया में चले गये थे। जहाँ कोई धर्म न था, जहाँ धर्म के नाम पर कोई मौत न थी,जहाँ धर्म के नाम पर कोई वोट न था। जहाँ सिर्फ फूल और प्यार था। वह दोनों थे । जिस दुनिया में हम सब पहुँच नहीं पा रहे हैं।
बिक्रम सिंह
बी-11,
टिहरी विस्थापित कॉलोनी,
ज्वालापुर,हरिव्दार,उत्तराखण्ड
249407
परिचय
नामः बिक्रम सिंह.
जन्मः दिनांक 01 जनवरी को जमषेदपुर (तात्कालीन बिहार, अब झारखंड) के एक सिक्ख परिवार में।
षिक्षाः प्रारम्भिक षिक्षा पंष्चिम बंगाल में। षिक्षाः आटोमोबाइल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा।
संप्रति. मुंजाल षोवा लिमिटेड कम्पनी ( हीरो ग्रुप) में बतौर अभियंता कार्यरत।
देष भर के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाषित।
अब तक चार कहानी संग्रह- ’वारिस’’(2013), ’’,और कितने टुकड़े’(2015),’काफिल का कुत्ता’(2017),गणित का पंडित (2018) प्रकाषित।
सम्पर्कः
बी-11,टिहरी विस्थापित कॉलोनी,ज्वालापुर,हरिव्दार,उत्
मो-9012275039
Tejas Poonia S/o Raghunath Poonia
Master's Of Arts
Department Of Hindi
Center Of Humanities & Language
Central University Of Rajasthan
Bandarsindri, Kishangarh
Ajmer - 305817
Ph. No. +919166373652
+918802707162
Email - tejaspoonia@gmail.com
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