Saturday, January 16, 2021

देखिए एक लोक कलेण्डर में 'शौर्य गाथा' उत्तराखंड की मिट्टी की


 देवभूमि उत्तराखंड न केवल देव स्थानों के लिए विख्यात है बल्कि इस देवभूमि पर समय-समय पर ऐसे योद्धाओं ने भी जन्म लिया है जिन्होंने अपनी मातृभूमि को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। ऐसे ही योद्धाओं की छवियों और उनकी शौर्य गाथाओं को दर्शाता हुआ यह कलेण्डर आदरणीय लक्ष्मी जी के माध्यम से प्राप्त हुआ। लक्ष्मी जी और उनकी पूरी टीम नाट्य कला और थियेटर के जरिए गत कई वर्षों से उत्तराखंड की लोक संस्कृति एवं परम्पराओं को प्रसारित, प्रचारित करने का महती कार्य कर रही है।


आज किसी भी देश या समाज की संस्कृति या परम्पराओं को जिंदा रखना एक चुनौती बन चुका है। एक समय था जब हर पीढ़ी के द्वारा अपनी भावी पीढ़ी तक अपनी सभ्यता-संस्कृति-परम्पराओं को हस्तांतरित करने के लिए कई प्रकार के प्रयास किये जाते रहे। परन्तु आज इस फेसबुक-सोशल मीडिया की दुनिया में किसे इतनी फुर्सत कि अपनी जड़ों को सींचने के लिए कुछ करें। बावजूद इसके वास्तव में कुछ लोग बिना हल्ला किये ऐसा महत्वपूर्ण काम कर रहे होते हैं कि उनके काम को साधारणतः शब्दों में बांधना असाधारण होता है। लक्ष्मी जी ऐसा ही कार्य कर रही हैं, जो उत्तराखंड निवासियों को अपनी संस्कृति और योद्धाओं पर गौरवान्वित होने के लिए प्रेरित करता है। कम से कम इस कलेण्डर को हर उत्तराखंड के घर में ही नहीं बल्कि सरकारी दफ्तरों में भी होना चाहिए। इस पंचांग के माध्यम से उत्तराखंड की लोक कथाओं/गाथाओं के नायक-नायिकाओं से पूर्णतः परिचय मिलता है। लक्ष्मी जी और उनकी पूरी टीम इसके लिए बधाई एवं साधुवाद के पात्र हैं। 

यह कोई सामान्य कलेण्डर नहीं जो आपको सिर्फ तारीखें बताता है बल्कि इसे मैंने नाम दिया है *लोक कलेण्डर* क्योंकि यह उत्तराखंड के उन शूरवीरों से हमारा संक्षेप में किंतु प्रभावशाली  परिचय कराता है, जिनसे आज की पीढ़ी अनभिज्ञ है।

साथ ही इस कलेण्डर में आपको उत्तराखंड के लोक संस्कृति और परम्पराओं से जुड़े त्यौहारों और मेलों के बारे में भी जानने को मिलेगा।  



इसमें जिन शूरवीरों का परिचय है जिसमें सबसे पहले माधो सिंह भंडारी हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि 400 साल पहले उत्तराखंड की धरती पर पहाड़ का सीना चीर उसमें से नदी निकालकर अपने गाँव लाए जो आज भी मलेधा गाँव को समृद्ध बनाए हुए है। 



रानी कर्णावती भारत की सबसे शक्तिशाली रानियों में गिनी जाने वाली जिन्हें नाक काटी रानी के रूप में भी जाना जाता है। 



रिलोखा लोधी शक्तिशाली उत्तराखंड का यौद्धा जिसे भीम भी कहा जाता है।



सती रानी धना जिनके बारे में कहा सुना जाता है कि उन्होंने कालीचंद के विवाह प्रस्ताव को एक शर्त के साथ स्वीकार किया जिसमें उन्होंने कहा कि वे अपने पति का संस्कार पंचेश्वर में करेंगी उसके बाद उससे विवाह करेगीं लेकिन वे कालीचंद को मार देती हैं और पति के शव के साथ सती हो जाती है। 



राजा अजयपाल सिकंदर लोदी के समकालीन व बावन गढ़ों को जीतकर एक साथ मिलाने वाले महात्मा तथा आदिनाथ कहलाए। 



माता संतला हिन्दू मंदिरों के नष्ट होने पर माँ दुर्गा का आह्वान कर मुगलिया सेना को अंधा बना देने वाली और फिर खुद पाषाण में तब्दील हो जाने वाली महिला। जिसकी इस घटना के बाद मुगलों ने किसी देवी मंदिर को नष्ट नहीं किया। 



 पंथ्या दादा


तत्कालीन राजा के रोज़ा कर के विरोध स्वरूप स्वयं आत्मदाह कर बलिदान कर दिया। बाद में राजा जो वह कर निरस्त करना पड़ा।



तीलू रौतेली


अपने पिता और भाइयों का मौत का बदला लेनी वाली वीरबाला।



 कुफ़्फ़ु चौहान


राजा के जुल्मों के आगे न झुकने वाला वीर योद्धा जिसने अपनी मातृभूमि के लिए अपना सर कटना मंजूर किया।



 राजकुमारी रानी


पिता और भाइयों द्वारा देश की रक्षा में कोई कमी ना रहे, इसके लिए अपनी दोनों बहनों को मारकर स्वयं का सिर भी कलम कर दिया।



 रानी जिया


एक ऐसी राजमाता जिसने तुर्कों के आगे अपने सम्मान की रक्षा करने के लिए खुद को शीला में परिवर्तित कर दिया।




धन्यवाद




डॉ० राम भरोसे
(एम.ए. हिन्दी, यू.जी.सी. नेट, पीएचडी, एम.ए. संस्कृत)
असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी)
राजकीय महाविद्यालय पोखरी (क्वीली)
टिहरी गढ़वाल-249146 (उत्तराखण्ड)
9045602061
dr.rambharose2012@rediffmail.com
ramharidwar33@gmail.com
sabhyatakateesrapaksh.blogspot.com


Tuesday, January 12, 2021

स्वामी विवेकानंद के विचारों की प्रासंगिकता

 


आज का युवा जाग कर उठ तो चुका है, परन्तु वो उल्टी दिशा में उल्टे लक्ष्य की ओर दौड़ रहा है। 



बाकी स्वामी जी के विचार भी आज भी प्रासंगिक हैं, परन्तु खेद है कि जिस प्रकार उनके विचारों का युवाओं के बीच प्रसार प्रचार होना था, नहीं हो सकें। इसके विपरीत हमारे युवाओं को जानबूझकर धर्म-जाति-सम्प्रदाय के नाम पर उल्टे लक्ष्य की ओर भगाया जा रहा है। हमेशा के तरह राजनैतिक लोग युवाओं पर ही अपनी रोटियां सेंक रहे हैं। वर्तमान शिक्षा और रोजगार की बुरी स्थिति से सभी वाकिफ है। यह भी युवाओं के भटकाव की मुख्य वजह है। इतना ही नहीं गत वर्षों में हमारे युवाओं को जिस प्रकार धर्म और जाति के नाम पर अंधविश्वासी और कट्टर बनाया जा रहा है, इसका दुष्प्रभाव देखने भी आने लगे हैं। ऐसे में इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा, जो ये सब कर रहे हैं उनके खुद के बच्चे देश- विदेश के बड़े बड़े संस्थाओं में अपने भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। 

ये जिम्मेदारी हर उस कामयाब और लक्ष्य प्राप्ति कर चुके व्यक्ति को लेनी होगी, कि वह कम से कम एक युवा को उसके सही लक्ष्य की ओर अग्रसारित करें। तभी स्वामी जी कप असल रूप में हम अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं। स्वामी जी की तरह हर युवा यदि अपने लिए सद्गुरु की तलाश कर उनके प्रति पूर्णतः समर्पित हो जाए तो उसकी सभी समस्याएं यूँ ही दूर हो जाएगी। लेकिन शर्त यही है कि इसके लिए नरेंद्र बनना होगा, तभी राम कृष्ण परमहंस जैसे गुरु की उपलब्धि होगी।


स्वामी विवेकानंद जी जन्मदिवस के सुअवसर पर समस्त देशवासियों को हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।





धन्यवाद


डॉ० राम भरोसे
(एम.ए. हिन्दी, यू.जी.सी. नेट, पीएचडी, एम.ए. संस्कृत)
असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी)
राजकीय महाविद्यालय पोखरी (क्वीली)
टिहरी गढ़वाल-249146 (उत्तराखण्ड)
9045602061, 9719177319

Sunday, November 15, 2020

रिव्यू : जज्बे और बुलंद हौसलों की कहानी 'छलाँग'



फिल्म:छलांग


कलाकार : राजकुमार राव, नुसरत भरुचा, मोहम्मद जीशान अयूब, सौरभ शुक्ला, सतीश कौशिक, बलजिंदर कौर 

निर्देशक :हंसल मेहता


राजकुमार राव और नुसरत भरुचा स्टारर फिल्म छलांग अमेजन प्राइम वीडियो पर रिलीज हो चुकी है। इस फ़िल्म का मुझे विशेष रूप से इंतजार था।  जिंदगी में हिम्मत ना हारना जैसी सीख बहुत सी जगह से मिलती रहती है। लेकिन बात तब बनती है जब हम उस सीख को अपने जीवन में धारण कर पाएं। क्योंकि जब तक हम खुद अपने   लिए कुछ नहीं करते तब तक दूसरों का बोलना जाया ही जाता है। अपने हालातों को बेहतर बनाने, आगे बढ़ने, की सीख यह फ़िल्म देती है। 

इधर बॉलीवुड में खेलों पर आधारित कई फिल्में आई हैं। और अमूमन हर खेल से जुड़ी फ़िल्म में जज्बा विशेष रूप से देखने को मिलता है। 

फिल्म की कहानी  हरियाणा के एक गाँव से शुरू होती है जहां  महेंद्र हुड्डा उर्फ मोन्टू यानी राजकुमार राव एक सरकारी स्कूल का पीटीआई  टीचर है। मोन्टू की जिंदगी बड़े आराम से कट रही है। वो स्कूल के बच्चों को कभी-कभी कुछ सिखा देता है अन्यथा खेल के मैदान में बैठा बस टाइमपास करता रहता है। मोन्टू ने अपनी जिंदगी में अभी तक कुछ बड़ा नहीं किया है। वह हर चीज को अधूरा छोड़ देता है। और तो और उसकी नौकरी भी उसे अपने पिता के कहने पर उसी स्कूल में मिली है, जिसमें वो बचपन में पढ़ा था। 


मोन्टू की दोस्ती उसी के स्कूल टीचर वेंकट यानी सौरभ शुक्ला से है। सब सही चल रहा है लेकिन उसकी जिंदगी स्कूल में नीलिमी मैडम यानी नुसरत भरुचा के आते ही बदलने लगती है। नीलिमा जो एक कंप्यूटर टीचर है, को  पटाने के लिए मोन्टू कोशिशें करने लगता है। लेकिन अब प्रेमी कहानी शुरू हुई है तो विलेन भी होगा ही। यहां आते  हैं नये पीटी टीचर मिस्टर सिंह यानी मोहम्मद जीशान अयूब। मिस्टर सिंह के आने से मोन्टू की नौकरी, छोकरी और इज्जत सब छिनने की कगार पर आ जाती है। ऐसे में अपना हीरो क्या फैसला लेता। और वह स्पोर्ट्स के कौन-कौन से कम्पटीशन लड़ने का फैसला करता है जानने के लिए आपको फ़िल्म देखनी होगी। इसके अलावा खेल देखते हुए आपके मनोभाव भी उसी दिशा में गोते खाने लगते हैं। और आप भी चाहते हैं कि अपना हीरो जीते।

 

ख़ैर परफॉरमेंस की बात करें तो राजकुमार राव बॉलीवुड के उन एक्टर्स में से हैं, जो आपको कभी निराश नहीं करते। उन्हें कोई भी रोल दे दिया जाए वो उसे बहुत आराम से निभा जाते हैं। छलांग में भी उन्होंने ऐसा ही किया है। इसके अलावा नीलिमा के रोल में नुसरत भरुचा ने अच्छा काम किया है। उनका रोल भले ही छोटा रहा हो लेकिन उनका काम और अंदाज देखने लायक है। 


बात सपोर्टिंग किरदारों की हो तो मोन्टू के पिता के रोल में सतीश कौशल, दोस्त और टीचर के रोल में सौरभ शुक्ला, मां के रोल में पंजाबी सिनेमा की बेहतरीन अदाकारा बलजिंदर कौर और स्कूल की प्रिंसिपल के रोल में ईला अरुण ने कमाल का काम किया है। किसी भी सीन में ये मंझे हुए एक्टर्स आपको निराश नहीं करते। फिल्म के 'विलेन' मिस्टर सिंह के रोल में मोहम्मद जीशान अयूब ने भी बढ़िया काम किया है।  स्कूल के बच्चों की तारीफ विशेष रूप से करनी होगी वे सभी कमाल के थे। यदि कहूँ कि उन्होंने ही इस फिल्म में जान डाली है तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। 



डायरेक्टर हंसल मेहता जानते हैं कि इतनी बढ़िया स्टारकास्ट के लिए उन्हें अच्छी कहानी चाहिए और उन्होंने वही दर्शकों को दी भी है। फ़िल्म की कहानी लव रंजन ने लिखी है और बहुत समय बाद लव रंजन की लिखी कहानी में कोई लड़की लड़के को ठगने का काम नहीं कर रही है।  स्कूल और पीटी टीचर की जिंदगी, हरियाणा के गांव और अन्य सेट को हंसल मेहता ने करीने से दिखाया है। फिल्म का म्यूजिक बढ़िया है। बैकग्राउंड स्कोर खास करके खेल के समय लाजवाब बन पड़ा है। फ़िल्म में कुछ कमियां भी नजर आती हैं। लेकिन उन्हें नजरअंदाज करके इसे देखा जाए तो एक एंटरटेनिंग है और जीवन की सीख देकर जाती है। 



अपनी रेटिंग 3.5



Review By Tejas Poonia


Sunday, November 8, 2020

बुक रिव्यू : दलित आंदोलन से गुजरते हुए हिन्दी दलित आत्मकथाएं - एक मूल्यांकन : पुनीता जैन

 



पुस्तक : हिन्दी दलित आत्मकथाएँ, एक मूल्यांकन

लेखक : पुनीता जैन

प्रकाशक : सामयिक पेपरबैक्स, नई दिल्ली

संस्करण : 2018

मूल्य : रु. 300

हिन्दी साहित्य में अवतरित हुए तमाम आंदोलनों-विमर्शों में स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श, दलित विमर्श आदि ने हिन्दी साहित्य की चिंतन प्रक्रिया को एक नवीन मोड़ प्रदान किया है । इन विमर्शों ने साहित्य की परंपरागत गति को आम जन के दर्द से जोड़कर जो नवीनता उत्पन्न की है, उससे साहित्य में विमर्श के मायने बदले हैं । हिन्दी में दलित आत्मकथाओं के मूल्यांकन के माध्यम से लेखिका पुनीता जैन ने इन मान्यताओं को एक नवीन दृष्टि प्रदान करते हुए दलित आत्मकथाओं के चिंतन को सर्वग्राह्यता प्रदान की है ।

हिन्दी के नवजागरण काल से ही दलित-विमर्श ने साहित्य में अपना स्थान निर्धारित किया । दलितों के साथ-साथ गैर-दलित लेखकों ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया । साहित्य में मुख्यधारा की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ने इस विषय पर विशेषांक निकालकर दलित आंदोलन को तीव्रता प्रदान की । पिछले दशकों में दलितों के बीच से कई अच्छे लेखक सामने आए, जिन्होंने दलितों की पीड़ा को ‘भोगे हुए यथार्थ’ के रूप में सामने रखा । इन लेखकों ने कविता, कहानी, उपन्यास, लेख तथा आत्मकथाओं के माध्यम से दलितों के सदियों पुराने दर्द को समाज से रूबरू करवाया । इन विधाओं में आत्मकथाओं का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान रहा । दलित विमर्श को ‘हंस’ के वर्ष दो हजार चार में निकले विशेषांक ने एक विशेष गति प्रदान की । 

वास्तव में देखा जाए तो दलित लेखन में जो ‘भोगा हुआ यथार्थ’ था, वह दलित आत्मकथाओं में विशेष रूप से उजागर हुआ । इन आत्मकथाओं में दलित लेखकों ने अपने समय और समाज को स्वयं की आंखों से देखा, परखा और भूतकाल से तुलना करते हुए उस यथार्थ को अपने लेखन में उतारा । समीक्ष्य पुस्तक ‘हिन्दी दलित आत्मकथाएं, एक मूल्यांकन’ में लेखिका पुनीता जैन ने दलित लेखकों द्वारा लिखी गईं लगभग सभी आत्मकथाओं को बड़ी ही सूक्ष्मता के साथ कुछ ऐसे प्रस्तुत किया कि इनआत्मकथाओं से अन्जान पाठक भी लेखक और उसके समाज के सच से परिचित हो सके । खालिस परिचित ही नहीं बल्कि गहराई से परिचय प्राप्त कर सके । 

पुस्तक के ‘फ्लैप’ पर डॉ. सूर्यनारायण रणसुभे लिखते हैं “सृजनात्मक साहित्य के निर्माण के मूल में लेखक की अकुलाहट, बेचैनी-यही एकमात्र बड़ा कारण होती है । लेखक अपनी अनुभूति के बोझ से मुक्त होने हेतु लिखने लगता है । सृजनात्मक समीक्षक की भी यही स्थिति होती है । एक मनुष्य होने के नाते पुनीता जैन, धर्म, जाति, पन्थ के परे जाकर दलितों की संवेदनाओं से, उनकी व्यथाओं से उनकी मर्मांतक पीड़ाओं से इस कदर प्रभावित, प्रेरित हो जाती हैं कि वह उनकी सहयात्री ही बन जाती हैं ।  इस सहयात्रा में एक ओर वे उस पीड़ा को भोगती भी हैं तथा उसी समय उस पीड़ा को, उसके भोगनेवाले को पूरी तटस्थता से देखती भी हैं ।” 

वास्तव में मूल पुस्तकों पर किए गए लेखन की पहली शर्त होती है कि लेखक मूल के अंतर्मन में पहुँचकर उस मूल संवेदना को निकालकर सामने लाए जिसको पढ़ते हुए ही मूल को पढ़ने और समझने की जिज्ञासा बढ़ जाए । उक्त पुस्तक में लेखिका ने मूल रचनाओं की उस मूल जड़ को बखूबी पकड़ा है । 


(सुनील मानव)

पुस्तक का आरंभ भूमिका के परिचय के साथ दलित साहित्य और उसमें भी दलित आत्मकथाओं की पृष्ठभूमि के परिचय से होता है जो इस पुस्तक की मूल विषय वस्तु का आधार बनी है । 

हिन्दी साहित्य की पृष्ठभूमि पर यदि दृष्टि डालें तो इस साहित्य की रचना में कुछ सामाजिकताओं के साथ स्वान्त:सुखाय एवं वाग्विलाश का भाव अधिक रहा है लेकिन दलित साहित्य दलितों के साथ सदियों से चले आ रहे अन्याय एवं अत्याचार, समाज में उनकी दयनीय स्थित अथवा कहा जाए कि वर्णव्यवस्था के अत्याचारों के प्रति स्वर उठाने की प्रक्रिया में हुआ । लेखिका पुनीता जैन ने प्रथम अध्याय ‘हिन्दी दलित साहित्य की पृष्ठभूमि’ में इन पूरी प्रकिया की पृष्ठभूमि को स्पर्श करते हुए वेदकाल से लेकर अंबेडकर के आंदोलन तक अपनी सूक्ष्म दृष्टि दौड़ाई है । इस संदर्भ में आपने इस बात को प्रमुखता से इंगित किया है कि वर्तमान में यदि कहा जाए कि अब से पहले दलितों को लेकर कोई आंदोलन नहीं हुए अथवा साहित्यिक रूप में कुछ लिखा नहीं गया तो यह बात पूरी तरह सही नहीं है । आप लिखती हैं “वर्तमान दलित लेखन, साहित्य पर यह आरोप नहीं लगा सकता कि उसके पक्ष में कभी आवाज नहीं उठी । वर्णव्यवस्था के विरोध में चार्वाक् से कबीर तक और कबीर से प्रेमचंद तक की लम्बी परम्परा दिखाई देती है ।” आपका यह निष्कर्ष पुस्तक के प्रति तटस्थता को मज़बूती प्रदान करता है । 

पुस्तक के द्वितीय अध्याय ‘हिन्दी दलित आत्मकथन का परिदृश्य’ में लेखिका ने वर्तमान दलित लेखन की प्रेरणा के बिन्दुओं के साथ-साथ मराठी के दलित लेखन को हिन्दी दलित साहित्य लेखन की पृष्ठभूमि के रूप में प्रस्तुत किया है । आपने हिन्दी साहित्य के आदिकाल के सिद्ध और नाथ साहित्य से लेकर मध्यकाल के संत कवियों की वाणियों को दलित साहित्य की नींव के रूप में इंगित किया है । इसके आगे लेखिका कहती हैं कि “आधुनिक काल में महाराष्ट्र में ज्योतिबा फुले व अंबेडकर के प्रभाव ने कथित शूद्र को ‘दलित’ नाम दिया तथा अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा दी । इसके प्रभाव से हुए सामाजिक, शैक्षिक जागरण ने उनके उत्पीड़न के दीर्घ इतिहास को वाणी देना आरम्भ किया । हिन्दी में दलित लेखन का प्रादुर्भाव इसी पृष्ठभूमि में मराठी साहित्य के प्रभाव से हुआ ।” अपने इस निष्कर्ष को सिद्ध करते हुए पुनीता जी तमाम संदर्भ भी प्रस्तुत करती हैं जो उनकी शोध दृष्टि की भी परिचायक है । 

तृतीय अध्याय ‘हिन्दी दलित आत्मकथाएं और उनका सौन्दर्य-मूल्य’ के संदर्भ में लेखिका ने दलित आत्मकथाकारों की उस दृष्टि को समझने का प्रयास किया है जिसके तहत कोई लेखक लिख पाता है । अपने परिवेश की सुन्दरता को संपूर्णता में देखना और उसके सार्वभौम स्वरूप को शब्दों में बाँधना, किसी भी लेखक के लिए बहुत सहज नहीं होता है । कोई भी लेखक उस सत्य को तभी शब्दों में पिरो पाता है जब वह उस परिवेश का ‘भोक्ता’ हो । ‘भोक्ता’ होने से सत्य को समझना थोड़ा आसान हो जाता है और यहीं से आत्मकथ्य के सूत्रों का सूत्रपात हो जाता है । लेखिका ने इन अध्याय में दलित लेखकों को उनकी आत्मकथाओं के संदर्भ में इसी स्वरूप में समझने का प्रयास किया है । सौंदर्यशास्त्र और कुछ आगे बढ़ते हुए दलित सौंदर्यशास्त्र को और स्पष्टता प्रदान करते हुए लेखिका ने डॉ. तुलसीराम के शब्दों को सौंदर्यशास्त्र की स्थापना के रूप में प्रस्तुत किया है कि “सौंदर्यशास्त्र का उद्देश्य साहित्य के माध्यम से व्यक्ति की सामाजिकता को परिष्कृत करना और उसके जीवन को उच्च स्तरीय बनाना है । इस प्रकार सौंदर्यबोध वैयक्तिक जीवन को उसकी संदर्भवत्ता देने और सामाजिक सम्बद्धता को सुदॄढ़ करने व गहनता प्रदान करने का दायित्त्व निभाता है ।”

हिन्दी साहित्य के आरम्भ से लेकर वर्तमान परिवेश और उसकी केन्द्र की विषय वस्तु पर दृष्टि दौड़ाई जाए तो आदिकाल के नाथ, जैन और रासो साहित्य में आम आदमी नहीं दिखता; मध्यकालीन साहित्य में ईश्वर और ईश्वर बनने की ललक के साथ ही बुर्जुवा वर्ग का चित्रण मिलता है । 1857के बाद परिस्थितियाँ कुछ बदलीं । धीरे-धीरे ही सही, साहित्य के मूल में आम आदमी की स्थिति मज़बूती पकड़ने लगी । और दलित साहित्य तक आते आते आम आदमी ने स्वयं अपनी स्थितियों को साहित्य के मूल में प्रस्तुत करना आरम्भ कर दिया । पुस्तक के चौथे अध्याय ‘दलित आत्मकथन और उसका समाज वैज्ञानिक पक्ष’ में लेखिका ने उक्त वस्तुस्थिति को गहराई से स्पष्ट किया है । लेखिका लिखती हैं कि “हिन्दी साहित्य में लम्बे समय तक ‘आम आदमी’ विषय के केन्द्र में नहीं था । जातिभेद के कारण उत्पन्न वास्तविक सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति का न्यूनतम उल्लेख हिन्दी में दिखाई देता है, जबकि साहित्य में वर्णित पात्र और परिवेश के द्वारा पाठक समाज की पृष्ठभूमि में कार्यशील स्थितियों से परिचित होता है ।”आपने इस अध्याय में लेखक और पाठक के बीच स्थापित तादात्म्य को भी स्पष्ट करने का प्रयास किया है । दलित लेखकों की आत्मकथाओं के माध्यम से पाठक को दलित वर्ग की सामाजिक परिस्थितियों का परिचय स्थापित करने का भी प्रयास है यह अध्याय । 

उक्त से आगे बढ़ते हुए पुनीता जैन ने ‘हिन्दी की दलित आत्मकथाएँ और स्त्री’ के संदर्भों को भी व्याख्यायित किया है । स्त्री की स्थिति प्रत्येक स्तर पर दयनीय रही है । वह मनुष्य कम ‘भोग्या’ अधिक मानी गई है । इस अध्याय में लेखिका ने दलित आत्मकथाओं में स्त्री की स्थिति को भी सूक्ष्मता से स्पष्ट किया है । ऐसा करते हुए लेखिका ने उन सभी आत्मकथाओं का जिक्र किया है जिनमें दलित स्त्री की वेदना को स्वर प्रदान किया गया हो । इसके साथ ही उक्त आत्मकथाओं में स्त्री की सामाजिकता को विशेष रूप में स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है । 

यहाँ तक आते आते पुस्तक का प्रथम खण्ड समाप्त हो जाता है और अगले खण्ड ‘अन्तर्पाठ’ के माध्यम से दलित आत्मालापों के आख्यानों का अन्तर्पाठ आरम्भ होता है । इन अन्तर्पाठों के माध्यम से लेखिका एक-एक कर हिन्दी की तमाम आत्मकथाओं का उनके मूल स्वर के साथ विवेचन-विश्लेषण करना आरम्भ करती है । लेखिका ने समस्त दलित आत्मकथाओं को उनकी विषय वस्तु के साथ स्पष्ट रूप से प्रकट करने का प्रयोग किया है । इन आत्मकथाओं की विषय वस्तु के साथ आत्मकथा लेखन से गुजरते हुए लेखक की मनोदशा और मूल लेखक के आस-पास को लेखिका पुनीता जैन ने बड़ी ही स्पष्टता से प्रस्तुत किया है । 

वर्ष 1995 में प्रकाशितमोहनदास नैमिशराय की ‘अपने अपने पिंजरे’ से आरम्भ हुए सफर को लेखिकावर्ष 2017में प्रकाशित हुई रजनी तिलक की आत्मकथा ‘अपनी ज़मीं अपना आसमां’तक पूरी ईमानदारी से लेकर आई हैं । इतिहास की विसंगतियों से लेकर समय के बदलाव को लेखिका ने इन आत्मकथाओं में बखूबी इंगित किया है । 

दलित आत्मकथाओं से पहले की जो आत्मकथाएँ थीं, उनमें उपदेश और सीख देने की प्रधानता के साथ-साथ लेखक के अभिजातीय दंभ भी देखने को मिलता रहा था । दलित आत्मकथाओं ने इस अभिजातीय दंभ, उपदेशात्मकता और मनोरंजकता के स्थान पर अपनी विषय वस्तु में एक आम आदमी के दर्द को, उसकी व्यथा को, उसके वातावरण को पूरी सच्चाई व आत्मनिष्ठा से उकेरने का प्रयास किया । वास्तव में यही वह विषय वस्तु थी जो लेखक की अपनी सच्चाई थी । पुनीता जैन ने आत्मकथा लेखकों की समीक्ष्य कृतियों के माध्यम से ‘एक आम जन की व्यथा’ को उसकी संपूर्णता प्रदान की है । पुनीता जैन ने इन अलग-अलग आत्मकथाओं के बिखरे सूत्रों को एक माला में पिरोते हुए संवेदना के सूत्र को एक साथ स्थापित किया है । 

अपने अपने पिंजरे, जूठन, दोहरा अभिशाप, झोपड़ी से राजभवन, घुटन, नागफनी, मेरा बचपन मेरे कंधों पर, मुर्दहिया, मणिकर्णिका, शिकंजे का दर्द, दु:ख-सुख के सफर में आदि आत्मकथाओं का जो विवेचन-विश्लेषण लेखिका पुनीता जैन ने किया है, बड़ा ही स्तुत्य है । आपने अपनी इस कृति को दलित लेखन का आख्यान बना दिया है । लेखिका ने प्रस्तुत आत्मकथाओं का एक-एक कर सिलसिलेबार कुछ ऐसा सूक्ष्म विश्लेषण किया है कि सामान्य से सामान्य पाठक भी मूल रचनाओं से अपना सहज संवाद स्थापित कर सके । 

अपनी विषय-वस्तु से इतर भी इस पुस्तक की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता और परिलक्षित होती है । वह यह कि पुस्तक को शोधपूर्ण दृष्टि से लिखा गया है । आत्मकथाओंके साथ ही उसको पूर्णता प्रदान करने के लिए लेखिका ने संबंधित लेखकों की अन्य स्वीकारोक्तियों तथा आत्मकथाओं पर अन्य समीक्षकों / आलोचकों की टिप्पणियों को जो संदर्भ रूप में प्रस्तुत किया है, वह पुस्तक की गरिमा और गहराई को और भी बढ़ाती है । 

वह पाठक जो हिन्दी की दलित आत्मकथाओं के स्वरूप और उसकी वैचारिकी को एक साथ एक ही स्थान पर समझना चाहते हैं, यह पुस्तक उन पाठकों के लिए बड़े काम की सिद्ध हो सकती है । सामान्य पाठकों के अतिरिक्त दलित विषयों पर शोध करने वाले विद्यार्थियों के लिए तो अत्यंत महत्त्वपूर्ण है ही । 

  सुनील मानव

मानस स्थली, एन.एच.24

फरीदपुर, बरेली

पिन : 243503

मोबाइल : 9918992511

Saturday, November 7, 2020

बुक रिव्यू : सकारात्मक और सामाजिक बदलाव की मूर्धन्य कहानियां


 

एक समयान्तराल के बाद मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक भावनाओं को छूने वाला तीन कहानी संग्रहों का संकलन ‘मेरी प्रारंभिक कहानियां’ पढ़ने को मिला। यह कहानी संग्रह माननीय केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री डॉ० रमेश पोखरियाल 'निशंक' द्वारा लिखित औऱ डॉ० गिरिराजशरण अग्रवाल द्वारा सम्पादित इसी वर्ष 2020 में संपादित हुआ है। आज भी इस संग्रह की हर कहानी प्रासंगिक ही नहीं बल्कि समाज के कटु सत्य को बयां करती है। इस संकलन में 'निशंक' जी की प्रारंभिक तीन कहानी संग्रहों 'बस एक ही इच्छा', 'क्या नहीं हो सकता' और 'भीड़ साक्षी है' में संकलित क्रमशः दस, ग्यारह और दस कहानियों को स्थान दिया गया है।

हर कहानी मानस पटल पर एक अमिट छाप छोड़ती है। हर कहानी को पढ़कर लगता है मानो हमारे आसपास ही यह सब आज भी घटित हो रहा। साधारण और आम बोलचाल (यही उनके लेखन की उपलब्धि भी है) की भाषा-शैली में लिखे ये तीनों कहानी संग्रह हिन्दी कथा साहित्य में विशिष्ट स्थान रखते हैं। हिन्दी साहित्य जगत के सशक्त हस्ताक्षर 'निशंक' जी की प्रारंभिक कहानियों को इस प्रकार सहेजकर उनको आम पाठकों तक पहुंचाना, निश्चय ही एक महती कार्य है, जिसका सम्पूर्ण श्रेय ‘डॉ० गिरिराजशरण अग्रवाल जी’ को जाता है। इसके लिए उनका धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ कि 'निशंक' जी की प्रारंभिक 31 कहानियों को उन्होंने एक ही स्थान पर पाठकों और शोधकर्ताओं के लिए उपलब्ध करा दिया। 



राजनीति के उच्च शिखर को पा लेने के बाद भी साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय रहना स्वयं में किसी महान उपलब्धि से कम नहीं है। साथ ही उनका लेखन इस बात का भी द्योतक है कि 'निशंक' जी राजनीति जैसे कठिन और ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलने के बाद भी साहित्य के संवेदनशील और हृदयी मार्ग को उन्होंने नहीं छोड़ा। इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए कि उन्होंने हमेशा अपनी लेखन शैली से कइयों के जीवन के दुष्कर रास्तों को अपनी लेखन की क्षमता द्वारा सरल बनाया होगा। 

'निशंक' जी का सम्पूर्ण साहित्य पर यदि नज़र डाली जाए तो आप देखेंगे कि उनका साहित्य सपनों की ऊंची उड़ान भरता प्रतीत नहीं होता बल्कि उनकी लेखनी सत्य की भूमि पर विचरण करती महसूस होती है। उनके साहित्य को पढ़कर एक आशावादी और आदर्शवादी साहित्यकार के दर्शन होते हैं, जो इस साहित्यिक और गैर-साहित्यिक विकटकाल में सहज प्राप्य नहीं है। उनका साहित्य सच की जमीन से फुटकर फिर वृहद वृक्ष बन जाता है।

कहानियों पर संक्षेप में प्रकाश डालते हैं। सबसे पहले उनका पहला कहानी संग्रह बस एक ही इच्छा में प्रकाशित कहानियों पर चर्चा करेंगे। 



वैसे तो हर कहानी पढ़कर पाठक को लगेगा कि यह कहानी लेखक के इर्द-गिर्द घूम रही है। काफी हद तक इसमें सच्चाई भी है क्योंकि लेखक यानी स्वयं 'निशंक' जी ने जीवन को बड़ी बारीकी और संवेदनशीलता से जिया है।

इस संकलन की पहली कहानी 'बस एक ही इच्छा' के नाम पर ही एक संकलन का नाम भी रखा गया है। यह कहानी उस पहाड़ी बालक विक्रम की है, जो घर की खराब आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने के लिए नीचे मैदान के एक होटल में काम करता है। पलायन की समस्या भी इस कहानी में देखी जा सकती है। 1985 में लेखक ने जो चिंता इस कहानी के माध्यम से दर्शायी थी, वह आज भी बनी हुई है। कहानी का पात्र विक्रम को गरीबी के कारण खुद न पढ़-लिख पाने का अफसोस जरूर है, परन्तु वह इस अफसोस को अपने छोटे भाई-बहन को पढ़ाकर दूर करना चाहता है। उसकी एकमात्र इच्छा भी यही है कि उसके भाई-बहन खूब पढ़-लिखकर बड़े आदमी बने। इसके लिए वह दिन रात जीतोड़ मेहनत भी करता गया। उसके मुख से निकला वाक्य आज भी अनेकों के मुख से निकला वाक्य है, जो गरीबी और लाचारी के चलते चाहते हुए भी पढ़-लिख नहीं पाए। वह कहता है 'हम अभागों की किस्मत में कहाँ है पढ़ना-लिखना बाबू जी।' इस संग्रह की अगली कहानी 'मैं और तुम' है जो एक अधूरे प्रेम की अधूरी कहानी है। और इस अधूरेपन के कई कारण लेखक ने दिखाएं हैं, जिनमें दहेज, जातीय संकीर्णता, क्षेत्रवाद और अमीरी-गरीबी के बीच की खाई जैसी गम्भीर समस्याओं को प्रमुखता से उठाया है। दीप्ति और शशांक का प्रेम इन्ही सामाजिक कुरूतियों के चलते अधूरा रह जाता है। हालांकि शशांक अपने प्रेम को पाने के लिए संघर्षरत है। वह अपने ही क्षेत्र एवं जाति का झूठा आवरण छोड़कर, परिवार से निष्कासित हो जाता है, परन्तु दीप्ति अपने परिवार को न तो मना पाती है और न ही शशांक की भांति समाज के झूठे आदर्शों के विरुद्ध जाकर अपने प्रेम को पाने का प्रयास करती है। इतना ही नहीं इस कहानी के अंत में शशांक के एक संवाद ने कहानी का उद्देश्य प्रकट दिया वह दीप्ति से कहता है 'दीप्ति! तुम तो खुद भी पढ़ी-लिखी हो, समाज के प्रबुद्ध वर्ग में गिनी जाती हो, फिर क्या शिक्षा का वैभव व विकास इन सब बातों की पुनरावृत्ति हेतु ही है? धनलोलुप भावनाएं बनी रहें, साथ ने यह कोरे आदर्श की सजातीय अनिवार्य है।' बाद में अपने प्रेम में समाज के सामने वह उपहास का पात्र न बन जाये इसके लिए वह दीप्ति से आग्रह भी करता है। परन्तु दीप्ति अपना निर्णय पहले ही बता चुकी होती है।

तीसरी कहानी 'कितना संघर्ष और' एक मेधावी लड़की 'श्वेता' के कठिन मेहनत और संघर्षों की कथा है। श्वेता का परिवार बड़ा है और गरीबी-लाचार है ऊपर से उसका पिता शराबी है, जो दिन-रात शराब में डूबा रहता है। इतना ही नहीं उसका पिता घर में सभी के साथ मार पिटाई करता है। वह भाई-बहनों में सबसे बड़ी होने के कारण सारी जिम्मेदारी उसने अपने कंधों पर उठा ली। श्वेता जैसी नायिका होने की ज़रूरत है आज की युवतियों को। उसने इतना संघर्ष होने के बाद भी निराशा को अपने पास फटकने तक नहीं दिया। लेकिन नौकरी न मिलने कारण वह टूटती जा रही थी, उसकी हिम्मत साथ छोड़ रही थी। वह रमेश को चिट्ठी में लिखती भी है ' मैं पूछती हूँ कि आखिर कितना संघर्ष करूँ? कहीं सफलता मिलने से पहले ही यह संघर्ष हमको ही न मिटा डाले!' इतना होने पर भी श्वेता का प्रथम आना, अपने आप में बेहतरीन उदाहरण था, क्योंकि इतने संघर्षों में आदमी जीना तक छोड़ देते हैं, ऐसे में पढ़ाई करना, किसी अजूबे से कम नहीं हो सकता। श्वेता कहानी की ऐसी पात्र है जिससे है युवती प्रेरणा पाकर जीवन में एक मुकाम हासिल कर सकती है, बशर्त उसकी तरह संघर्ष करना न छोड़े। हालांकि कहानी के अंत मंय सारे परिवार की जिम्मेदारी उठाते उठाते वह चारपाई पकड़ लेती है।

संकलन की चौथी कहानी 'संकल्प' है, जो विशुद्ध देशभक्ति कैसी होनी चाहिए, उस पर आधारित है। 'निशीथ' नाम का युवक अपनी शादी के प्रस्ताव को लेकर व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठने की बात कहता हुआ अपनी माँ से कहता है ''माँ' ऐसी किसी लड़की से मेरी शादी करा सकती है जो व्यक्तिगत स्वार्थों में ना पढ़कर आम व्यक्ति के हितों की बात कर सके? शोषितों के लिए जूझ सके?’ निशीथ का यह वाक्य हमारे सामने कई सवाल खड़ा करता है। इस कहानी का प्रतिपाद्य यह है कि हमें अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को त्याग कर जितना संभव हो आम लोगों के जन जीवन को बेहतर बनाने के लिए हमेशा प्रयासरत रहना चाहिए, साथ ही अपनी जन्मभूमि की खातिर जितना त्याग और समर्पण हो सके करना चाहिए। अपने व्यक्तिगत जीवन से इतर भी अनेक समस्याएं हैं, जिन पर हम कभी ध्यान नहीं देते हैं, ‘निशीथ’ भारत माता की फिक्र करता है, जिसे हिंसा वैमनस्य अलगाववाद और उचित राजनीति की जैसे सर्प लगातार डस रहे हैं। इस युवक की चिंता आज भी जस की तस बनी हुई है। जिसको कहानी के माध्यम से लेखक ने बखूबी बताने का प्रयास किया है।

इस संकलन की अगली कहानी 'याद रखूंगा' एक चुटीलापन  लिए हुए है। इस कहानी की व्यंग्यात्मकता में बहुत गहरा संदेश छिपा है। कहानी में एक युवक जो अपनी पत्नी की शिकायत लेकर आया है और अखबार में अपनी पत्नी के खिलाफ नोटिस छपवाना चाहता है। जिसका आग्रह वह लेखक से करता है। यही युवक अपने वक्तव्य में उसके द्वारा की जा रही है घरेलू हिंसा को सही ठहराया जाता है। लेकिन बाद में ‘साब’ उसे समझाते हैं कि यदि उसने अपने पत्नी के खिलाफ कुछ भी किया तो भविष्य में वह भी कुछ न कुछ अवश्य करेगी जिससे आपको मुश्किल उठानी पड़ सकती है। ‘साब’ की बातों को समझ कर वह युवक साहब को धन्यवाद देकर वहां से चला जाता है। एक पारिवारिक समस्या को कहानीकार ने कितनी खूबसूरती और हल्के से सरल कर दिया, यही कहानीकार की सफलता है। उस युवक को सबक भी मिलता है और ‘साब’ की बात को याद रखूंगा कहकर चला जाता है।

 संकलन की अगली कहानी ‘गंतव्य की ओर’ हमें प्रेरणा देती है कि स्थिति चाहे जो भी हो यदि मातृभूमि की रक्षा की बात हो तो जान की बाजी लगाने से भी पीछे नहीं हटना चाहिए। किस कहानी का पात्र विनय इस बात को प्रमाणित करता है  कि राष्ट्र की सुरक्षा से परे कुछ नहीं हो सकता। कहानी में आप देखेंगे की विनय को अपने देश के सामने अपने भाई का संबंध भी बोना नजर आने लगता है। इतना ही नहीं विनय को देखकर वे शराबी भी देश की फिक्र करते हैं और अंत में कहते हैं- ‘इसमें उपकार की क्या बात है यह देश भाई पैसे ने ने हमें अंधा बना दिया तो क्या! यह तो हमारा भी फर्ज बनता है। प्राणों को हथेली पर रखकर देश की रक्षा के लिए समर्पित तुम जैसे युवाओं से तो हमें सीख लेनी चाहिए’। कहकर उन्होंने तेजी से गाड़ी मोड़ी और बिना अपने गंतव्य की ओर चल दिया।

‘नई जिंदगी’ नामक कहानी इस संकलन की ऐसी कहानी प्रतीत हुई, जिसे पढ़कर क्रूर से क्रूर दंभी व्यक्ति का भी हृदय परिवर्तन हो जाए। इस कहानी का पात्र ‘दुष्यंत’ ऐसा ही एक पात्र है, जो अपने अय्याशीपन के कारण जीवन को खराब कर रहा था लेकिन एकाएक उसकी मुलाकात ‘अमीरदास’ नाम के एक दरिद्र व्यक्ति से होती है। जिसके पास पहले सब कुछ था लेकिन समय का चक्र कुछ ऐसा घूमा कि आज वह अपने दो बच्चों के साथ भीख मांगने पर मजबूर है। ‘अमीरदास’ से मिलने के बाद ‘दुष्यंत’ का हृदय परिवर्तन होता है और वह परिवर्तन कुछ ऐसा होता है कि वह अमीरदास और उसके दोनों बच्चों को अपने घर में आश्रय देता है। अमीरदास को अपने विभाग में सरकारी सेवा पर लगाता है और उसके दोनों बच्चों को अच्छे विद्यालयों में पढ़ाता है। बदले में अमीरदास भी दुष्यंत के प्रति वफादार और कर्तव्य परायण रहता है। इस कहानी से मन में यह प्रश्न भी कौंधा कि यदि किस देश का हर धनाढ्य व्यक्ति दुष्यंत की तरह किसी गरीब मजबूर का हाथ पकड़ ले, तो देश-समाज से अमीरी गरीबी का यह फासला एक दिन अवश्य कम हो जाएगा।

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि यदि स्त्री परिवार को जोड़ भी सकती है और बिखेर भी सकती है। ऐसी ही कहानी है ‘राधा’। ‘राधा’ अपने पति ‘राघव’ से बहुत प्रेम करती हैं। लेकिन कुछ समय से ‘राघव’ ‘राधा’ से खिंचा-खिंचा सा और परेशान रहता है। लेकिन ‘राधा’ इसका कारण नहीं जान पाती। लेकिन एक दिन वह अपने मन की पीड़ा राधा के सामने प्रकट कर ही देता है। उसके मन की पीड़ा आज के हर उस युवक की पीड़ा है जिसका परिवार उसकी पत्नी के कारण या तो टूट गया है या बिछड़ गया है। राघव की पीड़ा है कि वह चाह कर भी अपनी विधवा मां और अपने छोटे भाई किशोर को अपने साथ शहर में नहीं रख सकता। क्योंकि राधा यह नहीं चाहती लेकिन कहानी में एक ऐसा मोड़ आता है, जब राघव की तकलीफ सुनकर राधा का हृदय परिवर्तन होता है। हालांकि ऐसा हृदय परिवर्तन बहुत कम देखने यह सुनने को मिलता है। राघव के भाव और उसकी पीड़ा को समझते हुए, वह राघव की अनुपस्थिति में बिना उसे बताएं उसके गांव पहुंच जाती है और अपनी सासू मां और किशोर को किसी तरह समझा कर, जिद और अधिकार से अपने घर शहर में ले आती है। राघव जब कई दिनों बाद घर आता है और घर पर अपनी मां और छोटे भाई को देखता है, तो उसका हृदय भर आता है। उसके लिए यह किसी दिवास्वप्न जैसा था। जब माँ ने पूरी बात राघव को बताई तो राधा के प्रति उसके हृदय में पहले से कई गुना अधिक प्यार उमड़ पड़ा वह। इतना भावुक हुआ  कि अपनी आंखों में आते हुए आंसुओं की धारा को नहीं रोक सका। उसे लगा कि कोई नई जिंदगी मिल गई है, जिसे पाने के लिए वह कब से तड़प रहा था। यदि महिलाएं घर को एकजुट रखने के लिए अपना झूठा अभिमान छोड़ दें, तो निश्चय ही प्रत्येक परिवार स्वर्ग बन जाएगा। पारिवारिक विघटन से बचने का रास्ता इस कहानी से होकर गुजरता है, ऐसा कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा

अगली कहानी ‘सुख दु:ख’ लेखक की ऐसी कहानी है जिसे बाद में उन्होंने विस्तार प्रदान कर उपन्यास ‘मेजर निराला’ का रूप दिया। इस कहानी का पात्र भावावेश में एक ऐसा विवेक हीन कार्य कर देता है जिसके लिए वह पूरी उम्र खुद को माफ़ नहीं कर पाता। 15 वर्ष जेल में सजा काटने के बाद वह दोबारा अपना जीवन शुरु करता है। जीवन के दो पहलू हैं सुख और दु:ख, परंतु यह कभी नहीं कहा जा सकता कि आखिर सब सुख के पल बदलकर दु:ख के हो जाएं। यही इस कहानी का उद्देश्य भी है कि इस समय बहुत बलवान है कब क्या रूप इस जीवन का हमें देखने को मिले कोई नहीं जानता।

इस संकलन की अंतिम कहानी का शीर्षक है ‘अपना पराया’। कहानी के पात्र ‘मृदुला’ और उसके देवर ‘राहुल’ के इर्द-गिर्द घूमती है। एक परिवार के ताने-बाने से बनी यह कहानी ‘राहुल’ के रूप में ऐसे पात्र से पाठक का परिचय कराती है, जो हमेशा दूसरों की मदद करता है और उनकी समस्याओं को दूर करने के लिए हमेशा संघर्षरत रहता है। और   अपनों के दु:खों को दूर करने के लिए सीमा से बाहर जाकर सहयोग करता है। कहानी का एक अन्य पात्र इंजीनियर खरें हैं, जो राहुल के बोस हैं। राहुल को सहयोग के लिए हर संभव मदद करते हैं। वह कहते हैं, इस भीड़ भरी दुनिया में किसे फुर्सत है कि किसी के बारे में सोचें तक करना तो बहुत दूर की बात रही। कहानी के अंत में राहुल की एक इच्छा शेष रह जाती है कि वह ‘शरद’ जो कि उसका भतीजा है, उसे पढ़ा लिखा कर बड़ा बनाना है। इसके बाद वह सदा के लिए मुक्त हो जाएगा। यही उसका लक्ष्य है और यही है उसके जीवन की अंतिम अभिलाषा।

सत्य, करुणा, प्रेम, न्याय, सद्भाव इत्यादि अनेक जीवन मूल्यों की पक्षधरता लिए निशंक जी की इस संकलन की कहानियां हैं। इन कहानियों में सीख है कि निराशा, हताशा और संघर्ष की स्थिति में अपने भीतर एक गहन आस्था और विश्वास को बनाए रखें। अजेय बने रहने की प्रेरणा इन कहानियों से हमें मिलती है। सकारात्मक जीवन दृष्टि के मूर्धन्य साहित्यकार निशंक जी का साहित्य इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने अपने साहित्य में उन सामाजिक जीवन मूल्यों को स्थान दिया है, जो राष्ट्र की पहचान है, शाश्वत है और हर युग में समाज की निमित्त के प्रतिमान सिद्ध होंगे। इनकी कहानियों की भाषा-शैली एकदम सहज सरल और आम बोलचाल की है। इसी कारण पाठक बड़े चाव से इन कहानियों को एक बैठक में आनंद विभोर होकर पड़ जाता है। निश्चय ही लेखक का यह शुरुआती लेखन हो, लेकिन आज भी समाज को रचनात्मक दिशा की ओर ले जाने के लिए सक्षम है। इसके अगले भाग में उनकी कहानी संकलन क्या नहीं हो सकता कि 11 कहानियों की समीक्षा आप सभी जन पाठकों के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी।

05.11.2020

धन्यवाद

Review by Dr. Ram Bharose 

डॉ० राम भरोसे

हिन्दी विभागाध्यक्ष

राजकीय महाविद्यालय पोखरी (क्वीली)

टिहरी गढ़वाल

9045602061

Saturday, October 24, 2020

वेब सीरीज रिव्यू : राजनीति, हिंसा से भरपूर कहानी मिर्जापुर


 


कलाकार : पंकज त्रिपाठी, अली फजल, दिव्येंदु शर्मा, विक्रांत मैसी, कुलभूषण खरबंदा, राजेश तैलंग, श्रिया पिलगांवकर, रसिका दुग्गल, शीबा चड्ढा, शुभ्रज्योति भारत और अन्य.

निर्देशक : गुरमीत सिंह, करण अंशुमान 
प्लेटफॉर्म - अमेजन प्राइम 

मिर्जापुर 2  का बेसब्री से इंतजार करने वालों का इंतजार  समय से पहले ही खत्म हो गया। 'मिर्जापुर 2' कहानी में पहले सीजन की तरह घात-प्रतिघात खूब है और दिवाली से पहले ही इसमें गोली, बारूद और तमंचों की आतिशबाजी भी जमकर दिखाई गई है। बावजूद इसके  पहले दो एपिसोड की कहानी थोड़ी स्लो है। दूसरा इसमें पहले सीजन की भांति महिलाएं सिर्फ सेक्स ऑब्जेक्ट के तौर पर नहीं है। बल्कि  इसमें महिलाओं का कैरेक्टर मजबूत है। कालीन भैया यानी पंकज त्रिपाठी एक बार फिर अपने किरदार में कमाल किया है। कालीन भैया के बेटे मुन्ना त्रिपाठी का किरदार निभा रहे दिव्येंदु शर्मा ने पिछले सीजन की तरह ही बिगड़ैल युवक को जिंदा रखा है।

इस बार कहानी पिछली बार से ज्यादा ट्विस्ट लिए हुए है। 'मिर्जापुर 2' की कहानी केवल राजा के बारे में नहीं है बल्कि उनके सिपाहियों, रानियों और उनकी वफादारी की भी है।  कुछ ऐसे सीन भी इसमें  हैं, जिन्हें देखते हुए धैर्य की जरूरत होगी है तो कुछ ऐसे सीन भी हैं जिन्हें देखते हुए आपका मुंह खुला का खुला रह जाएगा। गुड्डू पंडित और गोलू गुप्ता, मुन्ना त्रिपाठी, कालीन भैया की बीवी बीना त्रिपाठी और शरद शुक्ला सभी मिर्जापुर की गद्दी पाने के लिए किसी पर भी हमलावर होते हुए दिखाई दे जाते हैं।


अली फजल उर्फ गुड्डू पंडित  'मिर्जापुर की गद्दी' के साथ भाई (विक्रांत मैसी) और पत्नी की मौत का बदला लेने आए हैं और इसमें उनका साथ देती है श्वेता त्रिपाठी यानी गोलू। गुड्डू पूरी सीरीज में घायल हैं और कदम-कदम पर गोलू उनका साथ दे रही हैं। जहां ये दोनों अपने बदले की तैयारी में लगे हैं, वहीं पिछली बार की ही तरह दिव्येंदु शर्मा यानी मुन्ना त्रिपाठी खुद को साबित करने में जुटे हुए हैं। सीरीज में जान डालने वाले कालीन भैया (पंकज त्रिपाठी) एक मजबूर पिता और पति के रूप में ही नजर आए हैं।  'मिर्जापुर 1' की कहानी मिर्जापुर और जौनपुर तक सीमित थी, लेकिन इस बार उसका विस्तार लखनऊ और बिहार के सिवान तक हुआ है। पॉलिटिक्स के तगड़े मसालों के साथ कहानी में कुछ ऐसे नए ट्विस्ट और टर्न्स हैं जिन्हें देखकर आप कहानी को रीयल लाइफ से जोड़ने पर मजबूर हो जाएंगे।


'मिर्जापुर 2' की एक चीज, जो इसे पिछली बार से अलग बनाती है, वह है 'स्त्री शक्ति'। पिछली बार जहां दर्शकों को स्ट्रॉन्ग फीमेल कैरेक्टर्स की कमी खली थी, वहीं इस बार शो के मेकर्स ने इस बात का पूरी तरह से ख्याल रखा है। फीमेल कैरेक्टर्स के साथ खूब स्क्रीनटाइम शेयर किया गया है। कहानी में सभी महिलाएं फिर चाहे वह गोलू गुप्ता का किरदार निभा रहीं श्वेता त्रिपाठी हों, बीना के किरदार में रसिका दुग्गल हों, डिंपी के किरदार में हर्षिता गौर हों या माधुरी के किरदार में ईशा तलवार, सभी पिछली बार से ज्यादा सशक्त दिखाई दी है। 

कहानी की बात करें तो गुड्डू पंडित और गोलू अपने कनेक्शन से बिहार के सिवान के दद्दा त्यागी के बेटे भरत त्यागी से अफीम के बिजनेस के लिए बात करते हैं और उसे मना लेते हैं। दूसरी तरफ, रतिशंकर शुक्ला का बेटा शरद शुक्ला अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए कालीन भैया और मुन्ना त्रिपाठी के साथ आ जाता है। शरद को गुड्डू से अपनी पिता की मौत का बदला तो लेना ही है, लेकिन त्रिपाठियों से मिर्जापुर भी छीनना है। कालीन भैया व्यापारी और बाहुबली से आगे बढ़ते हुए राजनेता बनने की चाह में अपने बेटे मुन्ना त्रिपाठी की शादी मुख्यमंत्री की विधवा बेटी माधुरी से शादी करा देते हैं। कालीन भैया की पत्नी बीना त्रिपाठी एक लड़के को जन्म देती है। उस बच्चे का पिता कौन है, यह सस्पेंस है।

गुड्डू के पिता अपराध की आंच में सुलगते और बर्बाद होते मिर्जापुर को बचाने तथा अपने बेटे बाबलू और बहू स्वीटी को न्याय दिलवाने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं। इसमें उनका साथ देते हैं आईपीएस अधिकारी मौर्या। अंत आते-आते एक बार फिर मिर्जापुर की गद्दी की लड़ाई कालीन भैया और गुड्डू पंडित के बीच में सिमट जाती है। बीना अपने पति और सौतेले बेटे मुन्ना के खिलाफ गुड्डू और गोलू का चुपके-चुपके साथ देती हैं। इसमें उनका क्या स्वार्थ है और मुन्ना त्रिपाठी और शरद शुक्ला का क्या होता है, इन सवालों का जवाब जानने के लिए आपको मिर्जापुर 2 देखना पड़ेगा।


सीरीज का सबसे शानदार कैरेक्टर रॉबिन उर्फ राधेश्याम अग्रवाल हैं। राधेश्याम यूं तो ऑलराउंडर हैं, लेकिन पेशे से इन्वेस्टमेंट का बिजनेस देखते हैं जो गुड्डू पंडित की बहन डिंपी से प्यार करते हैं और उनसे शादी करना चाहते है। रॉबिन का किरदार निभा रहे प्रियांशु पैन्यूली अपने किरदार के साथ न्याय करते हुए नजर आते हैं। 

 भाषा के लिहाज से देखा जाए तो मिर्जापुर-1 की तरह ही इसमें भी भरपूर गालियां हैं। शुरुआती दो एपिसोड की कहानी इतनी स्लो चलती है यह आपको बोर करती है। परन्तु  इसके बाद जैसे जैसे कहानी में जैसे-जैसे नए कैरेक्टर आते जाते हैं, तो कहानी उतनी ही पावरफुल नजर आने लगती है।

मिर्जापुर उत्तर प्रदेश के उस शहर की कहानी है, जो अभी तक कायदे का शहर नहीं बन सका है। जो देखने में भी कस्बा सा ज्यादा नजर आता है। हकीकत में भी मिर्जापुर बहुत कुछ आज भी ऐसा ही है। 

अभिनय के लिहाज से मिर्जापुर अच्छी वेब सीरीज है। कई कलाकारों का काम तो चौंकाने वाला है। खासकर अली फजल और दिव्येंदु शर्मा का अभिनय। वहीं गुड्डू पंडित के रूप में अली फजल का लुक किरदार के मुताबिक ढला हुआ है। बबलू पंडित के किरदार में विक्रांत मैसी जंचे हैं। उनकी आंखों में संकोच, डर और गुस्सा किरदार के मुताबिक ही है। 


कुलमिलाकर मिर्जापुर एक अच्छी कहानी हो सकती थी। लेकिन रियलिटी के नाम पर सेक्स, वायलेंस और कई बेसिर पैर की बातें निराश करती हैं। स्थानीयता पर भी  बहुत ध्यान नहीं दिया गया है। कई जगह लगता है कि सीरीज को मसालेदार बनाने के लिए सेक्स और हिंसा के सीन जबरदस्ती ठूंस दिए गए है।   सबसे बड़ी बात मिर्जापुर की पहचान विंध्याचल से है वो सीरीज के 9 एपिसोड में कहीं दिखता ही नहीं। 

अपनी रेटिंग - ढाई स्टार

Tuesday, October 20, 2020

रिव्यू : मातृभाषा से प्रेम करना सिखाती है 'उड़ा ऐड़ा'

 

स्टारकास्ट: तरसेम जस्सर, नीरू बाजवा, पोपी जब्बाल, बीएन शर्मा, गुरप्रीत घुग्गी, करमजीत अनमोल, और अन्य


 निर्मित : क्षितिज चौधरी, नरेश कथूरिया, दीपक गुप्ता, ररूपाली गुप्ता


 निर्देशित: क्षितिज चौधरी



विदेशी भाषाओं को लेकर उन पर हमारी ऐसी एकाग्रता है कि यह आशंका है कि पंजाबी 50 वर्षों के भीतर इस्तेमाल होना बन्द हो जाएगी। पंजाबी भाषा को बचाने के लिए भी यह फ़िल्म सिनेमा शैदाइयों के दिलों में जगह बनाने में कामयाब हुई है। क्या आप जानते हैं शहरी भारत में, 44% लोग द्विभाषी हैं और 15% त्रिभाषी हैं - हालांकि, ग्रामीण क्षेत्रों में आंकड़े 22% और 5% हैं। और जिस तरह से हमारा मोह अपनी माँ बोली को छोड़कर विदेशी भाषाओं को अपनाने का हो रहा है उस लिहाज से एक दिन जरूर हम अपनी माँ बोली को भूल जाएंगे। खैर


उड़ा ऐड़ा फिल्म एक ऐसी महिला की कहानी है जो अपने बेटे को अंग्रेजी स्कूल में दाखिला दिलाना चाहती है, ताकि उसके बच्चे को उज्ज्वल भविष्य मिले लेकिन मुख्य रूप से उसका मकसद उसे धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलना सिखाना है।    फिल्म एक सिनेमाई बंडल है जहां सब कुछ एक साथ ढेर किया गया है और इसके लिए वे दर्शकों को बांधें रखने में कामयाब हुए हैं।  यह फिल्म एक सपने के नोट पर शुरू होती है जिसमें तरसेम और नीरू का रोमांस भी है। 


 10 साल के बच्चे की माँ के रूप में नीरू का अभिनय आपको चकरा देता है। गुरप्रीत घुग्गी हर बार की तरह लाजवाब रहे। और उन्होंने फौजी ताया का किरदार निभाया है। बीएन शर्मा का कहना ही क्या। बी ए शर्मा पंजाबी फिल्मों के सुपरस्टार हैं। जो इस फ़िल्म में तरसेम के पिता का किरदार निभाते हैं, जो घर पर बहुत कुछ नहीं करता है। 

 करमजीत अनमोल फिल्म में एक सुरक्षा गार्ड की भूमिका निभाते हैं और उनका चरित्र इतना नया नहीं है। पोपी जब्बाल ने स्कूल समन्वयक की भूमिका निभाई है और वह अच्छा काम करती है।  कम से कम यह लड़की अपनी भूमिका में अच्छी तरह से फिट बैठती है और इसने अच्छा प्रदर्शन भी किया है।  


 फिल्म का पहला भाग अंग्रेजी सीखने और अंग्रेजी स्कूल में प्रवेश करने के बारे में है और दूसरा भाग एक पहेली के रूप में सामने आता है।  संभवतः फ़िल्म की पूरी टीम ने लाजवाब काम किया है। 

 फिल्म का डायरेक्शन ठीक रहा लेकिन उसे और बेहतर किया जा सकता था। स्क्रीनप्ले में भी कसावट की कमी नजर आई।  

 एक कैदा ले दे बेबे मैनु उड़े ऐड़ा दा गाना दिल को छू जाता है। 

 अपनी रेटिंग - 3 स्टार


 

Monday, October 19, 2020

रिव्यू : दिलो दिमाग पर छाई 'भूरी'



बहुत कम फ़िल्में हैं जो आपको पलक झपकने तक नहीं देतीं।  भूरी निश्चित रूप से उनमें से एक है।  यह वासना, प्रभुत्व और अंधविश्वास की खोज करती हुई फ़िल्म है।  ग्रामीण मानसिकता की पृष्ठभूमि पर निर्मित, भूरी एक महिला का संघर्ष है, जो सत्ता में रहने वालों और अंधविश्वासों पर टिके रहने वालों के बीच की कहानी कहती  है।

 प्लॉट 
 फ़िल्म एक लड़की, भूरी की कहानी है, जो अपने बिसवां दशा में है और यह बेहद आकर्षक है।  उसे अपने गाँव के लोगों द्वारा मनहूस (अशुभ) माना जाता है।  भूरी ने तीन बार शादी की, और उसके सभी पति मर गए।  ग्रामीणों का मानना ​​है कि वह किसी भी शादी में एक अभिशाप है, और इसकी वजह यह है कि तीनों पतियों की मृत्यु हो गई।  इस सब के कारण उसे गाली दी जाती है और प्रताड़ित किया जाता है।  उसकी शादी अब एक 54 वर्षीय ईंट भट्ठा मजदूर, धनवा से हुई है। ग्रामीणों का मानना ​​है कि उसकी वजह से धनवा की भी मौत हो जाएगी।  सत्ता में रहने वाले सभी लोग- राजनेता, पुलिस और पुरुष उसके साथ सोना चाहते हैं और ऐसा करने के लिए वे धनवा पर दबाव डालते हैं और उसे परेशान करते हैं। धनवा जब तक बीमार नहीं पड़ता तब तक वह भूरि को सभी शातिरों के चंगुल से बचाने की कोशिश करता है।  तब जब भूरी सभी के बीच खुद को नीलाम करती है और फिर उसके साथ कुछ अविश्वसनीय होने लगता है जो पूरे गांव को सदमे की स्थिति में छोड़ देता है।

 फिल्म एक स्टनर है और इसमें भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों की जमीनी हकीकत को दर्शाया गया है।  फिल्म कुछ दिलचस्प मोड़ हैं। जो आपकी आंतरिक आत्मा तक को हिला देती है।  फिल्म वास्तव में समाज का स्कैन करती है और हमारे समाज की सच्चाई को दर्शाती है।  फिल्म में केवल एक खलनायक है, और वह इसकी ईमानदारी है।  इस फ़िल्म के माध्यम से ग्रामीण स्तर पर हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति को आसानी से महसूस किया जा सकता है।

 स्टार परफॉरमेंस फिल्म में कोई बड़ी स्टार कास्ट नहीं है, लेकिन भारतीय सिनेमा के कई जाने माने चेहरे हैं।  पीपली लाइव फेम रघुवीर यादव, धनवा की भूमिका निभा रहे हैं, जिन्होंने शानदार ढंग से भूमिका निभाई है।  जबकि मार्श पौर ने वास्तव में अपने अभिनय और संवाद के साथ अपनी भूमिका साबित की है, क्योंकि उन्होंने भूरी को चित्रित किया था।  आदित्य पंचोली, कुनिका सदानंद, शक्ति कपूर, मोहन जोशी, मुकेश तिवारी, मनोज जोशी और सीताराम पांचाल ने भी महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई हैं और अपने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है।

 फ़िल्म में क्या है?

 1. नाटक और वास्तविकता का एक बहुत ही सही और सटीक चित्रण। साथ ही  फिल्म में ग्रामीण क्षेत्रों की विकट स्थितियों को बिना किसी दोष के साथ प्रदर्शित किया गया है और यह दिखाया गया है कि किस तरह पुरुषवाद और अंधविश्वासों ने तर्क और मानवता पर नियंत्रण किया है।

 2. कुछ गहन संवाद डिलीवरी जो कि खुरदरी, गंदा और आम तौर पर ग्रामीण होती है।

 3. दर्शकों को एक मजबूत और सीधा संदेश।

 4. कुछ व्यंग्यात्मक टैपिंग गाने।

 फ़िल्म में क्या नहीं है?

 1. फिल्म में ग्रामीण सेटअप, पंचायत, जातिवाद, आदि के कुछ महत्वपूर्ण हिस्से याद हैं। किंतु उन्हें खूबसूरती से नहीं फिल्माया जा सका।

 2. अंधविश्वास और पुरुषवाद पर अंकुश लगाने की समस्या का कोई हल नहीं है।

 3. कहानी में कुछ-कुछ गायब हैं। या कहें झोल हैं।

 4. फ़िल्म का चरमोत्कर्ष बेहतर हो सकता था।

  यह देखना दिलचस्प होगा कि वास्तविकता और नाटक के साथ फिल्माई गई यह कहानी जो कुछ मूर्त गीतों से सराबोर है। वह दर्शकों को कब तक याद रह पाती है।  एक आउट-ऑफ-द-बॉक्स फिल्म भूरी आपको ऐसी उत्कृष्ट कृतियों के लिए तरसा जरूर जाएगी।
  अपनी रेटिंग - 4 स्टार 
Review By Tejas Poonia

Sunday, October 18, 2020

बुक रिव्यू : आशा की किरण है 'तिनका तिनका मध्यप्रदेश'

 

मरजानी, तिनका तिनका की श्रृंखला, तिनका तिनका तिहाड़, तिनका तिनका मध्यप्रदेश, तिनका तिनका डासना, रानियाँ सब जानती है आदि जैसी प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय किताबें लिखने वाली लेखिका एवं लेडी श्री राम कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ वर्तिका नन्दा आज अपनी एक अलग  पहचान बना चुकी हैं। देश के विभिन्न जेलों का अध्ययन करके वहाँ से कविताएं और कहानियां निकालने का अनूठा काम इन्होंने किया है। यूं तो मैंने लेखिका वर्तिका नन्दा को हमारे महाविद्यालय किरोड़ीमल में एक सेमिनार के दौरान सुन चुका हूँ। बेहद सुरीली, सुमधुर आवाज और बहुमुखी प्रतिभा की धनी इस लेखिका के द्वारा जेलों पर किए गए कार्य के लिए राष्ट्रपति से सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। तिनका तिनका फाउंडेशन की शुरुआत करके जेलों के भीतर एक बेहतर माहौल इन्होंने तैयार किया है। पुस्तक समीक्षा की कड़ी में वर्तिका नन्दा की लिखी पुस्तक तिनका तिनका मध्यप्रदेश पर बात करूं उससे पहले तिनका तिनका तिहाड़ पुस्तक में एक महिला कैदी कि कविता है।

सुबह लिखती हूँ शाम लिखती हूँ।
इस चारदीवारी में बैठी जब से, तेरा नाम लिखती हूं
इन फासलों में जो गम की जुदाई है
उसी को हर बार लिखती हूं

यह मात्र कविता ही नहीं अपितु जेल के भीतर मौजूद उस महिला कैदी की अंतर्व्यथा भी प्रकट करती है। लेखिका वर्तिका नन्दा उस पार के संसार की बातें करती हैं जो 10 बाई 10 के अंधेरे कमरे में  अपनी जिंदगी काट रहे हैं। लेखिका जेल और उस संसार को चुनती है जिसके बारे में हम कभी बात नहीं करना चाहते। इन जेलों में फूलों की क्यारी नहीं है, खुला आसमान नहीं है। और तो और पेड़ की छांव भी उन्हें मयस्सर नहीं है। है तो बस एक खिड़की  जिसमें छोटे-छोटे से सुराख हैं उनमें भी दरवाजा नहीं है। लोहे का गेट है और उस गेट पर है एक बड़ा ताला जड़ा।  रात का एलान शाम 5 बजे ही हो जाता है। तब बचे-खुचे ख्वाब भी उसी बड़े कमरे में बंद हो जाते हैं और करवट बदलने तक की इजाजत लेते हैं। यहां सिर के नीचे कोई तकिया नहीं, एक छोटा-सा कपड़ा है।

खैर इसी श्रृंखला में समीक्षार्थ हेतु किताब है तिनका तिनका मध्यप्रदेश। 'जेल’ शब्द सुनते ही ऊंची दीवारों से घिरे एक परिसर, तंग कोठरियां, लोहे के गेट की सलाखों के पीछे पकड़े गए लोगों के अनजाने चेहरों का दृश्य आंखों के आगे आ जाता है। जेल का यह स्याह पक्ष है तो उसमें अपनी सजा काट रहे लोगों में कला और रचनात्मकता एवं सृजनात्मकता का एक उजला पक्ष भी मौजूद है और उसी पक्ष से दो चार करवाती है किताब ‘तिनका तिनका मध्यप्रदेश’। यह पुस्तक 19 लोगों के जरिए जेल की कहानी कहती है- मध्य प्रदेश की जेलों में बंद बारह पुरुषों, दो महिलाओं, चार बच्चों और एक प्रहरी के जरिए जेल के हर पक्ष को इसमें सुंदर तस्वीरों के साथ सँजोया गया है। बच्चों की उम्र छह साल से कम हैं और उनमें से तीन का तो जन्म ही जेल में हुआ है।

जेल में बाहर से न कोई रसोइया आता है, न हज्जाम।
जेलें सब कुछ नए सिरे से शुरू करने और जिंदगी के अस्थायी होने के भाव को समझने में माहिर होती हैं। जो आया है , वो लौटेगा।

कविता से तिनका तिनका मध्यप्रदेश की शुरुआत होती है। कुछ जेल के भीतर की तस्वीरें भी इस किताब में मौजूद हैं। और येतस्वीरें हमें जेल के भीतर के माहौल से रूबरू करवाती हैं।

थोड़ी और जेलें
थोड़ी और सिकुड़ती जगह
थोड़ी कम हवा
सब कुछ थोड़ा
पर इंतजार बड़ा।।

कविता अपने आप में एक अनूठा प्रयोग लगती है।
जेलों के बिना समाज नहीं पर जेलें अपराध के हर सवाल का जवाब भी नहीं। जेलों की मौजूदगी से अपराधों का खात्मा हुआ हो, ऐसा नहीं है और जो जेलों में हैं, वे सभी अपराधी ही हों, ऐसा भी कोई प्रमाण नहीं है। इसलिए दुनिया की हर जेल समाज से कटा एक टापू है जहां से सवाल झांकते हैं।

किताब कि ये मात्र पंक्तियां ही नहीं है अपितु ये हमें सोचने पर मजबूर करती हैं। कि क्या जेल में सिर्फ कोई अपराध करके ही जाया जा सकता है। कभी कभी तो बेकसूर होने के बाद भी लोग जेलों में ठूंस दिए जाते हैं। और ऐसा अभी से नहीं मुगलों, अंग्रेजों के राज में भी होता था। भारत देश मे चार लाख उन्नीस हजार से भी अधिक कैदी बन्द हैं। जिनमें से करीबन तीन लाख विचाराधीन केस के मामले में फंसे हुए हैं। तिनका तिनका मध्यप्रदेश बताती है कि अकेले मध्यप्रदेश मब करीबन चालीस हजार कैदी मौजूद हैं।
जेल हमें यह बताती है कि यहां ऊंची आवाज में बोलना मना है। जेलें रंगों का बायोस्कोप हैं तो ये लिखती भी हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान से लेकर माखन लाल चतुर्वेदी भवानी प्रसाद मिश्र, गांधी, भगतसिंह आदि जैसे हजारों लाखों नाम हैं जिन्होंने जेल के भीतर सृजन का काम किया है। तिनका के इतिहास कि बात करें तो यह 2013 में सामने आया। यूं तो लेखिका कहती हैं कि उन्होंने ने प्रयास 1993 से ही शुरू कर दिया था। परंतु मुक्कमल हुआ 2013 में आकर। लता मंगेशकर सरीखी आवाज की धनी लेखिका जेल का नुमाइंदा नहीं करती बल्कि जेल के भीतर से कला और सृजन को भी बाहर लेकर आती है।

जेलों पर किया गया यह काम अपने आप में मौलिक और काबिले तारीफ है। तिनका तिनका तिहाड़ पुस्तक तो गिनीज बुक रिकॉर्ड तक में दर्ज हो चुकी है। तिनका तिनका की सभी श्रृंखला में जेल के भीतर की प्रतिभाओं के साथ साथ वहां का मुआयना करती तस्वीरें भी इसमें साझा की गई हैं। ये तस्वीरें किसी भी संवेदनशील हृदय के व्यक्ति में दया भाव पैदा करने के लिए काफी है।

Book Review By Tejas Poonia

Thursday, September 24, 2020

बुक रिव्यू : थ्रिल और सस्पेंस से भरपूर है 'समप्रीत'


दो सिटिंग में बैठकर उपन्यास समप्रीत को पढ़ गया। पिछले करीबन एक साल से भी ज्यादा लम्बा वक्फा गुज़र गया इस उपन्यास की समीक्ष्य प्रति प्राप्त हुए को और एक बात इस उपन्यास को शेल्फ़ में ही पड़ा रहने दिया। कुछ व्यक्तिगत कारणों से पढ़ नहीं पाया। ख़ैर कल रात जब इसे हाथ में उठाया तो मन ही नहीं किया कि इसे बीच में छोड़कर सो जाऊं। आधा उपन्यास अगले दिन के लिए छोड़ना पड़ा। अब जब इसे पढ़ कर खत्म किया है तो कुछ बातें हैं इस उपन्यास को लेकर। कोई भी भारतीय नारी इस बात को कभी स्वीकार नहीं कर पायेगी कि उसका पति अपने लिए ही पति ढूंढता फिरे। यानी वह समलैंगिक हो। किसी भी भारतीय पत्नी के लिए यह कष्टदायक ही होगा। ऐसी स्थिति में या तो वह उस पति से तलाक लेना पसंद करेगी या मरना। हालांकि अब समय बदल रहा है और सुप्रीम कोर्ट ने भी समलैंगिकों को अपनी मर्जी से संबंध बनाने के अधिकार दे दिए हैं तो इस बात को समझते हुए अवश्य कुछ लड़कियां अपने पति के समलैंगिक होने पर शायद आवाज ना उठाए। लेकिन प्रकृति के साथ छेड़छाड़ और सामाजिक स्वीकृति ना प्राप्त हो पाने के सवाल भी उठाए जा सकते हैं। हालांकि समलैंगिक सम्बन्धों को कानूनी मान्यता मिल चुकी है। 


यह दुनिया बहुत बुरी है - यहाँ कोई किसी की भावनाओं की कद्र नहीं करता - कोई किसी को नहीं समझना चाहता - सब ख़ुद में गुम हैं। 


कांटों भरे बिस्तर पर मखमल की चादर बिछी हो और दुनिया उस चादर को सम्मान दे रही हो तो भले वह सम्मान झूठा हो मगर जीवन के लिए ऑक्सीजन की मानिंद साबित होता है। उसके बनिस्पत सच्ची जिंदगी जिसको दुनिया का तिरस्कार प्राप्त होता है, वो जिंदगी गले की फांस बनकर हलक में अटकी रहती है। 


औरत एक अजीब चीज है, जब निबाह करने पर आती है तो बड़ी विषम परिस्थितियाँ भी उसके लिए कोई अर्थ नहीं रखतीं, यूँ समझो कि कांटों को निगल जाने की कला भी प्रकृति ने औरत को दी है और ज़ख्मों को नुमाया भी नहीं करेगी लेकिन जब वह अपने तेवर बदल ले तो ईश्वर भी उसको नहीं थाम सकता। 


पूरे उपन्यास में ये तीन वाक्यात प्रभावित करने वाले हैं। यूँ तो लगभग पूरा उपन्यास ही आपको अपनी गिरफ्त में ज़ब्त रखता है और आप तब तक उसकी गिरफ्त में कैद रहते हैं जब तक उपन्यास पूरा खत्म ना हो जाए। 

मनोज (manoj) नाम का एक लड़का है जिसकी अंकिता नाम की लड़की से शादी हुई है। शादी के कुछ समय बाद ही अंकिता को पता चलता है कि मनोज यानी उसका पति समलैंगिक यानी गे (gay) है। तो वह भीतर तक टूट जाती है। यह पता भी उसे तब चलता है जब मनोज का बचपन का दोस्त उसके ही शहर में यस (yes bank) बैंक में जॉब लगता है और वे मिलते हैं। कुछ दिन सन्नी यानी मनोज का बचपन का दोस्त उसके घर रहने आता है। मनोज उसके आने से बेहद खुश होता है। रोजाना स्त्री वेश धारण करता है। सुर्खी, लाली, लिपस्टिक और चूड़ियां आदि तमाम सौंदर्य प्रसाधन इस्तेमाल करता है। एकदम खूबसूरत लड़की के रूप में वह सजधज कर सन्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाता है। इधर उसकी पत्नी अंकिता को यह सब नागवार गुजरता है। एक दिन अंकिता को उसकी सहेली का फोन आता है और वह सुसाइड करने की बात उससे करती है। अंकिता का मनोज से शादी करने से पहले ऋषभ से प्रेम सम्बन्ध थे। वे दोनों एक दूसरे को बहुत चाहते थे। लेकिन अंकिता की माँ शीतल उन दोनों की शादी नहीं होने देना चाहती क्योंकि ऋषभ नीची जाति का है। अब ऋषभ को अंकिता की सहेली से मालूम होता है वह अपनी शादी से मुतमइन नहीं है, खुश नहीं है। इसलिए वह अंकिता से बात करता है। कहानी कुछ मोड़ लेती है और मनोज की हत्या (मर्डर) की अंकिता और ऋषभ साजिश रचते हैं और उसकी हत्या कर देते हैं। मनोज को अपने लिए संगीता नाम से उच्चारण करवाना अच्छा लगता है। ऋषभ और सन्नी इसी नाम से बुलाते हैं उसे। कभी कभी सन्नी उसे मंजू कहकर भी बुलाता है। लेकिन मनोज को संगीता नाम सुनकर (अपने लिए) सुकून मिलता है। अब चूंकि मनोज की हत्या हो चुकी है तो पुलिस उसकी जांच पड़ताल करती है। कहानी एकदम से हत्या, मिस्ट्री, उत्सुकता से मुड़ती है। कभी कभी यह बोझिल सा भी प्रतीत होता है। लेकिन किसी भी उपन्यास को पूर्ण करने के लिए कुछ कहानियां समानांतर भी चलानी होती हैं। 

उपन्यास के अंत में एक सवाल जेहन में उठता है कि अंकिता के अलावा उसकी माँ शीतल, उसके पिता और भाई मनोज को क्यों नहीं पहचानते? अंकिता तो चलो मान लिया इस हत्या में शामिल है। लेकिन इस हत्याकांड में उसकी मां , भाई, पिता तो नहीं शामिल है फिर वे क्यों पुलिस से झूठ बोलते हैं? यह सवाल लगातार बना रहता है। ये बात तो लेखक एम इकराम फरीदी ही ज्यादा बेहतर तरीके से बता सकते हैं। 

खैर उपन्यास की कहानी अच्छी है और किसी फिल्मी कहानी सी प्रतीत होती है। कभी कभी यह भी लगता है कि इस तरह के उपन्यास लिखने के दिन अब लद चुके हैं। क्योंकि ऐसे उपन्यास 60,70 के दशक में लिखे जाते थे। बस एक अच्छी बात है वह है उपन्यास का समलैंगिक विमर्श पर आधारित होना। 

उपन्यास शैली, कथ्य, कथा विस्तार, बिम्ब , शिल्प के आधार पर बेहतर बन पड़ा है। लेकिन इस तरह के उपन्यासों का ऐसा अंत होना कुछ खास अच्छा नहीं लगता। लगता है इसकी कहानी कुछ और होनी चाहिए थी। वैसे इस उपन्यास को आधार बनाकर अगर फ़िल्म बनती है तो वह अवश्य रोचक होगी। लेकिन इस तरह की फिल्में भी बी ग्रेड की फिल्मों की श्रेणी में ही शामिल की जाएंगी। 

किताबों की समीक्षा करते हुए मैंने उन्हें फ़िल्म समीक्षा की तरह कभी कोई रेटिंग नहीं दी है। क्योंकि किसी भी किताब, उपन्यास, कहानी को लिखते हुए लेखक अपना दिमाग, ऊर्जा, कल्पना शक्ति और न जाने क्या क्या दांव पर लगाकर लिखता है। लेकिन इस उपन्यास के लिए 


अपनी रेटिंग - 3 स्टार


उपन्यासकार एम इकराम फरीदी के अन्य उपन्यास निम्न हैं। 


मनोरोग के नए सूत्र (समस्या और समाधान)

द ओल्ड फोर्ट

ट्रेजेडी गर्ल

गुलाबी अपराध

ए टेरेरिस्ट 

रिवेंज

चैलेंज होटल : द हॉन्टेड प्लेस

Review By Tejas Poonia

Tuesday, September 22, 2020

बुक रिव्यू : आशा की किरण जगाती 'तिनका तिनका मध्यप्रदेश


 मरजानी, तिनका तिनका की श्रृंखला, तिनका तिनका तिहाड़, तिनका तिनका मध्यप्रदेश, तिनका तिनका डासना, रानियाँ सब जानती है आदि जैसी प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय किताबें लिखने वाली लेखिका एवं लेडी श्री राम कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ वर्तिका नन्दा आज अपनी एक अलग  पहचान बना चुकी हैं। देश के विभिन्न जेलों का अध्ययन करके वहाँ से कविताएं और कहानियां निकालने का अनूठा काम इन्होंने किया है। यूं तो मैंने लेखिका वर्तिका नन्दा को हमारे महाविद्यालय किरोड़ीमल में एक सेमिनार के दौरान सुन चुका हूँ। बेहद सुरीली, सुमधुर आवाज और बहुमुखी प्रतिभा की धनी इस लेखिका के द्वारा जेलों पर किए गए कार्य के लिए राष्ट्रपति से सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। तिनका तिनका फाउंडेशन की शुरुआत करके जेलों के भीतर एक बेहतर माहौल इन्होंने तैयार किया है। पुस्तक समीक्षा की कड़ी में वर्तिका नन्दा की लिखी पुस्तक तिनका तिनका मध्यप्रदेश पर बात करूं उससे पहले तिनका तिनका तिहाड़ पुस्तक में एक महिला कैदी कि कविता है।

सुबह लिखती हूँ शाम लिखती हूँ।
इस चारदीवारी में बैठी जब से, तेरा नाम लिखती हूं
इन फासलों में जो गम की जुदाई है
उसी को हर बार लिखती हूं

यह मात्र कविता ही नहीं अपितु जेल के भीतर मौजूद उस महिला कैदी की अंतर्व्यथा भी प्रकट करती है। लेखिका वर्तिका नन्दा उस पार के संसार की बातें करती हैं जो 10 बाई 10 के अंधेरे कमरे में  अपनी जिंदगी काट रहे हैं। लेखिका जेल और उस संसार को चुनती है जिसके बारे में हम कभी बात नहीं करना चाहते। इन जेलों में फूलों की क्यारी नहीं है, खुला आसमान नहीं है। और तो और पेड़ की छांव भी उन्हें मयस्सर नहीं है। है तो बस एक खिड़की  जिसमें छोटे-छोटे से सुराख हैं उनमें भी दरवाजा नहीं है। लोहे का गेट है और उस गेट पर है एक बड़ा ताला जड़ा।  रात का एलान शाम 5 बजे ही हो जाता है। तब बचे-खुचे ख्वाब भी उसी बड़े कमरे में बंद हो जाते हैं और करवट बदलने तक की इजाजत लेते हैं। यहां सिर के नीचे कोई तकिया नहीं, एक छोटा-सा कपड़ा है।

खैर इसी श्रृंखला में समीक्षार्थ हेतु किताब है तिनका तिनका मध्यप्रदेश। 'जेल’ शब्द सुनते ही ऊंची दीवारों से घिरे एक परिसर, तंग कोठरियां, लोहे के गेट की सलाखों के पीछे पकड़े गए लोगों के अनजाने चेहरों का दृश्य आंखों के आगे आ जाता है। जेल का यह स्याह पक्ष है तो उसमें अपनी सजा काट रहे लोगों में कला और रचनात्मकता एवं सृजनात्मकता का एक उजला पक्ष भी मौजूद है और उसी पक्ष से दो चार करवाती है किताब ‘तिनका तिनका मध्यप्रदेश’। यह पुस्तक 19 लोगों के जरिए जेल की कहानी कहती है- मध्य प्रदेश की जेलों में बंद बारह पुरुषों, दो महिलाओं, चार बच्चों और एक प्रहरी के जरिए जेल के हर पक्ष को इसमें सुंदर तस्वीरों के साथ सँजोया गया है। बच्चों की उम्र छह साल से कम हैं और उनमें से तीन का तो जन्म ही जेल में हुआ है।

जेल में बाहर से न कोई रसोइया आता है, न हज्जाम।
जेलें सब कुछ नए सिरे से शुरू करने और जिंदगी के अस्थायी होने के भाव को समझने में माहिर होती हैं। जो आया है , वो लौटेगा।

कविता से तिनका तिनका मध्यप्रदेश की शुरुआत होती है। कुछ जेल के भीतर की तस्वीरें भी इस किताब में मौजूद हैं। और येतस्वीरें हमें जेल के भीतर के माहौल से रूबरू करवाती हैं।

थोड़ी और जेलें
थोड़ी और सिकुड़ती जगह
थोड़ी कम हवा
सब कुछ थोड़ा
पर इंतजार बड़ा।।

कविता अपने आप में एक अनूठा प्रयोग लगती है।
जेलों के बिना समाज नहीं पर जेलें अपराध के हर सवाल का जवाब भी नहीं। जेलों की मौजूदगी से अपराधों का खात्मा हुआ हो, ऐसा नहीं है और जो जेलों में हैं, वे सभी अपराधी ही हों, ऐसा भी कोई प्रमाण नहीं है। इसलिए दुनिया की हर जेल समाज से कटा एक टापू है जहां से सवाल झांकते हैं।

किताब कि ये मात्र पंक्तियां ही नहीं है अपितु ये हमें सोचने पर मजबूर करती हैं। कि क्या जेल में सिर्फ कोई अपराध करके ही जाया जा सकता है। कभी कभी तो बेकसूर होने के बाद भी लोग जेलों में ठूंस दिए जाते हैं। और ऐसा अभी से नहीं मुगलों, अंग्रेजों के राज में भी होता था। भारत देश मे चार लाख उन्नीस हजार से भी अधिक कैदी बन्द हैं। जिनमें से करीबन तीन लाख विचाराधीन केस के मामले में फंसे हुए हैं। तिनका तिनका मध्यप्रदेश बताती है कि अकेले मध्यप्रदेश मब करीबन चालीस हजार कैदी मौजूद हैं।
जेल हमें यह बताती है कि यहां ऊंची आवाज में बोलना मना है। जेलें रंगों का बायोस्कोप हैं तो ये लिखती भी हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान से लेकर माखन लाल चतुर्वेदी भवानी प्रसाद मिश्र, गांधी, भगतसिंह आदि जैसे हजारों लाखों नाम हैं जिन्होंने जेल के भीतर सृजन का काम किया है। तिनका के इतिहास कि बात करें तो यह 2013 में सामने आया। यूं तो लेखिका कहती हैं कि उन्होंने ने प्रयास 1993 से ही शुरू कर दिया था। परंतु मुक्कमल हुआ 2013 में आकर। लता मंगेशकर सरीखी आवाज की धनी लेखिका जेल का नुमाइंदा नहीं करती बल्कि जेल के भीतर से कला और सृजन को भी बाहर लेकर आती है।

जेलों पर किया गया यह काम अपने आप में मौलिक और काबिले तारीफ है। तिनका तिनका तिहाड़ पुस्तक तो गिनीज बुक रिकॉर्ड तक में दर्ज हो चुकी है। तिनका तिनका की सभी श्रृंखला में जेल के भीतर की प्रतिभाओं के साथ साथ वहां का मुआयना करती तस्वीरें भी इसमें साझा की गई हैं। ये तस्वीरें किसी भी संवेदनशील हृदय के व्यक्ति में दया भाव पैदा करने के लिए काफी है।

Book review by tejas poonia

Monday, September 14, 2020

रिव्यू : उरी हमले की याद ताजा करती 'द हिडन स्ट्राइक'

 द हिडन स्ट्राइक फ़िल्म उरी हमले के बाद भारत की ओर से पाकिस्तान में कई गई सर्जिकल स्ट्राइक पर आधारित है। जी हाँ वही स्ट्राइक जिसे तथाकथित वामियों ने फर्जीकल स्ट्राइक कहा और इसके सबूत भी भारत सरकार से मांगे थे। सबूत मांगना एक अलग प्रतिक्रिया है और उस पर फ़िल्म बनाना अलग। फ़िल्म  आर्मी ऑफिसर की कहानी बयां करती है, जो अपने आलाकमान की अनुमति से सीमा पार अपने सबसे अच्छे लोगों के साथ एक गुप्त मिशन पर जाता है और अंततः सफल होता है।  कहानी काउंटर अटैक पर एक व्यंग्य है हालांकि उनके पास सभी नवीनतम संसाधन और गोला-बारूद हैं।  फिल्म एक भारतीय के रूप में आपके गुस्से को भड़का सकती है कि कैसे हमारे सैनिक हमलों में अपनी जान गंवाते हैं। 

लोकेशन वार फील्ड का वास्तविक एहसास देते हैं।  संगीत, ग्राफिक्स, स्टोरीलाइन और स्टार कास्ट कुलमिलाकर औसत हैं। यह फ़िल्म नेपोटिज्म को एक गंभीर झटका देती है क्योंकि इसमें नए कलाकारों को लिया गया है।  फिल्म कलाकार दीपराज राणा, मीर सरवर, जिमी शर्मा, संजय सिंह, लाखा लखविंदर, वेदिता प्रताप सिंह और दिल्ली बिहार गुजरात, पंजाब, हरियाणा, जम्मू और कश्मीर के थिएटर कलाकारों ने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है।  इस फिल्म में दिखाई गई गहरी पीड़ा हमारे वास्तविक नायकों के जीवन के नुकसान के खिलाफ हमारे दिलों को आगे बढ़ाती है और यह भारतीयों के लिए एक मस्ट वॉच फिल्म है।

 संगीत हमारे दिलों में एक गूँज समान है। लेकिन इस फ़िल्म का गीत संगीत निम्न स्तर का है। कहानी और स्क्रीनप्ले भी कसे हुए नहीं लगते।  निर्देशक सुजाद इकबाल खान ने कहानी के साथ-साथ लेखक अभिनाश सिंह चिब और सागर झा को भी कहानी पटकथा और संवादों के साथ उनका साथ लिया है। क्रिस्टल मूवीज के बैनर तले निर्मित की गई इस फ़िल्म में अभिनेता जिमी शर्मा ने अपने अभिनय कौशल से साबित करते हैं कि उन्होंने अपने पावर पैक के प्रदर्शन के माध्यम से सभी के दिलों को और आंखों को भावुक कर दिया।

 एक आर्मी मैन के वास्तविक जीवन को 'द हिडन स्ट्राइक' में चित्रित किया गया है, जहां देश स्वयं से पहले आता है, परिवार से पहले कर्तव्य आता है।  उनकी प्रतिबद्धता, निष्ठा और वीरता वे तत्व हैं जो आपको अंत तक स्क्रीन पर चिपकाए तो रखते हैं लेकिन नाकाम कोशिश के साथ। इस तरह की फ़िल्म को देखने के लिए अंदर जोश आना चाहिए और मुठियाँ भींच जानी चाहिए हथेलियों में पसीना आ जाना चाहिए लेकिन अफसोस ऐसा कुछ नहीं हो पाता। और देशभक्ति के नाम पर आप ठगे जाते हैं। इससे बेहतर तो ये हो कि इस फ़िल्म को न देखकर साल 2016 की खबरें ही एक बार पुनः देख ली जाएं तो कुछ देशभक्ति तो पैदा होगी। सहयोगी कलाकारों के लिए करने लायक कुछ ज्यादा है नहीं। इस फ़िल्म को देखने से बेहतर है उरी फ़िल्म को देख लिया जाए। 


शेमारूओ बॉक्स ऑफिस

निर्देशक: सुज़ाद इकबाल खान

कास्ट: दीपराज राणा, मीर सरवर, जिमी शर्मा, संजय सिंह, लाखा लखविंदर, वेदिता प्रताप सिंह, अमित अंतिल आदि। 

 निर्माता: विजय वल्लभानी और सोनू जैन

 बैनर: क्रिस्टल मूवीज

 शैली: एक्शन थ्रिलर

 अपनी रेटिंग: ढाई  स्टार


रिव्यू: मनुष्य और राक्षसों के संसार की कहानी 'कार्गो'

 

हिंदी में तय फार्मूलों और हकीकत से हटकर बहुत ही कम फिल्में बनी हैं। अगर कभी बनती भी हैं तो उनमें ऐसे प्रयोग किए जाते हैं कि फिल्म आम दर्शक के सर से गुजर जाती है। कार्गो लीक से अलग होने के बावजूद एक सहज फिल्म है, जो हमें एक कल्पनालोक में ले जाती है। जहां जीवन और मृत्यु के गंभीर प्रसंगों पर कभी-कभी आप मुस्करा भी देते हैं। 

पृथ्वी पर अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए इंसानों और राक्षसों की लड़ाई पौराणिक है। लेखक-निर्देशक आरती कदव अपनी डेब्यू फिल्म कार्गो में इस पौराणिक मिथक को कई ट्विस्ट एंड टर्न के साथ तोड़ती और पेश करती हुई प्रतीत होती है। वे एक नई-रोचक कहानी बुनकर इस बार हमारे सामने प्रस्तुत हुई  हैं। इसमें विज्ञान, अंतरिक्ष के साथ साथ आत्मा-परमात्मा , जीवन-मृत्यु का दर्शन भी है लेकिन इसे एक फैंटेसी के रूप  में ही सहजता से बुना गया लगता  है। वह भी एक ऐसे दौर में जबकि हिंदी सिनेमा में रियलिस्टिक पर जोर है, आरती काल्पनिक कहानी को जमीनी सच्चाई की तरह पेश करती हैं वह भी हल्के-फुल्के कॉमिक अंदाज में। 


इसमें साल 2027 का समय दिखाया गया है। जिसमें यहां ऐसा समय दिखाया गया है, जब इंसान चांद-मंगल से आगे बृहस्पति तक पहुंच गया है। लेकिन धरती पर हालात 2020 जैसे हैं। क्योंकि 2027 तो कपोल कल्पना के आधार पर दिखाया जा सकता है। साल 2020 की बात करें तो इस दौर में वही लोकल ट्रेनें, वही घरों की पलस्तर से उखड़ती दीवारें और उनमें काले पड़ते इलेक्ट्रिक सॉकेट मौजूद हैं। वहीं प्यार के झूठे वादे और रिश्तों में धोखा देने वाले इंसान पैदा हो रहे हैं। लेकिन कार्गो में इस जीवन-मरण के बीच में बड़ा बदलाव दिखता है। मरे हुए इंसान को लेने के लिए भैंसे पर सवार यमराज या उनके नुमाइंदे नहीं आते। यह काम मनुष्यों जैसे दिखने वाले राक्षस करते हैं। साथ ही यहां न स्वर्ग है, न नर्क। पृथ्वी पर मनुष्यों और राक्षसों के समझौते के बाद आकाशगंगा में मृत्यु के पश्चात अंतरिक्ष स्टेशन बनाए गए हैं, जहां आदमी  सिर्फ मर कर ही पहुंच सकता है। यहां उसे कार्गो यानी डिब्बाबंद माल कहा जाता है। स्टेशन में उसकी ‘मेमोरी इरेज’ की जाती है और फिर धरती पर नए शरीर में उसका जन्म होता है। 

फ़िल्म की कहानी की बात करूं तो यहां काल्पनिक काल और स्थान के बैकग्राउंड वाली यह कहानी एक अंतरिक्ष स्टेशन पुष्पक 634-ए पर 75 साल से रह रहे होमो-राक्षस प्रहस्थ (विक्रांत मैसी) की है। जिसकी उम्र कितने सौ बरस होगी, कह नहीं सकते। लेकिन चूंकि अब उसके स्टेशन में जन्म-मृत्यु के कई चक्रों से गुजर कर आते लोग कहने लगे हैं कि उसे कहीं देखा है, तो इसका मतलब है कि धरती पर कई युग बीत चुके हैं। उसके रिटायरमेंट का समय आ गया है। उसकी जगह लेने के लिए राक्षसों-मनुष्यों के इंटरप्लेनेटरी स्पेस ऑर्गनाइजेशन ने युविष्का शेखर (श्वेता त्रिपाठी) को भेजा है।  दूसरी ओर प्रहस्थ को धरती पर लौटना मुश्किल लगता है क्योंकि उसकी भावनाएं अपने काम से जुड़ी हैं। मगर यहां उसकी एक छोटी-सी प्रेम कहानी भी आरती ने दिखाई है। 


ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर आई कार्गो का फिल्माई ढांचा रोचक है। हॉलीवुड या पश्चिमी देशों में बनने वाली महंगी अंतरिक्ष फिल्मों की तुलना में सीमित संसाधनों में बनी कार्गो अंतरिक्ष फैंटेसी का सुंदर नमूना पेश करती है। कहानी और स्क्रिप्ट में दम दिखाई देता है। इसी कारण यह आपको बांधे रखने में कामयाब होती  है। मृत्यु का सफर और वहां से पुनर्जन्म की राह पर लौटना क्या इतना ही सहज किंतु रोचक होता होगा। फिल्म में मर कर अंतरिक्ष स्टेशन में आने वाले किरदारों में एक बात लगभग समान दिखती है कि वे अचानक मर गए हैं और एक बार अपने किसी प्रियजन या परिवारवाले से बात करना चाहते हैं। मृत्यु यहां मशीनी रूप में है। जिसमें ना कोई दर्द, ना तकलीफ और ना ही इमोशन है। स्मृति को ‘खत्म’ कर देने वाली या मिटा देने वाली कुर्सी पर बैठने के बाद इंसान जैसे कोरी स्लेट हो जाता है और धरती पर ट्रांसपोर्ट होने के लिए रबर के गुड्डे की भांति तैयार रहता है। ऐसे तमाम दृश्य और प्रसंग यहां आकर्षक लगते हैं।  कार्गो जीवन से मोह और मृत्यु के भय को एक समान दूरी और एक नजर से देखने की कहानी मालूम पड़ती है। कई बार जैसे हमें यह पता नहीं होता कि हम जी रहे हैं, वैसे ही हमें यह भी पता नहीं चलता कि हम मर चुके है। कुछ ऐसी ही बात कहते हुए कार्गो कहीं-कहीं हल्की मुस्कान पैदा करती है। इसमें हल्का व्यंग्य भी है।

लगभग एक घंटे 50 मिनट की यह फिल्म दर्शकों को बांधे रखने में कामयाब  है। अगर आप रूटीन फिल्मों से अलग कुछ देखना पसंद करते हैं और साइंस फिक्शन में रुचि है तो कार्गो आपके लिए है। हिंदी में ऐसी फिल्में दुर्लभ है। अतः एक अलग अनुभव के लिए इस फिल्म को देखा जा सकता है। विक्रांत मैसी और श्वेता त्रिपाठी ने अपनी भूमिकाएं सहजता से निभाई हैं। फिल्म के सैट अच्छे से डिजाइन किए गए लगते हैं।  इसका आर्ट डायरेक्शन और वीएफएक्स कहानी के अनुकूल हैं। फ़िल्म के सेट, लोकेशन को छोड़ गाने ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाते। 

अपनी रेटिंग - 3 स्टार


Saturday, August 29, 2020

रिव्यू : सड़क 2 झेल सको तो झेल लो

 



 कास्ट: संजय दत्त, आलिया भट्ट, आदित्य रॉय कपूर, जीशु सेनगुप्ता, प्रियंका बोस, मकरंद देशपांडे, गुलशन ग्रोवर
  निर्देशक: महेश भट्ट
अपनी रेटिंग: एक स्टार

 हो सकता है कि किसी दिन महेश भट्ट इस पीढ़ी के सबसे रोमांचक अभिनेताओं में से एक, आलिया भट्ट के साथ कुछ कर रहे हों। लेकिन अफसोस की बात है कि सड़क 2 वह फिल्म नहीं है। सड़क 2 को पसंद करने की हिम्मत रखने वाले सभी लोगों पर मेहरबान होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।  फिल्म को अगर एक शब्द में कहना हो तो कहा जा सकता है कि यह भयानक है। कोई भी इस दिन और उम्र में इतना थकाऊ क्यों बनना चाहेगा? यह तो ऊपर वाला ही जाने।

 

 1991 की सड़क को देखें तो पता चलता है एक हँसते हुए टैक्सी-ड्राइवर और पटरियों के गलत साइड से एक लड़की के बीच एक उच्चस्तरीय रोमांस, एक समय की यादें वापस लाता है जब बॉलीवुड कहानियों को बताना जानता था।  उस संजय दत्त-पूजा भट्ट अभिनीत फिल्म के बारे में कुछ भी मौलिक नहीं था, लेकिन अतुलनीय सदाशिव अमरापुरकर द्वारा बुरी महारानी के रूप में प्रस्तुत किए गए खस्ता कथानक और प्रदर्शन के मिश्रण के बारे में कुछ ने इसे उस युग की सबसे यादगार फिल्मों में से एक बना दिया।

 

 लगभग तीस साल बाद यह ’सीक्वल’ आया है, और सीधे ही आपको पता चलता है कि यह एक खोया हुआ कारण जानने के लिए है।  ऐसा नहीं है कि संजय दत्त, अब उचित रूप से पुराने और आकर्षक रूप से जकड़े हुए हैं, उनकी भूमिका को मजबूत करने वाले टैक्सी-चालक रवि के रूप में, कुछ भी खो दिया है।  और ऐसा नहीं है कि आलिया भट्ट, जिनकी उत्तराधिकारी आर्या को सड़क पर आने के लिए सख्त जरूरत है, एक ठोस कलाकार नहीं है।

 

 फ़िल्म के सहायक कलाकार तो जर्जर है हीं साथ ही  जिशु सेनगुप्ता, जो हिंदी सिनेमा में लगातार अतिक्रमण कर रहे हैं, यहां प्रियंका बोस के साथ उनकी पापी मां के रूप में हैं और आर्या के पिता हैं।  आम तौर पर विश्वसनीय मकरंद देशपांडे को  ढोंगी बाबा के रूप में पागलपन करने का मौका मिलता है।  और 80 के दशक के अंत में, 90 के दशक की शुरुआत में, गुलशन ग्रोवर, संक्षेप में पॉप अप होते दिखाई देते हैं।

 लेकिन इनमें से किसी भी अभिनेता को ऐसा करने के लिए कुछ भी विश्वसनीय नहीं दिया गया है।  इस हरे-भरे दिमाग वाले प्लॉट का सपना किसने देखा था?  निश्चित रूप से, यह दुष्ट माँ और भिखारी दादा और लालची स्वामियों के लिए पूरी तरह से स्वीकार्य है जो निर्दोषों का शिकार करते हैं।  यहाँ और बहादुर लड़कियां हो सकती हैं, उनके वफादार स्वैन्स (रॉय कपूर) के साथ, जो अनैतिक रूप से ऊपर जाना चाहते हैं।  'और' श्वर के खिलाफ लड़ने के लिए, जैसा कि सड़क 2 वर्तमान में चाहती  है, एक अच्छी बात है, लेकिन इस तरह से?  एक विश्वसनीय दृश्य, या चरित्र, या ट्विस्ट के साथ नहीं?

 

 यह विश्वास करना कठिन है कि यह महेश भट्ट की और से आती है, जिसने हमें र्थ, नाम और 1999 ज़ख्म जैसे क्लासिक्स दिए हैं, जो धर्मों और लोगों के बीच बढ़ती दरार के लिए इतनी भव्यता और भावनात्मक रूप से बोलते थे।  यह एक ऐतिहासिक फिल्म थी।  अपने सबसे अच्छे काम में, भट्ट ने क्षण के स्वाद को पकड़ने और उस स्मार्ट मुख्यधारा में अनुवाद करने की क्षमता थी, और जब उन्होंने निर्देशन को रोकने का फैसला किया तो यह एक खाई थी।


 मुख्य कहानी के खिलाफ संघर्ष करने वाले एकमात्र व्यक्ति दत्त हैं।  लंबे समय तक याद रखने वालों को याद हो सकता है कि दत्त, एक महान अभिनेता, कभी भी स्क्रीन पर मौजूद नहीं थे, और कैसे उन्होंने और पूजा भट्ट (जिन्हें हम अगली कड़ी में अक्सर फ्लैशबैक में देखते हैं) ने एक जोड़ी बनाई जिसकी हमने देखभाल की।  इन हस्तक्षेप के वर्षों में, जिसके दौरान उन्होंने व्यक्तिगत और व्यावसायिक अशांति का अनुभव किया, दत्त ने सीखा कि कैसे एक भूमिका को भरना है, और हमें विश्वास करना है।  सड़क 2 में, सभी आलस्य के बावजूद, वह आखिरी आदमी खड़ा है।  लेकिन यह इस फिल्म को अविश्वसनीय रूप से कम से कम अच्छे से अच्छा नहीं करता है।

 हो सकता है कि किसी दिन महेश भट्ट इस पीढ़ी के सबसे रोमांचक अभिनेताओं में से एक, आलिया के साथ कुछ कर रहे हों।  अफसोस की बात है कि सड़क 2 वह फिल्म नहीं है।
 फ़िल्म के गाने कुछ खास और याद रखने लायक नहीं है। निर्देशन, एक्टिंग सब चरमराई सी दिखाई देती है। 

 सदाक 2 डिज्नी प्लस हॉटस्टार पर चल रही है।
रिव्यू by तेजस पूनिया