Sunday, September 15, 2019

स्वामी केशवानन्द : एक निराला ढाका शिक्षा-संत


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फ़र्श से अर्श तक पहुंचने वालों के कई किस्से सुने हैं। पर यह किस्सा एक ऐसी शख्सियत का है, जिसे पैर टिकाने के लिए अपना कोई टिकाऊ फ़र्श नसीब नहीं हुआ। आज यहां तो कल वहां। यह किस्सा एक ऐसे यायावर का है जिसने कष्टों के कांटों से जूझते हुए एक विशाल इलाके को शिक्षा से रोशन कर नव-जागरण की ज्वाला प्रज्ज्वलित की और अपने कर्मनिष्ठ जीवन से लोकप्रियता के आकाश पर धूमकेतु की तरह छाया रहा। यह किस्सा बेहद रोमांचक है। ट्विस्ट इसमें कई हैं।
तूफ़ान से दिए की लौ की लड़ाई जैसा किस्सा है यह। 
दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर एक चरवाहे का साधु बनना और फिर अपना समूचा जीवन राष्ट्रसेवा, जनसेवा एवं ज्ञानदान में झोंक देना -- यह है स्वामी केशवानन्द का चंद शब्दों में समाहित जीवन चरित। 

गुण, कर्म और स्वभाव , इन तीनों से केशवानन्द संत शिरोमणि थे। इस महान शिक्षा-संत, स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, हिन्दी के श्रेष्ठ सेवक, कला- मर्मज्ञ, त्यागी, तपस्वी, दृढ़ प्रतिज्ञ, निष्काम कर्मयोगी जनसेवक का जन्म दिसम्बर 1883 में सीकर जिले के लक्ष्मणगढ़ तहसील के गांव मंगलूणा में हुआ। असल नाम था बीरमा ढाका। पिता का नाम ठाकर सी ढाका तथा माँ का नाम था- सारां। पिता ऊँट- गाड़े से परिवहन का काम करके परिवार का पालन-पोषण करते थे।

कष्टों से भरा बचपन
बीरमा ढाका के जन्म के कुछ समय पश्चात उसके पिता जी मंगलूणा गांव छोड़कर रतनगढ़ ( जिला- चूरू) में एक माली गोत्र के जाट से धर्म भाई बनकर वहां रहने लगे। लगभग सात साल की उम्र में बीरमा पर क़िस्मत का क़हर ऐसा बरपा कि उसके पिता दुर्घटनावश काल के ग्रास बन गए। बालक की दुखियारी मां मंगलूणा गांव लौट आने और फिर वहां से एक गांव से दूसरे गांव पलायन करने को विवश हो गई। बाल्यावस्था में बीरमा गाय-बछड़े चराने लगा। सन 1897 में माँ और बेटा हनुमानगढ़ जिले के केलनियाँ गांव पहुंचे और वहाँ रहने लगे। दुर्भाग्य के दानव ने इस बालक पर यहाँ ऐसी बेरहमी से प्रहार किया कि उससे उसकी माँ का आँचल भी छीन लिया। सन 1899 में माँ के देहान्त के बाद बीरमा अनाथ हो गया। दर-दर की ठोकरें खाने को मज़बूर। परन्तु हालात से हारकर बैठ जाना और क़िस्मत को कोसते रहना बीरमा को मंजूर नहीं था।

बीरमा से केशवानन्द बनने की कहानी
सन 1899 (सवंत1956 जो 'छपनिया काल' के नाम से कुख्यात है) में पड़े भीषण अकाल की मार से त्रस्त 16 साल का बालक बीरमा खानाबदोश की हालत में भटकता हुआ रेगिस्तानी इलाके से फिरोजपुर ( पंजाब) पहुंचा और वहाँ अनाथालय में आश्रय प्राप्त किया। संस्कृत पढ़ने की इच्छा हावी होने पर वहां से पैदल चलकर भटिंडा, अबोहर होते हुए सन 1904 में साधु आश्रम, फाजिल्का जा पहुंचा। डेरे के साधुओं ने बीरमा की जाति पूछकर यह कहा: 'तुम जाट हो; जाट को कौन संस्कृत पढ़ाता है?' मालूम हो कि उस जमाने में संस्कृत पढ़ने का अधिकार सिर्फ़ ब्राह्मण जाति को था। धुन का पक्का बालक बीरमा हार मानने वाला नहीं था। उसने आश्रम में उदासी संप्रदाय के महंत कुशलदास से अनुनय-विनय की तो उन्होंने बीरमा को एक युक्ति सुझाते हुए साधु बनने की सलाह दी ताकि वह संस्कृत सीखने का पात्र बन सके। इस सलाह को शिरोधार्य करते हुए बीरमा ने साधुत्व धारण कर लिया और उदासी सम्प्रदाय में दीक्षित होकर महंत कुशलदास का शिष्य बन गया।

स्वामी जी के शब्दों में : 'भाग्य का ऐसा झोंका आया कि सूखे पत्ते की तरह उड़कर संवत 1961( सन 1904 ) में फाजिल्का (पंजाब ) में जा कर पांव जमे।' साधु आश्रम, फाजिल्का में बीरमा ने संस्कृत, हिन्दी व गुरुमुखी सीख ली। कुशाग्र बुद्धि के बल पर बीरमा गुरुग्रन्थ-साहब का पारंगत पाठी बन गया। कुछ समय बाद वह देशाटन एवं संस्कृत के ग्रंथों का गहन अध्ययन कर विद्वता अर्जित करने हेतु पहले इलाहाबाद और फिर काशी होते हुए प्रयाग पहुंचा।

सन 1905 में प्रयाग में आयोजित कुंभ मेले में अवधूत हीरानन्द ने बीरमा के संस्कृत व हिंदी के शुद्ध उच्चारण से प्रसन्न होकर उसे केशवानन्द नाम दे दिया। विदित हो कि अवधूत अखाड़े में पूर्व में केशवानन्द नाम के एक विद्वान हुए थे, जो अपने शुद्ध उच्चारण के लिए सुविख्यात थे। वहाँ से फाजिल्का लौट कर उन्होंने गहन ज्ञानार्जन हेतु हरिद्वार, अमृतसर , क्वेटा व सिन्ध की यात्राएं की।

"...यूं तो हमारे देश में गेरुवां कपड़े पहने लाखों साधु-संन्यासी हैं। समझा यह जाता है कि सब कर्मों का नाश करना ही सन्यास है। कुछ नहीं करना और समाज में भार बने रहना ही अपना कर्तव्य समझते हैं। सन्यासी को समाज से कम से कम लेना और अधिक से अधिक देना चाहिए ,ऐसे कर्म योगी को मैं नमन करता हूं।" सेठ रामगोपाल मोहता द्वारा स्वामी जी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहे गए ये शब्द एक सच्चे साधु के जीवन को परिभाषित करते हैं। आडम्बर और पाखण्ड से कोसों दूर स्वामी जी ने साधुत्व के सारतत्व को आत्मसात किया। कबीर के इस दोहे के निहितार्थ को उन्होंने गहराई से समझा और जीवन में उसका अनुसरण किया।
'साधु ऐसा चाहिए ,जैसा सूप सुभाय
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।'

श्रेष्ठ राष्ट्रसेवक व जनसेवक 
महंत कुशलदास अपने शिष्य केशवानन्द की कर्तव्य- परायणता, सेवा-भावना, सच्चरित्रता और योग्यता से इस हद तक प्रभावित थे कि उन्होंने फाजिल्का स्थित डेरे की रजिस्ट्री साधु केशवानन्द के नाम करवाकर उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। सन 1908 में उत्तराधिकारी के रूप में गुरु-गद्दी पर आसीन होकर स्वामी जी ने अपनी शक्ति और संसाधनों का सदुपयोग शिक्षा के प्रचार-प्रसार तथा जनहितकारी कार्यों में करना प्रारंभ किया। शिक्षा को मानव-कल्याण और समाजोत्थान का प्रमुख साधन स्वीकारते हुए स्वामी जी ने ज्ञानदान और जनसेवा को अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर लिया।

साधुत्व धारण करने के बाद स्वामी जी पर गुरु नानक और उदासीन संप्रदाय के संस्थापक श्रीचन्द जी महाराज के उपदेशों का गहरा प्रभाव पड़ा। इसके साथ ही स्वामी दयानंद से प्रभावित होकर उन्होंने समाज सुधार की दिशा में कई रचनात्मक काम किए। स्वामी जी की कार्यशैली तथा मनोवृत्ति नितान्त आधुनिक थी।
उनका दिमाग सिर्फ़ तर्क की राह पर चलता था। अपार कार्य-शक्ति से संपन्न दृढ़व्रती स्वामी जी स्पष्टवादी, सद्व्यावहारिक और सत्यवादी सज्जन पुरुष थे। डेरे की गद्दी पर काबिज़ रहकर कर्मकांडी जीवनयापन करना, आडम्बर को बढ़ावा देना, मठाधीश बने रहकर भक्तजनों की जमात खड़ी करना, दर्शनार्थियों से चरण- स्पर्श करवाना, उन्हें आशीष देना--ये सब स्वामी जी के स्वभाव में नहीं था। स्वामी जी ने एक त्यागी साधु का परिचय देते हुए सन 1916 में साधु-आश्रम, फाजिल्का की महंत की गद्दी अपने गुरुभाई श्यामदास को सौंपकर ख़ुद को देश-सेवा व जनसेवा के प्रति अर्पित कर दिया। 

स्वतंत्रता सेनानी 
आज़ादी के दीवाने स्वामी केशवानंद का नाम उन गिने-चुने साधुओं में सम्मिलित है, जिन्होंने आजादी के आंदोलन में बढ़चढ़ कर भाग लिया। सन 1919 में घटित जलियांवाला बाग हत्याकांड ने उन्हें झकझोर दिया। महात्मा गांधी की अगुवाई में चल रहे स्वतंत्रता के राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाते हुए वे कांग्रेस के सभी अधिवेशनों में स्वतंत्रता प्राप्ति तक शिरकत करते रहे।

आज़ादी के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण स्वामी जी को दो बार जेल की सजा भुगतनी पड़ी। पहली बार, सन 1921में महात्मा गांधी के नेतृत्व में चल रहे असहयोग आंदोलन में शामिल होने के कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया। पुलिस द्वारा उन पर अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध जनता में भावनाएं भड़काने का आरोप लगाया गया। मजिस्ट्रेट ने स्वामी जी से पूछा कि क्या वे माफी मांग कर छूटना चाहेंगे ? इस पर स्वामी जी का सहज उत्तर था; 'यदि मुझे बिना माफी मांगे भी छोड़ दिया जाए तो भी मैं पुनः आंदोलन में ही शामिल होऊंगा।' इस पर उन्हें फ़िरोज़पुर जेल में दो वर्ष की जेल की सजा भुगतनी पड़ी। गांधी जी के आह्वान पर स्वामी जी ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और खादी अपनाने की प्रतिज्ञा ली।

स्वामी जी को कांग्रेस द्वारा सन 1930 में फिरोजपुर जिले में आजादी के आंदोलन को गति देने का प्रभार सौंपा गया। वे इलाके में अंग्रेजी राज के ख़िलाफ़ धुंआधार प्रचार करने लगे। उसी वर्ष सत्याग्रह संग्राम और सविनय आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें दूसरी बार गिरफ्तार कर मुल्तान की कुख्यात न्यू सेंट्रल जेल व लाहौर जेल में एक साल से अधिक समय तक कैद रखा गया।
देश आज़ाद होने के बाद स्वामी जी ने स्वतंत्रता सेनानी को देय भत्ते/ पेंशन की कोई मांग नहीं की और न ही किसी ताम्रपत्र की चाह रखी।

शिक्षा-जगत को अतुल्य योगदान
स्वामी केशवानन्द ने 'गांव जगे, देश जगे' मुहिम को परवान पर चढ़ाने के लिए अज्ञान के अंधेरे में डूबे गांवों में ज्ञान का उजाला फैलाने का काम इन तीन संस्थाओं के ज़रिए किया: 

1.वेदान्त पुष्पवाटिका 
सन 1911 में स्वामी जी ने साधु आश्रम ( गुरु डेरा ), फाजिल्का में वेदान्त पुष्पवाटिका नाम से पुस्तकालय स्थापित कर सन 1912 में वहीं पर प्रथम संस्कृत विद्यालय की स्थापना की। वे मानते थे कि समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और रूढ़ियों के नाश के लिए आधुनिक ज्ञान से युक्त साहित्य आमजन तक हिंदी भाषा में पहुंचना जरूरी है। वे खुद हिंदी भाषा में लिखित लोकोपयोगी पुस्तकों की गठरी बांध कर आस-पास के गाँवों में ले जाते और पढ़े-लिखे लोगों को उन पुस्तकों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे।

2. साहित्य- सदन
सन 1924-25 में स्वामी जी ने अबोहर ( जिला-फ़िरोजपुर ) में साहित्य- सदन की स्थापना कर पंजाब में हिन्दी के प्रचार -प्रसार का बीड़ा उठाया। यहाँ दस हज़ार पुस्तकों से समृद्ध पुस्तकालय की स्थापना करने एवं समाचारपत्रों से सुसज्जित सर्व सुलभ वाचनालय शुरू करने का अनूठा कार्य कर दिखाया। सन 1925 से 1933 तक कि अवधि में उन्होंने अबोहर तहसील में हिंदी अध्ययन हेतु विद्यालयों की स्थापना के अलावा श्रीगंगानगर, मुख़्तसर, डबवाली, सिरसा, ऐलनाबाद में पुस्तकालयों व वाचनालयों की स्थापना की। गांवों में ज्ञान-ज्योति पहुंचाने हेतु स्वामी जी ने साहित्य- सदन पुस्तकालय के अंतर्गत एक चलता- फिरता पुस्तकालय सन 1932 में शुरू किया।

3. ग्रामोत्थान विद्यापीठ
सन 1932 से स्वामी जी के कर्तव्यनिष्ठ जीवन की कर्मभूमि बना राजस्थान, पंजाब और हरियाणा की सीमा पर बसा हुआ कस्बा संगरिया, जो कि उस समय एक छोटा- सा गांव था। यहां उन्होंने चौधरी बहादुर सिंह भोबिया द्वारा 9 अगस्त 1917 को स्थापित और चौधरी हरिश्चंद्र नैण के संरक्षण में तत्समय संचालित 'जाट एंग्लो संस्कृत मिडिल स्कूल' के संचालन की बागडोर शिक्षा-अनुरागी महानुभावों के आग्रह पर संभाली। स्वामी जी ने इस संस्था का कायापलट करने के उद्देश्य से काया-पलट नामक एक विज्ञापन प्रकाशित करवाकर जनता से धनराशि संग्रह करने का अभियान चलाया। चौधरी घेरूराम ज्याणी (कटेड़ा) ने आरोग्य मंदिर नामक भव्य इमारत का निर्माण करवा दिया। चौ. कानाराम ढाका ने साहित्य मंदिर का निर्माण करवाया। जनता से प्राप्त आर्थिक सहयोग से स्कूल के जीर्णोद्धार का सिलसिला शुरू हो गया। स्कूल के नाम पर पहले से बने हुए पांच कच्चे कोठों की जगह पक्की नई इमारत बनवाने के साथ-साथ सरस्वती मंदिर, व्यायामशाला, वाचनालय, औषधालय, रसायनशाला आदि इमारतों का सलीक़े से निर्माण करवाया गया। दो बीघा ग्यारह बिस्वा जमीन और ख़रीद कर स्कूल परिसर का विस्तार किया गया। पानी की विकट समस्या के समाधान हेतु वर्षा-जल के भंडारण के लिए कुण्डों का निर्माण करवाया गया। डिग्गियां, स्नानघर आदि बनवाए गए। जतन से पानी की एक-एक बूंद संचित कर स्कूल परिसर के रेतीले धोरों पर पेड़-पौधे लगाए गए। यहाँ यह जान लेना जरूरी है कि इस इलाके में भाखड़ा नहर का पानी सन 1955 में आने के बाद ही इलाक़े को पानी की क़िल्लत से निज़ात मिल सकी। 

सन 1938 में इस संस्था में म्यूजियम( संग्रहालय ) की विधिवत स्थापना 'सांस्कृतिक संग्रहालय' के नाम से की गई, जिसमें कीमती दुर्लभ दस्तावेज, पेंटिग्स, प्राचीन कलाकृतियां दूर-दराज़ के क्षेत्रों से लाकर यहाँ संग्रहित की गईं। सन 1956 में इस संग्रहालय का नामकरण 'सर छोटूराम स्मारक कलात्मक संग्रहालय' किया गया। सांसद रहने के दौरान स्वामी जी को जो भत्ता मिला, उसे उन्होंने विद्यापीठ के संग्रहालय के विस्तार में व्यय कर दिया। यह स्वामी जी का कला के प्रति अगाध प्रेम का द्योतक है।

स्वामी जी के प्रयासों से 13-14 सितंबर 1942 को जाट स्कूल, संगरिया का रजत जयंती महोत्सव मनाया गया, जिसमें सर छोटूराम और श्री के. एम. पन्निकर ने शिरकत की। इस अवसर पर प्रस्तुत 25 वर्षीय कार्य रिपोर्ट में उल्लेख है कि सन 1917 से सन 1942 तक इस संस्था में 2508 विद्यार्थियों ने शिक्षा प्राप्त की जिसमें से 1656 विद्यार्थी छात्रावास में रहे।

स्वामी जी की अनवरत साधना और कर्मठता का ही सुफल था कि यह संस्था उत्तरोत्तर प्रगति के पथ पर अग्रसर रही। सन 1943 तक विद्यार्थी- आश्रम, छात्रावास, सभाभवन, गोशाला-भवन, पांच अध्यापक निवास, अतिथिशाला, स्नानागार और वर्षाजल के संग्रहण हेतु बड़े कुण्ड का निर्माण करवाया जा चुका था। स्वामी जी के प्रयास से इस मिडल स्कूल की सन 1943 में हाईस्कूल के रूप में क्रमोन्नति हो सकी। सन 1948 तक इस संस्था में संगीत व आयुर्वेद -शिक्षा के साथ-साथ वस्त्र -निर्माण और सिलाई, काष्ठ-कला, धातु -कर्म आदि उद्योगों का प्रशिक्षण प्रदान करना प्रारंभ कर दिया गया था।

नवंबर- दिसंबर 1948 में इस शिक्षा संस्था का नाम स्वामी जी ने ग्रामोत्थान विद्यापीठ रखकर इसे उत्तर भारत की एक प्रगतिशील संस्था के रूप में रूपांतरित कर यह दिखा दिया कि मन में हो संकल्प तो कुछ काम नहीं है मुश्किल। विद्यापीठ के माध्यम से स्वामी जी ने राजस्थान, पंजाब और हरियाणा --इन तीन राज्यों में शिक्षा और जनजागृति के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान दिया।

दूर-दराज़ के गांवों में शिक्षादान 
स्वामी जी जानते थे कि जब तक गांवों में शिक्षा-प्रसार नहीं होगा तब तक देश उन्नत नहीं हो सकता। 'मरुभूमि सेवा कार्य' नाम से शिक्षा-प्रसार की एक विस्तृत योजना तैयार कर इसे गांवों में क्रियान्वित करने के लिए स्वामी जी ने देहात से जुड़े कर्मठ कार्यकर्ताओं का सहयोग लिया, जिसमें प्रमुख थे: चौ. कुम्भाराम आर्य, चौ. दौलत राम सारण, चौ. हंसराज आर्य, लोक कवि सरदार हरदत्त सिंह भादू, चौ. रिक्ताराम तरड़, व्यायामाचार्य श्री रामलाल काजला और श्री लालचंद पूनिया। इस परियोजना का हैड ऑफिस ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया में ही रखा गया। सन 1944 से 1959 तक की अवधि में 'त्रैमासिक शिक्षा योजना', 'ग्रामोत्थान पाठशाला योजना' और 'समाज शिक्षा योजना' के अंतर्गत मरुभूमि के विभिन्न गांवों में 287 स्कूल खोलकर उनका संचालन किया। ( स्कूलों की सूची श्री गोविंद चौधरी से साभार प्राप्त ) 
ग्रामीण इलाकों में स्कूल खोलने में स्वामी जी को ग्रामवासियों तथा मारवाड़ी रिलीफ सोसाइटी, कलकत्ता का भरपूर सहयोग मिला। इन ग्राम शालाओं में बच्चों की शिक्षा के अलावा प्रौढ़-शिक्षा, दलितोद्धार और प्राथमिक चिकित्सा के काम भी होते थे।

ग्रामोत्थान विद्यापीठ के अधीन मरुभूमि के गांवों में खोली गई 287 पाठशालाओं को 1 नवम्बर 1956 को राज्य सरकार को सौंपने तक स्वामी जी स्वयं इन पाठशालाओं का निरीक्षण करते रहते थे। चौधरी दौलतराम सारण ( राजस्थान के कद्दावर किसान नेता एवं पूर्व केंद्रीय शहरी विकास मंत्री ) ने इन पाठशालाओं की समुचित देखरेख का जिम्मा बख़ूबी निभाया। 

स्वामी जी ने शिक्षा-दान का महान कार्य उन दुर्गम इलाकों में किया जहां आवागमन के मार्गों व यातायात के साधनों का अभाव था। हालात इतने भयावह कि दूर- दूर तक पानी सुलभ नहीं होता था। मार्गों की दुर्गमता, बस्तियों की निर्जनता, अज्ञानता के अंधेरे और पानी की क़िल्लत से बागड़ का समूचा इलाका शहरों से अलग-थलग तिरस्कृत रूप में पड़ा था। कुछ नगरों में वहां के दानवीर सेठों की उदारता से कुछ स्कूल संचालित हो रहे थे, लेकिन देहात में हर तरफ़ अज्ञान का अंधेरा पसरा हुआ था।
स्वामी जी की प्रेरणा, मार्गदर्शन एवं सक्रिय सहयोग से मरुभूमि में जो स्कूल और हॉस्टल खुले, उनमें से कुछ का उल्लेख यहाँ किया जा रहा है :
◆विद्यार्थी भवन, रतनगढ, जिला-चूरू 
( 13-14 अप्रेल 1946 को शिलान्यास )
◆ विद्यार्थी आश्रम, राजगढ़, जिला- चूरू 
( स्थापना 9 सितम्बर 1947 )
◆ किसान बोर्डिंग हाउस, बीकानेर
( 24 मई 1947 को छात्रावास का उद्घाटन एवं
सन 1948 में प्राथमिक पाठशाला की शुरुआत )
◆ खीचिवाला ग्रामोदय विद्यापीठ
( शिक्षा सदन, खीचिवाला) स्थापना 9 नवम्बर 1947
◆ ग्राम छात्रावास, भादरा
( 20 अगस्त 1925 को भादरा में जाट बोर्डिंग हाउस नाम से स्थापित इस संस्था का नामकरण 28 मार्च 1949 को स्वामी जी के प्रस्तावानुसार ग्राम छात्रावास रख कर इसे नवजीवन प्रदान किया गया।)
◆ कस्तूरबा ग्रामोत्थान महिला विद्यापीठ, महाजन
( स्थापना सन 1951में, भवन निर्माण सन 1955)
◆ ग्रामोत्थान छात्रावास, श्री गंगानगर
◆ ग्रामोत्थान छात्रावास, सूरतगढ़
( 2 अक्टूबर 1955 को आधारशिला रखी गई ।)

जीवन की प्रतिकूलताओं के कारण स्वामी जी को औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिला। इस मलाल को महसूस करते हुए उन्होंने अपने जीवन- काल में विभिन्न स्थानों पर लगभग 300 स्कूल, 50 हॉस्टल मय स्कूल,अनेक पुस्तकालय एवं 58 समाज सेवा केंद्र स्थापित कर तमाम उम्र शिक्षा का उजियारा फैलाने और समाज- सुधार के काम में निष्ठा से लगे रहे। प्रो. ब्रजनारायण कौशिक ने स्वामी जी की शिक्षा- प्रसार की अनूठी परियोजनाओं के महत्त्व को समझ कर उन्हें शिक्षा-संत की संज्ञा देते हुए उनकी जीवनी 'शिक्षा-संत स्वामी केशवानंद' शीर्षक से सन 1968 में प्रकाशित की, जो कि उनके जीवन और योगदान पर लिखी गई प्रथम पुस्तक थी।

ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया एवं उसके तहत संचालित सभी संस्थाओं का अपने-अपने इलाके में ग्रामीण परिवेश की प्रतिभाओं को संवारने- निखारने में विशेष योगदान रहा है। इनमें शिक्षा प्राप्त अनेक विद्यार्थियों ने राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय प्रशासनिक सेवाओं के विभिन्न पदों को सुशोभित किया है। अनगिनत विद्यार्थी ऐसे हैं, जिन्होंने अनेक शिक्षण संस्थाओं में प्रख्यात शिक्षाविदों के रूप में अपनी ख़ास पहचान कायम की है। अनेक विद्यार्थी ऐसे भी हैं जिन्होंने सफल लेखक, पत्रकार, उद्यमी, अधिवक्ता, शिल्पकार एवं कलाकार के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की है।

शिक्षा और चिकित्सा का समन्वय
स्वामी जी गांवों की समस्याओं से भली-भांति परिचित थे। वे जानते थे कि गांवों में लोग कच्चे तालाब/जोहड़ों का गंदा पानी पीने के लिए मजबूर होने के कारण नहरूआ रोग से ग्रसित होते रहते हैं। रोगियों की तात्कालिक चिकित्सा के लिए गांवों में जो अध्यापक कार्यकर्ता हैं, उन्हें आयुर्वेद का भी ज्ञान होना चाहिए ताकि वे देहात में शिक्षा के साथ-साथ आरोग्य का उजाला भी फैला सकें। अतः स्वामी जी ने 'वैद्य ही अध्यापक, अध्यापक ही वैद्य' की निराली नीति पर काम करते हुए संगरिया में आयुर्वेद विद्यालय खोला। गांवों में रोग से उत्पन्न विपत्ति को ध्यान में रखते हुए स्वामी जी ने सन 1945 में अनुभवी वैद्यों का 'अखिल राजस्थान वैद्य सम्मेलन' आयोजित कर उसमें नहरूआ रोग के कारण व उसकी चिकित्सा आदि पर विचार-विमर्श किया तथा इस रोग से बचाव व उपचार से संबंधित निष्कर्षों पर जनोपयोगी साहित्य प्रकाशित करवाया। 

स्त्री-शिक्षा के प्रसार में योगदान
स्वामी जी का मानना था कि समाज रूपी गाड़ी के दो पहिए हैं : एक पुरुष तथा दूसरा स्त्री। जब तक यह दोनों पहिए समान रुप से साथ- साथ नहीं चलेंगे तब तक यह गाड़ी सही तरीके से आगे नहीं बढ़ सकती। महिला- शिक्षा के महत्त्व को समझते हुए स्वामी जी ने 1950 में विद्यापीठ में महिला आश्रम स्थापित कर कन्या प्राइमरी स्कूल खोली। ग्रामोत्थान विद्यापीठ के महिला आश्रम की स्थापना में सावित्री देवी का विशेष योगदान रहा। मालूम हो कि सावित्री देवी पंजाब के अबोहर जिले के गांव सिवाना में एक किसान परिवार की बाल विधवा बहू थी। वैधव्य काल में उन्होंने जालंधर में दयानन्द आर्य वैदिक कन्या विद्यालय में सन 1922 -23 के लगभग पढ़ाई की थी।

ग्रामोत्थान विद्यापीठ में महिला-शिक्षा की शुरुआत करने हेतु महिला आश्रम स्थापित करने की धुन स्वामीजी के दिमाग में काफी समय से सवार थी। दिक़्क़त बस यह थी कि उन्हें कोई कुशल अध्यापिका नहीं मिल रही थी। स्वामी जी के हठ करने पर सावित्री देवी अपनी अस्वस्थता के बावज़ूद सन 1950 में संगरिया आ गईं और वहां विद्यापीठ में स्थापित महिला आश्रम में अध्यापन व उसका संचालन निष्ठापूर्वक करने लगी।

सन 1954 में महिला आश्रम को मिडिल स्कूल तथा 1957 में इसे हाई स्कूल में क्रमोन्नत किया गया। कालांतर में इसे गृह विज्ञान तथा कला महाविद्यालय के स्तर पर क्रमोन्नत किया गया। 

विद्यापीठ में महिलाओं के लिए संगीत, सिलाई, कताई, कशीदाकारी, गुलकारी, रसोई का काम-- ये सभी विषय महिला शिक्षा में शामिल किए गए। महिला आश्रम का पृथक से पुस्तकालय और संग्रहालय भी बनाया गया। 
स्कूल व कॉलेज के भव्य भवनों के अलावा यहाँ पांच छात्रावास भी बने हुए हैं ,जिसमें लगभग एक हज़ार छात्राओं के निवास की क्षमता है। कृतज्ञ संस्था ने एक छात्रावास का नामकरण 'सावित्री छात्रावास' कर सन 1966 में इसका उद्घाटन किया।

प्रगतिशील एवं विशाल संस्था
ग्रामोत्थान विद्यापीठ में विद्यार्थियों को बिना किसी जात-पात व पंथ के भेदभाव के प्रवेश दिया जाता था। सभी जातियों के छात्र छुआछूत की सामाजिक बुराई से मुक्त रहते हुए छात्रावास में एक साथ रहते थे तथा एक साथ भोजन करते थे। सरकार ने सन 1954 में अनुसूचित व जन जातियों के छात्रावासियों को भोजन-व्यय के लिए छात्रवृत्ति प्रदान करने के लिए यह शर्त तय कर दी कि इन जातियों के छात्रों का सामूहिक रूप में छात्रावास में रहना जरूरी है। इसलिए स्वामी जी ने सन 1955 में 'सरस्वती आश्रम' नामक भवन अनुसूचित जाति के छात्रों को छात्रावास के रूप में आवंटित कर दिया।

सन 1955 में विद्यापीठ में इंजीनियरिंग विभाग एवं कृषि संकाय खोल कर इसे बहु-उद्दयेशीय उच्चतर माध्यमिक स्कूल का दर्जा दिया गया। सन 1956 में अध्यापकों के प्रशिक्षण के लिए बीकानेर संभाग का पहला शिक्षक प्रशिक्षण स्कूल ( एस.टी.सी.) इस संस्था में प्रारंभ किया गया। सन 1962 में विद्यापीठ में कृषि महाविद्यालय की शुरुआत की गई जो कि वर्तमान में स्वामी केशवानंद कृषि महाविद्यालय, संगरिया के नाम से संचालित है। बता दें कि कृषि महाविद्यालय के अधीन 300 एकड़ भूमि पर कृषि फ़ार्म विकसित किया गया। इससे खेती-बाड़ी के उच्च शिक्षण के साथ-साथ पशु -पालन, पशु- नस्ल संवर्धन, दुग्ध-उत्पादन आदि की शिक्षा सुलभ होने से इलाके को बहुत लाभ मिला है। सन 1965 में इस संस्था में शिक्षा महाविद्यालय खोला गया। विद्यापीठ में संचालित हो रहे कृषि महाविद्यालय को सन 1968 में बहुत संकायी ( कला एवं विज्ञान ) दर्जा दे दिया गया। 

स्वामी जी ने सन् 1932 से अपने जीवन के लगभग 40 वर्षों तक कर्मसाधन करते हुए एक ग्रामीण मिडिल स्कूल को हाई स्कूल व बहुउद्देशीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के रूप में परिणित करने के बाद इसे बहु संकायी महाविद्यालय स्तर तक क्रमोन्नत करवाकर रेगिस्तान में ज्ञान-गंगा प्रवाहित कर दी। स्वामी जी का यह बेमिसाल योगदान है।

विद्यापीठ में आर्थिक दृष्टि से कमजोर छात्र 'स्वयं कमाओ और विद्याभ्यास करो' की नीति का पालन करते हुए विद्यालय की शिल्पशाला में अपने लिए कमाते हुए स्वावलंबी जीवन यापन करते थे। स्वामी जी ने विद्यापीठ में बुनाई, रंगाई, छपाई, जिल्दसाजी, बढ़ईगिरी, दर्जीगिरी और सामान्य इंजीनियरिंग के पाठ्यक्रम संचालित कर विद्यार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा ( vocational education ) सुलभ करवाई।
विद्यापीठ में स्थित चिकित्सालय, मुद्रणालय, शिल्प भवन, व्यायाम शाला, कौतूकागार तथा विद्यार्थियों के लिए व्यायाम व क्रीडा के मैदान आदि स्वामी जी के व्यापक सोच को प्रकट करते हैं। विद्यापीठ के पुस्तकालय में विभिन्न भाषाओं की दुर्लभ पुस्तकों का अद्वितीय संग्रह है। अन्वेषकों व विद्वानों के लिए स्वामी जी द्वारा स्थापित यह वृहद पुस्तकालय ज्ञानार्जन का केन्द्र है।

स्वामी जी की छत्रछाया में पल्लवित एवं पुष्पित ग्रामोत्थान विद्यापीठ को देखकर दर्शकों के दिल में स्वामी जी के प्रति उतनी ही श्रद्धा जागृत होती है, जितनी रविंद्रनाथ ठाकुर के शांति निकेतन, श्री मदन मोहन मालवीय के बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, स्वामी श्रद्धानंद के गुरुकुल कांगड़ी को देखकर दर्शकों के दिलों में उन महान संस्थापकों के प्रति होती है। देहाती इलाके में समाज सुधार व जनहित के कार्य संपादित कर ग्रामीणों के आराध्य देव के रूप में अपनी पहचान स्थापित करने वाले स्वामी जी के कार्य से अभिभूत होकर एक शिक्षाशास्त्री ने उनसे कहा कि अगर ऐसा कार्य उन्होंने संगरिया जैसे मामूली गांव की बजाय किसी अन्य नगर में किया होता तो उनकी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान स्थापित होती। इस पर स्वामी जी का जवाब था : ' हां, बिजली के जलते हुए लट्टू के पास मिट्टी के दीपक का कोई महत्त्व नहीं। गांव की अंधेरी झोपड़ी में तो वह अवश्यमेव प्रकाश देगा। शहर में काम करने को तो हर कोई दौड़ता है लेकिन काम करने की असली जरूरत तो गांव में है।' ( स्वामी केशवानंद अभिनंदन ग्रंथ, पृष्ठ 82)

संयुक्त पंजाब के फिरोजपुर, हिसार जिलों और बीकानेर रियासत तथा बहावलपुर ( अब पाकिस्तान ) इन चार इलाकों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार व जनहित के कार्यों की बदौलत स्वामी जी जन-जन की श्रद्धा के पात्र बने। बागड़ इलाके के लिए तो वे देवदूत तुल्य थे।
ग्रामोत्थान विद्यापीठ में स्वामी जी के निमंत्रण पर पूर्व प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी, कृषि मंत्री डॉ रामसुभग सिंह, बाबू जगजीवन राम, आचार्य विनोबा भावे, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री श्री प्रताप सिंह कैरों, राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री श्री मोहनलाल सुखाड़िया आदि अनेक जन- नायक और महानुभाव इस संस्थान में पधारे, जिससे इस संस्था के साथ-साथ संगरिया को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।

हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अग्रणी भूमिका
हिन्दी के व्यापक प्रचार- प्रसार के लिए स्वामी जी ने 1920 में अबोहर ( पंजाब ) में 'नागरी प्रचारिणी सभा' की स्थापना की, जिसका नामकरण सन 1924 में 'साहित्य सदन ,अबोहर' कर दिया गया। वहीं पर दीपक प्रिंटिंग प्रेस स्थापित कर सन 1933 में हिंदी मासिक पत्रिका 'दीपक' का प्रकाशन कर हिंदी के पठन- पाठन को बढ़ावा दिया। साहित्य सदन में ही साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा और पंजाब विश्वविद्यालय की हिंदी से संबंधित परीक्षा- केंद्र स्थापित करवाए गए। इन परीक्षाओं में प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में विद्यार्थी प्रविष्ट होते थे। साहित्य सदन के अन्तर्गत इलाके के झूमियांवली, मौजगढ़, भंगरखेड़ा,पंचकोसी, रामगढ़, रोहिडांवाली, चुहड़ियाँवाला, बाजिदपुर, कल्लरखेड़ा, पन्नीवाला आदि 25 गांवों में हिंदी की प्राथमिक पाठशालाएं संचालित थीं, जिनमें प्रौढ़-शिक्षा का भी प्रबंध था।

साहित्य सदन, अबोहर में सन 1933 में नौवां पंजाब प्रांतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन का आयोजन किया गया। सन 1941 में स्वामी जी ने यहाँ में 30 वां अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन आयोजित करवाया। प्रख्यात कवि सूर्यकांत निराला तीन दिन तक अबोहर में स्वामी जी के पास रुके। स्वामी जी द्वारा हिंदी भाषा के प्रचार- प्रसार हेतु प्रदत अतुलनीय योगदान का सम्मान करते हुए उन्हें साहित्य वाचस्पति पदवी प्रदान की गई। वे लंबे अरसे तक हिन्दी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद के सदस्य रहे। 

सिख इतिहास का हिन्दी में प्रकाशन
उदासी सम्प्रदाय के साधु होने के नाते स्वामी जी के मन में गुरु-ऋण से उऋण होने की इच्छा बलवती थी। सिख गुरुओं के महान कार्य, उनकी सीख और सिखों के शौर्य व बलिदान की गाथाओं को हिंदी भाषी क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए सिख इतिहास को हिंदी भाषा में लिखे जाने की योजना तैयार कर स्वामी जी ने सन 1935- 36 में खालसा कॉलेज, अमृतसर में इतिहास और धर्म -शिक्षा के लेक्चरर डॉ गंडासिंह से मुलाकात की। आग्रह उनसे यह किया कि वे सिख इतिहास को हिंदी भाषा में लिखने में इतिहासकार ठाकुर देशराज को अपना सहयोग प्रदान करें। डॉ गंडासिंह ने इस मुलाकात का स्मरण इन शब्दों में किया है : 'मैं इस भगवा वेश साधु में विशेषकर दक्षिणी पंजाब के ग्रामीण दलित लोगों के उत्थान के लिए असाधारण जोश देखकर चकित सा रह गया।'

स्वामी जी के ग्यारह वर्षों के अथक प्रयास के फलस्वरूप सन 1954 में सिख इतिहास का हिंदी में लगभग एक हज़ार पृष्ठों का एक प्रामाणिक ग्रंथ प्रकाशित हो सका। इस ग्रंथ से हिंदी भाषी प्रदेशों के लोग सिख इतिहास और सिख गुरुओं की सीख से अवगत हो सके। 

समाज सुधार एवं दलितोद्धार
स्वामी जी की रेगिस्तान के ग्रामीण समाज के बारे में गहन समझ का पता उनकी पुस्तक 'मरुभूमि सेवा कार्य' से मिलता है। इस पुस्तक में उन्होंने मरुस्थलीय प्रदेश की ख़ासियतों का वर्णन करने के अतिरिक्त वहाँ की समस्याओं की पहचान कर उनके समाधान भी सुझाए हैं। स्वामी जी ने अस्पृश्यता, निरक्षरता, बालविवाह, अनमेल विवाह, नारी-उत्पीड़न, पर्दा-प्रथा, शोषण, ग़रीबी, पिछड़ापन, नशा-सेवन, नैतिक पतन आदि सामाजिक बुराइयों व रूढ़ियों के उन्मूलन हेतु जन चेतना जागृत करने का काम समर्पित भाव से किया।

सामाजिक सद्भाव और पारस्परिक समझ को पुख़्ता करने हेतु स्वामी जी सिख, बिश्नोई, नामधारी और जैन गुरुओं के सम्मान में उत्सव आयोजित करते रहते थे।
उन्होंने विश्नोई मत के प्रवर्तक गुरु जंभेश्वर, महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष बोष, मार्टिन लूथर किंग जूनियर, महात्मा मेजिनी और शेख सादी आदि की जीवनियाँ हिंदी में छपवाकर उनका जनसामान्य में वितरण किया। आधुनिक विचारों को आमजन तक पहुंचाने के लिए स्वामी जी ने 'विज्ञान के चमत्कार', 'तंबाकू के काले कारनामे', 'भले रहो, चंगे रहो', 'समाज- शिक्षा दर्पण'आदि कई पुस्तकें प्रकाशित करवा कर गांवों में वितरित करवाई।

स्वामी जी कहते थे,"मनुष्य भगवान से भी बड़ा है, उसे मत भूलो, न उसकी अवहेलना करो।" दलितोद्धार को वे वक़्त की जरूरत समझते थे। इस दिशा में कार्य करते हुए उन्होंने सन 1937 में बहावलपुर (अब पाकिस्तान में ) के चानण गांव में दलितों के लिए हरिजन पाठशाला की स्थापना की तथा उस गांव के खैरदीन मेहतर को धर्मपाल नाम देकर अपना निजी सहायक ( PA) बनाया। जात-पात के जहर पर प्रहार करते हुए स्वामी जी ने 23 दिसंबर 1946 को एक पत्र में लिखा: 'आज मनुष्य की कद्र नहीं रही। आज तो अपनी जाति का आदमी चाहिए, फिर चाहे वह कितना भी बुरा क्यों न हो, और दूसरी जाति का देवता भी उसे पसंद नहीं है।' दलितों में चेतना जागृत करने के उद्देश्य से 24 मई 1947 को संगरिया में आयोजित अखिल राजपुताना मेघवंशीय सम्मेलन की अध्यक्षता स्वामी जी ने की। बाबू जगजीवन राम ने स्वामी जी के दलितोद्धार कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा था: 'दलित और उपेक्षित लोगों के प्रति इनके मन में करुणा और सहानुभूति है।'
स्वामी जी सभी धर्मों व पंथों के अनुयायियों के श्रद्धा के पात्र थे। सन 1956 में स्वर्ण मंदिर, अमृतसर के स्वर्ण पत्रों के जीर्णोद्धार समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में उन्हें आमंत्रित कर सम्मानित किया गया।

स्वामी जी कहते थे: "मैं किसी जाति विशेष का नहीं, धर्म या समुदाय को मानने वाला नहीं। मेरा शरीर इस देश की मिट्टी से बना है। इसी में पला-पोसा और बड़ा हुआ है। हमारा रास्ता साफ है। हम मुल्क के आदमी हैं। मुल्क के लिए जियेंगे। मुल्क के लिए मरेंगे।"

घुम्मकड़ साधु
मनमौजी स्वभाव के स्वामी जी सारी उम्र एक जिज्ञासु सैलानी की भूमिका में रहे। हरिद्वार से रामेश्वर और पंजा साहब व पेशावर से प्रयाग तक सिख और हिंदुओं के सभी तीर्थ स्थलों की उन्होंने यात्रा की। विभिन्न तीर्थ- स्थानों, मंदिरों, मठों, शहरों, विश्वविद्यालयों, शिक्षा- संस्थानों, ऐतिहासिक स्थलों, संग्रहालयों, पुस्तकालयों, वनों,पर्वतों व दुर्गम इलाकों का अवलोकन कर उन्होंने देश का प्रत्यक्ष ज्ञान (फर्स्ट हैंड नॉलेज) अर्जित किया। शायद अनवरत भ्रमण ने ही स्वामी जी को जिंदगी का फ़लसफ़ा सिखाया। रूढ़िवादी सोच से मुक्त रहकर वे सत्य की खोज में तत्पर रहेते थे। उनकी विद्वता का स्रोत बोझिल शास्त्र नहीं अपितु उनका खुद का जीवन अनुभव था। 

युगप्रवर्तक 
जनसेवा की साक्षात प्रतिमूर्ति, लोकेषणा और वित्तेषणा से मुक्त रहकर स्वामी जी ने गांवों में शिक्षा का उजाला फैलाने, जनसेवा और हिन्दी के प्रचार -प्रसार के लिए की गई उनकी अनुपम सेवाओं का सम्मान करते हुए काँग्रेस पार्टी ने राजस्थान से उन्हें लगातार दो बार सन 1952 से 1958 एवं 1958 से 1964 तक संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा का सम्मानित सदस्य बनाकर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त की। स्वामी जी के जीवन के 75 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री मोहनलाल सुखाड़िया ने उन्हें 9 मार्च 1958 को श्री बनारसीदास चतुर्वेदी व ठाकुर देशराज द्वारा संपादित अभिनन्दन ग्रंथ भेंट किया। 

फ़कीरी और कबीरी का जीवन जीने वाले यह महान शिक्षा संत, समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी, कर्म योगी स्वामी केशवानन्द 13 सितंबर 1972 को 89 वर्ष की आयु में अपराह्न दो से तीन बजे के बीच दिल्ली के तालकटोरा चौराहे के फुटपाथ पर चलते-चलते बेहोश होकर गिर गए और इस दुनिया से महाप्रयाण कर गए। भारत सरकार ने उनके सम्मान में 15 अगस्त 1999 को डाक टिकट जारी किया। 

स्वामी जी द्वारा स्थापित विभिन्न संस्थाएं शिक्षा के लिए किए गए उनके शौर्यपूर्ण प्रयासों का प्रमाण प्रस्तुत कर रही हैं। सच्चा त्याग, तपस्या, कठिन परिश्रम किसे कहते हैं, इसे जानने के लिए स्वामी जी के जीवन से बेहतर कोई मिसाल मिलना मुश्किल है। इसे विडम्बना ही कहेंगे कि बीकानेर संभाग में शिक्षा का उजाला फ़ैलाने वाले इस शिक्षा-संत के नाम पर जिस विश्वविद्यालय का नामकरण होना चाहिए था, उसका नामकरण रियासत के उस महाराजा के नाम पर किया गया है, जिनका रियासत में शिक्षा-प्रसार के क्षेत्र में कोई ख़ास योगदानसे नहीं रहा है।

स्वामी जी कहते थे: "मैं कोई पूजा-पाठ नहीं करता। ईश्वर किस बला का नाम है मुझे नहीं मालूम। मैं सुबह उठते ही सोचता हूं कि मेरे सामने आज कौन-कौन से काम हैं, जिनके लिए मुझे आज ही जुटना पड़ेगा... काम करते रहने से शरीर कभी नहीं थकता। यदि मन थक जाता है तो शरीर अपने आप थक जाता है।"
''सत्यनिष्ठा, सादगी उच्च आचरण एवं निस्वार्थ समाज सेवा से ओतप्रोत उनका जीवन बेमिसाल है। साहित्य, समाज तथा ग्रामोत्थान की दिशा में स्वामी जी की सेवायें सदा स्वर्णाक्षरों में लिखी रहेंगी और वे आज के और भविष्य के समाजसेवियों के लिए प्रकाश-स्तंभ प्रमाणित होंगे।'' ( श्री प्रताप सिंह कैरों, पूर्व मुख्यमंत्री, पंजाब, के उद्गार )

राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रभाषा के नाम पर सिर्फ हंगामा खड़ा करने व शब्द-जाल गूँथने से राष्ट्रसेवा नहीं होती। इसके लिए स्वामी जी की तरह जीवन खपाना पड़ता है। सत्ता के मद में तांडव करने वालों को स्वामी जी खरी-खरी कहते थे : "पराक्रम किसी को सताने में नहीं , सताए हुओं को ऊपर उठाने में है। यदि तुम पराक्रम दिखाना चाहते हो तो यह सारी सृष्टि ही अभाव से पटी पड़ी है; इसको अपने पराक्रम से मुक्त करो। सत्ता सहयोग के लिए होती है, सताने के लिए नहीं।"

स्वामी जी ने अपने कर्मनिष्ठ जीवन एवं लोकचेतना के प्रसार सम्बन्धी कार्यों से विशाल भूभाग के जनसाधारण के दिलों में ख़ास जगह बनाई। शिक्षा, जनजागृति, समाज सुधार के क्षेत्रों में एक कर्मयोगी के रूप में तथा हिंदी के एक नैष्ठिक सेवक के रूप में उनका योगदान युगांतरकारी सिद्ध हुआ है। 'आप जो अपने पीछे छोड़ जाते हैं, वह पत्थरों के स्मारकों पर अंकित नहीं बल्कि दूसरों के जीवन की यादों में बसा होता है।' पेरिकल्स का यह कथन स्वामी जी जैसे युगप्रवर्तक के योगदान के लिए एकदम सटीक एवं सार्थक है।

वाया व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी

सहायक प्राध्यापक (हिन्दी साहित्य एवं भाषा विज्ञान)
"हिन्दी विभागाध्यक्ष"
शहीद बेलमती चौहान राजकीय महाविद्यालय पोखरी (क्वीली) टिहरी गढ़वाल
उत्तराखंड

Friday, September 13, 2019

सोशल मीडिया और हमः आलोचनात्मक अध्ययन


भारत में सूचना क्रांति का सबसे पहला नारा/स्लोगन ‘कर लो दुनिया मुट्ठी में‘ लगभग डेढ़ दशक पहले रिलायंस कम्पनी ने दिया था, जिसकी निःसन्देह ही आम आदमी तक मोबाइल का पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उस समय मोबाइल फोन हाथ में होना बड़ी बात थी। मोबाइल क्षेत्र यानि सूचना क्रांति के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति ‘धीरू भाई अंबानी‘ का कभी यह सपना था कि एक पोस्टकार्ड से भी कम कीमत की एक कॉल हो जाए। उनका यह सपना मात्र सपना न रहते हुए हकीकत बनने में देर न लगी। पहले और आज के समय में कितना परिवर्तन आ गया है। आज सभी के हाथों में मोबाइल फोन है और इंटरनेट जैसे आधुनिक तकनीक या सुविधा भी उसके पास है। अब कुछ भी उसकी पहुंच से दूर नहीं रह गया।
    इंटरनेट क्षेत्र में क्रांति के साथ अस्तित्व में ‘सोशल मीडिया‘, जो आज क ऐसा मंच बन चुका है कि जिसने आम आदमी के सपनों को पंख लगा दिये हैं। आपकी कोई भी किसी भी प्रकार की योग्यता/खूबी हो, अब वह सीमित नहीं रहेगी, सोशल मीडिया है न। कुछ तथ्यों पर नजर डाली जाए तो 639 मीलियन चीन उपभोक्ता ‘ओजोन‘ सोशल मीडिया पर हैं, 600 मीलियन उपभोक्ता ‘व्याहट्स‘ पर, 500 मीलियन ‘फेसबुक मेंसजर‘ पर, 468 मीलियन ‘वी-चेट‘ पर, 100 मीलियन ‘स्नेपचैट‘ पर और 100 मीलियन उपभोक्ता ‘वीकोंटके‘ पर सक्रिय हैं।
    विकिपीडिया के अनुसार सोशल मीडिया की परिभाशा कुछ इस प्रकार दी है, ‘‘सामाजिक मीडिया पारस्परिक संबन्ध के लिए अंतर्जाल या अन्य माध्यमों द्वारा निर्मित आभासी समूहों को संदर्भित करता है। यह व्यक्तियों और समुदायों के साझा, सहभागी बनाने का माध्यम है। इसका उपयोग सामाजिक संबन्ध के अलावा उपयोगकर्ता सामग्री के संशोधन के लिए उच्च पारस्परिक मंच बनाने के लिए मोबाइल और वेब आधारित प्रौद्योगिकियों के प्रयोग के रूप के रूप में भी देखा जा सकता है।‘‘  (ीजजचेरूध्ध्ीपण्ूपापचमकपंण्वतहध्े79ु1 से साभार) इस परिभाशा के इसके महत्व को स्पश्ट रूप से समझा जा सकता है। किस तरह आज यह माध्यम हमारे जीवन के हेतु कितना अनिवार्य अंग बन चुका है।
    सोशल मीडिया विशयक इतिहास का संक्षिप्त परिचय उल्लेखनीय है। सोशल मीडिया का जन्म लगभग 1995 में हुआ था। उस समय ूूूण्बसंेेउंजमण्बवउ नाम से वेबसाइट शुरू की गयी, जिसके माध्यम से स्कूला, कॉलेजों, कार्यक्षेत्रों और सेना के लोग एक दूसरे से जुड़ सकते थे। यह पोर्टल अब भी सक्रिय है। इसके बाद वर्श 1996 में इवसजण्बवउ नामक पोर्टल बनाया गया। इसके बाद 1997 में एशियाई-अमरीकी कम्यूनिटी हेतु एशियन एवेन्यू नाम से एक साइट शुरू की गयी। सभी जानते हैं कि सोशल मीडिया के क्षेत्र में सबसे बड़ी क्रांति फेसबुक और ट्वीटर के आने से फेसबुक का जन्म 04.02.2004 में हुआ। मार्क जकरबर्ग ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए फेसबुक बनाया। फिर धीरे-धीरे इसका विस्तार दूसरे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों तक हुआ और वर्श 2005 में अमरीकी सीमा पार कर यह विश्व के दूसरे देशों में पहंँुच गया। कुछ इसी प्रकार अन्य सोशल साइटों की कहानी है।
    शुरू में यह मीडिया मध्यवर्ग से दूर था लेकिन जब मोबाइल फोन पर इस प्रकार की आधुनिक सेवाएं मिलनी शुरू हुईं, तो यह इस वर्ग के सबसे करीब हो गयी। गत वर्श के आंकड़ों पर यदि ध्यान दें, तो मात्र भारत में लगभग 1 करोड़ एक्टिव फेसबुक का प्रयोगकर्ता हैं और भावी समय में यह लक्ष्य अनंत आंकड़े पार कर लेगा। लगभग सम्पूर्ण विश्व में सोशल मीडिया इन दिनों लोकप्रियता के चरम पर है। विशेशज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया आम जनता के लिए ऐसा माध्यम है जिसके माध्यम से वह अपने विचार पहले से ज्यादा सशक्त तरीके से रख सकते हैं। सर्वविदि है कि पिछले एक दशक में कई बड़ी खबरें सोशल मीडिया के जरिये लाइमलाइट में आयीं हैं। सोशल मीडिया आम आदमी के हाथ में एक ऐसा टूल है जिसके माध्ये से वह अपनी बात एक बड़ी आबादी तक पहुँचा सकते हैं।
    वर्तमान में नोटबंदी का समर्थन हो, भ्रश्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे का आन्दोलन हो, स्त्रियों-दलितों-पीड़ितों-पीछड़ों आदि पर अत्याचार का विरोध हो, तानाशाह गद्दाफी के विरुद्ध आम लोगों का विरोध हो इत्यादि। सभी का मुख्य केन्द्र बिंदु ‘सोशल मीडिया‘ ही रहा है। ऐसे ही कई उदाहरण हैं, जो सोशल मीडिया के जरिए आम से खास हुए। गत वर्शाें में कई आन्दोलन सोशल मीडिया द्वारा प्रारम्भ किये गये। जैस जनवरी ,2011 में फेसबुक के द्वारा ही मिस्त्र में जबरदस्त आन्दोलन किया गया। ट्यूनिशिया में भी फेसबुक के जरिय वहां की सरकार के खिलाफ आम जनता लामबंद होने लगी। हालात इतने बदल गये कि वहां की सरकार को फेसबुक और ट्वीटर जैसे सोशल मीडिया को प्रतिन्धित करना पड़ा, परन्तु इससे आन्दोलन रुका नहीं और वहां के राश्ट्रपति मुबारक को मजबूर होकर इस्तीफी देना पड़ा। उमेश कुमार राय इस सन्दर्भ में वेब पोर्टल ीजजचेरूध्ध्ेंीपजलंेंउीपजंण्वतह पर अपने लेख में लिखते हैं कि ‘‘सामाजिक कार्यकर्ता से राजनेता बने अरविंद केजरीवाल को दिल्ली के चुनाव में भारी सफलता मिली तो इसका श्रेय फेसबुक को भी जाता है। अपने देश में लोकसभा चुनाव को लेकर फेसबुक के जरिए खूब प्रचार हुआ। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कुछ माह पहले सभी मंत्रालयों और मंत्रियों को सोशल मीडिया पर आने को कहा ताकि मंत्रालय के कामकाज के बारे में लोग जान सकें और काम में भी पारदर्शिता बनी रहे। फेसबुक ने लंबे‘ अरसे से बिछड़े पिता-बेटी, भाई-बहन और दोस्तों को को मिलवाने का भी काम किया।‘‘ 
अब चाहे वो कोई व्यक्ति हो या आन्दोलन। जैसे- हॉलीवुड के मशहूर यूथ गायक ‘जस्टिन बीबर‘ जिनकों यू-ट्यूब से सफलता मिली। बिहार की नेत्रहीन लड़की थुंपा कुमारी जो व्हाट्सऐप पर अपनी मुधर आवाज से सबको मोह लेती है। सोशल मीडिया के माध्यम से ही इस बच्ची को आज देश का हर घर जानता है। सोशल मीडिया के विशेशज्ञ बालेंदु शर्मा दाधीच लिखते हैं, ‘‘हिन्दी में ब्लागिंग ने कुछ वर्ष पहले बड़ी हलचल मचाई थी। आज सोशल नेटवर्किंग के दबाव में यह मंच कुछ कमजोर जरूर पड़ा है, लेकिन इसने कितने अच्छे लेखक, पत्रकार, अनुवादक, तकनीक कार्यकर्ता, शिक्षक, प्रशिक्षक, कलाकार और एक्टिविस्ट हमें दिये हैं।‘‘    (कादम्बिनी, जून 2016, पृ0 14)
    इसमें कोई दो राय नहीं है कि सोशल मीडिया हमारी सामाजिकता-सांस्कृतिकता को काफी हद तक प्रभावित कर रही है। आज पूरे विश्व की जानकारी मात्र एक ‘टच‘ भर से मिल जाती है। साऊथ अफ्रीका के एक आदिवासी इलाके का वो बच्चा सभी को याद होगा, जिसमें एक युवती एक कुपोशित आदिवासी बच्चे को बोतन से पानी पिला रही है और आज वह बच्चा सोशल मीडिया के माध्यम से सबका प्यारा बन चुका है। और अभी हाल ही उस बच्चे जो तस्वीरें सामने आ रही है, वो बेहद चौंकाने वाली हैं। क्योंकि आज वह बच्चा पूर्ण रूप से स्वस्थ और आलीशान घर में खेलता देखा जा सकता है। जिसे हजारों-लाखों लाइक व कमंेट मिल रहे हैं। दूसरे शब्दों मंे कहिए कि ऐसे कई मुद्दों पर आज हम आम आदमी अपनी चुप्पी तोड़ रहा है, भले ही वह माध्यम सोशल मीडिया ही हो।
    कुछ नकारात्मक बातों को छोड़कर सोशल मीडिया से सबसे सशक्त स्वर महिलाओं को मिला है। यह सच है कि सोशल मीडिया ने महिलाओं समेत हाशिये के सभी लोगों को अभिव्यक्ति की ताकत प्रदान की है। निश्चि तौर पर आज सोशल मीडिया ने स्त्रियों की वैचारिकता बदल दी है। ग्रामीण हो या शहरी सभी अपनी बात बेबाकी से रख रही है। क्योंकि सोशल मीडिया पर भाशा की कोई बाध्यता नहीं है। सामाजिक कार्यकर्ता रंजना कुमारी का इस विशय में कहना है कि ‘‘सोशल मीडिया ने महिलाओं को बदला भी है। गांव-घर की महिलाएं भी यहां अपनी बात रख रही है। सबसे खूबसूरत बात यह है कि यहां भाषा की कोई बाध्यता नहीं।‘‘( कादम्बिनी, जून 2016, पृ018) 
    सरकारों की बात की जाए तो केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकारें लगभग सभी आज सोशल मीडिया पर सक्रिय है। संतुष्टिपरक तो नहीं कहा जा सकता फिर भी काफी हद तक सरकार जनता के प्रति पारदर्शिता बढ़ी है। हांलाकि इसका दूसरा पहलू यह भी है कि हमारे देश में आज भी ऐसी जनसंख्या निवास करती हैं, जिसकी पहुंच तक सोशल मीडिया अभी तक नहीं पहंुच पाया है। एक अनुमान के मुताबिक अभी अपने यहां 46 करोड़ से अधिक लोग, यानी लगभग 35 प्रतिशत आबादी ही इंटरनेट का इस्तेमाल कर रही है और उभरती आर्थिक ताकत होने के कारण भारत में यह संख्या स्वाभाविक रूप से बढ़ेगी। महाराश्ट्र के वर्तमान मुख्य मंत्री देवेन्द्र फड़नवीस सरकार और जनता के बीच सोशल मीडिया की महत्ता के विशय में का मानना है, ‘‘हमारी कोशिश होती है कि सोशल मीडिया के माध्यम से हम अपनी हर बात से लोगों को अवगत कराएं। ......सोशल मीडिया ने लोगों की दूरियां कम की हैं और दिलों की दूरियां भी अब धीरे-धीरे कम होने लगी हैं। इससे सरकार  और जनता के बीच की दूरी भी घटी है।‘‘( कादम्बिनी, जून 2016, पृ021) दूसरे शब्दों में कहें तो आज सोशल मीडिया सुशासन का फॉर्मूला भी बनता दिख रहा है। इसके माध्यम से सरकारें सीधे लोगों से जुड़ रही है और अपनी योजनाओं का प्रचार-प्रसार कर रही है। इनका मानना है कि ‘‘लेकिन दिक्कत यह है कि इस पर अभी ज्यादातर शहरी युवावर्ग ही सक्रिय है। यह जब तक गांवों तक नहीं पहुंचता, तब तक बेहतर शासन की बातें एक सीमित दायरे तक ही रहेगी।‘‘(कादम्बिनी, जून 2016, पृ022) आज आम आदमी के साथ राजनेता भी सोशल मीडिया पर हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश समेत सभी नेताओं ने सोशल मीडिया पर सक्रिय है। 
    कुछ समय तक सोशल मीडिया मात्र व्यक्तिगत अभिव्यक्ति और आभासी मित्रता का केन्द्र था। लेकिन आज यहां युवओं हेतु बड़ी बड़ी व्यावसायिक संभावनाएं भी लेकर आ रहा है। वैसे अभी इसकी उपस्थिति स्पश्ट नजर नहीं आती। समय के बीतने के साथ इसमें स्पश्टता व पारदर्शिता आएंगी। इसमें अपार व्यावसायिक संभावनाएं बढ़ेंगी। फिक्की केपीएमजी की रिपोर्ट के अनुसार ‘‘इंटरनेट और मोबाइल फोन के इस्तेमाल का तेजी से बढ़ता ग्राफ, डिजिटल मीडिया पर विज्ञापन की तेजी से बढ़ती हिस्सेदारी सामग्री के स्तर पर उपभोक्ता की सक्रियता और उसकी निर्णायक भूमिका आदि बिंदुओं को शामिल करते हुए इस नतीजे पर पहुंचती है कि तकनीकी स्तर के सुधार के बाद बाजार और मुनाफे के आंकड़े और मजबूत होंगे। इस लिहाज से जिसे हम धंुधली व्यावसायिक शक्त कर रहे हैं, आने वाले समय में उसे बिल्कुल पारदर्शी और स्पष्ट हो जाना चाहिए।‘‘ (कादम्बिनी, जून 2016, पृ025)
    सूचना क्रांति के इस युग में यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि सोशल मीडिया और जीवन आज के एक दूसरे के पूरक बन चुके हैं। सोशल मीडिया ने आज लोगों की जिंदगी में क्रांतिकारी बदलाव ला दिये हैं। साथ ही आज फेसबुक से बढ़कार संवाद बढ़ाने का कोई अन्य ऐसा माध्यम नजर नहीं आता।
    हमारे जीवन का शायद ही कोई पहलू आज सोशल मीडिया से अछूता रह गया होगा। साहित्य जगत की बात करें तो इसने साहित्यिक दुनिया को अत्यधिक प्रभावित किया है। आज कोई भी जो शब्दों के द्वारा साहित्यिक माध्यम से अपने विचार गद्य या पद्य में अभिव्यक्त करना चाहता है, वह बिना किसी विलम्ब के कर सकता है। यह आजादी बहुत महत्व रखती है। पहले साहित्य की दुनिया साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं तक ही सीमित थी जहां संपादक उसे अपनी मर्जी से स्वीकृत या अस्वीकृत कर देता था। परन्तु आज सोशल मीडिया पर युवाओं की बड़ी संख्या है, जो सीधे अपने पाठकों से रू-ब-रू हैं और हाँ! निश्चित ही यह एक ऐसा मंच तो है ही जहां लेखक स्वयं संपादक भी है। वरिश्ठ पत्रकार पीयूश पाण्डे इस बात की पुश्टि अपने इन शब्दों के साथ करते हैं, ‘‘सोशल मीडिया के जरिये आज हर शख्स के पास अपना मंच है जिसके जरिये वह कभी लेखक की भूमिका में होता है, कभी पत्रकार की। यहां न प्रकाशन की शर्तें हैं, न संपादक का सेंसर।..........फिलहाल, साहित्यिक पैमाने की चिंता से दूर आप अगर कुछ भी लिखते हैं और आपके पास मंच नहीं हैं, तो फौरन फेसबुक और ट्वीटर का दरवाजा खटखटाइए। कोई आश्चर्य नहीं सोशल मीडिया के जरिये आप अपने भीतर छिपी प्रतिभा का कोई अनूठा आयाम खोज लें।‘‘ (कादम्बिनी, जून 2016, पृ041) 
    आज के परिप्रेक्ष्य में सोशल मीडिया मतलब दोस्ती या कहिए असीमित लोगों से चैट के जरिये बात करना। दोस्ती का दायरा बढ़ चुका है। दोस्ती आम पड़ोस के घरो से निकलकर आज पास के शहरों, राज्यों और देशों तक पहुंच गयी है। बढ़ती व्यस्तताओं के चलते उन मित्रों से भी बात हो जाती है, जिनसे आमतौर पर मुलाकाल नहीं होती। शादी जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक कार्य में भी सोशल मीडिया एक सेतु का काम कर रहा है। फेसबुक की अगर बात की जाये तो उसके जन्मदाता ने भी फेसबुक की परिकल्पना करते समय यह नहीं सोचा होगा कि यह एक ऐसा प्लेटफार्म बन जाएगा, जहां हर उम्र, हर वर्ग, हर देश के लोग आपस में गुथ जाएंगें।
    भारत में सबसे ज्यादा समझने, पढ़ने, लिखने वाली एकमात्र भाशा ‘हिन्दी‘ है। सोशल मीडिया ने हिन्दी को अपने देश की सीमाओं से बाहर निकाल अन्य देशों में पहुंचाने का लाजवाब काम किया है। आज हम धडल्ले से इंटरनेट पर हिन्दी में लिख-पढ़ रहे हैं। अभी हाल के सालों से पूर्व ही हिन्दी  व अन्य भारतीय भाशाओं हेतु टाइपिंग की इतनी बेहतर व इतनी सरल सुविधा नहीं थी। आज हम कम्पयूटर हिन्दी टाइप करने के लिए टाइपिंग का पारम्परिक रूप से सीखने की जरूरत ही नहीं है। हमारे पास टाइपिंग के कई टूल/सॉफ्टवेयर मौजूद हैं। अभी फेसबुक संचालकों ने फेसबुक में हिन्दी टाइप करने के लिए एक महत्वपूर्ण टूल ‘रोमन फोनेटिक‘ देवनागरी टाइपिंग हेतु दिया है। प्रसिद्ध ब्लागर रवि रतलामी के शब्दों में ‘‘तकनीक भाषा को भी बहुत प्रभावित किया है। सोशल साइटों में इस जबरदस्त विस्तार हुआ है।‘‘ अब तो तकनीक का यह आलम है कि आप अपने स्मार्टफोन पर बोलकर भी देवनागरी में टाइप कर सकते है। इस सुविधा के लिए गुगल इनपुट तथा गुगल वाइस इनपुट टूल इंस्टाल करके हिन्दी लैंग्वेज पैक प्ले स्टोर से इंस्टाल करना होगा। तकनीकी व सोशल मीडिया शोधकताओं की माने तो इसका दायरा आने वाले समय में और भी बढ़ेगा।
    पत्रकारिता के सन्दर्भ में अगर बात करें तो पायेंगे कि सोशल मीडिया ने पत्रकारिता को एक अनोखा आयाम दिया है। हालांकि पत्र-पत्रिकाओं का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है, परन्तु सोशल मीडिया ने कहीं न कहीं पत्रकारिता के क्षेत्र को विस्तृत करते हुए उसे पंख लगा दिये हैं। किसी भी घटना की सूचना हेतु कल के अखबार का इंतजार करना नहीं पड़ता बल्कि तुरंत सोशल मीडिया के किसी न किसी माध्यम से वह हाल फिलहाल में सूचना हम तक पहंुच जाती है।
     सोशल मीडिया विशेशकर फेसबुक का सफेद पहलू सहजता से दिख जाता है, लेकिन इसका स्याह पहलू लोग देख नहीं पाते या कहिए देखना नहीं चाहतें। जिसमें आज का युवा सच में कहीं खो गया है। प्रसिद्ध युवा एंकर रवीश कुमार का मानना है कि ‘‘सोशल मीडिया ने सबसे ज्यादा हमारी सामाजिकता को प्रभावित किया है। इसके जरिये हम दूर-दराज के लोगों से तो हमेशा संपर्क में रहते हैं लेकिन अपने परिवार और आस-पड़ोस के लिए हमारे पास समय ही नहीं है। इस माध्यम ने हमें जितना जोड़ा है उतना ही अकेला भी किया है।.... अभिव्यक्तियों का संसार बदल रहा है। संसार नहीं बदल रहा है। हम वही हैं, आप भी वही हैं।‘‘ (कादम्बिनी, जून 2016, पृ016) यह समझने की बात है और जितना जल्द समझ ले अच्छा है। 
    पिछले लगभग एक दशक में विज्ञान-प्रौद्योगिकी ने हमारा पूरा जीवन बदल कर रख दिया है। अब जमाना चिट्ठी-पत्री से निकलकर अत्याधुनिक माध्यम इंटरनेट तक आ पहुंचा है। जिसका सबसे ज्यादा प्रभाव हमारी सामाजिकता और अभिव्यक्ति पर पड़ा है। फेसबुक, ट्वीटर, व्हाट्सएप और अन्य अनेक प्रकार के सोशल माध्यम हमारे मोबाइल व कम्प्यूटर का अभिन्न अंग बन चुके हैं। जहां  एक ओर उपरोक्त इन माध्यमों ने हमें अभिव्यक्ति की अनंत स्वतंत्रता दी है वही दूसरी ओर हमारी सामाजिकता को भी कमजोर करने का कार्य किया है। 
 हमारी दुनिया में सोशल मीडिया का दखल इस कदर हो चुका है कि हम अपनी वास्तविक दुनिया, रिश्तें-नातों से कहीं दूर होते जा रहे हैं, वहीं एक आभासी दुनिया के इतने करीब आ गये हैं कि सुबह आँख खुलते ही प्रभु स्मरण के बजाएं फेसबुक, वाहट्सऐप का स्मरण हो आता है। दिन की शुरूआत और अंत या यूं कहिए लगभग पूरा दिन अपने हेंडसेट से हर पल चिपके रहते हैं। निश्चय ही सोशल मीडिया के अनेक सकारात्मक पहलू है, जिसको नकार पाना संभव नहीं हैै, परन्तु वास्तव में सोशल मीडिया ने आदमी के व्यक्तिगत जीवन में इतनी खलबली मचा दी है कि कहने के लिए शब्दों को खोजना पड़ रहा है। इससे बच पाना असंभव है। मजेदार बात यह है कि इसने कब अपने अनुसार हमको चलाना शुरू कर दिया, यह हमें पता भी नहीं चला। 
सोशल मीडिया के कई पहलुओं पर गंभीर व सामायिक चर्चा अनिवार्य हो गयी है। आज की स्थितियां दिल-दिमाग के कई तंतुओं का हिला कर रख देती हैं। पारम्परिक तकनीक धैर्य का पाठ पढ़ाती है, जबकि आधुनिक तकनीक का वास्ता अधैर्य, बैचेनी व हड़बड़ी से है।
    वरिश्ठ पत्रकार ए.पी. मिश्रा कुछ ऐसा लिखते हैं कि किस प्रकार हर समयाकाल में अलग-अलग किस्म का सोशल मीडिया रहा है। भले ही आज आधुनिक युग में फेसबुक, व्हाट्सऐप, ट्वीटर, टेलीग्राम इत्यादि सूचना संप्रेशण के लोकप्रिया माध्यम बन चुके हो, परन्तु हर दौर में सूचना संप्रेशण के माध्यम मौजूद रहे हैं। सोशल मीडिया से हम कितने ही आधुनिक क्यों न हो गये हो, परन्तु व्यक्तिगत सोच तो अभी भी जस की तस है। खासकर महिलाओं के सन्दर्भ में।  
इस बात में कोई दो राय नहीं है कि सोशल मीडिया से अगर सबसे ज्यादा लाभ किसी को पहुंचा है, तो वो है बाजार। दूसरा सोशल मीडिया ने जीवन का सरल बनाने की अपेक्षा उलझा दिया है। तीसरा सोशल मीडिया आज जरूरत से कही आगे मजबूरी सा बन चुका है। अतिश्योक्ति नहीं है कि हमने सोशल मीडिया के माध्यम से आसमान तो छू लिया है, परन्तु अपनी जमीन छोड़ चुके हैं। असीमित दोस्त तो बन चुके हैं, परन्तु अपने ही घर के लोगों का पता नहीं। समाजिक घटनाओं को लाइक/कमंेट तो खूब मिलते है, परन्तु जब व्यक्तिगत कदम उठाने की बात आती है तो वहां अपने पैर पीछे खीच लेते हैं। 
    सोशल मीडिया ने दोस्ती का दायरा तो बढ़ाया है पर एकाकीपन के सा। भले ही आने वाले समय में सोशल मीडिया का दायरा और भी बढ़ेगा, लेकिन इस बात का भी ख्याल रहे कि हमारा सामाजिक-नैतिक-पारिवारिक दायरा भी कम न हो।
..........धन्यवाद। 


सहायक प्राध्यापक (हिन्दी साहित्य एवं भाषा विज्ञान)
"हिन्दी विभागाध्यक्ष"
शहीद बेलमती चौहान राजकीय महाविद्यालय पोखरी (क्वीली) टिहरी गढ़वाल
उत्तराखंड

Thursday, September 12, 2019

अथ: श्री किन्नर कथा भाग 2


किन्नर कथा भाग 2 के लिखने की प्रेरणा बनी बलिया की ट्रांसजेंडर 'किन्नर सिंह'। अपने शोध के दौरान इनसे मुलाकात हुई। स्वभाव से चुलबुली, हँसमुख, समझदार, जीवन मे कुछ कर गुजरने की इच्छा रखने वाली, भावुक, तमाम दुखों के चलते हमेशा हँसती रहने वाली और इनका सबसे प्रभावित करने वाली बात इनके 'किन्नर' होने के बाद भी आम आदमी से कही ज़्यादा आम समाज की समझ रखने वाली, उनके साथ घटित समस्याओं के प्रति संवेननशील, कुछ ऐसा सा है सिमरन सिंह जी का व्यक्तित्त्व।  हमेशा ऊर्जा से भरे रहने और जीवन में कभी न रुकना, न हार मानना और सदैव चलते रहने की प्रेरणा से भरपूर है इनका जीवन।
खैर यह बात तो 'तीसरी ताली' ब्लॉग के माध्यम से जारी रहेगी ही। हम बात कर रहे थे सिमरन सिंह की।
इन्होंने अपना घर छोड़ा और चल पड़ी अपनी नई दुनिया में, जो इनके जैसों के लिए ही थी। परंतु महाराष्ट्र में यह अपनी पहली गुरु (नाम लिखना उचित नहीं) से जब मिली, तो इन्हें उनसे बहुत कटु अनुभव हुए, किस प्रकार इन्हें ट्रेनों में भीख मांगना सीखाया और ऐसा करने भी इन्हें मजबूर किया जाता था और न करने पर तरह तरह की यातनाएं दी जाती थीं। इन्होंने बताया कि उनकी उस गुरु ने किस प्रकार इनका मानसिक, शारीरिक और आर्थिक शोषण किया, जिससे तंग आकर इन्होंने उस गुरु का घर छोड़ दिया।


LGBT समुदाय से जुड़े सभी के लिए अपनी सामान्य पहचान से अलग पर एक सामान्य पहचान बनाने के लिए कितना कठिन होता है, यह तभी जान सकते हैं जब इनके करीब आकर इन्हें जानने-समझने की कोशिश करें। हमें तो अपनी ही फुर्सत नहीं होती फिर इनके बारे में तो सोच ही पहुंच कहाँ पाती। इनके नाचने-गाने, बधाई या भीख मांगने से हटकर कभी इनको यह आम-सभ्य समाज देखता भी नहीं और देखना भी नहीं चाहता। इनके व्यक्तिगत या सामाजिक जीवन से हमें कोई सरोकार नहीं। वैसे भी हम अपने से भीतर कभी निकल पाएं तो ही तो इन तक पहुंचे।  कभी हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि इनको एक आम व्यक्ति की तरह अपनी पहचान बनाने हेतु कितना संघर्ष करना पड़ता है, इस तथाकथित सभ्य समाज मे जानवरों के जैसे इन्हें ट्रीट किया जाता है। इनका सुख, दुख-तकलीफ सिर्फ इनकी ही हैं और इन तक ही सीमित हैं। इनका जन्म 06.06.1986 को राजनगर, मधुबनी जिला बिहार में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। इनके पिता मुंबई की एक फार्मसूटेकल कम्पनी में बतौर मशीन ऑपरेटर काम करते थे। सिमरन अपने परिवार में 2 बहने और 3 भाई थे।  बचपन में सभी आम बच्चों के जैसे इनको भी माँ-बाप, भाई-बहन का प्यार मिला। पर जल्द ही यह प्यार तिरस्कार, नफरत और मारपीट में बदल गया।

फिलहाल सिमरन बलिया उत्तर प्रदेश ने रहती हैं। अनस किराये के मकान में अकेली रहती हैं औऱ 'बधाई' से अपना जीवन-यापन कर रही हैं।

Monday, September 9, 2019

राष्ट्रभाषा हिन्दी का विकास और भारतेन्दु हरिश्चंद्र


    हिन्दी का आरम्भ तभी से माना जा सकता है, जब से 1000 ईस्वी के लगभग भारतीय आर्य भाषाओं का जन्म हुआ। शुद्ध खड़ी बोली के पुराने अवशेष शरफुद्दीन, अमीर खुसरों और बंदा नवाज़ गैलूदराज़ की रचनाओं में मिलते हैं। आधुनिक खड़ी बोली अर्थात् हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी का विकास क्रम सन् 1799 में फोर्ट विलियम कॉलेज, कलकत्ता की स्थापना से होता है। इसके आचार्य जॉन गिलक्रिस्ट ने भारतीय भाषाओं का गहनतम् अध्ययन किया। इन्होंने अपने चार सहयोगियों इंशा अल्लाह खाँ, लल्लूलाल, सदलमिश्र और सदासुखलाल के साथ मिलकर अनेक पुस्तकों के अनुवाद व मौलिक रचनाएं प्रकाशित करायी गयी। इसमें कोई दो राय नहीं है कि फोर्ट विलियम कॉलेज के इन चारों लेखकों ने खड़ी बोली यानि हिन्दी के साहित्यिक क्षेत्र का विस्तार किया। परन्तु भाषा का कोई व्यावहारिक व मानक रूप उपस्थित नहीं कर सके। इसके बाद 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में राजा लक्ष्मण सिंह ने स्वतंत्र शैली निर्माण किया। राजा लक्ष्मण सिंह का उद्देश्य था, विशुद्ध हिन्दी, जिसमें उर्दूपन बिल्कुल भी न हो। अपने शकुन्तला व मेघदूत नाटकों के हिन्दी अनुवाद में उन्होंने ऐसी ही शैली का प्रयोग किया। जिसे बाद में स्वामी दयानंद सरस्वती, पं0 भीमसेन शर्मा, अम्बिका दत्त व्यास आदि अनेक प्रमुख साहित्यकारों ने परिष्कृत तथा परिनिष्ठित किया। उस समय खड़ी बोली के बढ़ते प्रयोग को देखकर ईसाई मिशनरियों ने भी अपना धर्मप्रचार का सरल खड़ी बोली को अपना माध्यम बनाय। उन्होंने धर्म-समाज सुधार संबंधी कई छोटी-बड़ी पुस्तकें छपवाकर लोगों में वितरित की। सन् 1826 में में ‘धर्म पुस्तक‘ नाम से ओल्ड टेस्टामेंट का खड़ी बोली में अनुवाद प्रकाशित किया। अनुवाद होने के कारण मिशनरियों ने अंग्रेजी पुस्तकों में प्राप्त विराम-चिह्नों को अपनाकर नया प्रयोग किया जो समय के साथ-साथ बढ़ता गया।
    खड़ी बोली को उसके वर्तमान व्यवहारिक रूप ‘हिन्दी‘ में लाने का अद्वितीय कार्य भारतेन्दु हरिश्चंद्र द्वारा ‘हरिश्चन्द्र मैंगजीन‘ के प्रकाशन के साथ किया।
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।

सन 1877 ई. में भारतेन्दु ने ‘हिन्दी की उन्नति पर व्याख्यान’ शीर्षक से ये लम्बी कविता लिखी थी, वास्तव में यह कविता न होकर एक काव्यात्मक व्याख्यान था, जिसे जून 1977 में उन्होंने हिन्दीवर्द्धिनी सभा में पढ़ा था। इस कविता रूपी व्याख्यान के माध्यम से उन्होंने हिन्दी के प्रचार और प्रसार की आवष्यकता पर बल देते हुए हिन्दी को हेय दृष्टि से देखने वालों की अच्छी खबर ली थी, जो आज भी तथाकथित अंग्रेज़दानों के चरित्र पर सटीक बैठती है। हिन्दी साहित्य को भारतेन्दु की देन भाषा व साहित्य दोनों की क्षेत्रों में समान है। भाषा के क्षेत्र में उन्होंने खड़ी बोली के उस रूप को प्रतिष्ठित किया, जो उर्दू से भिन्न है और हिन्दी क्षेत्र की बोलियों का रस लेकर संवर्धित हुआ है। यद्यपि इन्हांेने विभिन्न भाषाओं में साहित्य लिखा, किन्तु ब्रजभाष पर इनका असाधारण अधिकार था। भारतेन्दु के समायाकाल में देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था और अंग्रेजी शासन में अंग्रेजी भाषा अपने चरमात्कर्ष पर थी। राजकाज के सभी कार्य अंग्रेजी में किये जाते थे। भारतीयों में विदेशी भाषा और सभ्यता के प्रति आकर्षण बढ़ता जा रहा था। उस समय अंग्रेजी पढ़ना और पढ़ाना लोग गर्व की बात समझते थें। हिन्दी के प्र्रति मोह समाप्त होने लगा था, क्योंकि अंग्रेजी की नीति से हमारे साहित्य पर बुरा असर पड़ रहा था। हम मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार की गुलामी जीने को विवश थें। भारतीय संस्कृति नष्ट होने की कगार पर खड़ी थी। ऐसे विकट काल में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का अर्विभाव हुआ। सबसे पहले उन्होंने समाज और देश की दशा पर गंभीर विचार करते हुए अपनी कलम के जरिए अंग्रेजी राज का पर्दाफ़ाश किया। अपनी 35 वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने लगभग 37-38 कविता, नाटक, निबंध, व्याख्यान आदि विधाओं में साहित्य सृजन किया। जिनमें मौलिक होने के साथ अनुदित कृतियां भी थीं। जिनमें प्रमुख रचनाएं भक्तसर्वस्व, प्रेममालिका, प्रेममाधुरी, प्रेम-प्रलाप, प्रेम फुलवारी, फुलों का गुच्छा, वैदिक हिंसा हिंसा न भवति, भारत दुर्दशा, अंधेरी नगरी, सत्य हरिश्चंद्र, मुद्रा राक्षस आदि हैं। उनका उपन्यास ‘पूर्ण प्रकाष‘ और ‘चन्द्रप्रभा‘ मराठी उपन्यासों का खड़ी बोली में अनुवाद है। वर्तमान राष्ट्रभाषा हिन्दी के विकास में उनका वास्तविक योगदान हरिश्चन्द्र मैगजीन, हरिश्चन्द्र चन्द्रिका और बालाबोधनी पत्रिकाओं में प्रकाशित निबंधों में स्पष्टतः मिलता है। इतनी कम आयु में भारतेंदु ने मात्रा व गुणवत्ता की दृष्टि से इतना साहित्य रचा कि उनका सम्पूर्ण रचनाकर्म भावी पीढ़ियों का पथप्रदर्शक बन गया। भारतेन्दु ने राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द की अरबी-फारसी  प्रधान हिन्दी और राजा लक्ष्मण प्रसाद की संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के बीच का मार्ग निकाला। यानि भाषा में न ज्यादा पंडितपन हो और न ही मौलवी शैली की कठिनता। उन्होंने इन भाषाओं के उन्हीं शब्दों को ग्रहण किया जिनसे भाषा का हिन्दीपन बना रहे। उन्होंने खड़ी बोली यानि हिन्दी को कठिन प्रयोगों से हमेशा मुक्त रखा। इनसे पूर्व की जो हिन्दी है उसमें ऐसा माधुर्य प्रायः देखने को नहीं मिलता है।
हिन्दी के प्रमुख प्रचारक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ही हैं। उस समय भाषागत् इतनी विविधताओं के होते हुए भी एक समन्वित मार्ग निश्चित करना भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का ही कार्य था। सामान्य रूप से उनकी भाषा अपने उद्देश्य के अनुकूल रही और परिमार्जित होगर आधुनिकता की ओर बढ़ती रही। जो आज हमारे समक्ष हिन्दी के रूप उपस्थित है जिसे आज हम गर्व से राष्ट्रभाषा कहते हैं। विख्यात आलोचक व साहित्यकार डॉ. रामचन्द्र शुक्ल भारतेन्दु के विषय में लिखते हैं- ‘‘जब भारतेन्दु अपनी मंजी हुई परिष्कृत भाषा सामने लाए तो हिन्दी बोलने वाली जनता को गद्य के लिए खड़ी बोली का प्राकृत साहित्यिक रूप मिल गया और भाषा के स्वरूप का प्रश्न न रहा गया। भाषा का स्वरूप स्थिर हो गया।‘‘ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र निःसन्देह खड़ी बोली की उन्नति के लिए बहुत सक्रिय रहें और उन्होंने अपने रचनाक्रम द्वारा साहित्य को समृद्ध करने का भरसक प्रयत्न किया। उनका पूरा प्रयास रहता था कि नवीन साहित्यिक सृजन करके हिन्दी भाषा का प्रचार और प्रसार किया जाए। यह भी सच है कि वे अपने मन्तव्य को पूरी तरह धरातल पर नहीं उतार सकें। इसका कारण था उनका अल्पायु में ही दिवंगत हो जाना। उनकी साहित्यिक उपलब्धियों से प्रभावित होकर काषी की जनता तथा साहित्यिक लोगों ने उन्हें ‘भारतेन्दु‘ की संज्ञा से विभूषित किया।
14 सितंबर 1949 को हिंदी को संवैधानिक रूप से राजभाषा का दर्जा दिया गया। भले ही राजनैतिक या संवैधानिक कारणों से लोग इसे राजभाषा कहें, लेकिन हिन्दी भारतीयों के दिलों में रहने वाली व्यावहारिक धरातल पर राष्ट्रभाषा ही है। आज पूरे देश में बोली व समझे जाने वाली एकमात्र भाषा हिन्दी ही है। हिन्दी की इसी सर्वव्यापकता के आधार पर वह राष्ट्रभाषा है। अपनी राष्ट्रभाषा के विकास व प्रसार के लिए आवश्यक है कि हम अपने अन्य राज्यों-प्रांतो की भाषाएं सीखें, उनके साहित्य को पढ़े। भारत की अन्य भाषाओं की शब्दावलियों को आत्मसात् करें। हांलाकि संविधान के अनुच्छेद 351 में राजभाषा हिन्दी के विकास, प्रसार-प्रचार के विशेष प्रावधान किये गये हैं। परन्तु हिन्दी के विकास के लिए हमें व्यक्तिगत स्तर से भी प्रयास करने होंगे। हम सोचते हैं कि यदि बच्चों को इंग्लिश मीडियम में नहीं पढ़ाएंगे तो उनका भविष्य खराब हो जाएगा। बल्कि आजकल अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम में पढ़ाना माता-पिता के लिए प्रतिष्ठा का सवाल हो गया है। बच्चे का पहला विद्यालय उसका घर और पहले शिक्षक मां-बाप ही होते हैं। बचपन से ही हम बच्चों को अंग्रेजी की ओर अग्रसर करने पर तुले रहते हैं। अबोध बच्चों को सामान्य बातों-चीजों से संबंधित ज्ञान हम अंग्रेजी शब्दों में कराते हैं। जबकि हमारा हिन्दी शब्दकोश भरा-पूरा है। यहंा तक कि हिन्दी ही एकमात्र ऐसी भाषा है जिसमें विश्व की अनेक भाषाओं के शब्दों को अपने में समाहित कर लिया है। आज अंग्रेजी न जानना पिछड़ेपन व गवारूपन समझा जाता है। यह भी विरोधाभास ही है कि एक ओर तो हम हिन्दी को अपनी मातृभाषा व राष्ट्रभाषा मानते हैं और दूसरी ओर अंग्रेजी को जरूरत से ज्यादा महत्व देते हैं। शहर हो या गांव आप जगह-जगह यह इश्तहार चिपक हुए मिल जाएंगे कि ‘नब्बे दिनों में अंग्रेजी बोलना सीखे‘। यह बात ठीक है कि अंग्रेजी आज अंतर्राष्ट्रीय भाषा बन चुकी है और उस पर अधिकार रखना हमारे हित में है। अंग्रेजी भी हिन्दी के जैसे एक भाषा ही है हमें उसका सम्मान करना चाहिए, परन्तु जिस तरह से अंग्रेजी ज्यादा प्रयोग में लाने से हमारी सभ्यता-संस्कृति का ह्यस हो रहा है, वह किसी से नहीं छिपा है। आज अंग्रेजी में उच्च व मध्यम वर्ग के जो बच्चे शिक्षा ले रहे हैं, वे निश्चय ही अपनी परम्परागत संस्कृति से कोसो दूर हो चुके हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि हिन्दी भाषा एक ऐसा सशक्त माध्यम है, जो पूरे देश को एक कड़ी में पिरोता है। यदि यह कमजोर होती है, तो जाहिर सी बात है देश भी कमजोर हो जाएगा। इसके विकास के प्रयास हमें निरंतर करते रहना चाहिए। वर्तमान समय के सन्दर्भ में यह भी कहना समीचीन होगा कि आज जो लोग प्रत्येक हिन्दी दिवस पर हिन्दी का रोना रोते हैं, वह भी ठीक नहीं है। क्योंकि आज हिन्दी ने विश्वपटल पर अपना सम्मानित स्थान पा लिया है। सोशल साइट्स फेसबुक, ट्वीटर, ब्लॉग या वाहट्सएव के माध्यम हिन्दी फल-फूल रही है। अन्य देशों जैसे जापान, चीन, ब्रिटेन आदि विकसित देशों में हिन्दी पढ़ी और पढ़ाई जा रही है। परन्तु इतने से ही संतुष्ट होने वाली बात नहीं है क्योंकि अभी भी हिन्दी अपने ही देश में राष्ट्रभाषा बनने हेतु संघर्षरत है। हिन्दी को अपने गंतव्य पर पहुंचे इसके लिए लगातार हमें सद्प्रयास करना होगा। हम हिन्दुस्तानी है तो हमार यह नैतिक जिम्मेदारी भी बनती है कि हम हिन्दी के लिए धरातल पर सार्थक प्रयास करें। प्रत्येक वर्ष हिन्दी दिवस, सप्ताह या पखवाड़ा मनाते हुए यह बात सदैव हमारे स्मरण में रहनी चाहिए। सिर्फ गाल बजाने से कुछ नहीं होगा। कम से कम वो लोग जो हिन्दी के कारण वेतन पा रहे हैं, वे हिन्दी हेतु गंभीरता से कोई रचनात्मक कार्य करें। वर्तमान में साधारण रूप से हिन्दी वर्तनी में जो दोष आ रहे हैं, निश्चय ही हिन्दी के विकास में मुख्य बाधक कारण है। इसके निराकरण हेतु विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों में कम से कम स्नातक स्तर पर सामान्य हिन्दी को अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। ऐसा ही सराहनीय प्रयास हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखण्ड द्वारा किया गया है। सत्र 2015-16 से सामान्य हिन्दी को बी.ए.-बी.कॉम. के प्रथम व द्वितीय सेमेस्टर में अनिवार्य रूप से पढ़ाया जा रहा है। ऐसे ही प्रयास हिन्दी के विकास व प्रचार-प्रसार में कारगार साबित होंगे।

डॉ. राम भरोसे
असि. प्रोफेसर (हिन्दी-विभाग)
राजकीय महाविद्यालय पोखरी (क्वीली) टिहरी-गढ़वाल
$919045602061,
                                                                                                       कतण्तंउइींतवेम2012/तमकपििउंपसण्बवउ

Friday, September 6, 2019

रिव्यू: मोटिवेशनल स्टोरी है 'छिछोरे'


कलाकार: श्रद्धा कपूर, सुशांत सिंह राजपूत, वरुण शर्मा, ताहिर भसीन, तुषार पांडे, प्रतीक बब्बर, सहर्ष शुक्ला, नवीन पोलिशेट्टी, शिशिर शर्मा आदि।
निर्देशक: नितेश तिवारी
निर्माता: फॉक्स स्टार स्टूडियोज, साजिद नाडियाडवाला

सफलता मिलने के बाद का प्लान सभी सोचते हैं, लेकिन फेल होने के बाद क्या करना है ये कोई नहीं बताता। ये डायलॉग है 'छिछोरे' फ़िल्म का। वाकई हमारे असल जीवन में भी कुछ ऐसा ही हर किसी के साथ होता देखा जा सकता है। 

 हिंदी सिनेमा में खेल और मोटिवेशनल स्टोरीज पर आधारित कई फिल्म बनी हैं। इसमें वर्तमान में साजिद नाडियाडवाला ऐसे निर्माता, निर्देशक हैं जिन्होंर ढेरों फिल्में बनाई हैं लेकिन 'छिछोरे' उन सबमें हटकर है। 'दंगल' के बाद बतौर निर्देशक नितेश तिवारी की ये अगली फिल्म है। दंगल ने कमाई के मामले में विश्व रिकॉर्ड बनाया था। लेकिन छिछोरे से ऐसी कोई उम्मीद रखना हानिकारक है।

 नितेश तिवारी की खासियत है कि वे अपनी कहानियां खुद गढ़ते हैं। और बाकी के लोग उसमें खाद पानी डालते हैं नितेश का सिनेमा कहानियों में एक आम इंसान की भावनाएं लेकर आता है। '
 फ़िल्म की कहानी श्रद्धा कपूर और सुशांत राजपूत पर ज्यादा टिकी हुई नजर आती है। सनद रहे कहानी में झोल दो चार और भी हैं। कहानी है अन्नी, माया, सेक्सा, डेरेक, एसिड, मम्मी, वेबड़ा और रैगी की। इन मुख्य किरदारों के अलावा और भी किरदार हैं जो कहानी में रंग भरने आते हैं। कॉलेज लाइफ की कहानी है तो कॉलेज में जूनियर्स और सीनियर्स का गैंग भी फ़िल्म में है। कॉलेज के हॉस्टलों में  होने वाली मस्तियाँ , लड़ाईयां आदि सबकुछ इस फ़िल्म में नजर आता है। फ़िल्म में एच 4 हॉस्टल लूजर्स का है तो वहीं एच 3 विनर का। कारण ये कॉलेज में होने वाले खेल में हमेशा आगे रहते दो हॉस्टल एक दूसरे के आमने सामने हैं खेल के मैदान में। ये कहानी चलती है फ़िल्म की पूर्व  दीप्ती में यानी के अतीत की। और वर्तमान में ये सारे दोस्त मिले हैं अन्नी यानी अनिरुद्ध पाठक (सुशांत राजपूत) के बेटे की जान बचाने के लिए। इम्तिहान में नाकाम रहने का दबाव न झेल कर अन्नी का बेटा अपने दोस्त के कमरे की बालकनी से कूद कर सुसाइड का प्रयास करता है।




नितेश तिवारी निर्देशित 'थ्री ईडियट्स' की कहानी में भी इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र के पंखे से कूद जाने का किस्सा था तो यहाँ आईआईटी की प्रवेश परीक्षा पास न कर पाया बच्चा छत से छलांग लगा देता है। इस मायने में नितेश तिवारी चूके हैं। नितेश के निर्देशन की दूसरी दिक्कत यहां है अपने कौशल का अतिरिक्त प्रदर्शन। अस्पताल की घटनाओं और हॉस्टल की घटनाओं को वह मानवीय संवेदनाओं से जोड़ने की कोशिश करते हैं और यह फिल्म के कथ्य में कई बार खटकती हैं।

नितेश ने इस फ़िल्म की कास्टिंग भी सटीक की है। इसके लिए कास्टिंग निर्देशक मुकेश छाबड़ा ज्यादा तारीफ के हकदार हैं। इस  फिल्म में कोई एक हीरो नहीं है। सुशांत का किरदार सिर्फ कहानी का आधार है। जबकि श्रद्धा कपूर और बाकी कलाकार सुई की घड़ी की तरह सहयोगी हैं। वरुण शर्मा का किरदार हो या फिर मम्मी के नाम से पुकारे जाने वाले तुषार पांडे, दोनों की अदाकारी फिल्म की जान है। सहर्ष शुक्ला बेवड़ा के किरदार में प्रभावित करते हैं तो डेरेक बने ताहिर भसीन का काम भी लाजवाब लगता है।

बावजूद इन मसालों के फ़िल्म थोड़ी और चुस्त दुरुस्त हो सकती थी। फ़िल्म में मात्र एक गाना 'खैरियत' ही जुबां और दिल में चढ़ता है। बाकी फ़िल्म हंसते हँसाते कब मोटिवेशनल सन्देश देकर चली जाती है पता ही नहीं चलता। संगीत के मामले में अरसे से कुछ नया नहीं बना पा रहे हैं। फिल्म के टाइटल से लगता है कोई छिछोरा होगा लेकिन जितने भी  किरदार हैं, उनमें से कोई भी ऐसा नहीं जिसे छिछोरा कहा जा सके। वरुण शर्मा इस फ़िल्म में भी फुकरे के चूचा ही नजर आते हैं।

तिवारी का डायरेक्शन उम्दा है। और वे कहानी में उत्सुकता भी बनाए रखते हैं। बावजूद इसके फिल्म थोड़ी सी खिंच ज़रूर गई है। इसे कैंची लगाकर छोटी की जा सकती थी।  एक और बात, जब तमाम दोस्त बूढ़े दिखाए जाते हैं तो उनका मेकअप नकली सा लगता है।
Review by tejas poonia
अपनी रेटिंग - 2.5 स्टार

Tuesday, September 3, 2019

मिलिए एक असली भारत से


सबसे पहले आप अपने बारे में तथा अपनी संस्था के बारे में बताएँ आपने अब तक जो काम किए हैं उनका वर्णन करें।

मेरा जन्म पटना में हुआ है। यही मेरी जन्मभूमि और यही मेरी कर्मभूमि रही है अब तक। स्कूली शिक्षा दीक्षा के बाद मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग में प्रवेश लिया किंतु परिवार की माली हालत अच्छी न होने के कारण पटना वापस आ गया। क्योंकि दिल्ली एक महंगा शहर है इस लिए मैं यहां के खर्च अफोर्डे नही कर पा रहा था। पटना आने के बाद पटना विश्वविद्यालय से स्नातक और स्नातकोत्तर समाजशास्त्र में किया। इसी दौरान यहाँ कई दिव्यांग और किन्नर छात्र मिले। जिनकी स्थिति बहुत भयावह थी। लोग उनका मजाक बनाते थे। उनकी आर्थिक स्थितियाँ भी अच्छी नहीं थी। तो मुझे समाज शास्त्र पढ़ते हुए एहसास हुआ कि इनके साथ जुड़कर इन्हें मुख्य धारा में लाने की जरूरत है। इसलिए वहीं से जमीनी स्तर पर काम शुरू किया। और उन लोगों को छात्रवृत्ति दिलवाना उन लोगों के अधिकारों। के लिए लड़ना। उनके पास, ई रिक्शा आदि अभी को लेकर हमने लड़ाइयां लड़ी। छात्र संघ में उनके द्वारा वोट न देना। वोट का मताधिकार उन्हें दिलवाना आदि सभी में प्रशासन से नोक झोंक किया। इसके बाद स्नातकोत्तर पूरा करते ही किन्नर अधिकार मंच की स्थापना की। उसके बाद से लगातार हम उनके लिए काम कर रहे हैं। 

किन्नर अधिकार मंच कितने सालों से कार्यरत है? और यह संगठन किस तरह से कार्यरत है?  

ये अधिकार मंच पिछले चार सालों से कार्यरत है। और इसमें उनके अधिकार , सम्मान के लिए, जीने के अधिकार आदि तक के सभी मुद्दों को हमने उठाया। कोई भी छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा मुद्दा हमने नहीं छोड़ा। उनके लिए जो बीड़ा उठाया वह आज पूरे पटना में अपना नाम बना रहा है। दिव्यागों और किन्नरों के लिए पिछले 3 साल से होली मिलन समारोह भी हम आयोजित कर रहे हैं। जो बिहार के इतिहास में पहली बार है। इसके लिए हमें कहीं से भी किसी भी प्रकार का आर्थिक सहयोग नहीं मिलता है। केवल क्राउड फंडिंग से हम यह सब कर या रहे हैं। दिव्यागों को ट्राय साइकिल, ई रिक्शा दिलवाने में भी हमने काम किया है। किन्नरों के लिए भी वही उनके स्वास्थ्य और काम दिलवाने , उनकी जॉब्स के लिए लड़ना भी हमने जरूरी समझा और इस क्षेत्र में काम किया। स्वास्थ्य को लेकर डॉक्टर्स  के साथ मिलकर कैम्प लगाने जैसे काम भी किए। उन्हें सेफ सेक्स के लिए जागरूक करना आदि सभी काम हमने किए हैं। किन्नर या तो भीख मांगते देखे जाते हैं या फिर सेक्स वर्क करते हुए। और उनके ये काम समाज में सम्मानित नही है। उनके लिए यह स्वास्थ्य का खतरा और समाजिक सुरक्षा के लिहाज से भी ठीक नही है। 

आपने किन्नर अधिकार मंच के माध्यम से किन्नरों के रोजगारके लिए क्या कदम उठाए हैं? 

हां हमने अभी तक तीन किन्नरों को एनजी ओ में रोजगार उपलब्ध करवाया है। लेकिन हमारी लड़ाई निरन्तर जारी है। ये एन जी ओ हैंड वॉश नाम से शोध का कार्य करता है। लेकिन वहाँ रिक्तियां होने के बाद भी उनके बायोडाटा ले लिए गए किंतु बावजूद इसके जब उन्हें मालूम हुआ कि ये लोग किन्नर हैं तो उनके बायोडाटा फाड़ कर उन्हें वहाँ से भगा दिया गया। जबकि वे स्नातक और स्नातकोत्तर किए हुए थे। जब किन्नर इस बात से आहत होकर हमारे पास आए तो हमने आंदोलन किया। हमने इनके लिए डॉक्यूमेंट्री भी बनाई। हमने एन जी ओ की शिकायत के लिए भी उन्हें सचेत किया। बिहार के माननीय मुख्यमंत्री को ज्ञापन भी सौंपा क्योंकि जब सुप्रीम कोर्ट किन्नरों को मान्यता दे चुका है तो उनके साथ ये अन्याय क्यों? चूंकि एक एन जी ओ होने के नाते उन्होंने गैर कानूनी काम किया और मानवीय अधिकारों का उल्लंघन भी किया था। पॉपुलेशन इंडिया नाम से एक संस्था है वहाँ के स्टेट कोर्डिनेटर ने हमें दिलासा दी और कहा कि आपका एक प्रतिनिधि मंडल हमसे मिले तो उनके माध्यम से ही उन्होंने उन किन्नरों को रखा। इसके बाद उन्हें काम मिला। हम सोशल मीडिया के माध्यम से भी लगातार उनके मानव अधिकारों के लिए पोस्ट करते हैं, लिखते हैं। हमने ट्रांसजेंडर मॉडल मैगजीन भी हमने फेसबुक पर बनाया। जिसके माध्यम से कई अखबारों तक हमारी आवाज पहुँची है। ट्रांसजेंडर के जो भी नेशनल, इंटरनेशनल रोल मॉडल हैं उन सभी को हम उस पत्रिका में स्थान देते हैं बिना किसी वित्तीय सहायता के। महाराष्ट्र की एक किन्नर हैं अमृता सोनी और एक दिव्यांग हैं दिलीप कुमारी उन्हें हमने वडा पाव और पकौड़े का दुकान भी हमने एक कॉम्प्लेक्स में उन्हें उपलब्ध करवाया। जिससे वे रोजगार कर सकें। 

दवाई बैंक क्या है? इसमें आप किस तरह से काम कर रहे हैं? 

जी हमने एक दवाई बैंक की भी स्थापना की है। जहाँ हम फ्री में दवाई देते हैं लोगों से इकठ्ठा करते हैं। खास बात इसमें ये है कि इसमें सभी दिव्यांग हैं। वे लोग अपने ट्राय साइकिल से स्लम एरिया में जाते हैं और जरूरत कि दवाईयां वितरित करते हैं। इसमें उन लोगों को पहले डॉक्टरों को भी दिखाया जाता है उसके बाद दवाईयां वितरित की जाती हैं। इसके अलावा फीडिंग इंडिया नाम की संस्था से हम जुड़े हैं जिसके माध्यम से स्लम एरिया में खाद्य पदार्थों का वितरण किया जाता है। सर्दियों में गर्म कपड़े आदि का भी वितरण हम करते हैं। ये सब के लिए हमें आर्थिक सहयोग क्राउड फंडिंग या सोशल मीडिया से की गई अपील से ही मिलता है। इसके अलावा बुद्धिजीवी, सोशल एक्टिविस्ट, बिजनेस मैन लोग आगे आकर स्वयं सहायता करते हैं। किसी खाद्य सामग्री दी तो किसी ने दवाईयां तो कोई आर्थिक सहायता भी दे देता है। उनके लिए हम सेमिनार भी करते हैं। किसी दिव्यांग का जन्मदिन बनाना हो तो उसमें भी हम जितना बन पड़ता है अपने संगठन की ओर से उनका जन्मदिन मनाते हैं। 

इन सबकी आपको प्रेरणा कहाँ से मिली कि समाज के एक तबके के लिए ये सब किया जाना चाहिए? 


दरअसल हमारे परिवार में मेरे दादा जी हों या चाचा आदि हों ये सारे लोग सामाजिक क्षेत्रों से जुड़े हुए हैं। ये उनका शुरुआत से ही रहा है कि किसी भी तरह का सहयोग उन लोगों के लिए बन पड़े तो वे करते हैं। बस यहीं से मुझे प्रेरणा मिली इसके अलावा समाज में जब मैं घुमा और समाजशास्त्र की पढ़ाई की तो मैंने पाया कि हमारे समाज में ये दो वर्ग ऐसे हैं जिनके लिए कुछ किया जाना चाहिए। इनको मुख्यधारा में लाने के लिए प्रयत्न करना जीवन का ध्येय रहा। पटना विश्वविद्यालय में एक नेत्रहीन या कहें दिव्यांग छात्रावास है तो वहाँ देखा की उनकी स्थिति बहुत भयावह थी। उनके पैरों में घाव है या उनके पास दवा नही है  तो यहीं के एक फिजिशियन डॉक्टर से सम्पर्क किया। तो उन्होंने हमें सैम्पल दिए जिन्हें हमने उनके बीच वितरित किया। बिहार सरकार की कमिटी में माध्यम से दिव्यागों को जो कि खाना खुद नहीं बना सकते उन्हें खाना खाने के लिए टिफिन के या एक स्थाई रसोईये की व्यवस्था करने के लिए भी बात की। तो इस तरह मुझे प्रेरणा समाज और परिवार से ही मिली। 


अपने संगठन की स्थापना के बाद आप पटना में कितना बदलाव महसूस करते हैं? 


दरअसल दिव्यांग और किन्नरों के लिए काम करना एक चुनोती से कम नहीं है। इस चुनोती को हमने स्वीकार किया। वैचारिक तौर पर यह अपने आप में हमारा खुद से एक एग्रीमेंट है। जो बदलाव समाज में इस वर्ग के लिए हो सकता है वो किया जा रहा है। जैसे कोई दिव्यांग या किन्नर पढ़ना चाहता है तो अगर उसके पास रुपए नही है। या पढ़ने के बाद उसे रोजगार नहीं दिया जा रहा है। जैसे एक दिव्यांग राजेश नवादा जिले से है उसका अभी हाल ही में साउथ केंद्रीय विश्वविद्यालय से पीएचडी का कोर्स वर्क पूरा हुआ है। उसके पास भरने के लिए फीस और लैपटॉपके लिए पैसे नहीं थे तो हमने सोशल मीडिया पर अपील किया। इस अपील से उसे लैपटॉपभी मिला और फीस भी वह अपनी भर पाया। तो इस तरह से बहुत ज्यादा तो नही लेकिन कुछ हद तक बदलाव हम ला रहे हैं। दरअसल इस तरह की संस्थाओं का विगत कुछ वर्षों से हाल या कहें काम करने का तरीका सही नही रहा है। उनमें जो घटनाएं घटी है उसके बाद से लोगों का विश्वास उन पर से हट सा गया है। तो हमने पूरी विश्वसनीयता से अपना काम कर रहे हैं और लोगों के बीच ले जा रहे हैं। कोई भी काम हो हम पूरी पारदर्शिता से कर रहे हैं। बहुत से ऐसे उद्योगपति जो बाहर से आते हैं दिव्यांगों या किन्नरों के बीच रहना चाहते हैं या उनकी मदद करना चाहते हैं तो इसके लिए हम पूरी पारदर्शिता से अपनी संस्था के बारे में अवगत कराते हैं। सब कुछ एक रजिस्टर में लिखा जाता है। दवाई बैंक का भी सब बिल रखा जाता है।इस बीच दवाई बैंक के लिए सबसे पहला डब्बा हमें डॉक्टर राम भरोसे से मिला। हमारा सारा काम निस्वार्थ भाव से होता है। खाना वितरण करना हो भले बच्चों को पढ़ाना हो सभी काम किए जाते हैं। हमारी संस्था को बाबा नागार्जुन सम्मान भी मिला। पटना के श्री कृष्ण मैमोरियल में हमें सम्मानित करने से पहले एक छोटा सा डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बाबा नागार्जुन पर आधारित दिखाया गया। हमारे साथी, हमारे परिवार का सहयोग ये सब हमें मजबूती प्रदान करता है। इस तरह अंत में मैं यही कहूँगा कि आजकल के युवा जो हर समय मोबाईल में लगे रहते हैं वो लोग समाज के इन दूसरे तबके के लिए भी काम करे। अपने को भटकने ना दे क्योंकि उनके भटकने से बिखराव उत्पन्न हुआ है। 

आने वाले दस सालों में आप अपनी संस्था को कहाँ देखना चाहेंगे? 

हम अपनी संस्था को एक मूवमेंट के माध्यम से सामाजिक, आर्थिक सभी रूपों में बदलाव चाहेंगे। और हम इस तरह का कोई काम न करते है ना करेंगे जिससे हमारी संस्था की प्रतिबद्धता पर कोई आंच पड़े। किन्नर आवास योजना को लाने का काम भी हम करेंगे। उसके लिए भी हम प्रयासरत्न हैं। किन्नरों को मकान दिलाने के लिए हम जिम्मेवारी भी लेते हैं। अपनी जिम्मेवारी पर हमने कई किन्नरों को घर दिलवाए हैं। 



यह एक टेली साक्षात्कार है जिसे तेजस पूनिया ने लिया है।  

दिल्ली के हँसराज कॉलेज में छाया मंटो


21 फरवरी 2019 को दिल्ली विश्वविद्यालय के हँसराज महाविद्यालय में मंटो की कहानी 'टोबा टेक सिंह' पर आधारित नाटक खेला गया। मंटो आपके या मेरे ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के चेहते अफसानानिगार है। मंटो ने कई कहानियाँ लिखी और क्या खूब लिखी सभी एक से बढ़कर एक। और आज उनकी कहानियों पर शोध भी हो रहे हैं और नाटक भी खेले जा रहे हैं। 

नीरज छिलवार के कैमरे से निकला टोबा टेक सिंह नाटक कपिल कुमार द्वारा निर्देशित है। कपिल कुमार ने इससे पहले कई नाटकों को निर्देशित किया है। कपिल का डायरेक्शन कमाल का है। और नीरज छिलवार का कैमरा भी ठीक है।

टोबा टेक सिंह को कैमरे में लेते समय नीरज से बड़ी गलती हुई है। कारण उन्हें ऐनवक्त पर बताया गया जिस वजह से उन्हें यह नाटक अपने मोबाइल में रिकॉर्ड करना पड़ा। खैर इससे पहले उनके कैमरे से निकली 'लाल वतन' 'प्रेमचंद' की कहानी 'कफ़न' 'सद्गति' 'चीफ की दावत' और वेश्या खूबसूरत कैमरा एंगल के साथ रही है। 
खैर टोबा टेक सिंह नाटक में बिशन सिंह (टोबा टेक सिंह)
 बने अवनीश ने बेहतरीन किरदार और अदायगी दिखाई है। नुक्कड़ नाटकों की यही खासियत होती है कि आपको सब कुछ एक टेक में ही करना पड़ता है। यहाँ रीटेक जैसा कुछ नहीं होता। बिशन सिंह के सहायक अभिनेताओं मेंरिवई, स्नेहदीप,  नितिन, उषा,आकाश, उज्ज्वल, शालू, नेहा सभी ने अपना काम बखूबी किया है। 

टोबा टेक सिंह तो आप सभी ने पढ़ी ही होगी। किस तरह एक पागल खाने में पागल लोगों के साथ व्यवहार किया जाता है और टोबा टेक सिंह की खोज में बिशन सिंह दोनों सरहदों के बीच ही गश खाकर गिर पड़ता है और कहानी का अंत हो जाता है। बिशन सिंह का किरदार इस कहानी में सबसे अहम है और इस किरदार को अवनीश ने घूंट दर घूंट पीया है। रंगरेज थियेटर पिछले 3-4 सालों से लगातार दिल्ली और आसपास के इलाकों में अपनी खूबसूरत प्रस्तुति देता रहा है। जश्न प्रोडक्शन के यूट्यूब चैनल पर इनके नाटकों को देखा जा सकता है। 
टोबा टेक सिंह नाटक का यूट्यूब लिंक दे रहा हूँ कैमरे को नजरअंदाज करके आप इस नाटक को अवश्य देखें। वैसे भी नाटकों का हश्र आप सभी जानते हैं। बड़े शहरों के अलावा इन्हें कहीं कोई नहीं पूछता। परिवार वाले भी इन्हें हिदायतें देते रहते हैं। खैर ये सब इनका जाती मामला है। आप नाटक का लुत्फ घर बैठे लें। 

लिंक क्लिक करें और नाटक देखें कि कितनी खूबसूरती से हँसराज कॉलेज में अफसानानिगार मंटो को उतारा गया। 

Sunday, September 1, 2019

रिव्यू : बेदम बेअसर शाहो या साहो

फ़िल्म - साहो / शाहो
निर्देशक - सुजीत
कास्ट- प्रभास, नील नितिन मुकेश, श्रद्धा कपूर , जैकी श्रॉफ , मंदिरा बेदी, टीनू आंनद, मुरली शर्मा आदि

सबसे पहले बता दूँ कि साहो एक तेलुगु एक्शन फिल्म है, जो 'रन राजा रन' के निर्देशक सुजीत द्वारा निर्देशित है। इस फिल्म में बाहुबली यानी प्रभास मुख्य भूमिका में हैं। फिल्म के निर्माता वामसी और प्रमोद ने यूवी क्रिएशन्स के बैनर तले किया है।

 प्रभास, श्रद्धा कपूर, नील नितिन मुकेश, एवलिन शर्मा, नतासिया माल्टे, लाल, अरुण विजय, शारबंती चटर्जी, जैकी श्रॉफ, वेनेला किशोर, महेश मांजरेकर, चंकी पांडे, साशा छेत्री, तिन्नु आनंद आदि से सजी इस फ़िल्म के सहायक अभिनेता है नवीन वर्मा गणपतिराजू, आदित्य श्रीवास्तव, शिवकृष्ण, मुरली शर्मा।

फ़िल्म की कहानी कुछ इस प्रकार है-

 रॉय ग्रुप ऑफ कंपनीज को एक दुर्घटना का सामना करना पड़ता है। यह फ़िल्म प्रमुख सदस्यों के बीच सत्ता की लड़ाई है। इस बीच, फ़िल्म के दूसरे हिज्जे में अशोक चक्रवर्ती और उनकी टीम मुंबई में दो लाख करोड़ की एक चोरी के मामले की जांच कर रही है।  इन दोनों घटनाओं के बीच क्या संबंध है? इसी के इर्द गिर्द फ़िल्म घूमती नजर आती है। महिष्मती की प्राचीन भूमि में सर्वोच्च शासन करने के बाद, प्रभास ने अपनी नवीनतम एक्शन-थ्रिलर साहो में टी-शर्ट, स्वैग और कारगो के लिए महलों और शाही कपड़ों को छोड़ दिया बावजूद इसके यह फिल्म 350 करोड़ रुपये के असाधारण बजट पर बनी है और इसे बनाने में दो साल लगे हैं।
खाली बर्तन जिस तरह शोर करता है साहो भी उसी तरह चमकते रैपर में खाली शोर मचाती दिखाई देती है। यही कारण है कि फ़िल्म को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा और फ़िल्म का निर्देशन भी उन आलोचनाओं के घेरे में आ गया।
 फ़िल्म एक प्रकार से टैटू में कवर किए गए घातक बदमाशों के साथ सवार है, और ऊंची इमारतों पर चमकते हुए हैं जो एक वीडियो गेम से ज्यादा कुछ नही नजर आता है। इतना ही नहीं, शहर के चारों ओर एक जादुई आभा है इसे लोग अपनी इच्छा से गुरुत्वाकर्षण के नियमों को धता बता सकते हैं। 

 हर किसी के सवालों का जवाब देती यह फ़िल्म रहस्यमयी  है, जिसका रहस्य कहीं न कहीं दबा हुआ है और यह रहस्य खुलता है फ़िल्म के आखिर तक। अमृता नायर के रूप में श्रद्धा कपूर सहज नजर आई है। कुछ जगह प्रभास की डायलॉग डिलीवरी से भी ज्यादा चौंकाने वाली बात है श्रद्धा का किरदार। 

 मंदिरा बेदी फिल्म में व्यावहारिक रूप से गैर-मौजूद सी लगी हैं, और उनके पास केवल कुछ ही डायलॉग्स हैं जो पूरी तरह उन्हें फ़िल्म में स्थापित करने में कम असर हैं।  हर फ़िल्म की तरह इस फ़िल्म में भी तमाम महिला अभिनेत्रियां  सौंदर्य प्रसादन मात्र है। 

इस फ़िल्म को केवल बाहुबली के फैन होने के नाते तथा  प्रभास के कभी-कभार अपने वन-लाइनर्स के साथ फ़िल्म  का कुछ डैमेज-कंट्रोल करने की कोशिश करने के नाते देखा जा सकता है।

 फ़िल्म की कहानी भी उतनी ही हल्की है जितना की इसका निर्देशन। फ़िल्म के अंत से निर्माता निर्देशक ने बताया है कि इसका भाग 2 भी यानी सीक्वल भी बनेगा। फ़िल्म का गीत संगीत औसत दर्जे का है।

Review By Tejas Poonia

अपनी रेटिंग 2 स्टार

Tuesday, August 27, 2019

स्वतंत्रता दिवस और बाबा साहेब अम्बेडकर की प्रासंगिकता


जय भीम साथियों,
यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा सब मिट गए जहाँ से,
अब तक मगर है बाक़ी नाम-ओ-निशाँ हमारा.
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा.

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमारा!!
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमारा!!

७२ साल पहले आज ही के दिन हम अंग्रेज़ी हुकूमत की जंजीरों से आजाद हुए थे. अपनी आज़ादी को पाने के लिए देश के न जाने कितने लोगों ने अपनी जान न्योछावर कर दी. धर्म-जाति से ऊपर उठकर आज़ादी की लड़ाई लड़ी गयी और कामयाबी भी मिली. देश को आज़ादी दिलाने वाले अधिकांश वीरों के नामों से हम भले ही परिचित हों, परन्तु असंख्य नाम ऐसे भी हैं, जिनको हम आज तक भी नहीं जा पाए. उन सभी देश के सच्चे वीर सपूतों को भी हम सब सलाम करते है. 
आज़ादी तो बहुत संघर्षों के बाद हमे मिली, लेकिन एक बात जो आज़ादी के बाद सबको परेशान किये हुए थी, कि अंग्रेजी राज से तो हम मुक्त हो गये, मगर अब  इस आज़ादी को कैसे सहज और संवार का रखा जाये? क्योंकि आज़ादी के सही मायने तभी है जब हम बरक़रार रख सकें. 
    आज़ादी का यह दिन हम बड़े जोश-खरोश से मनाते आ हैं, परन्तु आज़ादी का यह जश्न देश की एक महानतम हस्ती के जिक्र के बैगेर अधूरा होगा. वह शख्सियत है बाबा साहेब डॉ. भीम राव अम्बेडकर. जिन्होंने सही मायनों में देश की आज़ादी को ‘संविधान’ निर्माण कर संरक्षण प्रदान किया. आज भी बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर एक विश्व प्रसिद्ध न्यायविद, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, संविधान शिल्पी, राष्ट्रभक्त, समाजसेवी, बुद्धिवादी, समता, स्वतंत्रता, बंधुता के पहरेदार तथा चिंतक के रूप में अपने कृतित्व के माध्यम से हमारे बीच मौजूद हैं. सभी तरह से उपेक्षित तथा वंचित लोगों के साथ-साथ सम्पूर्ण मानव मात्र के लिए बंधुता, समता एवं स्वतंत्रता का अजीवन एवं अहर्निश (लगातार) शंखनाद करनेवाले बाबा साहेब अम्बेडकर मात्र दलितों के ही मसीहा नहीं हैं, अपितु सभी तरह की असमानताओं तथा उपेक्षाओं से पीड़ित मानव महाकुम्भ के झंडाबरदार हैं. 
    आज़ादी का मतलब तभी है जब देश-समाज में सभी को समान रूप से मानव समझा जाए. बाबा साहेब ने सदियों से सभी तरह के अधिकार और सुविधा से वंचित जन समुदायों में चेतना का संचार किया और उन्हें शिक्षित, संगठित होकर संघर्ष करने का रास्ता दिखाया, तो यह उनका दलित प्रेम नहीं; बल्कि सभी मूल, कूल, वंश, जाति, गोत्र, नस्ल, सम्प्रदाय, वर्ग, वर्ण, लिंग के अधिकार वंचितों की सच्ची सेवा का दुर्लभ उदाहरण है. सुविधा तथा अधिकार वंचित केवल दलित ही नहीं हैं, वे भी हैं जिनकी उन्नति तथा समृद्धि के सभी मुहानों को उद्धारक कहलाने वाले मायावी मानवों ने अवरुद्ध कर रखा है. इस पुस्तक का प्रणयन बाबा साहेब के इन्हीं अवदानों को रेखांकित करने के लिए किया गया. 
    आज स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देश में हो रही तमाम घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में बाबा साहेब अम्बेडकर के विचारों पर चिन्तन करना समयानुकूल और अति प्रासंगिक है. क्योंकि अम्बेडकर एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक मिशन का नाम है, जिसका लक्ष्य है- समानता मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है. इसे प्राप्त करना सभी मनुष्यों का प्रथम कर्तव्य है. 

    इतना ही नहीं स्वतंत्रत भारत के संदर्भ में हमारी वर्तमान मौद्रिक, राजकोषीय, श्रम-समस्या, नारी-प्रगति, धर्म, सामाजिक न्याय, उद्योग, कृषि, मानव संसाधन, जल-संसाधन, बीमा उद्योग, मद्यनिषेध, शिक्षा, लोकतंत्र, कार्यपालिका, न्यायपालिका, व्यवस्थापिका, संघीय शासन प्रणाली, भाषायी प्रान्त, राष्ट्रभाषा विषयक चिन्तन तथा सिद्धांत, संविधान के माध्यम से ये सभी मात्र बाबा साहेब अम्बेडकर की ही देन हैं. बाबा साहेब मात्र दलितों के देवता नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवजाति के रक्षक और मसीहा हैं. आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षणिक तथा धार्मिक रूप से पिछड़े एवं शोषित तमाम मनुष्यों के अधिकारों के वकालत करने वाले अधिवक्ता हैं. उनका स्पष्ट मानना है कि जिस समाज में अशिक्षा तथा नारी शोषण अधिक हो, मानना चाहिए वह समाज सदियों तक अवश्य ही शोषकों का गुलाम रहा है. और यह बात आज कितनी समीचीन है आप भलीभांति समझ सकते हैं. 
    बाबा साहेब राष्ट्रीय स्वतंत्रता से अधिक सामाजिक स्वतंत्रता के पक्षधर हैं. उनका स्पष्ट विचार है कि सामाजिक समानता वाला राष्ट्र कभी गुलाम नहीं होता है, जबकि असमानता पर टिका समाज लम्बे समय तक आजाद नहीं रह सकता. भारत मात्र दो हज़ार वर्ष में यदि एक हज़ार वर्ष से अधिक समय तक परतंत्र रहा है, तो यह इसका प्रमाण है कि इस देश में सभी तरह की समानता का घोर अभाव रहा है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सभी तरह की सामाजिक असमानता को अपने चरित्र में धारित करनेवाला राष्ट्र बहुत दिनों तक स्वतंत्र नहीं रह सकता. और आज हमारा देश किस ओर जा रहा है? यह मंथन भी करें.
    आप या हम या कोई भी आज़ादी का सही अर्थ तभी समझ सकते हैं जब हम शिक्षित होंगे. बाबा साहेब शिक्षा को जीवन के लिए मशाल मानते हैं. शिक्षा के मार्ग से ही स्वतंत्रता की मंजिल को प्राप्त किया जा सकता है. वे कहते हैं- शिक्षा एक ऐसी ज़रूरत है जो सबको प्राप्त होनी चाहिए. जिस देश में अनपढ़ों की संख्या जितनी अधिक हो, मानना चाहिए, वह देश उतना ही ज्यादा विपन्न तथा विषम है.
    यह विडंबना ही है कि आज भी समाज जातपात, धर्म, वर्ग, वर्ण, लिंग के आधार पर भेदभाव में संलिप्त है. भेदभाव का यह कोढ़ ज्यों-का-त्यों विद्यमान है. आदमी जितना एक-दूसरे से भेदभाव व्यवहार करता है, उतना अन्य कोई प्राणी नहीं करता. जब तक आदमी, आदमी को आदमी का दर्जा नहीं देगा, दुनिया में दिन-रात बहुकोणीय संघर्ष जारी रहेंगे. आदमी को आदमी का दर्जा दिलवाना ही बाबा साहेब का जीवन का एकमात्र लक्ष्य था, तो क्या यह अपराध या पक्षपात है? 
    डॉ. अम्बेडकर सभी तरह के विभेद का समूल नाश करने वाले महामानव का नाम है. समस्त शिक्षा तथा अनुभव के आधार पर इन्होने मानव कल्याण के लिए जिन नीतियों एवं सिद्धांतों का सृजन किया, वे अश्रुतपूर्व हैं. तभी तो आज भी मानवता के शिप्लकर बाबा साहेब पूर्ण रुप से प्रांसगिक हैं और उनकी सीख आज मानवजाति के लिए अति महती हैं. 
    इसमें कोई दो राय नहीं है कि बाबा साहेब अम्बेडकर दलितों के मसीहा नहीं, सभी तरह के मानवाधिकारों से वंचित जनसमूह के झंडेबदार हैं. हम सबके बाबा साहेब तब तक प्रासंगिक रहेंगे, जब तक महावाधिकारों का हनन पूर्णत: रुक नहीं जाता और चारो और बंधुता, समता और स्वतंत्रता का साम्राज्य स्थापित नहीं हो जाता है. 
सबके हक में सब होता पर, अपने हक में क्या होता,
सबके हक में रब होता पर, अपने हक में क्या होता.
सोच सोच कर दिल घबराये, दशा दिशा कैसी होती,
होते ना बाबा साहेब तो, अपने हक में क्या होता.
धन्यवाद



  जय भीम!                                            जय भारत!! 

सहायक प्राध्यापक (हिन्दी साहित्य एवं भाषा विज्ञान) "हिन्दी विभागाध्यक्ष" शहीद बेलमती चौहान राजकीय महाविद्यालय पोखरी (क्वीली) टिहरी गढ़वाल उत्तराखंड